जनवरी 2025, अंक 47 में प्रकाशित

अमरीकी आरोपों ने अडानी की अजेयता के मिथक को कैसे तोड़ दिया

–– परंजॉय गुहा ठाकुरता

(यह मामला न केवल अडानी के व्यापारिक साम्राज्य की पड़ताल करता है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनके सम्बन्धों की भी जाँच करता है जिन्होंने लगातार इस दिग्गज उद्योगपति के हितों को बढ़ावा दिया है।)

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गौतम अडानी, उनके भतीजे और उनके सहयोगियों पर अमरीका में अभियोग चलाये जाने से भारत और दुनिया के सबसे धनी लोगों में से एक व्यक्ति की महत्वाकांक्षाओं को झटका लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नजदीकी रखने वाले इस प्रमुख उद्योगपति को इससे पहले कभी इस तरह से झटका नहीं लगा था। उनकी प्रतिष्ठा दाँव पर लगी है। और इसके साथ ही उनकी कारोबारी योजनाएँ भी दाँव पर हैं।

जनवरी 2023 में प्रकाशित न्यूयॉर्क स्थित शॉर्ट–सेलिंग फर्म हिण्डनबर्ग रिसर्च की 30,000 शब्दों की रिपोर्ट में दावा किया गया था कि अडानी “कॉर्पाेरेट इतिहास में सबसे बड़ा घोटाला कर रहे हैं”, और खोजी पत्रकारों की अनगिनत रिपोर्टें, जिनमें ऑर्गनाइज्ड क्राइम एण्ड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (ओसीसीआरपी) के लोग भी शामिल हैं, उन पर, उनके परिवार के सदस्यों और उनके साथ मिलकर काम करने वाले अन्य लोगों पर लगाये गये आरोपों की गम्भीरता और गहराई के सामने महत्वहीन हो जाती हैं, जो अमरीका की संघीय सरकार की दो एजेंसियों–– न्याय विभाग (डीओजे) और उस देश के वित्तीय बाजारों के नियामक, प्रतिभूति और विनिमय आयोग (एसईसी) द्वारा लगाये गये हैं। ये आरोप, मुख्यत: संघीय जाँच ब्यूरो (एफबीआयी) की जाँच पर आधारित हैं।

अपने खिलाफ गिरफ्तारी वारण्ट के बावजूद अडानी अपने जनसम्पर्क तंत्र की मदद से साहसी मोर्चा खोलने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन शायद उन्हें, उनके संरक्षक मोदी की तरह, एहसास है कि दीवानी और आपराधिक आरोपों के इस दौर के बाद चीजें फिर कभी वैसी नहीं हो सकतीं। ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि भारत में कोई भी पूँजीपति देश की सरकार के मुखिया के इतने करीब नहीं रहा है – दोनों सियामी जुड़वाँ की तरह हैं और इस कारण सोशल मीडिया पर उनके उपनामों का एक साथ मिलकर ‘मोदानी‘ के रूप में उभरना स्वाभाविक हो गया है।

भारत का राजनीति–व्यवसाय गठजोड़

बड़े व्यवसाय और राजनीति के बीच गठजोड़ भारत के लिए न तो नया है और न ही अनूठा है। यहाँ इस देश के अतीत के केवल दो उदाहरण दिये गये हैं। मोहनदास करमचन्द गान्धी 30 जनवरी, 1948 तक “राष्ट्रवादी” व्यवसायी घनश्याम दास बिड़ला के घर से काम करते थे। इसी दिन नाथूराम गोडसे ने उनकी हत्या कर दी थी। उन्होंने ऐसा क्यों किया इसके बारे में उनके बयान को पढ़ना उचित है। धीरूभाई अम्बानी ने 1979 में एक सार्वजनिक सभा में इंदिरा गाँधी का उस समय खुलकर समर्थन किया था, जब वह सत्ता से बाहर थीं। प्रणब मुखर्जी भी अम्बानी परिवार के करीबी दोस्त थे। लेकिन मोदी और अडानी के बीच सम्बन्ध ऊपर दिये गये उदाहरणों से अलग है।

