चिली में गुप्तवास
(गैब्रियल गार्सिया मार्खेज द्वारा फिल्म निर्देशक मिगेल लितिन के कारनामों की दास्तान)
–– महेन्द्र नेह
मार्खेज को उनकी जादुई यथार्थ लेखन शैली के लिए कौन नहीं जानता? गार्गी प्रकाशन द्वारा दिसम्बर, 2024 में मार्खेज द्वारा लिखित और उषा नौडियाल द्वारा अनूदित, एक बेहद सनसनीखेज और उत्सुकता जगाने वाली किताब ‘चिली में गुप्तवास’ को प्रकाशित किया गया है। यह किताब चिली के मशहूर फिल्म निर्देशक मिगेल लितिन के बारे में है जो अपने ही देश से निर्वासित थे। उन्होंने निर्वासन अवधि के दौरान 1985 में एक धनाढ्य व्यवसायी का भेश बना कर गुप्त रूप से चिली में प्रवेश किया और वहाँ देखा कि सैन्य शासन द्वारा चिली के नागरिकों की स्वतन्त्रता का दमन जारी है। उन्होंने दमन के विरुद्ध प्रतिरोध अभियान और चिली के यथार्थ को कैमरों में बन्द किया। यह फिल्म–निर्माण की उनकी एक साहसिक दास्तान है। मार्खेज ने मिगेल लितिन का साक्षात्कार लिया। फिल्म निर्माण के दौरान हर कदम पर चिली में लितिन की गिरफ्तारी की सम्भावना बनी रही। उनके रोमांचक अनुभवों को मार्खेज ने अपनी पैनी नजर से नोट किया और उन्हें एक रिपोर्ताज की शक्ल दी है।
अपनी फिल्म निर्माण–योजना में मिगेल लितिन अकेले नहीं थे। उनके साथ एक पूरी फिल्म निर्माण टीम थी और इस विशाल प्रोजेक्ट को रूपायित करने के लिए इटली, नीदरलैण्ड और फ्रांस से बुलाये गये सहयोगी फिल्म निर्माता क्रू भी थे, जो गुप्त रूप से फिल्म–निर्माण में शामिल थे। ये क्रू कभी आपस में मिल जाते किन्तु अधिकतर अलग–अलग रहते हुए अपने प्रोजेक्ट को पूरा करते रहे। नकली पासपोर्टों और नामों के आधार पर हवाई जहाज, पानी के जहाज, ट्रेनों, बसों और कारों में यात्रा करते हुए, काम करने और फिल्म की शूटिंग करते समय, होटलों और अन्य स्थानों पर रुकते हुए मिगेल सहित इन सभी क्रू–सदस्यों के सर पर सेना, पुलिस और गुप्तचर विभाग द्वारा गिरफ्तार कर लिए जाने का खतरा चैबीसों घण्टे मँडराता रहता था। यह काम कितना जोखिम भरा था, इसका अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सेना के गश्ती दलों की नजरों से बचते–बचाते क्रू के सदस्य अपने आवास की ओर लौटते थे। शहरों में रोजाना कर्फ्यू लगाया जाना और सरकार के विरुद्ध प्रतिरोध आन्दोलन चलायेजाने वाले कार्यकर्ताओं पर मशीनगनों से गोलियाँ चलाया जाना रूटीन बना हुआ था। नोट करने लायक यह बात भी है कि पिनोशे की सैन्य सरकार के विरुद्ध जनतंत्र स्थापित करने वाले कार्यकर्ता खुले और गुप्त रूप से काम कर रहे थे। वे इस फिल्म निर्माण के क्रू सदस्यों को गिरफ्तारी से बचाने की पूरी कोशिश कर रहे थे। चिली के उन जनतंत्र प्रेमियों और वामपंथी कार्यकर्ताओं में सभी वर्गों के नागरिक शामिल थे, यहाँ तक कि धनाढ्य वर्ग की वे महिलाएँ भी जो अपनी कीमती विदेशी कारों में मिगेल और उनके साथियों को बैठा कर उन महँगे होटलों में भी ले जाती थीं, जहाँ उन पर सन्देह की गुंजाइश कम होती थी। मिगेल की मुलाकात कुछ सेना के उच्च अधिकारियों से भी करायी गयी, जिन्हें पिनोशे के शासन ने राष्ट्रपति अलेन्दे के वफादार होने के सन्देह में सेवा–मुक्त कर दिया था।
