असली परजीवी कौन हैं?

एक ऐसे पेशे के शीर्ष पर विराजमान होकर— जिसने कभी चावल का एक दाना, एक मीटर कपड़ा या रहने के लिए एक ईंट भी नहीं बनायी— भारत के बेरोजगार युवाओं को परजीवी और कॉकरोच कहना, एक खास तरह की ढिठाई— या शायद हकीकत से पूरी तरह कटे होने की निशानी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ठीक यही कारनामा किया है। दूसरों की मेहनत से बनी, रखरखाव की गयी और तमाम कर्मचारियों के बल पर चलने वाली अदालत के आरामदेह ऊँचे आसन से बोलते हुए, उन्होंने रोजगार न मिल पाने वाले भारतीय नौजवानों को "परजीवी" और "कॉकरोच" कहा। भारत के युवाओं ने जिनको ताकतवर लोग अक्सर कम आंकते हैं: उन्हें उसी लहजे में जवाब दिया-- बेपरवाही या बेकद्री के लहजे में। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का जन्म हुआ। तीन हफ़्ते बाद, इसके सैकड़ों समर्थकों ने— कॉकरोच के मास्क पहने, हाथ में किताबें और राष्ट्रीय झंडा लिए— नई दिल्ली के.. आगे पढ़ें

साहित्य का उद्देश्य

यह सम्मेलन हमारे साहित्य के इतिहास में स्मरणीय घटना है। हमारे सम्मेलनों और अंजुमनों में अब तक आम तौर पर भाषा और उसके प्रचार पर ही बहस की जाती रही है। यहां तक कि उर्दू और हिन्दी का जो आरम्भिक साहित्य मौजूद है, उसका  उद्देश्य, विचारों और भावों पर असर डालना नहीं, किन्तु केवल भाषा का निर्माण करना था। वह भी एक बड़े महत्व का कार्य था। जब तक भाषा एक स्थायी रूप न प्राप्त कर ले, उसमें विचारों और भावों को व्यक्त करने की शक्ति ही कहां से आएगीः हमारी भाषा के ‘पायनियरों’ ने – रास्ता साफ करने वालों ने – हिन्दुस्तानी भाषा का निर्माण करके जाति पर जो एहसान किया है, उसके लिए हम उनके कृतज्ञ न हो तो यह हमारी कृतघ्नता होगी। भाषा साधन है, साध्य नहीं। अब हमारी भाषा ने वह रूप प्राप्त कर लिया है कि हम भाषा से आगे बढ़ कर भाव की ओर ध्यान.. आगे पढ़ें

पढ़ने की राजनीति

Originally published: Simplifying Socialism  on June 12, 2026 by A. J. Horn (more by Simplifying Socialism) (Posted Jun 15, 2026)   पढ़ने की क्रिया केवल आँखों से पाठ को पढ़ना या -- यदि आप ऑडियोबुक पसंद करते हैं तो कानों से सुनना ही नहीं है। सही ढंग से किया जाए तो पढ़ना लेखक(ओं) के साथ बौद्धिक संवाद के माध्यम से बेहतर समझ प्राप्त करने की कला है। प्राथमिक स्तर से आगे पढ़ने का क्या अर्थ है, यह समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि जो कोई भी शैक्षणिक संस्थान से बाहर स्वयं से नई चीजें सीखना चाहता है, उसे पढ़ने के माध्यम से ही अंतर्दृष्टि प्राप्त करनी होगी। एआई या अन्य शॉर्टकट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है; यदि कोई सतही जानकारी से अधिक कुछ प्राप्त करना चाहता है , यानी यदि वह सच्ची अंतर्दृष्टि प्राप्त करना चाहता है, तो उसे सही ढंग से पढ़ने का प्रयास करना होगा।   पढ़ने के विषय पर कई पुस्तकें लिखी गई हैं, जिनमें.. आगे पढ़ें

