इब्ने इंशा: ख़ामोश रहना फ़ितरत में नहीं

(एक हमीं हुशियार थे यारो एक हमीं बदनाम हुए) इब्ने इंशा सिर्फ़ जनता का हाल–अहवाल बयान करने वाले, बाज़ वक़्त उसे भी आईना दिखाने वाले रचनाकार हैं। वह अपने पढ़ने–सुनने वालों को ताक़ीद करते हैं कि अपनी पक्षधरता तय करो। अनिश्चय और ऊहापोह में रहने वाले ग़ाफ़िल लोगों को बेईमान कहते हैं। उनके पाँवों में ‘सनीचर’ था। वह घूमते रहे। घाट, मैदान, नदी, पहाड़ लाँघते रहे। अपनी भाषा को लगातार माँजते रहे, धारदार और मारदार बनाते रहे। उनकी मारक भाषा पाठक को तिलमिला कर रख देती है। ग़ुस्से, चिढ़ और ज़िद से भरी भाषा को इब्ने इंशा कलात्मकता और सहजता के साथ अपने पढ़ने–सुनने वालों के दिल–दिमाग़ में ‘ट्रांसफ़र’ कर देते हैं। इन्हें अपने भीतर महसूस करने वाला हालात को नये नज़रिये से देखने–परखने लगता है और इंशा के साथ आर–पार की लड़ाई में शामिल हो जाता है। वह कार्यपालिका, व्यवस्थापिका, न्यायपालिका और इन पर नज़र रखने वाली पत्रकारिता एवं… आगे पढ़ें

कैफ़ी आज़मी : मेरी आवाज़ सुनो

कैफ़ी आज़मी सचमुच हिन्दी–उर्दू साहित्य के सूरज–चाँद हैं। ख़्ाुशवन्त सिंह उन्हें उचित ही आज के उर्दू साहित्य का बादशाह कहते हैं। उन्होंने बादशाही के नये कीर्तिमान गढ़े, नयी मंज़िलों को फ़तह किया। हिन्दी और उर्दू के बीच उनकी उपस्थिति एक चमकते हुए तारे की तरह है जो हमें अँधेरे से लड़ने और रौशनी की तलाश करने की प्रेरणा देता है। अपने आत्मकथ्य में उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया है। इस्लाह लेने के लिए वह लखनऊ के मशहूर शायर सफ़ी साहब के घर पहुँच गये। उस्ताद और शागिर्द के बीच हुई बातचीत का एक अंश पेश है, “तुम एक ख़्ाास अक़ीदत से मेरे पास इस्लाह के लिए आये हो, लेकिन इस्लाह के बाद जब जाओगे तो कुढ़ते हुए जाओगे कि मेरी ग़ज़ल ख़्ाराब कर दी। मेरी राय यह है कि अगर वाह–वाह से गुमराह न हो तो लिखते रहो और पढ़ते रहो। शे’र की कमियाँ सूखे पत्तों की तरह गिरती… आगे पढ़ें

जाँ निसार अख़्तर : मन मोरा बावरा

उर्दू अदब में जाँ निसार अख़्तर का एक अलग मुक़ाम है। वह ताज़िन्दगी मार्क्सवादी उसूलों के क़ायल रहे हैं। उन्होंने अपनी ग़ज़लों, नज़्मों और फ़िल्मी नग़मों से मजलूमों और बेबस लोगों की ख़्िादमत की। आम जनता को नींद से जगाया और हर तरह के अन्याय और शोषण के ख़्िालाफ़ लामबन्द किया। चार दशकों के अदबी दौर में उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ का शानदार नेतृत्व किया। उन्होंने ज़िन्दगी के  सभी रंग देखे हैं। हँसी–ख़्ाुशी, दु:ख–दर्द, सहमति–असहमति, आँसू, यातना, उपेक्षा, स्वीकृति–अस्वीकृति। इन दो शे’रों मंे हम उनके एहसास का अंदाज़ा लगा सकते हैं, हरेक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे ये ज़िन्दगी तो कोई बद्दुआ लगे है मुझे — बिखर गया है कुछ इस तरह आदमी का वजूद हरेक फ़र्द1 कोई सानिहा2 लगे है मुझे (1– व्यक्ति  2– दुर्घटना) बद्दुआ में बदलती ज़िन्दगी और आदमी के अस्तित्व पर लगातार हमलावर पूँजीवादी संस्कृति आदमी को रौंद रही है। भय और हिंसा… आगे पढ़ें