मौजूदा प्रधानमंत्री ने अडानी के व्यावसायिक हितों को अन्य सभी भारतीय व्यापारियों के हितों से कहीं अधिक बढ़ावा दिया है। यह कभी–कभी देश के हितों के लिए नुकसानदेह साबित हुआ है, उदाहरण के लिए बांग्लादेश, श्रीलंका और केन्या जैसे अन्य देशों में। इसलिए, मोदी अडानी के खिलाफ साजिश और धोखाधड़ी के आरोपों के नतीजों से खुद को पूरी तरह से अलग करने की उम्मीद नहीं कर सकते।

21 नवम्बर को न्यूयॉर्क और वाशिंगटन डीसी में दोपहर का समय था, जब भारतीय गहरी नींद में थे, तभी खबर आयी कि न्याय विभाग ने 62 वर्षीय व्यवसायी, उनके भतीजे सागर अडानी, उनके सहयोगी विनीत जैन (सभी अडानी समूह के एक इकाई में निदेशक हैं) के साथ–साथ कनाडा स्थित पेंशन फण्ड से जुड़े चार अन्य लोगों पर अभियोग दस्तावेज (एक आरोप पत्र के समान) पेश किया है। इसके तुरन्त बाद यह घोषणा की गयी कि एसईसी ने भी उनके खिलाफ दीवानी और आपराधिक शिकायतें दर्ज की हैं। एक ग्रैंड जूरी समन (अदालत में जूरी के सामने पेश होने के लिए एक समन की तरह) जारी किया गया था और सबसे महत्वपूर्ण बात, उनके खिलाफ गिरफ्तारी का वारण्ट तैयार किया गया था।

उस दिन सुबह जब भारत जागा तो शेयर बाजारों में उथल–पुथल मची हुई थी। दिन भर में नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनयेसई) पर अडानी समूह के शेयरों में 7–2 प्रतिशत से लेकर 22 प्रतिशत तक की गिरावट आयी। दुनिया भर से इस पर प्रतिक्रियाएँ आयीं। तब तक, जो लोग डीओजे के 54 पृष्ठ के अभियोग आदेश और एसईसी के आरोपों को पढ़ चुके थे, वे उन दो दस्तावेजों में शामिल विवरणों को देखकर दंग रह गये जिन्हें सार्वजनिक किया गया था। पता चला कि डेढ़ साल से भी ज्यादा पहले 17 मार्च 2023 को एफबीआयी के विशेष एजेंटों ने न्यायिक रूप से अधिकृत तलाशी वारण्ट के साथ सागर अडानी से पूछताछ की थी और उनके निजी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को अपने कब्जे में ले लिया था।

उनका दावा है कि इन उपकरणों में अन्य चीजों के अलावा उन व्यक्तियों और संगठनों के नामों की सूची मिली है जिन्हें चार भारतीय राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश–– तमिलनाडु, ओडिशा, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश और जम्मू और कश्मीर में सौर ऊर्जा के लिए बिजली खरीद और बिक्री समझौते करने के लिए कथित तौर पर रिश्वत दी गयी थी या दी जानी थी। बस इतना ही नहीं है। यह खुलासा किया गया कि गौतम अडानी ने खुद अपने भतीजे को दिये गये सर्च वारण्ट और समन दस्तावेजों की तस्वीरें ली हैं और खुद को ईमेल किया है।

आरोपों की जाँच

आरोप क्या थे ? अडानी ग्रीन एनर्जी और एज्योर पावर ने भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के तहत एक सार्वजनिक क्षेत्र की कम्पनी सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया यानी एसईसी (अमरीका की एसईसी नहीं) से सौर ऊर्जा तैयार करने के लिए निविदाएँ हासिल की थीं और अनुबन्ध प्राप्त किये थे। यह मानी गयी कि बिजली बहुत महँगी थी और एसईसी को राज्य बिजली वितरण कम्पनियों (डिस्कॉम) से खरीदार नहीं मिल रहे थे। इसलिए यह सुनिश्चित करने के लिए रिश्वत देने की जरूरत थी कि उत्पादित बिजली वास्तव में बेची जाये। डीओजे (डीओजे) ने ये आरोप लगाया।