डैनियल कोहन-बेंडिट: मई-68 आन्दोलन का लोकप्रिय छात्र नेता

1968 का साल पूरी दुनिया में उथल-पुथल का साल था। जगह-जगह छात्र, नौजवान, मजदूर और आम लोग पुराने ढाँचे, राजनीति और दमनकारी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे थे। अमरीका में वियतनाम युद्ध के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था। अफ्रीका और एशिया के देशों में उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाइयाँ जारी थीं। चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति चल रही थी। इसी दौर में फ्रांस में भी एक ऐसा विस्फोट हुआ जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया। इस आन्दोलन का सबसे चर्चित चेहरा बना एक दुबला-पतला, लंबे बालों वाला 22 साल का छात्र--  डैनियल कोहन-बेंडिट। वे मई-68 आन्दोलन के सबसे लोकप्रिय छात्र नेता थे। डैनियल कोहन-बेंडिट का जन्म 1946 में फ्रांस में हुआ था। उनके माता-पिता जर्मन यहूदी थे, जो हिटलर और नाज़ीवाद के दौर में जर्मनी से भागकर फ्रांस आये थे। इस वजह से डैनियल के पास फ्रांस और जर्मनी-- दोनों देशों की नागरिकता थी। बाद में यही बात फ्रांसीसी सरकार.. आगे पढ़ें

होर्मुज की लहरें कुछ कहती हैं 

होर्मुज, हाँ वही होर्मुज  फारस की खाड़ी का  मात्र  सत्तर किलोमीटर चैड़ा समुद्री गलियारा  जहाँ से दुनिया की  एक बड़ी आबादी की साँसें चलती हैं  गैस और पेट्रोलियम, हमारी साँसेंे ही तो हैं  इनका ठहराव यानी हमारी साँसोंे का थम जाना ।   होर्मुज की लहरें कह रही हैं  बहुत हो चुका बस  अब हम नहीं नाचेंगे  वाशिंगटन के इशारों पर  लगभग छ: सौ वर्षों तक  पश्चिमी दुनिया के इन आवारा साड़ों ने  अपने खूँखार सींगों और नुकीले खुरों से   इस धरती को लहूलुहान किया है  हमें रौंदा है, दबाया और लूटा है  किन्तु अब बस   उनके दिन खत्म हो गये न झुकेंगे, न दबे और डरेंगे  समझौता तो कतई नहीं करेंगे   हमें मरना है तो लड़ते हुए मरेंगे  उनके सींगों को पकड़ कर  उन पर झूम कर ।   दुनिया के इतिहास के सबसे बहशी दरिन्दे  जिन्होंने शहरों को राख में बदल दिया   कैद आबादी को कत्लगाहों तक हाँका .. आगे पढ़ें

पश्चिम एशिया संकट की वैश्विक चुनौतियाँ

ईद से ठीक एक दिन पहले ईरान द्वारा जारी किये गये दुनिया के नाम एक कड़े सन्देश में स्पष्ट तौर से कहा गया है कि यह लड़ाई सिर्फ क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर उस चैधराहट (इजराइल–अमरीका फासिस्ट गठजोड़) के खिलाफ है जो अपने वर्चस्व और निजी आर्थिक हितों के लिए पूरी दुनिया को अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत के बलबूते ठेंगे पर रखना चाहता है और अपने इशारों पर नचाना चाहता है। सोवियत संघ के विघटन के बाद एक धु्रवीय दुनिया में पूँजीवादी–साम्राज्यवादी अमरीका और उसके पिछलग्गू देशों ने जो तबाही मचाई है वह किसी से छिपी नहीं है। अमरीका द्वारा दुनिया पर थोपक गये युद्धों, जैसे कोरियाई युद्ध, वियतनाम युद्ध, जापान पर एटमी हमला, खाड़ी युद्ध (लीबिया, सीरिया, इराक), अफगान के अतिरिक्त दक्षिण अमरीकी देशों में अपनी साजिश से तख्ता पलट और फिलिस्तीन लेबनान की बर्बादी जैसी गिरी हुई हरकतों ने पूरी दुनिया में तबाही मचा.. आगे पढ़ें

हम कॉकरोच हैं

हम कॉकरोच हैं  नौजवान हैं, मचलती हुई सोच हैं निज़ाम के पैरों में आ गई मोच हैं  हम कॉकरोच हैं   बेरोज़गार हैं  दिशाहीन हैं, बहके हुए हैं  टूटे हुए करार हैं  घरों, परिवारों की हार हैं  जीवन को तरसती हुई चाह हैं  हम कॉकरोच हैं   ग्रैगर समसा1  कभी तू भी कॉकरोच बना था  और सबने तुझे नकार दिया  पिता ने, बहन ने, भाई ने  पूरे समाज ने  सरमाये के राज ने  हम भी नकारे गए हैं   कौन कहता है यह?  कौन न्यायाधीश  कौन सियासतदान कौन देता है शब्दों का यह 'वरदान'   यह अलग बात है  लोरका2 ने कभी शायर-कॉकरोच की कल्पना की थी या कॉकरोच-शायर  कॉकरोच ब्रह्मांड-जीवन का हिस्सा है  मनुष्य उन्हें अपना दुश्मन समझता है  मिटा देना चाहता है उनकी हस्ती   निज़ाम भी यही चाहता है  बेरोज़गारी नहीं  बेरोज़गारों की हस्ती मिटाना  उन्हें कॉकरोच कहना  लोरका या काफ़्का की तरह नहीं  इश्तहारों में  उबलती.. आगे पढ़ें