मैं समझता हूँ कि इस पुस्तक को पढ़ते हुए हमें लातिन अमरीकी देश चिली के नागरिकों के उस संघर्ष की जानकारी भी होनी चाहिए जिसे उन्होंने अमरीकी साम्राज्यवाद के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष राजनीतिक दखल, अमरीकी कम्पनियों की लूट, अमरीका परस्त राजनीतिज्ञों और सैन्य शासन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाया और जो आज भी जारी है। हालाँकि इस पुस्तक की भूमिका, परिचय और मिगेल के संस्मरणों में इस संघर्ष के बहुत से सन्दर्भ हैं, किन्तु मुझे लगता है कि उन लोगों के अलावा जो चिली के गत आधी सदी में घटित इतिहास और वर्तमान संघर्षों से परिचित हैं, उनके अलावा भी इस किताब के बहुत से ऐसे पाठक हो सकते हैं, जिन्हें यह सब जान कर पुस्तक में वर्णित ब्यौरों में दिलचस्पी अधिक बढ़ सकती है।
यदि संक्षेप में कहा जाये तो वह यह है कि लातिन अमरीकी देश क्यूबा में फिदेल कास्त्रो और चे ग्वेरा के नेतृत्व में 1959 में गुरिल्ला युद्ध द्वारा वहाँ के क्रूर सैनिक शासन का तख्ता पलट दिया गया और समाजवादी व्यवस्था स्थापित की गयी। उसके बाद चिली सहित अन्य लातिन अमरीकी देशों में, अमरीकी प्रभुत्व, लूट, दमन और हस्तक्षेप के विरुद्ध राजनीतिक संघर्ष तेज हो गया। चिली में अमरीका के विरुद्ध वामपंथी–समाजवादी ताकतों ने जनता के दिलों में जो स्थायी जगह बनायी उससे संसदीय चुनावों में उनकी जीत हुई। इससे अमरीका के शीर्ष राजनेता, कोर्पाेरेट कम्पनियों के मालिक, नौकरशाह और अमरीकी गुप्तचर–तंत्र के अधिकारी बौखला गये और चिली की वामपंथी सरकार को उखाड़ फेंकने का षड़यन्त्र रचने लगे। इस दास्तान को उन्हें तो समझना ही चाहिए, जो अमरीकी साम्राज्यवाद द्वारा दुनिया भर के प्राकृतिक साधनों को बर्बरतापूर्वक लूटे जाने से क्षुब्ध हैं। उन्हें भी जानना चाहिए, जिनकी निगाहों में अमरीका की छवि आज भी दुनिया के एक बड़े जनतंत्र और उद्धारक देश के रूप में बनी हुई है।
यह सन 1960 था, जब चिली के छात्र आन्दोलन में साल्वादोर अलेन्दे एक ऐसे नेता के रूप में उभर कर आये, जिन्होंने अमरीकी कम्पनियों द्वारा संचालित ताम्बा–उद्योग के राष्ट्रीयकरण की आवाज उठायी। इन कम्पनियों द्वारा चिली के संसाधनों की अबाध लूट जारी थी। राष्ट्रीयकरण का सीधा सम्बन्ध वहाँ के मजदूरों और आम नागरिकों की आय को बढ़ना था। शीघ्र ही इस माँग ने एक जन–आन्दोलन का रूप ग्रहण कर लिया। आन्दोलन के इस फैलाव को देख कर 1961 में तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति जॉन एफ कनेडी ने कहा–– “समाजवाद के प्रसार को रोको” और वहाँ की दक्षिणपंथी क्रिस्चियन डेमोक्रेटिक पार्टी की सहायता राशि बढ़ा दी। 1964 में इस राशि को 200 लाख डॉलर कर दिया गया। इसके बाबजूद अलेन्दे के नेतृत्व में गठित ‘पोपुलर यूनिटी’ वामपंथी गठबन्धन की लोकप्रियता बढ़ती गयी। 1970 के राष्ट्रीय चुनाव में अलेन्दे की पार्टी जीत गयी और अलेन्दे को चिली का राष्ट्रपति चुन लिया गया। अलेन्दे ने सरकार गठित होने के तुरन्त बाद अमरीकी कम्पनियों के साथ–साथ कपड़ा उद्योग, ऑटोमोबाइल तथा डाक तार का राष्ट्रीयकरण कर दिया। भूमि सुधारों की घोषणा कर के 100 लाख एकड़ जमीन भूमिहीनों को वितरित कर दी। किसानों के नि:शुल्क इलाज की योजना तथा बच्चों को आधा लीटर दूध बाँटना शुरू कर दिया। चिली के मेहनतकशों की आय में दो साल के अन्दर 40 प्रतिशत की वृद्धि नोट की गयी।
तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति निक्सन, उनके सलाहकार किसिंजर और सीआईए के निदेशक रिचर्ड हेल्म्स की आपात बैठक में अलेन्दे की वामपंथी सरकार को गिराने की योजना तैयार की गयी। अन्य देशों से चिली के व्यापार पर रोक लगा दी गयी। चीली की सेना के कमाण्डर–इन–चीफ रेन श्राइडर की हत्या करवा कर अलेन्दे सरकार पर हत्या के आरोप को प्रचारित किया गया। इसके बाबजूद नागरिकों का बड़ा हिस्सा अलेन्दे के साथ खड़ा रहा। अमरीका द्वारा लाखों डॉलर की मदद से देश के उद्योगपतियों, व्यापार संघों और विरोधी दलों ने षड्यंत्र करके अन्तत: 1973 में बहुमत से निर्वाचित अलेन्दे की वामपंथी सरकार को गिरा कर सेना के जनरल पिनोशे को राष्ट्रपति घोषित कर दिया। साल्वादोर अलेन्दे की हत्या कर दी गयी। पिनोशे की सरकार द्वारा 1973 से 1990 के बीच में 3,000 से अधिक लोग मार डाले गये।
मार्खेज द्वारा लिखी गयी यह किताब, हमें एक फिल्म निर्माता की उस जिज्ञासा से रू–ब–रू कराती है कि जिस देश से उन्हें निर्वासित होना पड़ा, उसकी हालत आज क्या है? वहाँ के गली, मोहल्लों और पार्कों में वह चहल–पहल है कि नहीं, जिनमें उन्होंने अपनी जिन्दगी के खुशी और गम भरे दिन बिताये थे? फिल्म निर्माता मिगेल के लिए यह एक अजीब अनुभव था कि वे फिल्म का निर्माण करते हुए अपनी पुरानी स्मृतियों में लौट रहे थे–– “यहाँ मेरे अतीत की चाबियाँ थीं। पास में एक पुराना टेलीविजन स्टेशन और दृश्य–श्रव्य विभाग था, जहाँ से मैंने अपना फिल्मी कैरियर शुरू किया था। और वह ड्रामा स्कूल जहाँ मैं सत्रह साल की उम्र में अपने गृह नगर में प्रवेश लेने आया था, जिसने मेरे जीवन के काम को तय किया था। यहीं पर 1970 में सल्वाडोर अलेन्दे के लिए एकता प्रदर्शन आयोजित किये जाते थे, जहाँ मैंने अपने अहम और मुश्किल दिन बिताये थे। मैं उस मूवी थियेटर से गुजरा जहाँ मैंने पहली बार मास्टरपीस सिनेमा देखे थे। हिरोशिमा, माँ अमीर उनमें सबसे यादगार थीं। तभी कोई वहाँ से पाब्लो मिलानेस का गीत गाते हुए गुजरा–– “मैं फिर से उन सड़कों पर चलूँगा, जो कभी खूनी सांतियागो थीं” मैं अपने गुप्त हालात को भूल गया और एक पल के लिए खुद में लौट आया। मेरे अन्दर खुद को पहचानने, अपना नाम चिल्लाने, दुनिया को यह बताने का एक अतार्किक आवेग था कि घर पर रहना मेरा अधिकार है।”
