जैक लण्डन का उपन्यास ‘आयरन हील’ के बारे में
–– महेन्द्र नेह
जैक लण्डन के उपन्यास ‘आयरन हील’ का अनुवाद लाल बहादुर वर्मा जी ने किया है। यह उपन्यास अमरीका के तत्कालीन राजनीति–सामाजिक परिवेश को समझने के लिए एक सूत्र प्रदान करता है। यह जैक लण्डन का सर्वाधिक चर्चित उपन्यास है। आयरन हील 1908 में प्रकाशित हुआ था। 1947 में इसे बीसवीं सदी की शायद सबसे आश्चर्यजनक रूप से भविष्य दृष्टा कृति करार दिया गया।
जैक लण्डन का जन्म सैन फ्रांसिस्को में 12 जनवरी 1876 में हुआ और 22 नवम्बर, 1916 में मात्र 40 वर्ष की उम्र में शारीरिक तकलीफ से जूझते हुए उनका निधन हो गया। अपने जीवन में उन्होंने खूब यात्राएँ कीं और खूब लिखा।
जब जैक लण्डन ने ‘आयरन हील’ को 1906 में लिखा था तो जार की फौज, आतंकवादी गैंग और गुप्त पुलिस 1905 की रूस की क्रान्ति को रौंद रही थी। शायद ही किसी को उम्मीद होगी कि इस पराजय के बाद, 1917 की रूस की समाजवादी क्रान्ति जीत हासिल करेगी। उपन्यास की भूमिका में अमरीकी लेखक एच ब्रूस फ्रेंकलिन ने लिखा है––
“हम वैश्विक क्रान्तियों और प्रतिक्रान्तियों के युग में जी रहे हैं, जब भयानक दूरगामी संघर्ष जारी है, मानव जाति के भविष्य का निर्णय करने के लिए। यही वह महायुद्ध है, जिसकी कल्पना ‘आयरन हील’ में की गयी है। उपन्यास का विषय है ––दरिद्रीकृत जनसमूह, जो दुनिया के अधिकांश काम निपटाता है, और विशेषाधिकार सम्पन्न अल्पमत, जो मुनाफों के गुलछर्रे उड़ाता है–– के बीच अनिर्णीत तीन सौ वर्षों से जारी युद्ध।”
जैक लण्डन की कुछ भविष्यवाणियाँ तो तत्काल प्रमाणित हो गयीं। जुलाई, 1908 में इस पुस्तक के प्रकाशन के पाँच महीने बाद ही संयुक्त राज्य अमरीका में एक राष्ट्रीय गुप्त पुलिस, जिसे उस वक्त ‘ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन’ कहते थे, स्थापित कर दी गयी। बारह वर्षों से कम समय बाद ही मेहनतकशों के राजनीतिक संगठनों के हिंसक दमन की इस पूर्व दृष्टि को चरितार्थ कर दिया गया। 2 जनवरी, 1920 की एक अकेली रात को अमरीका के न्याय विभाग के अटार्नी जनरल पामर डेपुटी एडगर हूवर के नेतृत्व में एक साथ 70 शहरों में मजदूरों पर आक्रमण किया गया। उन्हें घरों से खींच कर पीटा गया, छापा खाने बर्बाद कर दिये गये और दस हजार सक्रिय कार्यकर्ता जेल में ठूँस दिये गये। चार साल बाद ही हूवर को संस्था का सर्वेसर्वा बना दिया गया। अब नाम रखा गया–– फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन (एफबीआई) जो आज भी मजदूर आन्दोलन की जासूसी और उसको तोड़ने का काम करता है।
