अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

जीडीपी के आँकड़े बनाम आम आदमी की जेब

–– विश्व प्रताप सिंह

 

भारत में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के नए आँकड़े आने के बाद एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं। सरकार की नयी गणना के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था लगभग 7-8 प्रतिशत की तेज गति से बढ़ रही है। लेकिन पूर्व वित्त सचिव सुभाष चन्द्र गर्ग सहित कुछ अर्थशास्त्रियों ने इन आँकड़ों और जीडीपी की गणना की नयी पद्धति पर सवाल उठाये हैं। यहाँ सवाल यह नहीं है कि सरकार के आँकड़े गलत हैं। असली सवाल यह है कि क्या सरकार ने यह समझाने के लिए पर्याप्त जानकारी दी है कि ये आँकड़े कैसे निकाले गये और इन पर भरोसा कैसे किया जा सकता है।

जीडीपी को अकेले देखकर अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। इसलिए इसे निवेश, लोगों की खपत, बैंक क्रेडिट, निर्यात, बिजली की खपत, कम्पनियों की बिक्री और टैक्स कलेक्शन जैसे दूसरे आर्थिक संकेतकों के साथ भी देखना जरूरी है। यहीं कुछ सवाल पैदा होते हैं। पिछले कुछ वर्षों में जहाँ जीडीपी की वृद्धि लगभग 7–8 प्रतिशत बतायी गयी, वहीं कई दूसरे संकेतक उतनी तेज वृद्धि नहीं दिखा रहे थे। उदाहरण के लिए, घरेलू खपत और कुछ निवेश सम्बन्धी आँकड़े अपेक्षाकृत कमजोर रहे। बिजली की खपत और कुछ अन्य आर्थिक गतिविधियों में भी जीडीपी की बतायी गयी गति जैसी मजबूती हमेशा दिखाई नहीं दी। हालाँकि हाल की तिमाही में तस्वीर कुछ बेहतर हुई है। निवेश, बैंक क्रेडिट, निर्यात, बिजली की खपत और कम्पनियों की असली बिक्री जैसे कई संकेतकों में तेजी दिखाई दी है। इसलिए यह कहना भी सही नहीं होगा कि जीडीपी के आँकड़ों के खिलाफ हर संकेतक खड़ा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों के आँकड़ों में जो अन्तर दिखाई देता है, उसका स्पष्ट जवाब मिलना जरूरी है। एक और महत्वपूर्ण सवाल तेल की कीमतों को लेकर है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में तेल आयात करता है। जब तेल महँगा होता है तो आयात का खर्च बढ़ता है और अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ता है। हाल के समय में ऊर्जा कीमतों का झटका काफी बड़ा रहा है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि इतने बड़े ऊर्जा झटके के बावजूद जीडीपी इतनी मजबूत कैसे बनी रही। सरकार का तर्क हो सकता है कि जीडीपी की गणना की पद्धति बदल गयी है और इसलिए पुराने और नये आँकड़ों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती। यह बात अपने आप में सही हो सकती है, क्योंकि जीडीपी की पद्धति में बदलाव से आँकड़ों में बड़ा अन्तर आ सकता है। लेकिन इससे सारे सवाल खत्म नहीं हो जाते।

भारत में आर्थिक आँकड़ों को लेकर पहले भी कई विवाद हो चुके हैं–– चाहे वह जीडीपी संशोधन हों, 2017–18 का खपत–व्यव सर्वे हो, कोविड से जुड़े आँकड़े हों या खुले में शौच से सम्बन्धित आँकड़े। हर मामले का अपना अलग स्पष्टीकरण हो सकता है, लेकिन बार–बार होने वाले ऐसे विवाद धीरे–धीरे आँकड़ों की विश्वसनीयता को कमजोर करते हैं।

लेकिन आँकड़ों से परे, जमीन पर दिखने वाली तस्वीर क्या है?