मिगेल उन खतरनाक दिनों को याद करते हैं, “बारह साल पहले की बात है, जब एक सुबह सेना के एक हवलदार ने मशीन गन से ताबड़तोड़ गोलियाँ चलायी थीं, जो मेरे सर के ऊपर से गुजर गयी थीं। मुझे कैदियों के समूह के साथ जाने का आदेश दिया गया, उन्हें चिली फिल्म्स बिल्डिंग की ओर ले जाया जा रहा था, जहाँ मैं काम करता था। ––– अगर हमने कुछ देर पहले सड़क पर लाशें नहीं देखी होतीं, तो शायद कोई भी यह सोच सकता था कि सब काल्पनिक है। खून से लथपथ एक घायल आदमी फुटपाठ पर बिना किसी चिकित्सा सहायता की उम्मीद के मर रहा था, सिविल कपड़ों में आदमियों के गिरोह राष्ट्रपति अलेन्दे के समर्थकों को मौत के घाट उतार रहे थे। इसके विपरीत अलेन्दे का असर सेना के उन जवानों के बीच भी मौजूद था, जो दिखावे के लिए तो अलेन्दे समर्थकों पर बन्दूकें ताने हुए थे, किन्तु चुपचाप यह भी कह रहे थे–– “हम तटस्थ हैं।” उन्हीं में से एक सार्जेंट जो मिगेल लितिन को पहचानता था, सेना के लेफ्टिनेंट से कहा कि यह आदमी इसमें शामिल नहीं था, लेफ्टिनेंट ने घृणा की दृष्टि से मेरी तरफ देखा। –––” और मिगेल सेना कि तलाशी से और अपनी मौत से बचता–बचाता भागता रहा और अन्तत: बच्चों के साथ निर्वासन की सुरंग से बाहर निकलने में कामयाब रहा।
यह राष्ट्रपति अलेन्दे के समाजवादी विचारों, अपने देश चिली और उसके बाशिन्दों के प्रति मिगेल की गहरी निष्ठा थी कि एक बार पिनोशे की फौजी तानाशाही से बच निकलने के बाबजूद, वह पुन: जान जोखिम में डाल कर चिली वापस आये। वे फौजी शासन की नजरों को धोखा देते हुए चिली के तत्कालीन यथार्थ का फिल्मांकन करने की जिद में वेश बदल कर घूमते रहे। अपने अनुभवों को रेखांकित करते हुए मिगेल ने कहा–– “हमने सांतियागो में पाँच दिन और फिल्मांकन किया जो सिस्टम को परखने के लिए पर्याप्त था। इस दौरान मैंने उत्तर में फ्रांसीसी क्रू और दक्षिण में डच क्रू के साथ सम्बन्ध बनाये रखा। एलेना के साथ सम्पर्क बहुत सही था और धीरे–धीरे मैं भूमिगत लोगों सहित उन राजनीतिक हस्तियों का भी साक्षात्कार कर रहा था, जो खुले में काम कर रहे थे।”
मिगेल ने इस दौरान चिली में अमरीका से आयी ऊपरी चमक–दमक की तहों में झाँक कर देखा तो पाया कि वहाँ गहरा अन्धेरा था–– “समृद्धि का तत्काल और प्रभावशाली आभास देने के लिए, ‘सैन्य जुंटा’ ने अलेन्दे द्वारा राष्ट्रीयकृत की गयी हर चीज का विराष्ट्रीयकरण कर दिया और लगभग हर कीमती चीज को निजी पूँजी और बहुराष्ट्रीय निगमों को बेच दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि आकर्षक विलासिता की वस्तुओं और सजावटी सार्वजनिक कार्यों का विस्फोट हुआ, जिसने शानदार समृद्धि और आर्थिक स्थिरता का भ्रम पैदा किया। –––पिछले दो सौ सालों से कहीं ज्यादा वस्तुओं का आयात किया गया। अमरीका ने अन्तरराष्ट्रीय क्रेडिट एजेंसियों के साथ मिलीभगत करके बाकी काम किया। लेकिन जब भुगतान करने का समय आया तो भ्रम दूर हो गया। छ: साल के आर्थिक दिवास्वप्न एक ही बार में गायब हो गये, चिली का बाहरी ऋण बढ़कर 23 अरब डॉलर हो गया, जो अलेन्दे प्रशासन के ऋण से लगभग छ: गुना अधिक है। आर्थिक चमत्कार ने कुछ अमीरों को और अमीर, बाकी समाज को और गरीब बना दिया।”
