दिसंबर 2025, अंक 49 में प्रकाशित

अमीरी–गरीबी की बढ़ती खाई और भगत सिंह के विचार

‘हुरुन इण्डिया रिच लिस्ट 2025’ की रिपोर्ट के अनुसार, महज 1687 अरबपतियों के पास देश की आधी जीडीपी के बराबर सम्पत्ति है।

भारत की आज की आर्थिक स्थिति पर अगर हम गहराई से नजर डालें, तो स्पष्ट दिखता है कि पूँजी और सम्पत्ति का संकेन्द्रण कुछ ही हाथों में सिमट गया है। ऑक्सफैम की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि भारत में केवल 1 प्रतिशत अमीर आबादी देश की लगभग 40 प्रतिशत सम्पत्ति पर नियंत्रण रखती है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों के पास केवल 3 प्रतिशत सम्पत्ति है। इसका मतलब यह है कि करोड़ों मेहनतकश जनता–– किसान, मजदूर, ठेले–खोमचे वाले, छोटे व्यापारी जो देश की असली उत्पादक शक्ति हैं, वे अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं, जबकि एक बेहद छोटा वर्ग विलासिता में आकण्ठ डूबा हुआ है और नेताओं–मंत्रियों को अपनी जेब में रखकर राजनीतिक प्रभाव का मजा ले रहा है।

आँकड़े बताते हैं कि 2011 में भारत में जहाँ केवल 55 अरबपति थे, वहीं 2024 तक यह संख्या बढ़कर 1600 से अधिक हो गयी–– यानी लगभग बीस गुना वृद्धि। यह परिघटना कोई संयोग नहीं, बल्कि पूँजीपरस्त नीति का परिणाम है। मोदी सरकार के शासनकाल में पूँजीपतियों के पक्ष में एक व्यवस्थित ढंग से नीतियाँ बनायी गयीं–– कॉर्पाेरेट टैक्स में भारी कटौती (2019 में 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत), सार्वजनिक उपक्रमों का निजीकरण, श्रम कानूनों को ढीला करना और कृषि सुधारों के नाम पर किसानों को खुले बाजार की असुरक्षा में धकेलना। अडानी और अम्बानी जैसे कॉर्पाेरेट घरानों की सम्पत्ति जिस तेजी से बढ़ी है, वह इस पक्षपाती नीति का सीधा परिणाम है। उदाहरण के लिए, अडानी समूह की सम्पत्ति 2014 में लगभग 5 अरब डॉलर थी, जो 2022 तक बढ़कर 120 अरब डॉलर के पार पहुँच गयी, यानी 24 गुना की बढ़ोतरी।

यह असमानता केवल आर्थिक जीवन में ही नहीं, बल्कि इसके सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव भी बहुुत खतरनाक हैं। जब सम्पत्ति और पूँजी कुछ हाथों में सिमट जाती है, तो लोकतंत्र केवल दिखावटी बनकर रह जाता है। पूँजीपति वर्ग सरकारों को अपनी जेब में रखता है, नीतियाँ उसके हित में बनायी जाती हैं–– जैसे कर छूट, निजीकरण, श्रम कानूनों में ढील और सार्वजनिक संसाधनों के कॉर्पाेरेट के हवाले करना। 21 नवम्बर को मौजूदा चार श्रम संहिताओं को लागू करना भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है। गरीब और मध्यम वर्गीय जनता पर करों का बोझ बढ़ता जा रहा है, जबकि अरबपतियों की सम्पत्ति हर साल कई गुना बढ़ती जा रही है। यह वही स्थिति है जिसे कार्ल मार्क्स ने “पूँजी का संकेन्द्रण और श्रम का अवमूल्यन” कहा था। मजदूरों के श्रम का मूल्य घटा दिया गया है, किसान कर्ज में डूब रहे हैं और कॉर्पाेरेट घराने लगातार कर–छूट और सरकारी ठेके के जरिये मालामाल हो रहे हैं।

ऐसे दौर में शहीदे–आजम भगत सिंह के विचार पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गये हैं। अंग्रेजी राज के खिलाफ संघर्ष करते हुए भगत सिंह ने 1928 में लिखा था–– “क्रान्ति की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है।” उनका मानना था कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं, जब तक आर्थिक और सामाजिक बराबरी स्थापित न हो। उन्होंने बताया कि यदि किसी देश में एक वर्ग अमीर होता जाता है और दूसरा गरीब, तो यह समाज के पतन का संकेत है। भगत सिंह ने जिस समाजवाद की बात की थी, उसका अर्थ था–– उत्पादन के साधनों पर श्रमिकों का सामूहिक अधिकार, शोषणमुक्त व्यवस्था और ऐसी समाज व्यवस्था जिसमें “हर व्यक्ति को उसकी आवश्यकता के अनुसार और हर व्यक्ति से उसकी क्षमता के अनुसार” का नारा लागू हो।

आज भारत में जो असमानता, बेरोजगारी और भुखमरी की स्थिति है, वह उसी पूँजीवादी विकास मॉडल का परिणाम है जिसके विरुद्ध भगत सिंह ने चेताया था। 2024 में भारत की जीडीपी तो बढ़ी, लेकिन 80 करोड़ लोग आज भी 5 किलो सरकारी राशन पर निर्भर हैं–– यह “विकास” नहीं, “विकृत विकास” है।

भगत सिंह का सपना एक ऐसे भारत का था जहाँ “न कोई शोषक हो, न शोषित”। उन्होंने कहा था कि क्रान्ति केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि “समाज के मूल ढाँचे में आमूल परिवर्तन” है। आज जब 1687 लोगों के पास देश की आधी सम्पत्ति है और करोड़ों लोग न्यूनतम वेतन पर गुजारा कर रहे हैं या बेरोजगार हैं, तब यह स्पष्ट है कि वह आमूल परिवर्तन अभी बाकी है। भगत सिंह के समाजवादी विचार हमें यह सिखाते हैं कि असमानता और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष केवल नारे से नहीं, बल्कि संगठित जनशक्ति और वैचारिक चेतना से जीता जा सकता है।

इसलिए आज की भयावह असमानता, पूँजी के केन्द्रीकरण और श्रम के अवमूल्यन के समय में भगत सिंह के विचार केवल ऐतिहासिक विरासत भर नहीं हैं, बल्कि वे भविष्य की दिशा तय करते हैं–– एक ऐसे समाज की ओर, जहाँ न्याय, समानता और स्वतंत्रता केवल संविधान की बातें न होकर जीवन की वास्तविकता बनें। मेहनतकश जनता की जिन्दगी वास्तव में खुशहाल हो!

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