जीडीपी की बहस किताबी नहीं होनी चाहिए, बल्कि आम आदमी की रसोई, खेत और पगार–पर्ची तक पहुँचनी चाहिए। अगर अर्थव्यवस्था वाकई 7–8 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है, तो यह तेजी मजदूरों, किसानों और मध्यम वर्ग की जेब में उसी अनुपात में क्यों नहीं दिखती? मजदूरों की असली मजदूरी लगभग गिर रही है। श्रम ब्यूरो और पीएलएफएस जैसे सरकारी स्रोतों पर आधारित शोध बताते हैं कि 2010–11 से 2015–16 के बीच ग्रामीण मजदूरों की असली आय करीब 7 प्रतिशत सालाना की दर से बढ़ी थी, लेकिन उसके बाद के वर्षों में यह वृद्धि लगभग शून्य के बराबर रह गयी। आर्थिक सर्वेक्षण 2024–25 के हवाले से भी यह सामने आया है कि लॉकडाउन के बाद से ग्रामीण गैर–कृषि मजदूरी में वृद्धि लगभग शून्य है और कृषि मजदूरी में सालाना 2 प्रतिशत से कम वृद्धि हुई है। यानी नाममात्र मजदूरी भले ही बढ़ी हो, महँगाई उसे लगभग बराबर कर देती है–– इसी को अर्थशास्त्री “ठहरी हुई असली मजदूरी” कहते हैं।

किसानों की आय दोगुनी करने को लक्ष्य का हकीकत से कोई लेना–देना नहीं है। सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था, जिसके लिए असली आय में करीब 10–4 प्रतिशत सालाना वृद्धि जरूरी थी। लेकिन राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के अपने आँकड़े बताते हैं कि 2012–13 से 2018–19 के बीच कृषक परिवारों की कुल असली आय में औसतन करीब 3–3.5 प्रतिशत सालाना की दर से ही बढ़ोतरी हुई ––   यानी लक्ष्य का एक–तिहाई भी नहीं। खेती से होने वाली शुद्ध आय का हिस्सा इसमें और भी कम रहा, क्योंकि किसान परिवारों की आय का बड़ा हिस्सा अब मजदूरी, पशुपालन और गैर–कृषि कामों से आता है, न कि खेती से।

शहरी मध्यम वर्ग की खपत भी दबाव में है। नेस्ले, हिन्दुस्तान यूनिलीवर, आईटीसी जैसी तेजी से बढ़ती उपभोक्ता वस्तुओं (एफएमसीजी) की कम्पनियों ने खुद बार–बार शहरी माँग में सुस्ती की बात कही है। निजी अन्तिम उपभोग व्यय (पीएफसीई) की वृद्धि दर भी कम हो रही है। बेरोजगारी दर बढ़कर 45 साल के उच्चतम स्तर तक पहुँच गयी थी। उच्च शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी की दर आज भी बहुत अधिक बनी हुई है और शहरी युवा बेरोजगारी ग्रामीणों की तुलना में लगभग दोगुनी है। नतीजा यह है कि उपभोक्ता महँगे ब्रांड छोड़कर सस्ते, बिना–ब्रांड वाले विकल्पों की ओर जा रहे हैं जिसे बाजार की भाषा में “डाउन–ट्रेडिंग” कहा जाता है।

विराट अर्थव्यवस्था, और कंगाल नागरिक

जीडीपी के आँकड़ों की चमक में अक्सर एक बुनियादी तथ्य छिप जाता है––   भारत भले ही आज दुनिया की चैथी या पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका हो, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के मामले में यह आज भी दुनिया के सबसे पिछड़े देशों में गिना जाता है। अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अक्तूबर 2025 के वर्ल्ड इकॉनोमिक आउटलुक के अनुसार, भारत की प्रति व्यक्ति औसत आय करीब 3 लाख रुपये सालाना है और इस पैमाने पर भारत दुनिया के 194 देशों में करीब 144वें स्थान पर है। यानी कुल अर्थव्यवस्था के आकार में भारत जितना ऊपर है, हर नागरिक के हिस्से आने वाली औसत आय के मामले में उतना ही नीचे है।