इस विभाग के अनुसार, उस समय के प्रचलित विनिमय दरों के मुताबिक वादे के तहत भारत में “अधिकारियों” को कथित रूप से दी गयी या दी जाने वाली रिश्वत की कुल राशि 265 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,029 करोड़ रुपये थी। इस राशि का बड़ा हिस्सा (228 मिलियन डॉलर) कथित तौर पर आन्ध्र प्रदेश के अधिकारियों को गया, जिसके तत्कालीन मुखिया वाई–एस– जगन मोहन रेड्डी थे जिनका नाम एसईसी के दस्तावेजों में छोटे अक्षरों में लिखा है। हालाँकि जगन रेड्डी के नेतृत्व वाली युवजन श्रमिक रायथू कांग्रेस पार्टी (वाईएसआरसीपी) ने किसी भी गलत काम में शामिल होने से इनकार किया है, लेकिन जो दस्तावेज में दर्ज है वह यह है कि राज्य सरकार द्वारा बिजली खरीदने के लिए सौदे पर हस्ताक्षर करने से पहले गौतम अडानी ने अगस्त 2021 में जगन रेड्डी से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की थी और सागर अडानी ने अगले महीने उनसे मुलाकात की थी।

जो दावा किया गया है वह अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक है–– रिश्वत के रूप में वादा की गयी राशि का हिसाब खरीदी गयी प्रत्येक मेगावाट (एमडब्ल्यू) बिजली के आधार पर की गयी थी। एक दावा यह है कि इसका दर 25 लाख रुपये प्रति मेगावाट था।

इन चार राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश का चयन क्यों किया गया ? जिस समय कथित तौर पर रिश्वत दी गयी या देने का वादा किया गया, उस समय केंद्र में सत्तारूढ़ पार्टी भाजपा की इन चारों राज्यों में से किसी में भी सरकार नहीं थी। हालाँकि, पार्टी के सदस्य जम्मू–कश्मीर सरकार का नेतृत्व कर रहे थे। क्या ऐसा हो सकता है कि भाजपा शासित राज्यों में अधिकारियों को रिश्वत देने की जरूरत नहीं थी ? क्या नयी दिल्ली की ओर से सिर्फ एक मंजूरी ही अडानी के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए पर्याप्त होगी ?

भले ही भाजपा के प्रवक्ता अडानी के मुद्दे का जोरदार समर्थन कर रहे हैं, लेकिन मोदी सरकार सीबीआयी, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी अपनी एजेंसियों से क्यों नहीं पूछ रही है, जिनका इस्तेमाल वह पहले भी तत्परता से करती रही है। इन एजेंसियों से वह जगन रेड्डी (जो अब भाजपा से जुड़े नहीं हैं), कांग्रेस के भूपेश बघेल, बीजू जनता दल के नवीन पटनायक, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम के मौजूदा मुख्यमंत्री एम–के– स्टालिन जैसे पूर्व मुख्यमंत्रियों की जाँच क्यों नहीं करवा रही है ? जम्मू–कश्मीर के उपराज्यपाल और भाजपा से जुड़े मनोज सिन्हा से जाँच की उम्मीद करने के बारे में सोचना शायद बहुत ज्यादा होगा।

जो भी हो, इस समय सबसे बड़ी दुविधा में आन्ध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री एन– चन्द्रबाबू नायडू हैं जिन्होंने विपक्ष में रहते हुए अडानी का पक्ष लेने के लिए जगन रेड्डी की सरकार पर खूब हमला बोला था। नायडू के समर्थकों ने इस सम्बन्ध में आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका भी दायर की थी। आज नायडू के विश्वासपात्र असमंजस में हैं। उनमें से एक (आन्ध्र प्रदेश के वित्त मंत्री पय्यावुला केशव) ने पहले कहा था कि अडानी के साथ राज्य सरकार का समझौता रद्द किया जा सकता है और फिर जल्दी ही यह कहते हुए पीछे हट गये कि “कानूनी” विकल्पों पर विचार किया जाएगा।