1929 में ‘आयरन हिल’ किताब इटली में प्रकाशित हुई। अनुवादक ने सम्हाल कर भूमिका में लिखा कि “धनतंत्र और जनता के बीच संघर्ष कौन जाने कब फूट पडेगा।” कुछ ही दिनों में इस किताब के सस्ते संस्करण तथा जैक लण्डन की अन्य क्रान्तिकारी कृतियों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया, यह कहकर कि ये फासिज्म की सत्ता को उखाड़ फेंकने के षड्यंत्र का हिस्सा हैं। जैक लण्डन ने धनिक तंत्र की लोहे की एड़ी को इस तरह चित्रित किया है जैसे उसके मॉडल रहे हों बीसवीं सदी के फासिस्ट राज्य–– इटली, स्पेन, जर्मनी, पुर्तगाल, बुल्गारिया, रूमानिया, हंगरी। जहाँ थे–– गुप्त जालिम पुलिस, अनियंत्रित सैन्यवाद और राज्य संचालित आतंक। 21 अप्रैल 1980 में लिखी गयी भूमिका में फ्रैंकलिन लिखते हैं–– “‘आयरन हील’ भयानक स्पष्टता के साथ उस संघर्ष की बर्बरता प्रस्तुत करती है जिसमें हम लिप्त हैं। जब हम शिकागो के संघर्ष का प्रखर चित्रण पढ़ते हैं तो हम उसे उपन्यास के सपाट प्राक्कथन और बेजान फुटनोट की अपेक्षा ज्यादा गहराई से समझ पाते हैं कि पूँजीवादी समाज के उस दौर में जब पूँजीवाद आन्तरिक अन्तर्विरोधों से ग्रस्त है, उतनी भयानक लड़ाई लड़नी पड़ेगी जितनी कि उपन्यास के क्रान्तिकारियों को लड़नी पड़ी थी, ताकि हमारे चेहरों को रौंदने की उद्धत घोषणा पूरी न हो सके।”
‘आयरन हील’ उपन्यास की समूची पाण्डुलिपि उसकी नायिका एविस एवरहार्ड ने लिखी थी, जिसे उसने पूरे देश में ‘आयरन हील’ के भाड़े के सिपाहियों, जासूसी संगठनों और गद्दार मेहनतकशों द्वारा हथियाये जा रहे सत्ता अभियान के अन्तर्गत रौंदी जा रही सामाजिक संरचना और कामरेडों की धर–पकड़ और हत्याओं के दौर में छुपा दिया था, भागने या गिरफ्तारी से पहले। लेखक के अनुसार–– “दु:ख है कि वह इसे पूरा नहीं कर सकी। कर पाती तो शायद सात सदियों से घिरे रहस्य से पर्दा उठ गया होता।”
एविस ने अपने अनुभवों में अमरीका के उस दौर को चित्रित किया है, जब वह देश वर्ग संघर्ष तेज करने वाले मजदूर वर्ग और धनी वर्ग के बीच चल रही भौतिक और वैचारिक टक्करों से गुजर रहा था। एलिस के पिता अमरीका की एक यूनिवर्सिटी में भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर थे। विज्ञान की विभिन्न शोधों में उनकी दिलचस्पी के साथ सामाजिक विज्ञान और दर्शन में भी उनकी गहरी रुचि थी। वे अपने ड्राइंग रूम में अकसर विभिन्न विषयों के अधिकृत वक्ताओं और उन्हें सुनने के लिए सभ्रान्त समाज के मेहमानों को आमंत्रित करते थे। वे स्वयं खुले विचारों के व्यक्ति थे। उन्होंने एक दिन सड़क से गुजरते हुए एक नुक्कड़ पर मजदूरों को सम्बोधित करते हुए एक युवा मजदूर नेता को सुना, जिसका नाम था–– अर्नेस्ट एवरहार्ड। वे उसकी तकरीर से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे अपने घर में आयोजित होने वाली डिनर पार्टी में अपने विचार व्यक्त करने के लिए आमंत्रित कर दिया। एलिस जो 24 वर्ष की एक उत्साही युवती थी, अपने पिता द्वारा आयोजित गोष्ठियों में दिलचस्पी के साथ शामिल होती थी। उसकी माँ का निधन हो चुका था। विवाह की उम्र हो जाने के बावजूद उसने अभी अपना जीवन साथी नहीं चुना था।