अपने गुप्त चिली प्रवास के दौरान मिगेल अपने गाँव भी जाते हैं, उन्हें आश्चर्य होता है कि घर की जीर्ण–शीर्ण हालत के बाबजूद, उनकी किताबें और पसन्द की चीजें उनकी माँ ने सजा कर करीने से रखी हुई थीं, इस उम्मीद के साथ कि एक दिन उनका बेटा अपने देश में अवश्य लौटेगा। वे उस शहर वालपाराइसो में भी गये जो एक बन्दरगाह है, जहाँ अलेन्दे का जन्म हुआ था, जहाँ उन्होंने अपनी पहली राजनीतिक पुस्तक एक विद्रोही मोची के घर में पढ़ी, जहाँ उनके दादा रेमन अलेन्दे ने पहले धर्मनिरपेक्ष स्कूल की बुनियाद रखीय जहाँ उनकी सबसे शुरुआती राजनीतिक गतिविधि “बारह समाजवादी दिनों” के दौरान हुई और यही वह शहर था जिसे पिनोशे के फौजी शासन ने अलेन्दे की हत्या के बाद, उनकी लाश को बिना किसी को सूचित किये, केवल उनकी पत्नी और बहन की उपस्थिति में एक चर्च में दफना दिया। मिगेल ने वहाँ जा कर लोगों से बातचीत की तो वे आश्वस्त हुए कि भले ही अलेन्दे के शरीर को दफना दिया गया हो, उनके विचार और काम आज भी चिलीवासियों के दिमाग में जिन्दा थे। वे अपने क्रू के साथ पाब्लो नेरूदा के पूर्वी समन्दर के किनारे बसे घर इस्ला नगर यानी काला द्वीप भी पहुँचते हैं जहाँ महाकवि की स्मृतियाँ बसी हैं, लेकिन जिसे पुलिस ने सील कर दिया है और वहाँ जाने की मनाही है। तस्वीर का दूसरा पहलू यह भी है कि चिली में अलेन्दे और नेरूदा दो ऐसे मृतक हैं जो मरे नहीं हंै और जनगण के मानस में जीवित हैं। चिली में पिनोशे के यातनादायक शासन को पलट देने और समाजवाद स्थापित करने की चाहत मरी नहीं है। युवा पीढ़ी, जिसने नेरूदा को देखा नहीं, उनके बीच नेरूदा का कल्ट भी पनप रहा है।
एक कलाकार होने के नाते मिगेल कला और संस्कृति के केन्द्रों में भी जाते हैं। उन्हें दु:ख होता है कि पिनोशे के शासन में क्लबों में नग्न–संस्कृति पनप रही है, लेकिन भले ही पाबन्दियाँ लगी हों, जन संस्कृति कर्मियों की गुप्त और खुली गतिविधियाँ रुकी नहीं थीं। मिगेल और उनके साथ चिली में गुप्त रूप से घुसे तीनों क्रू के सदस्यों के वहाँ होने और कई स्थानीय प्रशासनों से उनके द्वारा फिल्म निर्माण की अनुमति ले लिये जाने के बाबजूद, उनकी गिरफ्तारी का खतरा निरन्तर बढ़ता जा रहा था। कुछ सदस्य गिरफ्तार भी कर लिये जाते थे, लेकिन प्रशासन को उनके गुप्त–प्रोजेक्ट का अहसास हो, तब तक अपनी योजना के अनुसार क्रू के सदस्य अपने भारी भरकम उपकरणों के साथ चिली के बाहर निकलते जा रहे थे। अपने दो माह के कार्यकाल में उन्होंने एक लाख पाँच हजार फुट फिल्म बना ली थी और चिली से निकलने से पहले ही फिल्म के रोलों का बड़ा हिस्सा वहाँ से बाहर भेजा जा चुका था। किताब के लेखक मार्खेज के अनुसार यह फिल्म के पीछे फिल्म का एक स्केच है जो मूल फिल्म प्रोजेक्ट से कहीं ज्यादा एक व्यक्तिगत कहानी है।
‘चिली में गुप्तवास’ के बाद–––
मार्खेज द्वारा फिल्म निर्देशक मिगेल लितिन से लिए गये साक्षात्कार से गुजरते हुए, हम पाते है कि हालाँकि तानाशाह पिनोशे के सैन्य शासन का आतंक और जनता पर दमन बरकरार था, लेकिन वह सिर्फ एक ऊपरी सतह की तरह था, जिसके अन्दर गहरे सूराख और अन्तर्द्वंद्व पैदा हो गये थे। वरना यह आसान नहीं था कि मिगेल के फिल्म निर्माण प्रोजेक्ट के अन्तर्गत तीन अन्य फिल्म निर्माता क्रू, चिली के अन्दर अपने साजो सामान के साथ घुसें और चिली की सुरक्षा व्यवस्था को भेदते हुए दो माह तक फिल्म का निर्माण कार्य करें और वापस सुरक्षित लौट कर आ जायें।