बार–बार यह सवाल पूछा जा रहा है कि ये आरोप अमरीका में क्यों लगाये गये। इसका कारण यह है––अडानी ग्रीन एनर्जी सहित अडानी समूह की कम्पनियों ने वित्तीय साधनों के जरिये धन जुटाया है – इनमें से कुछ के नाम ऐसे हैं जो आम लोगों को अजीब लग सकते हैं, जैसे “ग्रीन बॉन्ड” और “सीनियर सिक्योर्ड नोट्स”– और इन्हें अमरीका और भारत सहित विभिन्न देशों के निवेशकों ने सब्सक्राइब किया था। इनमें से एक फ्लोटेशन अगस्त–सितम्बर 2021 में हुआ था, जिसकी राशि 750 मिलियन डॉलर थी जिसमें से 175 मिलियन डॉलर अमेरिकियों के लिए रिजर्व था। अडानी समूह की संस्थाओं द्वारा 409 मिलियन डॉलर के बॉन्ड का एक अन्य मुद्दा हाल ही में मार्च 2024 में हुआ।

अमरीका में कानून, खास तौर पर 1977 का फॉरेन करप्ट प्रेक्टिस एक्ट (एफसीपीए) कहता है कि रिश्वत या रिश्वत देने की पेशकश किसी भी देश में की गयी हो जिससे अमरीका का कोई नागरिक या संस्था प्रभावित होती है तो इसे अमरीकी कानून के तहत संज्ञेय अपराध माना जाएगा। इस मामले में आरोप यह है कि अडानी ने जानबूझकर अमरीकी निवेशकों से यह बात छिपायी कि उनके और उनके सहयोगियों की अमरीकी सरकारी एजेंसियों द्वारा भारतीय अधिकारियों को अनुचित व्यापारिक लाभ के लिए रिश्वत देने के लिए जाँच की जा रही है।

दूसरे शब्दों में, वित्तीय साधनों के जारीकर्ताओं द्वारा “मूल्य संवेदनशील” जानकारी का खुलासा नहीं किया गया था – संयोग से यह इस देश में भी भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) (लिस्टिंग ऑब्लिगेशन एण्ड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) विनियमन 2015 के तहत एक अपराध है, जिसे बाद में 2023 में संशोधित किया गया। इसके अलावा, रिश्वत तो रिश्वत ही होती है, चाहे वह अमरीका में हो, भारत में हो या कहीं और। लेकिन यह एक अलग ही मामला है।

भारत का हरित ऊर्जा क्षेत्र

अमरीका में की गयी जाँच को भी अडानी ग्रीन एनर्जी की वार्षिक रिपोर्ट में जगह नहीं मिली, जबकि इस समूह ने दावा किया था कि रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार के प्रति उसकी “जीरो टॉलेरेंस” है और वह कॉर्पाेरेट प्रशासन के “उच्चतम मानकों” का पालन करता है।

दो वरिष्ठ वकील, भारत के पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी जिन्होंने पहले अडानी का प्रतिनिधित्व किया है और भाजपा से जुड़े राज्यसभा सांसद महेश जेठमलानी दोनों ने 27 नवम्बर को प्रेस कॉन्फ्रेंस की और अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि आरोप “कमजोर”, “निराधार”, “दुर्भावनापूर्ण” और “झूठे” थे। उस दिन की शुरूआत में अडानी ग्रीन एनर्जी ने एनएसई को अपना पहला सार्वजनिक बयान जारी किया था जिसमें मीडिया रिपोर्टों का खण्डन किया गया था कि उस पर एफसीपीए के तहत आरोप लगाये गये थे, जबकि उसने स्वीकार किया था कि डीओजे और एसईसी ने उस पर साजिश, प्रतिभूतियों के लेनदेन में धोखाधड़ी और “वायर धोखाधड़ी” या अमरीका के भीतर और अमरीका से इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से गलत जानकारी प्रसारित करने के तीन मामलों में आरोप लगाये थे।