तेल: ईरान युद्ध और मध्य पूर्व के सभी युद्धों के पीछे का असली कारण

ईरान में युद्ध शुरू हुए एक महीना बीत चुका है, और अब पत्रकारों और राजनेताओं, डेमोक्रेट्स और रिपब्लिकन, वामपंथियों, दक्षिणपंथियों और निर्दलीयों को यह पूछना बंद कर देना चाहिए कि आखिर यह युद्ध किस बारे में है। सासन फयाजमानेश ने 'काउंटरपंच'  में अपने 13 मार्च के लेख में यह ठोस (और साहसी) तर्क दिया है कि "यह इज़राइल एकदम बेवकूफ है"।  बस वे अपनी बात को पूरी गहराई तक नहीं ले जा पाये।   उन्होंने बिल्कुल सही ढंग से उन सवालों को उठाकर शुरुआत की है, जिनका  अभी तक कोई सुसंगत जवाब मिलता नहीं दिख रहा था: क्या इसलिए कि ईरान के साथ उसके परमाणु कार्यक्रम को लेकर बातचीत आगे नहीं बढ़ रही थी? क्या इसलिए कि ईरान परमाणु हथियार विकसित करने के बेहद करीब था? क्या इसलिए कि ईरान की बैलिस्टिक मिसाइलें जल्द ही अमेरिका तक पहुँचने वाली थीं? क्या इसलिए कि इज़राइल ईरान पर हमला करने वाला था.. आगे पढ़ें

अरावली पर्वतमाला पर हमला

पर्यावरण अरावली पर्वतमाला की कोई भी संकीर्ण परिभाषा इस बेहद महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर सकती है, जिसके भूजल, कृषि और उत्तर भारत के कई राज्यों में रहने वाले लाखों लोगों की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं। -वितास्ता कौल हरियाणा में अरावली पर्वतमाला का हवाई दृश्य। यह पर्वतमाला उत्तर भारत की जीवित रक्षा प्रणाली के रूप में काम करती है, थार रेगिस्तान से आने वाली धूल भरी आंधियों को रोकती है, भूजल का पुनर्भरण करती है, तापमान को नियंत्रित करती है और इस क्षेत्र की अनूठी वनस्पतियों और जीवों को संरक्षित रखती है। फोटो साभारः एएनआई 20 नवम्बर, 2025 को, सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले ने अरावली पर्वतमाला के लिए एक तरह से मौत का फरमान जारी कर दिया, जिसे पर्यावरणविदों ने उत्तर भारत के कई राज्यों में फैली अरावली पर्वतमाला के लिए एक तरह का विनाशकारी फरमान बताया है। इस फैसले में अरावली पर्वतमाला को पारिस्थितिकी.. आगे पढ़ें
लम्पट-उन्मादी ट्रम्प द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का अपहरण

लम्पट-उन्मादी ट्रम्प द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का अपहरण

लम्पट और उन्मादी ट्रम्प की आपराधिक कारवाई ने हमेशा की तरह इस बार भी शोर ज़्यादा पैदा किया है, उसके लिए फायदा कम। वेनेजुएला पर जिस आपराधिक कार्रवाई को वह निर्णायक झटका मान रहा था, उसकी हवा इतनी जल्दी निकल जाएगी, इसका अंदाज़ा शायद उसके सबसे करीबी सलाहकारों को भी नहीं था। नए साल की यह घटना ट्रम्प की शक्ति का प्रतीक बनने के बजाय उसकी हताशा और बौखलाहट का उदाहरण बन गई है। जिस कार्रवाई से वेनेज़ुएला को घुटनों पर लाने की योजना थी, वही कार्रवाई ट्रम्प को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक अलग-थलग कर गई है। नए साल पर पूरी दुनिया ने इस खुली गुंडागर्दी को देखा और हतप्रभ रह गई। अमरीकी सत्ता के शीर्ष पर बैठे ट्रम्प ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति के साथ जो किया, उसे अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और सभ्य राजनीतिक व्यवहार-- तीनों के मुँह पर तमाचा माना जा रहा है। यह संदेश साफ़ है कि.. आगे पढ़ें