इस पुस्तक की सबसे बड़ी खूबी है कि इसमें चिली के अन्दर बह रही उस अन्तर्धारा को पहचान कर पाठकों के सामने रखा गया है, जो सैनिक शासन से मुक्ति के लिए उन आदर्शों के साथ सक्रिय थी, जिसके बीज साल्वादोर अलेन्दे और नेरुदा जैसे मुक्तिकामियों ने बोये थे। वह 1986 था जब यह साक्षात्कार चिलीवासियों और दुनिया के सामने आया। हम देखते हैं कि चिली में इसके बाद जन संघर्षों और जनतंत्र की वापसी के आन्दोलन तेज हुए, 2019–20 में सैनिक शासन के भ्रष्टाचार के विरुद्ध हुए आन्दोलन में ‘चिली बैण्ड’ के गायकों की भूमिका को अवश्य याद किया जाना चाहिए, जिन पर रबर की गोलियाँ चलाने से सैकड़ों की संख्या में वे युवा गायक आधे या पूरी तरह अंधे हो गये, इसके बाबजूद उन्होंने सड़कों और गलियों में–– “जीत के लिए आगे बढ़ो” जैसे गीतों को गाना बन्द नहीं किया। उस आन्दोलन में करीब 300 नागरिक शहीद हुए, किन्तु इसके परिणामस्वरुप सैनिक शासन चुनाव कराने के लिए बाध्य हुआ।
2021 के चुनावों में चिली में 40 साल बाद अलेन्दे के समर्थकों की भारी बहुमत से चुनावी वापसी हुई। 16 मई, 2021 को घोषित किये गये केन्द्रीय असेम्बली के चुनावों में कम्युनिस्ट पार्टी के गठबन्धन को 117 सीट मिली, जबकि सत्ताधारी दक्षिणपंथी दल मात्र 37 सीटों में ही सिमट गया। चुने गये सदस्यों में महिलाओं का प्रतिशत 50 प्रतिशत और विजेताओं की औसत आयु 45 वर्ष थी जो युवा बहुमत की सूचक है। महाकवि पाब्लो नेरूदा की भविष्यवाणी एक बार पुन: चरितार्थ हुई –– “एकजुट लोगों को कोई ताकत नहीं हरा सकती।”
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- जी एन साईबाबा की कविताएँ 1 Jan, 2025
- तुच्छ जीवन की महान गाथा 5 May, 2026
- बच्चे काम पर जा रहे हैं 19 Jun, 2023
- साक्षात्कार
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- कम कहना ही बहुत ज्यादा है : एडुआर्डो गैलियानो 20 Aug, 2022
- चे ग्वेरा की बेटी अलेदा ग्वेरा का साक्षात्कार 14 Dec, 2018
- नेपाल के मौजूदा हालात पर कॉमरेड आहुति से बातचीत 5 May, 2026
- फैज अहमद फैज के नजरिये से कश्मीर समस्या का हल 15 Oct, 2019
- भारत के एक बड़े हिस्से में मर्दवादी विचार हावी 15 Jul, 2019
- साहित्य
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- अव्यवसायिक अभिनय पर दो निबन्ध –– बर्तोल्त ब्रेख्त 17 Feb, 2023
- औपनिवेशिक सोच के विरुद्ध खड़ी अफ्रीकी कविताएँ 6 May, 2024
- कविता का मूलस्रोत 12 Dec, 2025
- किसान आन्दोलन : समसामयिक परिदृश्य 20 Jun, 2021
- खामोश हो रहे अफगानी सुर 20 Aug, 2022
- चिली में गुप्तवास 7 Jul, 2025
- जनतांत्रिक समालोचना की जरूरी पहल – कविता का जनपक्ष (पुस्तक समीक्षा) 20 Aug, 2022
- जैक लण्डन का उपन्यास ‘आयरन हील’ के बारे में 1 Jan, 2025
- निकोलाई ओस्त्रोव्स्की का उपन्यास ‘अग्निदीक्षा’ 4 Jul, 2025
- निशरीन जाफरी हुसैन का श्वेता भट्ट को एक पत्र 15 Jul, 2019
- फासीवाद के खतरे : गोरी हिरणी के बहाने एक बहस 13 Sep, 2024
- फैज : अँधेरे के विरुद्ध उजाले की कविता 15 Jul, 2019