पूर्व अटॉर्नी जनरल और वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी इस बयान के बाद कम्पनी के शेयर की कीमतों में उछाल आया। यह ध्यान में रखना चाहिए कि भारत में शेयर की कीमतें विभिन्न कारकों के आधार पर बढ़ती और घटती हैं, जिसमें विदेशी निवेशकों के साथ–साथ जीवन बीमा निगम और भारतीय स्टेट बैंक जैसे बड़े संस्थागत निवेशकों के खरीद और बिक्री के फैसले शामिल हैं। पहली हिण्डनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट आने से पहले जनवरी 2023 में कम्पनी के शेयर की कीमत अपने अधिकतम स्तर से 83 प्रतिशत गिर गयी है। इस बीच, अडानी ने 600 मिलियन डॉलर के बॉन्ड की एक नयी पेशकश को रद्द कर दिया। देश भर में गैस की आपूर्ति करने वाली अडानी टोटल गैस में 37–4 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली फ्रांस की टोटलएनर्जीज ने कहा कि वह कम्पनी में नया निवेश नहीं करेगी। इसका अडानी ग्रीन एनर्जी में 19–7 प्रतिशत शेयर भी हैं।

अन्तरराष्ट्रीय बैंकों और वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधियों ने कई ऑफ–द–रिकॉर्ड बयान दिये हैं। अन्तरराष्ट्रीय संस्थानों ने कहा है कि अडानी के खिलाफ आरोपों का भारत की अक्षय ऊर्जा की आपूर्ति बढ़ाने की योजनाओं पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। द इकोनॉमिस्ट ने लिखा कि अमरीका में अभियोग “भारत के कारोबारी माहौल पर सन्देह पैदा करता है जो विदेशी निवेशकों को हतोत्साहित कर सकता है और अन्य भारतीय कम्पनियों की विदेश में धन जुटाने की योजनाओं में बाधा डाल सकता है”। सुशान्त सिंह जैसे भारतीय टिप्पणीकारों ने द कारवाँ में लिखते हुए कहा कि “अडानी प्रकरण भारत को वैश्विक मंच पर रणनीतिक रूप से कमजोर बना देगा”।

ऑस्ट्रेलिया स्थित फाइनेंसर राजीव जैन के नेतृत्व वाली जीक्यूजी पार्टनर्स जिसने पहली हिण्डनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के बाद समूह की कम्पनियों के शेयरों के गिरने पर अडानी की मदद की थी उसने अभियोग को कम करके दिखाने और लोगों को कॉर्पाेरेट इकाई से दूर रखने की कोशिश की। दूसरे लोगों ने बताया कि सौर ऊर्जा अडानी समूह के कुल कारोबार का केवल एक छोटा सा हिस्सा है। आलोचकों ने इन तर्कों को बेबुनियाद बताया। संयोग से, जीक्यूजी ने अडानी टोटल गैस में निवेश करने से खुद को दूर रखा है।

भारत में ए रेवन्त रेड्डी की अध्यक्षता वाली तेलंगाना सरकार ने प्रस्तावित शैक्षणिक संस्थान के लिए अडानी से 100 करोड़ रुपये का अनुदान अस्वीकार कर दिया है। विपक्ष के नेता राहुल गान्धी ने अडानी की गिरफ्तारी की माँग की है और आश्चर्य जताया है कि मुख्यमंत्री हेमन्त सोरेन और अरविन्द केजरीवाल को तुरन्त गिरफ्तार किया जा सकता है, लेकिन गौतम अडानी को नहीं। संसद के शीतकालीन सत्र का पहला सप्ताह बेकार चला गया है। हालाँकि, इंडिया ब्लॉक एकजुट नहीं दिख रही है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ ब्रायन ने सबसे पहले कहा कि संसद को केवल एक मुद्दे यानी अडानी के लिए बर्बाद नहीं कर देना चाहिए।