एलिस के पिता ने उनके घर पर 12 फरवरी 1912 को आयोजित डिनर पार्टी में मेहमानों से अर्नेस्ट एवरहार्ड का परिचय कराते हुए कहा था कि “हमारे बीच एक मजदूर वर्ग का प्रतिनिधि है। मुझे विश्वास है कि वह एक नये दृष्टिकोण के साथ बातें रख सकता है जो दिलचस्प और ताजगी भरी हो सकती हैं।” एलिस की अर्नेस्ट से यह पहली मुलाकात थी। उसे उसका शारीरिक गठन और पोशाक ही नहीं, उसके विचार भी उस परिवेश से भिन्न लगे थे, जिसमें वह पली थी। किन्तु इस भिन्नता और पार्टी में निडर होकर व्यक्त किये गये विचारों से वह अन्दर ही अन्दर उसकी ओर खिंचाव महसूस कर रही थी। जब अर्नेस्ट ने उससे हाथ मिलाया तो जिस तरह का दबाब उसने महसूस किया वह सामान्य सामाजिक शिष्टाचार के अन्तर्गत नहीं आता, किन्तु एलिस ने मन ही मन अर्नेस्ट को अपने भावी जीवन–साथी के रूप में चुन लिया था। डिनर पार्टी में उपस्थित लोगों में अधिकांश पादरी, डॉक्टर और सभ्रान्त वर्ग से थे। जब अर्नेस्ट ने उनके पराभौतिक दर्शन के मुकाबले वैज्ञानिक भौतिकवादी दर्शन के तर्क पूरी मजबूती के साथ रखे तो उनमें से अधिकांश उत्तेजित हो गये, सिवाय एलिस के पिता और एक पादरी मोरहाउस के। हालाँकि अधिकांश लोग अर्नेस्ट के तर्कों से पराजित और निरुत्तर हो गये थे। डिनर के आयोजक पिता इस वैचारिक टक्कर में अर्नेस्ट की मजदूर वर्ग के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और विचारों से प्रफुल्लित थे।
अर्नेस्ट एवरहार्ड से एलिस की दूसरी मुलाकात तब हुई जब वह उसके पिता के साथ घर पर आया। वह उन दिनों बर्कले की यूनिवर्सिटी में जन्तु विज्ञान के विशेष कोर्सेज ले रहा था। साथ ही वह एक नयी किताब पर मेहनत कर रहा था–– दर्शन और क्रान्ति (यह किताब लगातार गुप्त रूप से छपती रही) इस दूसरी भेंट में एलिस और बिशप मोरहाउस, अर्नेस्ट पर सवालों की बौछार कर देते हैं, वे कहते हैं कि तुम्हारे विचारों में वर्ग–घृणा भरी हुई है, जो समाज विरोधी है। अर्नेस्ट उनके एक–एक सवाल का जबाव पूरे आत्म–विश्वास और जिन्दगी के ठोस तर्कों के साथ देता है। वर्ग–संघर्ष की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए वह कहता है, “वर्ग संघर्ष, वर्ग–घृणा तो नहीं। मेरा विश्वास कीजिए हम वर्ग–घृणा पैदा नहीं करते। हम वर्ग संघर्ष की व्याख्या करते हैं–– वैसे ही जैसे न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण की। हम हितों के टकराव की व्याख्या करते हैं, जिसके कारण वर्ग संघर्ष पैदा होता है।” अर्नेस्ट अमीरों और गरीबों के बीच चल रही हितों की टकराहट में चर्च की तठस्थता को हकीकत में अमीरों की लूट से आँखें बन्द कर लेने की भूमिका बताता है। वह बेहद बेबाक होकर कहता है कि अमीरों के ठाठबाट, मजदूरों के खून के धब्बों से सने हैं। वह बर्कले के एक मजदूर जैक्सन का उदाहरण देता है, जिसकी बाँह कारखाने की मशीन में फँस कर कट गयी थी। किन्तु मिल मालिक, उनके वकील और न्याय–प्रणाली सभी मिलकर जैक्सन को ही उसके लिए दोषी ठहराते हैं और उसकी मुआवजे की माँग को खारिज कर देते हैं। वह कहता है कि इस तरह के उदाहरणों से पूरा देश–समाज भरा पड़ा है, जिनकी कीमत पर चन्द लोग गुलछर्रे उड़ाते हैं और सभ्यता का नकली आवरण ओढ़कर अपनी अमानवीयता और बर्बरता को छुपाते हैं।