- श्रम और साहित्य पर दो दिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न 5 May, 2026
- सच लिखने में पाँच कठिनाइयाँ 12 Dec, 2025
- सामाजिक चेतना जगाने में नाटकों की भूमिका : नोबेल विजेता––दारियो लुइगी एंजेलो फो 1 Jan, 2025
- “मैं” और “हम” 14 Dec, 2018
- सामाजिक-सांस्कृतिक
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- अम्बेडकर ने कहा था कि हिन्दू राज भारत के लिए सबसे बड़ी आपदा होगी 4 Jul, 2025
- उपभोक्तावाद की संस्कृति 12 Dec, 2025
- एक आधुनिक कहानी एकलव्य की 23 Sep, 2020
- एपस्टीन की फाइलों से साफ जाहिर होता है कि कुलीन वर्ग कैसे काम करता है 5 May, 2026
- एलन मस्क और महिलाओं की ‘सुरक्षा’ का झूठा दक्षिणपंथी आख्यान 7 Jul, 2025
- किसान आन्दोलन के आह्वान पर मिट्टी सत्याग्रह यात्रा 20 Jun, 2021
- गैर बराबरी की महामारी 20 Aug, 2022
- घोस्ट विलेज : पहाड़ी क्षेत्रों में राज्यप्रेरित पलायन –– मनीषा मीनू 19 Jun, 2023
- दिल्ली के सरकारी स्कूल : नवउदारवाद की प्रयोगशाला 14 Mar, 2019
- पहाड़ में नफरत की खेती –– अखर शेरविन्द 19 Jun, 2023
- सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर राजनीति 14 Dec, 2018
- साम्प्रदायिकता और संस्कृति 20 Aug, 2022
- हमारा जार्ज फ्लायड कहाँ है? 23 Sep, 2020
- ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ पर केन्द्रित ‘कथान्तर’ का विशेषांक 13 Sep, 2024
- कहानी
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- एक देवदासी 12 Dec, 2025
- जामुन का पेड़ 8 Feb, 2020
- पानीपत की चैथी लड़ाई 16 Nov, 2021
- माटी वाली 17 Feb, 2023
- समझौता 13 Sep, 2024
- अन्तरराष्ट्रीय
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- अमरीका की हथकड़ी–बेड़ी नीति और भारतीय शासकों की बेहयाई 7 Jul, 2025
- अमरीका बनाम चीन : क्या यह एक नये शीत युद्ध की शुरुआत है 23 Sep, 2020
- इजराइल का क्रिस्टालनाख्त नरसंहार 17 Nov, 2023
- क्या लोकतन्त्र का लबादा ओढ़े अमरीका तानाशाही में बदल गया है? 14 Dec, 2018
- नरसंहार पर पर्दा डालने वाले आर्थिक सिद्धान्त के लिए नोबेल 4 Jul, 2025
- पश्चिम एशिया में निर्णायक मोड़ 15 Aug, 2018
- प्रतिबन्धों का मास्को पर कुछ असर नहीं पड़ा है, जबकि यूरोप 4 सरकारें गँवा चुका है: ओरबान 20 Aug, 2022
- बोलीविया में तख्तापलट : एक परिप्रेक्ष्य 8 Feb, 2020
- भारत–इजराइल साझेदारी को मिली एक वैचारिक कड़ी 15 Oct, 2019
- भोजन, खेती और अफ्रीका : बिल गेट्स को एक खुला खत 17 Feb, 2023
- महामारी के बावजूद 2020 में वैश्विक सामरिक खर्च में भारी उछाल 21 Jun, 2021
- लातिन अमरीका के मूलनिवासियों, अफ्रीकी मूल के लोगों और लातिन अमरीकी संगठनों का आह्वान 10 Jun, 2020
- वह दिन जब परमाणु सम्पन्न ईरान का जन्म हुआ 7 Jul, 2025
- सउ़दी अरब की साम्राज्यवादी विरासत 16 Nov, 2021
- ‘जल नस्लभेद’ : इजराइल कैसे गाजा पट्टी में पानी को हथियार बनाता है 17 Nov, 2023
- श्रद्धांजलि
- राजनीति
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- 106 वर्ष प्राचीन पटना संग्रहालय के प्रति बिहार सरकार का शत्रुवत व्यवहार –– पुष्पराज 19 Jun, 2023
