गाँव में बढ़ती बीमारी, बेहाल जनता और बदहाल व्यवस्था
“कमायेंगे नहीं तो खायेंगे क्या, इसलिए बुखार में भी काम पर जाना मजबूरी बन गया है, मालिक हमारी परेशानी जानकर भी अनजान बन रहा है” यह उस मजदूर के शब्द हैं जो लगभग 30 दिनों से बुखार की मार झेल रहा है। लेकिन उसके बाद भी वह लड़खड़ाते कदमों के साथ फैक्ट्री जाने को मजबूर है, वरना मालिक उसे नौकरी से निकाल देगा। कमोबेश इसी तरह की स्थिति का सामना मेरठ के गाँवों के अधिकतर लोग कर रहे हैं। कुछ बुखार का असर तो महीनों तक शरीर के सभी जोड़ों में दर्द छोड़ रहा है। शरीर का तापमान लगभग 104 डिग्री से लेकर 105 डिग्री फारेनहाइट तक पहुँच रहा है जो शरीर के लिए काफी खतरनाक है। बच्चे, बूढ़े, जवान सभी इससे पीड़ित हैं। गाँवों की अधिकतर आबादी बुखार की चपेट में हैं।
यह हाल केवल एक गाँव का नहीं है, बल्कि मेरठ, हापुड़, अमरोहा आदि के 50 से ज्यादा गाँव इस बुखार की मार झेल रहे हैं। सबसे ज्यादा भयावह स्थिति तब हो जाती है जब आसपास के गाँव से खबरें आ रही है कि बुखार से फला व्यक्ति की मौत हो गयी, जो लोगों को और मानसिक तनाव में धकेल रहा है।
हमारे गाँव में अभी तक कोई भी प्रशासनिक या स्वास्थ्य अधिकारी नहीं आया है। हम गाँव की भयावह स्थिति को देखकर जब प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र के अधीक्षक के पास गये तो उन्हें इस महामारी की जानकारी ही नहीं थी। उन्होंने इसे केवल मामूली मौसमी बुखार कहकर टाल दिया। वे कहने लगे कि आपके गाँव में कम्युनिटी हेल्थ ऑफिसर बैठता है उसको दिखा दो। वह रोज 40 ओपीडी करता है, फिर आप यहाँ क्यों आये हो?
हमारे गाँव की जनसंख्या लगभग 10 हजार से कुछ ज्यादा है, जिसमें से आधी आबादी बुखार की चपेट में आ गयी। ऐसे में अकेले नर्सिंग स्टाफ इतने लोगों का इलाज कैसे कर सकता है? हमारे सवाल–जवाब करने के बाद उन्होंने फोन पर अपने से छोटे अधिकारी को डाँटा और तुरन्त मेडिकल कैम्प लगाने का आदेश दिया और उसके बाद अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया। यही हाल मेरठ के जिला अस्पताल का भी है। यहाँ सिर्फ ढाई सौ बेड की व्यवस्था है। जबकि जनपद की कुल जनसंख्या लगभग 40 लाख के आसपास है। इस अनुपात में अस्पताल में मरीजों को देखने वाले डॉक्टर भी कम हैं, उन पर पहले से ही अतिरिक्त बोझ है। क्या ऐसे में वह किसी आपातकालिक स्थिति के लिए तैयार हैं ?
प्राइवेट अस्पताल का महँगा इलाज कराना गाँव के मजदूरों और छोटे किसानों के लिए सम्भव नहीं है। ऐसे समय केवल गाँव के गैर डिग्रीधारी डॉक्टर ही उनके लिए मुक्तिदाता बने हुए हैं। यही डॉक्टर बीमारों को प्राथमिक उपचार मुहैया करा रहे हैं। बुखार के दौरान अधिकतर लोगों में गम्भीर लक्षण दिखायी दे रहे हैं जिसके चलते उन्हें मजबूरी में निजी अस्पतालों में भी जाना पड़ रहा है, जहाँ इलाज के लिए उन्हें कर्ज लेने को मजबूर होना पड़ रहा है। यह समस्या केवल यहीं तक सीमित नहीं, बल्कि इसके चलते मजदूर रोजगार से हाथ धो रहे हैं और कर्ज के जाल में फँस रहे है। बड़ी आबादी के बीमार होने के चलते गन्ने की कटाई भी बाधित हो रही है। इससे गाँव के लोगों की जीविका संकट में है।
आखिर इतने बड़े पैमाने पर बुखार गाँवों में क्यों फैल रहा है? यह सवाल गाँव के लोगों से पूछा तो उनके पास कोई साफ जवाब नहीं था। उनके लिए जिन्दगी में ऐसा पहली बार था जब गाँव के लगभग आधे लोग बीमार पड़े हों। कुछ ने गाँव के गन्दे तालाबों, नाले और नालियों को इसका जिम्मेदार बताया जिनमें बरसात के बाद बड़ी संख्या में मच्छर पैदा हो रहे हैं। जो बीमारियों की जड़ है। तालाबों की सफाई सालों से लम्बित है। प्रशासन इस ओर से मुँह मोड़े बैठा है। गाँव का पानी पीने लायक नहीं बचा है। हवा भी जहरीली हो गयी है। हवा में पीएम 2–5 माइक्रो कण साँस के साथ हमारे फेफड़ों में पहुँचते हैं जो खून में मिलकर पूरे शरीर में फैल जाते हैं और दिल, फेफड़ों आदि अंगों में गम्भीर बीमारी पैदा कर रहे हैं। इनके चलते ही गाँव–गाँव कैंसर, अस्थमा, हर्ट अटैक और ब्रेन स्ट्रोक तेजी से बढ़ रहा है।
इन बीमारियों का देश की राजनीति और पारिस्थितिकी से गहरा सम्बन्ध है। पिछले कुछ सालों से उत्तराखण्ड, झारखण्ड, छत्तीसगढ़ समेत कई राज्यों में जंगलों की अन्धाधुन्ध कटाई की जा रही है। इसके साथ ही पर्यावरण कानूनों में ढील देकर पूँजीपतियों को प्रदूषण फैलाने की खुली छूट दी जा रही है। वहीं दूसरी तरफ आम जनता की पहुँच से स्वास्थ्य सुविधाओं को दूर किया जा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र को बर्बाद किया जा रहा है जिसकी कीमत हर रोज हजारों लोगों को इलाज के अभाव में अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। अगर हम सरकार की इन नीतियों का विरोध नहीं करते हैं तो ऐसे संकट और गम्भीर और विकराल रूप लेकर हमारे सामने आयेंगे।
–– सुहैल
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