गौतम अडानी के अलावा उनके भतीजे सागर, जैन और चार अन्य आरोपी कनाडाई पेंशन फण्ड सीडीपीजी (कैस डे डेपोट एट प्लेसमेंट डु क्यूबेक) से जुड़े हैं या थे जिसने एज्योर पावर में निवेश किया है और जिसके अधिकारियों ने कथित तौर पर भारतीयों को रिश्वत देने के लिए अडानी के साथ मिलकर साजिश रची थी। ये अधिकारी सिंगापुर में रहने वाले ऑस्ट्रेलियाई–फ्रांसीसी मूल के सिरिल कैबनेस और तीन अन्य व्यक्ति हैं जो भारतीय मूल के हैं वे हैं सौरभ अग्रवाल, रूपेश अग्रवाल और दीपक मल्होत्रा। “द इकोनॉमिक टाइम्स के अरिजीत बर्मन ने रिपोर्ट किया है कि एज्योर से जुड़े दो व्यक्ति, यूके के ऐलन रोस्लिंग और मुरली सुब्रमण्यम– जो पहले भारत में काम कर चुके थे,—सम्भवत: व्हिसलब्लोवर्स थे, जिन्होंने भ्रष्टाचार के आरोपों की जाँच करने वाली अमरीकी एजेंसियों को सूचित किया था।”

इसी संस्थान ने यह भी बताया है कि अडानी द्वारा अब तक आन्ध्र प्रदेश के लिए एसईसीए को एक भी यूनिट (किलोवाट घण्टा) बिजली की आपूर्ति नहीं की गयी है। ट्रांसमिशन परिसर अभी तक तैयार नहीं हैं और अदानी द्वारा उत्पादित बिजली की अपेक्षाकृत थोड़ी मात्रा को राज्य के डिस्कॉम के साथ सहमत मूल्य से 40 प्रतिशत अधिक कीमत पर बिजली एक्सचेंजों के माध्यम से बेचा गया है।

क्या ट्रम्प अडानी के बचाव में आएँगे ?

अब क्या होगा ? क्या वही गौतम अडानी जिन्होंने हिण्डनबर्ग रिसर्च के नाथन एण्डरसन पर मानहानि का मुकदमा करने की धमकी दी थी, लेकिन लगभग दो साल तक ऐसा नहीं किया, उन्हें अब न्यूयॉर्क के पूर्वी जिले में ग्रैंड जूरी के सामने पेश होना पड़ेगा ? या उनके वकील उनके लिए पेश होंगे ? क्या 20 जनवरी को डोनाल्ड ट्रम्प के पदभार ग्रहण करने और उनके नॉमिनी द्वारा डीओजे, एसईसी और एफबीआयी का नेतृत्व करने के बाद स्थिति बदल जाएगी ?

ट्रम्प ने कई बार कहा है कि वे “खौफनाक” एफसीपीए के खिलाफ हैं क्योंकि यह अमरीकी व्यापारिक हितों के खिलाफ है। लेकिन क्या वे इस कानून को कमजोर कर पाएँगे ? या इसे पूरी तरह से निरस्त कर पाएँगे ? गौतम अडानी ने ट्रम्प के फिर से चुने जाने का भरपूर स्वागत किया और सार्वजनिक रूप से वादा किया कि उनका समूह अमरीका की ऊर्जा परिसरों और बुनियादी ढाँचे में 10 बिलियन डॉलर (वर्तमान में 84,000 करोड़ रुपये के बराबर) का निवेश करेगा, जिससे उस देश में 15,000 नये रोजगार सृजित होंगे। क्या उन्हें इस बात का अन्दाजा था कि कुछ सप्ताह बाद उनके साथ क्या होने वाला है ?