जिगर मुरादाबादी : प्रेम के अप्रतिम कवि

जिगर मुरादाबादी कवि–कुल में जन्मे और कविता उन्हें विरासत में मिली। पिता, दादा, परदादा सभी कवि रहे। उनके पूर्वज मौलवी समीअ़ दिल्लीवासी थे और बादशाह शाहजहाँ के शिक्षक भी। किसी बात से बादशाह रूठ गये और उन्हें दिल्ली से निकाल दिया गया। वह मुरादाबाद में जा बसे और यहीं अली सिकन्दर यानी जिगर मुरादाबादी का जन्म हुआ। लम्बी अस्वस्थता के कारण उनकी औपचारिक शिक्षा–दीक्षा नहीं के बराबर हुई। सहज और समवार ज़िन्दगी उन्हें नहीं मिली। जीवन–यापन के लिए बस स्टैण्ड और रेलवे प्लेटफ़ॉर्म पर चश्मा बेचा तो कभी कुछ और सौदा–सुलफ़ बेचना पड़ा। अंग्रेज़ी का ज्ञान कामचलाऊ था। अपने शौक़ के कारण मनोयोग से फ़ारसी सीखी। जिगर मशहूर शायर ‘दाग़’ के शिष्य रहे और बाद में उस्ताद ‘तस्लीम’ के शागिर्द रहे। ‘असगर’ साहब के संग–साथ ने उन्हें हल्की–फुल्की शायरी से बाहर निकाला और उनकी रचनाओं को गम्भीर, अर्थपूर्ण और उच्चस्तरीय बनाया। शायरी पढ़ने का उनका अन्दाज़ बहुत आकर्षक और निराला… आगे पढ़ें

दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा

(मैं मुहम्मद खान हूँ, आतंकवादी नहीं) –– डॉ– जसबीर सिंह औलख क्या कोई संवेदनशील इनसान यह सोच सकता है कि एक सत्रह साल की उम्र के लड़के ने तीन राज्यों में 19 बम धमाके किये होंगे ? पहली नजर में ही आपके दिमाग में ‘यह तो नहीं हो सकता’ का ख्याल आएगा, पर हमारी पुलिस तो आखिर पुलिस है। जरा सोचो कि एक उन्नीस साल के लड़के को 20 फरवरी 1998 से सात दिन पहले अगवा करके दिल्ली पुलिस ने गैर कानूनी हिरासत में रखा तथा 1996–97 में दिल्ली, हरियाणा, तथा उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक हुए बम धमाकों के पूरे 19 मामलों में नामजद कर दिया जिस कारण उसको और दो महीने कानूनी पुलिस रिमाण्ड में रहना पड़ा। गैर कानूनी तथा कानूनी पुलिस रिमाण्ड में हर तरह की यातनाएँ जैसे की चड्डे फाड़ने, कच्ची फांसी, बिजली के झटके, मुँह पानी में डुबो देना, जबरदस्ती सर्फ वाला पानी… आगे पढ़ें

भीष्म साहनी: एक जन–पक्षधर संस्कृतिकर्मी का जीवन

भीष्म साहनी का जन्म गुलाम भारत के रावलपिण्डी शहर में 8 अगस्त 1915 में हुआ था। पिता हरवंशलाल आर्य समाज के मंत्री थे। माँ का नाम लक्ष्मी था। वह बड़ी धार्मिक स्वभाव की महिला थी। भीष्म साहनी अपनी माँ से कहानियाँ और गीत सुनते हुए बड़े हुए। पिताजी का कपड़ों का व्यापार था। चार भाई बहनों में भीष्म साहनी सबसे छोटे थे। मशहूर फिल्म अभिनेता बलराज साहनी इनके बड़े भाई थे। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा गुरूकुल पोठोहार में हुई, जहाँ वे बड़े भाई की जिद के कारण मंत्र और व्याकरण को रटते थे। बाद में दोनों को रावलपिण्डी के स्कूल में दाखिला दिला दिया गया। पिताजी आसानी से मान गये क्योंकि व्यापार के लिए अग्रेंजी भाषा में शिक्षित होना जरूरी था। स्कूली शिक्षा पूरी होने के बाद लाहौर गवर्नमेण्ट कॉलेज से एमए और पंजाब विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। कॉलेज के दिनों में भीष्म साहनी नाटक करते, हॉकी खेलते,… आगे पढ़ें

मजरूह सुल्तानपुरी : गा मेरे मन गा

मजरूह सुल्तानपुरी की शख्सियत गजल और गीत के अद्भुत मेल से बनी है। वह एक साथ गजलगो और गीतकार हैं। दोनोे विधाओं को साधना दोधारी तलवार के वार को निहत्थे रोकने जैसा है। उन्होंने जीवन भर हर हमले और प्रहार का डट के सामना किया। उनका मानना है कि खतरा अभी टला नहीं है, बल्कि वह बार–बार रूप बदलकर आ रहा है। कातिल सिरफिरा ही नहीं, बहुरूपिया भी है। चारो ओर गौर से देखिए सारा तमाशा सामने आ जायेगा। अंग्रेजों का खंजर अब हमारे रहबरों और दुनिया को लूटने वाले हाईटेक व्यापारियों के हाथ में है। किसने कहा कि टूट गया खंजरे–फरंग,1 सीने पे जख्मे–नौ2 भी हैं दागे कुहन3 के साथ। (1– अंग्रेज का खंजर 2– नया घाव 3– पुराने दाग) सत्ता पक्ष जनता के साथ नहीं बल्कि इन्हीं लुटेरे व्यापारियों के साथ खड़ा है। दोहरी लूट से जनता जूझ रही है। पुराने जख्मों के दाग के साथ रोज नये… आगे पढ़ें