यह अन्तर तब और साफ हो जाता है जब भारत की तुलना उन्हीं देशों से की जाये जो 1990 और 2000 के दशक में भारत जैसी ही स्थिति में थे। विजुअल कैपिटलिस्ट के हालिया विश्लेषण के अनुसार, वर्ष 2000 से 2025 के बीच असली प्रति व्यक्ति जीडीपी (महँगाई–समायोजित) में सबसे तेज वृद्धि करने वाले देशों में चीन शीर्ष पर है–– जहाँ प्रति व्यक्ति आय में 518 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई और यह 2025 में करीब 24 लाख रुपये तक पहुँच गयी। इसके बाद वियतनाम (266 प्रतिशत) और भारत (235 प्रतिशत) का स्थान आता है। यानी संख्या के हिसाब से भारत की वृद्धि दर भी सम्मानजनक रही है, लेकिन शुरुआती आधार इतना नीचे था कि 235 प्रतिशत की वृद्धि के बावजूद भारत की प्रति व्यक्ति आय आज भी वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों के आसपास या उनसे पीछे बनी हुई है, जबकि चीन भारत से पाँच से आठ गुना आगे निकल चुका है। ब्रिक्स देशों में भी भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी सबसे कम है–– रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और चीन, सभी भारत से काफी आगे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि भारत की कुल जीडीपी का आकार जितनी तेजी से बढ़ रहा है, उतनी ही तेजी से आय के असमान बटवारे के चलते वह “प्रति व्यक्ति” औसत आय में तब्दील नहीं हो पा रहा। एक बड़ी अर्थव्यवस्था होना अलग बात है और हर नागरिक तक उस समृद्धि का पहुँचना बिल्कुल अलग बात।

ऊपर की 5 प्रतिशत आबादी को हटा दें, तो बाकी देश की तस्वीर क्या है?

इस सवाल को शायद जीडीपी की पूरी बहस में सबसे ज्यादा अनदेखा किया जाता है–– औसत की गणित हमेशा सच नहीं बताती। अगर देश की आय में सबसे ऊपर के 5 प्रतिशत या 10 प्रतिशत लोगों को हटा दिया जाये, तो बाकी बचे 90–95 प्रतिशत लोगों की तस्वीर बिल्कुल अलग दिखती है।

दिसम्बर 2025 में जारी विश्व असमानता रिपोर्ट 2026 (जिसे विश्व असमानता प्रयोगशाला–– पेरिस के अर्थशास्त्री लुकास शांसेल और थॉमस पिकेटी जैसे शोधकर्ताओं ने तैयार किया है) के अनुसार, भारत में शीर्ष 10 प्रतिशत कमाने वाले लोग देश की कुल राष्ट्रीय आय का लगभग 58 प्रतिशत हिस्सा अपने पास रखते हैं, जबकि सबसे नीचे के 50 प्रतिशत लोगों को इसका सिर्फ 15 प्रतिशत हिस्सा मिलता है। सम्पत्ति के मामले में असमानता और भी ज्यादा है–– शीर्ष 10 प्रतिशत के पास देश की करीब 65 प्रतिशत सम्पत्ति है और अकेले शीर्ष के 1 प्रतिशत के पास लगभग 40 प्रतिशत सम्पत्ति है, जबकि सबसे गरीब आधी आबादी के पास कुल सम्पत्ति का महज 6–4 प्रतिशत हिस्सा है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि 2014 से 2024 के बीच शीर्ष 10 प्रतिशत और सबसे गरीब 50 प्रतिशत के बीच की यह खाई कम होने के बजाय बढ़ती जा रही है, यानी बीते दशक की तेज जीडीपी वृद्धि का लाभ ऊपर के तबके तक ही पहुँचा है न कि नीचे के तबके तक नहीं।

