मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

गेहुँआ अफ्रीका

मेरा लाल खून

मनुष्य का पवित्र लाल खून

नीले पसीने की बूँद बन जब गिरता है

तुम अपनी नरम हथेलियों की अँजुरी बनाकर बटोरते हो

जब मैं उस श्रम के गन्धयुक्त पसीने को सूँघना चाहता हूँ

तुम मेरा अपमान करते हो और मुझे दूर रखते हो

आँखें मिलाने का साहस करो पुजारी

मैं 20वीं शताब्दी का ‘अछूत’ हूँ!

मैं गोल–भूगोल का एक गेहुँआ गोरा अफ्रीका हूँ!

 

मैं न्याय चाहता हूँ

मैं मुक्ति चाहता हूँ।

तुम्हारे मन्दिर की मूर्ति में है मेरी भट्टी की गन्ध

तुम्हारे चूल्हे पर रखी कड़ाही में है मेरे पसीने की गन्ध

मुझसे आँखे मिलाने का साहस करो धर्मांध मनुष्य

या मेरे अस्तित्व को आग की भट्ठी में भूनो

और धर्म बचाने का साहस करो

या मेरा अपमान करने वाले शास्त्रों के

पन्नों को फाड़ डालो

या साहस करो उन्हें जलाने का

मैं तुम्हारे मन्दिर का देवता बनाने वाला लोहार हूँ

इस गोल–भूगोल का एक गेहुँआ गोरा अफ्रीका हूँ!

 

अपनी बस्ती की साफ जमीन को सूँघो

बस्ती के हर टुकड़े में मिलेगी मेरे खून की गन्ध

आँखें मिलाने का साहस करो चिकने मनुष्य!

या मेरी लाल धमनियों में पानी भरो

या अपने दिमाग के कचरे को साफ करो

मैं तुम्हारी बस्ती को साफ करने वाला चमार हूँ!

इस गोल–भूगोल का एक गेहुँआ गोरा अफ्रीका हूँ!

 

अपने मन की आनन्दित ग्रंथियों को फाड़ डालो

वहाँ सुनाई देगा मेरे संगीत का मधुर स्पन्दन

आँखंे मिलाने का साहस करो चेतनायुक्त मनुष्य!

या साहस करो मुझे जानवर के साथ बाँधने का

और घास खिलाने का

या साहस करो तुम अपने को जानवर से अलग करने का

मैं सारंगी मादल बजाने वाल ‘गाइन1’ हूँ, ‘बादी2’ हूँ

मैं गोल–भूगोल का एक गेहुँआ गोरा अफ्रीका हूँ!

 

मिट्टी में धसी हुई मेरी जिन्दगी की धड़कन को छुओ

वहाँ मिलेगा मेरे आँसुओं का एक भण्डार। 

आँख मिलाने का साहस करो ऊबे हुए मनुष्य!

या कहने का साहस करो कि

नहीं है तुम्हारे निवाले में मेरे आँसुओं की गन्ध

यह साहस करो सम्मान देने की मेरे दलित जीवन को 

मैं तुम्हारे बैलों के साथ खेतों में तैरने वाला

गुलाम मुसहर हूँ

मैं गोल–भूगोल का एक गेहुँआ गोरा अफ्रीका हूँ!

 

तुम्हारे पैर के जूते से सिर की टोपी तक

तुम्हारी दृष्टि के दूर क्षितिज से दिल की धड़कन तक

मैं कहाँ नहीं हूँ? हर जगह हूँ मैं!

तुम कैसे बना सकते हो मुझे ‘अछूत’ हे ‘छूत’ मनुष्य

या साहस करो इतिहास के कटघरे में खड़े होने का

या अपने को बदलने की हिम्मत करो।

आँखें मिलाने का साहस करो पुजारी

मैं 20वीं शताब्दी का अछूत हूँ

मैं गोल–भूगोल का एक गेहुँआ गोरा अफ्रीका हूँ!

 

मैं अपमानित इतिहास का हिसाब चाहता हूँ

मैं किसी भी कीमत पर मुक्ति चाहता हूँ।

–– आहुति

 

शब्दार्थ––

1– गाइन: नेपाल की दलित जातियों में एक जाति जो कई पीढ़ियों से अपना भरण–पोषण गीत–संगीत के जरिये करती है। 

2– बादी: नेपाल की दलित जातियों में से एक जो अपना भरण–पोषण वेश्यावृत्ति के जरिये करती है।

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