- इलेक्टोरल बॉण्ड घोटाले पर जानेमाने अर्थशास्त्री डॉक्टर प्रभाकर का सनसनीखेज खुलासा 6 May, 2024
- कर्नाटक सरकार देवनहल्ली के किसानों के साथ विश्वासघात कर रही है 4 Jul, 2025
- कोरोना वायरस, सर्विलांस राज और राष्ट्रवादी अलगाव के खतरे 10 Jun, 2020
- जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का तर्कहीन मसौदा 21 Nov, 2021
- डिजिटल कण्टेण्ट निर्माताओं के लिए लाइसेंस राज 13 Sep, 2024
- नया वन कानून: वन संसाधनों की लूट और हिमालय में आपदाओं को न्यौता 17 Nov, 2023
- नये श्रम कानून मजदूरों को ज्यादा अनिश्चित भविष्य में धकेल देंगे 14 Jan, 2021
- बेरोजगार भारत का युग 20 Aug, 2022
- बॉर्डर्स पर किसान और जवान 16 Nov, 2021
- मोदी के शासनकाल में बढ़ती इजारेदारी 14 Jan, 2021
- सत्ता के नशे में चूर भाजपाई कारकूनों ने लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से रौंदा 23 Nov, 2021
- हरियाणा किसान आन्दोलन की समीक्षा 20 Jun, 2021
- जीवन और कर्म
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- दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा 1 Jan, 2025
- रामवृक्ष बेनीपुरी का बाल साहित्य : मनुष्य की अपराजेय शक्ति में आस्था 14 Jan, 2021
- राजनीतिक अर्थशास्त्र
- व्यंग्य
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- अगला आधार पाठ्यपुस्तक पुनर्लेखन –– जी सम्पत 19 Jun, 2023
- आजादी को आपने कहीं देखा है!!! 20 Aug, 2022
- इन दिनों कट्टर हो रहा हूँ मैं––– 20 Aug, 2022
- नुसरत जहाँ : फिर तेरी कहानी याद आयी 15 Jul, 2019
- बडे़ कारनामे हैं बाबाओं के 13 Sep, 2024
- विचार-विमर्श
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- अतीत और वर्तमान में महामारियों ने बड़े निगमों के उदय को कैसे बढ़ावा दिया है? 23 Sep, 2020
- अस्तित्व बनाम अस्मिता 14 Mar, 2019
- क्या है जो सभी मेहनतकशों में एक समान है? 23 Sep, 2020
- क्रान्तिकारी विरासत और हमारा समय 13 Sep, 2024
- दिल्ली सरकार की ‘स्कूल्स ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सलेंस’ की योजना : एक रिपोर्ट! 16 Nov, 2021
- धर्म की आड़ 17 Nov, 2023
- पलायन मजा या सजा 20 Aug, 2022
- राजनीति में आँधियाँ और लोकतंत्र 14 Jun, 2019
- लीबिया की सच्चाई छिपाता मीडिया 17 Nov, 2023
- लोकतंत्र के पुरोधाओं ने लोकतंत्र के बारे में क्या कहा था? 23 Sep, 2020
- विकास की निरन्तरता में–– गुरबख्श सिंह मोंगा 19 Jun, 2023
- विश्व चैम्पियनशिप में पदक विजेता महिला पहलवान विनेश फोगाट से बातचीत 19 Jun, 2023
- सरकार और न्यायपालिका : सम्बन्धों की प्रकृति क्या है और इसे कैसे विकसित होना चाहिए 15 Aug, 2018
- मीडिया
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- मीडिया का असली चेहरा 15 Mar, 2019
- फिल्म समीक्षा
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- समाज की परतें उघाड़ने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ 15 Jul, 2019