रामवृक्ष बेनीपुरी का बाल साहित्य : मनुष्य की अपराजेय शक्ति में आस्था

–– सुधीर सुमन बेनीपुरी की लेखनी को जादू की छड़ी कहा जाता रहा है। अपने प्रवाहपूर्ण लालित्य से युक्त गद्यशिल्प के कारण वे हिन्दी साहित्य में बेहद चर्चित रहे। लेकिन अपने अद्भुत शिल्प के साथ ही अपने साहित्य के वैचारिक उद्देश्य के कारण भी वे उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं में अपनी लेखनी चलायी। खासतौर पर उनके यात्रा संस्मरण, वैचारिक ललित निबन्ध, रेखाचित्र और कहानियों से हिन्दी का आम पाठक परिचित है। लेकिन शायद यह कम लोगों को ही पता है कि बेनीपुरी ने अपने दौर के बच्चों के लिए अत्यन्त मूल्यवान साहित्य का सृजन किया। बेनीपुरी ग्रन्थावली के सम्पादक सुरेश शर्मा ने लिखा है कि रविन्द्रनाथ ठाकुर को छोड़कर किसी भी दूसरे भारतीय लेखक के बाल साहित्य में बेनीपुरी जितनी विविधता नहीं है। विविधता के साथ ही इन्साफ, बराबरी आजादी और मनुष्यता के लिए विकास की जो प्रतिबद्धता है वह बेनीपुरी के बाल साहित्य… आगे पढ़ें

व्लादिमीर मायाकोव्स्की की कविताएँ (संघर्ष और क्रान्ति का उद्घोष)

मैं जनता का नेता हूँ, और साथ ही जनता का सेवक भी। मेहनतकश हमारी ही आवाज में बोलता है, हम सर्वहारा कलम के सिपाही हैं। (कविता और टैक्स–इंस्पेक्टर) कविता का यह अंश जिस कवि की कलमनवाजी का नजीर है और जो इतिहास के पन्नों में अमर हो गया, वह था व्लादिमीर मायाकोव्स्की। उनकी कविताओं में बीसवीं सदी की रूसी क्रान्ति की ज्वाला और मानवीय संवेदना की लौ एक साथ जलती थी। उनका जन्म 7 जुलाई 1893 को जॉर्जिया के बगदादी प्रान्त में हुआ था और उनके पिता वन अधिकारी थे। उन्हें बचपन में शब्दों और रंगों के संसार से अनूठा प्रेम था। कुताइसी में एक कलाकार ने उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उन्हें चित्रकला सिखायी। जब 1905 की रूसी क्रान्ति की आँच पूरे रूस में फैल रही थी, उसी वक्त मास्को से लौटी उनकी बहन ने अपने साथ लायी क्रान्तिकारी पुस्तकें उन्हें भेंट किया। उन पुस्तकों ने मायाकोव्स्की के भीतर… आगे पढ़ें

समाजवादी यथार्थवाद के अलम–बरदार कवि गफूर गुलोम

मुझे यतनाएँ दी गयीं, क्योंकि मैं एक यहूदी हूँ,  एक संख्या मेरी पहचान बना दी गयी फेंक दिया गया मुझे आग में मुझे यातनाएँ देकर गोली से उड़ा दिया गया मैं एक यहूदी हूँ–––– यह एक गैर यहूदी कवि का साहसपूर्ण बयान है। उस समय का जब दूसरे विश्व युद्ध के दौरान नाजी जर्मनी और उसके सहयोगी लाखों यहूदियों का कत्लेआम कर रहे थे। उनके खिलाफ गफूर गुलोम की कलम किसी हथियार की तरह गरजती रही। उनकी यह कविता ‘आई एम ज्यू’ पीड़ित यहूदियों की शक्ति, सहनशीलता और दृढ़ता को बहुत प्रभावशाली तरीके से व्यक्त करती है जिसमें वह अपने आप को यहूदी कहते हैं और हिटलर की यातना से भी नहीं डरते हैं। गफूर उज्बेकिस्तान के राष्ट्रीय कवि थे। उनका जन्म 10 मई 1903 को ताशकन्द के एक गरीब परिवार में हुआ था। उस समय उज्बेकिस्तान रूसी जारशाही के जुए के नीचे पिस रहा था। उनके वालिद गुलोम मिर्जा… आगे पढ़ें