एलिस जैक्सन के मामले की पूरी पड़ताल करती है, तथ्य जुटाती है और इस नतीजे पर पहुँचती है कि जिस यथार्थ जिन्दगी से बहुसंख्यक जनता गुजरती है, प्रभु वर्ग उस यथार्थ को ठुकरा कर अपने हित में एक कृत्रिम यथार्थ रचता है और उस पर कानून की मोहर लगवाता है।
एलिस इस तथ्यात्मक यथार्थ से रोमांचित होती है और कहती है–– “यह सब अभूतपूर्व था, अवास्तविक जैसा, फिर भी अर्नेस्ट की सत्य की कसौटी के अनुसार यह सब कारगर सिद्ध हुआ। मैंने अपना जीवन समर्पित कर दिया और विश्वास भाग्यशाली सिद्ध हुआ।” अर्नेस्ट के विचारों की गर्मी से प्रबुद्ध जन आकर्षित हो रहे थे। उसे व्याख्यान देने के लिए अच्छी खासी राशि भी दी गयी। अपने व्याख्यानों में उसने बताया कि किस तरह धनिकों की नीचे की श्रेणियाँ बर्बाद हो रही थीं और उनकी कमाई का धन चन्द कम्पनियों और ट्रस्टों को अत्यधिक धनवान बनाने के काम आ रहा था। उसने अमरीकी अर्थतंत्र का गणित और उसके आने वाले भविष्य की रूपरेखा को विस्तार से समझाया। वह कहता है कि या तो मजदूर वर्ग और पूँजीपति वर्ग के युद्ध में मजदूर जीत कर मशीन के उत्पादन के न्यायपूर्ण विभाजन के जरिये अधिक खुशहाल, बेहतर और भद्र जीवन जियेंगे और अमरीका ही नहीं सारी दुनिया एक नये और शानदार युग में प्रवेश करेगी। ‘पर मान लो मशीनों और दुनिया के स्वामित्व के संघर्ष में पूँजीपति जीत जायें ‘एक प्रश्न उछला –––’ तब हम और मजदूर और आप सब इतिहास के किसी भी कमाऊ और कुख्यात अधिनायक की तरह के क्रूर अधिनायकत्व के इस्पाती जूतों के नीचे रौंद दिये जायेँगे। इस अधिनायक का उपयुक्त नाम होगा ‘आयरन हील’।
एलिस के पापा ने अपने अध्ययन के आधार पर एक पुस्तक लिखी जिसमें उनके तर्क समाजवादियों के पक्ष में स्वत: ही मुड़ गये थे। पादरी मोरहाउस भी चर्च में सामाजिक सत्य को लोगों के सामने रखने लगे थे। उस दौर में उनके जैसे व्यवस्था विरोधी बुद्धिजीवियों की संख्या बढ़ रही थी। संसद में भी समाजवादियों का प्रतिनिधित्व बढ़ रहा था। अर्नेस्ट एवरहार्ड भी अच्छे मतों से जीत कर वहाँ पहुँच गया था। किन्तु समाज में आ रही इस सुगबुगाहट से स्वामी वर्ग चैकन्ना हो गया। एलिस के पापा की किताब को प्रेस में छपने से रोक दिया गया, उन्हें अनार्किस्ट और निहिलिस्ट करार दे दिया गया और यूनिवर्सिटी की नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। पादरी मोरहाउस को भी चर्च से धकेल कर पागल करार कर दिया गया। ‘यंत्र चालकों की हड़ताल तोड़ी गयी, दो लाख चालकों के पाँच लाख समर्थक थे। पर उनका ऐसा खूनी दमन हुआ जैसा अमरीका के इतिहास में कम ही हुआ होगा। मालिकों ने हड़ताल तोड़कों की फौज उतार दी और उनसे खूनी संघर्ष हुआ। कितने ही मजदूर नेता मार दिये गये। बहुतों को जेल, हजारों को कांजी हॉउस जैसी जगहों में बन्द कर दिया गया। उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया गया।
