अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

ब्रिक्स सम्मेलन में शाकाहारी गाला डिनर की नफासत

ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने एक गाला डिनर रखा, जिसका नाम दिया गया “अन्नपूर्णा”। यहाँ बता दें कि गाला डिनर बड़ा, औपचारिक और उत्सवपूर्ण रात्रिभोज होता है जो किसी खास मकसद या जश्न के लिए आयोजित किया जाता है। मोदी का पूरा डिनर पूरी तरह शाकाहारी था जिसकी मीडिया में खूब डींग हाँकी गयी। मेन्यू में गुच्ची मार्मिक, बाजरा पुलाव, खुम्ब गलौटी, पनीर लबाबदार जैसे व्यंजन थे और इसे भारत की संस्कृति का प्रतिनिधित्व बताया गया। पूरे देश का प्रतिनिधित्व करने वाले राष्ट्रीय मंच पर केवल शाकाहारी भोजन को “भारतीय संस्कृति” के रूप में पेश किया गया, जबकि देश के 70 फीसदी लोग मांसाहारी हैं। हम सभी जानते हैं कि आज मांस खाने पर लोगों के साथ मारपीट की जाती है, कई जगह हत्या तक कर दी जाती है, मांस खाने वालों को अशुद्ध और शाकाहारी को शुद्ध बताने की कोशिश होती है, सावन और दूसरे त्योहारों के बहाने मांस की दुकानें बन्द करवाई जाती हैं। ऐसे में यह केवल खाना नहीं है, बल्कि भाजपा और आरएसएस का रजनीतिक एजेंडा बन गया है।

सबसे पहले यह भ्रम तोड़ना होगा कि भारत हमेशा से शाकाहारी देश रहा है। भारत की पहचान उसकी विविधता है। उत्तर–पूर्व, बंगाल, केरल, कश्मीर, गोवा, तटीय इलाके, आदिवासी समाज, अनुसूचित जाति समाज और अनेक पिछड़े समुदाय हजारों साल से मछली, मटन, भैंस का मांस और दूसरे प्रकार का मांस खाते आये हैं। भारत की असली पहचान एक थाली नहीं, बल्कि हजारों थालियाँ हैं। फिर दुनिया को केवल शाकाहारी थाली क्यों दिखाई गयी? ब्रिक्स में परोसी गयी गुच्ची मार्मिक, यानी हिमालयी गुच्छी मशरूम की कीमत कई बार 20–30 हजार रुपये प्रति किलो तक है। इसे प्रधानमंत्री खा सकते हैं। अरबपति खा सकते हैं। लेकिन राशन की लाइन में खड़ा परिवार क्या खाएगा?

अमीर के लिए शाकाहार का मतलब गुच्छी मशरूम, ब्रोकली, एवोकाडो, कीवी, चिया सीड्स, महँगी मिलेट्स, काजू, बादाम और ऑर्गेनिक दूध है। गरीब के लिए शाकाहार का मतलब पतली दाल–चावल, रोटी, आलू, भिंडी, गोभी और कभी–कभार थोड़ा दूध है। आज दाल की कीमत कई परिवारों के बजट से बाहर चली गयी है। शुद्ध दूध गरीब को नसीब नहीं, बादाम के रूप में मूँगफली खायी जाती है। अमीर की खिचड़ी भी सिर्फ दाल और चावल से नहीं बनती, गरीब की पूरी शाकाहारी थाली पेट भरने तक सीमित रहती है। उसमें पोषकता भी नहीं होती और उसे खाकर बीमारियों से लड़ने की ताकत भी पैदा नहीं होती।

यह बात सबसे खतरनाक है, क्योंकि भारत में आज भी कुपोषण कोई छोटी समस्या नहीं है। नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे–5 (एनएफएचएस–5) के मुताबिक देश के लगभग 35.5 प्रतिशत बच्चे ठिगने हैं, यानी उनकी लम्बाई उम्र के हिसाब से कम रह जाती है। लगभग 32 प्रतिशत (5 करोड़) बच्चे कम वजन के हैं। लगभग 6 करोड़ बच्चे उम्र के हिसाब से कम लम्बाई के साथ बड़े हो रहे हैं। इससे भी ज्यादा चिन्ताजनक बात यह है कि 15 से 49 वर्ष की लगभग 57 प्रतिशत महिलाएँ खून की कमी (एनीमिया) से पीड़ित हैं। यह केवल भूख का आँकड़ा नहीं है, यह बताता है कि करोड़ों लोगों की थाली में लगातार प्रोटीन, आयरन, विटामिन, जिंक और दूसरे जरूरी पोषक तत्व कम पड़ रहे हैं।

कुपोषण की सबसे बड़ी वजह सिर्फ गरीबी है। इसके साथ ही शाकाहारी गरीब के पास विकल्प ही नहीं हैं। दाल महँगी है। दूध मिलावटी है। फल महँगे हैं। सूखे मेवे पहुँच से बाहर हैं। सरकार की 5 किलो राशन योजना कैलोरी देती हैं, पोषण नहीं। अब सवाल यह है कि किसी गरीब परिवार को ज्यादा पोषण कहाँ से मिलेगा? एक अंडे में उच्च गुणवत्ता वाला प्रोटीन, विटामिन बी12 और कोलीन होता है। छोटी मछली प्रोटीन के साथ ओमेगा–3 और आयरन देती है। चिकन भी प्रोटीन का अच्छा स्रोत है। दूसरी तरफ शाकाहारी विकल्प बहुत महँगे हैं। ऐसे में जिस भोजन से गरीब कम पैसे में ज्यादा पोषण पा सकता है, वही भोजन उनके लिए अच्छा है। लेकिन इन्हें ही भाजपा–आरएसएस निशाना बनाते हैं और शाकाहार को बढ़ावा देने के नाम पर जनता के बीच भेदभाव पैदा करते हैं।

सबसे बड़ा पाखण्ड क्या है? एक तरफ सार्वजनिक मंचों पर शाकाहार और दूसरी तरफ भारत दुनिया के सबसे बड़े भैस–मांस निर्यातकों में है। विदेशों में मांस बेचना ठीक है, लेकिन देश में मांस खाने वालों पर हमला किया जाएगा। यह दोहरा मापदण्ड क्यों?

भारत की पहचान दाल–रोटी है, तो मटन, मछली और मुर्गा भी है। बंगाल के भाजपा नेता चुनाव जीतने के लिए मछली और मुर्गे को खुलेआम खाकर खुद को बंगाली परम्परा का हिस्सा घोषित करते हैं। पूर्वोत्तर के भाजपा नेता बीफ खाते हैं और अपने बचाव में तर्क देते हैं कि मिथुन का मांस खाया जा सकता है। ये कैसे कपटपूर्ण तर्क हैं? ऐसा ही छल–कपट ब्रिक्स में शाकाहारी दावत देकर किया जा रहा है। भाजपा के ऐसे जन–विरोधी एजेण्डे से सावधान रहने की जरूरत है।

–– विश्व प्रताप सिंह

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