व्यावहारिक भाषा में समझें, तो इसका मतलब यह है कि अगर देश की जीडीपी प्रति व्यक्ति के हिसाब से 3 लाख रुपये सालाना दिखायी जाये, तो यह एक भ्रामक औसत है। शीर्ष 5–10 प्रतिशत लोग–– बड़े कॉर्पाेरेट मालिक, वरिष्ठ पेशेवर, बड़े ठेकेदार और शहरी सम्पन्न वर्ग–– इस औसत को ऊपर खींच देते हैं। लेकिन जब असली संख्या देखी जाये, तो देश की नीचे की आधी आबादी के पास खर्च करने लायक इतना कम पैसा बचता है कि वह न तो टिकाऊ उपभोग बढ़ा सकती है, न बचत कर सकती है और न ही बेहतर शिक्षा–स्वास्थ्य में निवेश कर सकती है। यही वजह है कि ग्रामीण मजदूरों की असली मजदूरी दशक भर से लगभग ठहरी हुई है या कम हो रही है। किसान परिवारों की आय वृद्धि लक्ष्य से बहुत पीछे है और शहरी मध्यम व निम्न–मध्यम वर्ग महँगे ब्रांड छोड़कर सस्ते विकल्पों की ओर जा रहे हैं क्योंकि “औसत आय बढ़ने” की कहानी में उनका हिस्सा उतना नहीं है जितना आँकड़े दिखाते हैं।

यह विश्लेषण किसी एक सरकार या दल के खिलाफ आरोप नहीं है–– विश्व असमानता रिपोर्ट खुद बताती है कि भारत में आय व सम्पत्ति की यह असमानता उदारीकरण के बाद, यानी बीते तीन दशकों में लगातार बढ़ी है और यह प्रवृत्ति अलग–अलग सरकारों के दौर में जारी रही है। सवाल यह नहीं है कि किसकी नीति सही थी और किसकी गलत, बल्कि यह है कि जब समग्र जीडीपी तेजी से बढ़ रहा हो, तब यह बढ़ोतरी जनसंख्या के बड़े हिस्से तक पर्याप्त रूप से क्यों नहीं पहुँच रही और नीति–निर्माताओं को  “ट्रिकल डाउन” सिद्धान्त की विफलता को स्वीकार करते हुए वितरण पर उतना ही ध्यान क्यों नहीं देना चाहिए जितना कुल वृद्धि दर पर दिया जाता है।

तेज जीडीपी वृद्धि का एक स्वाभाविक परिणाम बेहतर सार्वजनिक बुनियादी ढाँचा होना चाहिए–– सड़कें, अस्पताल, स्कूल, सार्वजनिक परिवहन। सरकार सड़क और राजमार्ग निर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाने का दावा जरूर करती है, लेकिन आम नागरिक के अनुभव में सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च, ग्रामीण सड़कों की गुणवत्ता और शहरों में भीड़भाड़, जल–भराव व प्रदूषण जैसी समस्याएँ उस रफ्तार से हल होती नहीं दिखतीं जितनी तेज जीडीपी वृद्धि का दावा किया जाता है या कई बार तो ये सार्वजनिक सुविधाएँ बद–से–बदतर होती जाती हैं।

असली सवाल क्या है?

मसलन, अगर कोई दुकानदार कहे कि उसकी दुकान की बिक्री 8 प्रतिशत बढ़ी है, लेकिन उसके ग्राहक, बिजली की खपत और खरीदारी के आँकड़े केवल 3–4 प्रतिशत वृद्धि दिखा रहे हों, तो इसका मतलब यह जरूरी नहीं कि दुकानदार झूठ बोल रहा है। लेकिन उससे यह पूछना बिल्कुल उचित होगा कि उसने 8 प्रतिशत वृद्धि की गणना कैसे की।

आखिरकार, अच्छी आर्थिक व्यवस्था के लिए सिर्फ चमकते आँकड़े पर्याप्त नहीं होते। जरूरी यह भी है कि उन आँकड़ों को लोग, अर्थशास्त्री और स्वतंत्र संस्थाएँ समझ सकें, उनकी जाँच कर सकें और यह भी परख सकें कि वे आम नागरिक की असल जिन्दगी से मेल खाते हैं या नहीं।

जब तक भारत की प्रति व्यक्ति आय दुनिया में 140वें पायदान के आसपास बनी रहेगी और जब तक शीर्ष 10 प्रतिशत ही राष्ट्रीय आय का आधे से ज्यादा हिस्सा समेटता रहेगा, तब तक “दुनिया की सबसे तेज बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था” होने का दावा आम नागरिक के लिए एक छलावे से ज्यादा कुछ नहीं होगा।

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