भारत सरकार ने 29 नवम्बर को पहली बार अडानी के अभियोग पर प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “यह निजी फर्मों और व्यक्तियों तथा अमरीकी न्याय विभाग से जुड़ा एक कानूनी मामला है। ऐसे मामलों में स्थापित प्रक्रियाएँ और कानूनी रास्ते हैं, हमें विश्वास है कि इनका पालन किया जाएगा। भारत सरकार को इस मुद्दे के बारे में पहले से सूचित नहीं किया गया था। हमने इस मामले पर अमरीकी सरकार से कोई बातचीत भी नहीं की है” किसी विदेशी सरकार द्वारा समन/गिरफ्तारी वारण्ट की तामील के लिए किया गया कोई भी अनुरोध आपसी कानूनी सहायता का हिस्सा है। ऐसे अनुरोधों की मेरिट के आधार पर जाँच की जाती है। हमें इस मामले में अमरीकी पक्ष से कोई अनुरोध नहीं मिला है। यह एक ऐसा मामला है जो निजी संस्थाओं से जुड़ा है और भारत सरकार, इस समय किसी भी तरह से कानूनी रूप से इसका हिस्सा नहीं है।”

भारत और अमरीका के बीच प्रत्यर्पण सन्धियाँ हैं, लेकिन क्या अडानी को प्रत्यर्पित किया जाएगा ? क्या भारत में उनके खिलाफ मामले दर्ज किये जा सकते हैं ताकि उन्हें भारत छोड़ने से रोका जा सके ? खबर है कि सेबी ने कम्पनियों के “अन्तिम लाभकारी मालिकों” से सम्बंधित नियमों के कथित उल्लंघन और “प्रमोटर समूह” द्वारा रखे जा सकने वाले शेयरों की सीमा को पार करने की जाँच पूरी करने के बाद अडानी समूह की एक इकाई के खिलाफ कारण बताओ नोटिस जारी किया है।

सेबी की अध्यक्ष माधबी पुरी बुच का हालिया ट्रैक रिकॉर्ड और उनके खिलाफ लगाये गये हितों के टकराव के आरोप अडानी समूह के खिलाफ दण्डात्मक कार्रवाई करने की बाजार नियामक की क्षमता में विश्वास पैदा नहीं करते हैं। न ही यह सम्भावना है कि अमरीका में लगाये गये आरोपों के आधार पर, हमारे देश में कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988, धन शोधन निवारण अधिनियम 2002 या प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 जैसे कानूनों का इस्तेमाल करके उनके खिलाफ कार्रवाई करेंगी।

लीफलेट ने अनुराग कटारकी सहित चैम्बर ऑफ लिटिगेशन के कानूनी विशेषज्ञों के हवाले से कहा है कि नया ट्रम्प प्रशासन सैद्धांतिक रूप से अभियोजन को स्थगित कर सकता है या जुर्माना अदा करने पर अडानी को कुछ आरोपों से मुक्त करने के लिए याचिका दायर कर सकता है।

व्यक्तिगत तौर पर, 21 नवम्बर की सुबह जब मैं और मेरी पत्नी ट्रेन से गुजरात पहुँचे तो मेरी पत्नी ने बेटी को फोन करके गौतम अडानी के खिलाफ गिरफ्तारी वारण्ट के बारे में बताया। बात साफ नहीं सुनायी दी और हमारी बेटी को लगा कि मेरे खिलाफ एक और गिरफ्तारी वारण्ट जारी किया गया है, जैसा कि जनवरी 2021 में हुआ था। हमने उसे बताया कि वारण्ट मेरे खिलाफ नहीं, बल्कि उस उद्योगपति के खिलाफ है। जब हम लोगों को यह मामला सुनाते हैं, तो वे मुस्कुराते हैं।

 (दऐडेम–डॉट–कॉम से साभार, 2 दिसम्बर 2024)

Leave a Comment

लेखक के अन्य लेख

साहित्य
कविता
जीवन और कर्म
राजनीतिक अर्थशास्त्र
राजनीति
सामाजिक-सांस्कृतिक
व्यंग्य
समाचार-विचार
कहानी
विचार-विमर्श
श्रद्धांजलि
अन्तरराष्ट्रीय
साक्षात्कार
अवर्गीकृत
मीडिया
फिल्म समीक्षा