इस तरह अमरीका के कुलीन तंत्र ने जनतंत्र की उस आवाज को कुचल दिया, जिस जनतंत्र को उसने ही सामन्ती ढाँचे को ध्वस्त करके निर्मित किया था। उस जनतंत्र के अन्दर से ही बराबरी और समाजवाद की तरुणाई एक नयी उम्मीद के साथ आकार ग्रहण कर रही थी। किन्तु विचारों की चिंगारियों को दुनिया की कोई भी बर्बर ताकत बुझा नहीं सकती, वह चिंगारी अमरीका और यूरोप में ‘आयरन हील’ के पैशाचिक दमन के द्वारा तात्कालिक रूप से बुझा दी गयी। किन्तु वह इस उपन्यास के लिखे जाने के बाद के चन्द वर्षों के अन्दर ही क्रान्ति की महा–ज्वाला बनकर रूसी सर्वहारा वर्ग के कठोर संघर्षों के रूप में दुनिया के बड़े हिस्से में लहक उठी। किन्तु तब इस उपन्यास के लेखक जैक लण्डन और उपन्यास के क्रान्तिकारी पात्र अर्नेस्ट एवरहार्ड, उस पर अपनी जान न्यौछावर करने वाली प्रेमिका एलिस जैसे लोग जीवित नहीं रह सके थे या फिर इतिहास की गर्द में कहीं खो गये थे। किन्तु सही अर्थों में वे मरे नहीं, न पराजित हुए। वे उस नींव के पत्थर थे, जिन्होंने करोड़ों मेहनतकशों के लिए भविष्य की खुशहाली और पूँजी की बर्बर लूट के विरुद्ध खुशहाली और आजादी की एक नयी जिन्दा इबारत लिखने का काम किया। वह इबारत इसी उपन्यास की नायिका एलिस द्वारा अपने अविच्छिन्न नायक अर्नेस्ट के बारे में एक कविता के रूप में व्यक्त की थी, उस कविता के एक छोटे से अंश के जरिये उस आवेगमय, उदात्त मानव की स्पिरिट का अन्दाज लगाया जा सकता है––
“मैं जीवन के लिए, मृत्यु के लिए जीता हूँ
मेरे होठों पर गीत थिरकते हैं
क्योंकि मैं जब मरूँगा
कोई और ‘मैं’ प्याले को आगे बढ़ा देगा”
इस उपन्यास को हिन्दी में पढ़े जाने की अर्ज, जिस शख्स के सीने में कसमसाई और जिसे लगा कि इतिहास के इस दौर को जिन्दा रखा जाना चाहिए, उसका नाम था प्रो– लाल बहादुर वर्मा, उसे लगा कि आज जिस अमरीका को हम साम्राज्यवाद के उत्थान और पतन के शिखर के रूप में देख रहे हैं, उसके अतीत को समझने के लिए हावर्ड फास्ट के उपन्यास ‘अमरीकन’ का आख्यान अधूरा रह जायेगा, उसे पूर्णता देने के रास्ते में ‘आयरन हील’ जैसे मील के पत्थर भी हैं। यही सोच कर उन्होंने इस उपन्यास का बहुत सरल और समझ में आने वाली भाषा में अनुवाद करते हुए, लुप्त माने जाने वाले इतिहास के वे पृष्ठ उजागर किये, जिनमें भविष्य के लिए बचायी गयी आग आज भी कहीं न कहीं धधक रही है।
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