साधारण मनुष्य की उम्मीद का कवि वीरेन डंगवाल

––मंगलेश डबराल ‘इन्हीं सड़कों से चल कर आते हैं आततायी/ इन्हीं सड़कों से चल कर आयेंगे अपने भी जन।’ वीरेन डंगवाल ‘अपने जन’ के, इस महादेश के साधारण मनुष्य के कवि हैं। वे उन दूसरे प्राणियों और जड़–जंगम वस्तुओं के कवि भी हैं जो हमें रोजमर्रा के जीवन में अक्सर दिखायी देती हैं, लेकिन हमारे दिमाग में दर्ज नहीं होतीं। कविता के ये ‘अपने जन’ सिपाही रामसिंह और इलाहाबाद के मल्लाहों, लकड़हारों, रेलवे स्टेशन के फेरीवालों, डाकियों, अपने दोस्तों की बेटियों समता और भाषा, निराला, शमशेर, नागार्जुन, त्रिलोचन, केदार, पीटी उषा, तारंता बाबू, किन्हीं माथुर साहब और श्रोत्री जी तक फैले हुए हैं। मनुष्येतर जीवधारियों और वस्तुओं के स्तर पर यह संसार भाप के इंजन, हाथी, ऊँट, गाय, भैंस, कुत्ते, भालू, सियार, सूअर, मक्खी, मकड़ी, पपीते, इमली, समोसे, नींबू, जलेबी, पुदीने, भात और पिद्दी का शोरबा आदि तक हलचल करता है। इन जीवित–अजीवित चीजों से वीरेन का व्यवहार कितना आत्मीय… आगे पढ़ें

साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे हैं

साहिर लुधियानवी का बाकमाल शेर है, खुद्दारियों के खून को अर्ज़ां1 न कर सके, हम अपने जौहरों2 को नुमाया न कर सके।   (1– सस्ता  2– गुणों को) खुद्दारी हमेशा उनके लिए बेशक़ीमती रही। इसे कभी उन्होंने सस्ते में नहीं लिया और न ही ऐसा करने की ज़ुर्रत किसी को करने दी। वह कहते हैं कि अपने गुणों को पूरी तरह दुनिया के सामने नहीं ला सके। उनकी चाहत थी कि दिल की आवाज़ को वह पूरी गहराई और ऊँचाई के साथ सुना सकें। सुरों के हर घुमाव, मोड़, नक़्क़ाशी और बारीक़ कारीगरी को प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य के साथ सुनने और पढ़ने वालों की आत्मा में उतार सकें। साहिर के लिए कविता आत्मा की आवाज़ है और मोहब्बत की पवित्र पुकार है। मैं शायर हूँ मुझे फ़ितरत1 के नज़्ज़ारों से उल्फ़त है, मेरा दिल दुश्मने–नग़मा–सराई2 हो नहीं सकता। मुझे इनसानियत का दर्द भी बख्शा है कुदरत ने, मेरा मक़सद3 फ़क़त4… आगे पढ़ें

हिन्दू–मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार काजी नजरुल इस्लाम

काजी नजरुल इस्लाम हिन्दू–मुस्लिम सौहार्द के विलक्षण पैरोकार और महत आकांक्षी बांग्ला कवि–लेखक थे। वे आधुनिक बांग्ला काव्य और संगीत के क्षेत्र में एक युग प्रवर्तक थे। प्रथम महायुद्ध के बाद आधुनिक बांग्ला काव्य में रवीन्द्रनाथ टैगोर के बाद केवल काजी नजरुल इस्लाम ही एक निर्भीक और सशक्त रचनाकार रहे हैं। रवीन्द्रनाथ के बाद काजी नजरुल साहित्य और संगीत की युगलबन्दी के प्रख्यात कवियों और साहित्यकारों में सर्वाेपरि हैं। नजरुल ने लगभग 4,000 गीतों की रचना की तथा कई गानों को आवाज दी जिन्हें ‘नजरुल गीति’ नाम से जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि काजी नजरुल इस्लाम को अंग्रेजी साहित्य का उतना प्रगाढ़ ज्ञान नहीं था, फिर भी उनकी अन्तश्चेतना इतनी विलक्षण थी कि अंग्रेजी के कई पुराने कवियों की रचनाओं के बरक्स उनकी रचनाएँ रखी जा सकती हैं। उनमें काव्य का एक नूतन सौष्ठव और स्वरूप झाँकता है। विविध भाषाओं के इन्द्रधनुषी आकाश में बांग्ला साहित्य का अवदान सम्भवत:… आगे पढ़ें