जुलाई 2025, अंक 48 में प्रकाशित

कुम्भ मेले में भगदड़

वैसे तो हर बारह वर्षों में कुम्भ मेला का आयोजन होता रहा है। लोग अपनी आस्था और सुविधा के अनुसार स्नान करने जाया करते थे। लेकिन इस बार का कुम्भ मेला लोगों के आस्था के लिए नहीं बल्कि सत्ताधारी भाजपा सरकार ने अपने हिन्दुत्ववादी– फासीवादी राजनीति के एजेण्डे को विराट रूप देने, आस्था के नाम पर लोगों को वोट बैंक तैयार करने का एक जरिया बनाया। देश के लगभग सभी मीडिया चैनल, अखबार और सोशल मीडिया पर विज्ञापनों और खबरों के माध्यम से दिन–रात बस कुम्भ मेले की ही खबर चलायी गयी। कभी कोई नेता स्नान करने आ रहा है तो कभी कोई अभिनेता। कभी कोई पूँजीपति आ रहा है तो कभी कोई अभिनेत्री। मीडिया ऐसे दिखाती मानो 144 साल के इस मुहूर्त में अगर आप कुम्भ स्नान करने नहीं गये तो न जाने आप क्या खो देगें? अपने पाप को खत्म करके जीवन धन्य करने जैसे अंधविश्वास को लजीज अन्दाज में परोसा जा रहा था। “इस भव्य महाकुम्भ के संगम में हर दिन ‘इतने लाख’ लोग स्नान कर रहे हैं।” “इस दिव्य महाकुम्भ में ‘इतने करोड़’ लोगों के स्नान कराने का टार्गेट है।” “भारत ने विश्वरिकार्ड कायम कर लिया है” इत्यादी। कुम्भ स्नान के लिए लोगों को उकसाया जा रहा था।

प्रशासनिक व्यवस्था और लोगों की सुरक्षा को लेकर गोदी मीडिया के माध्यम से सरकार ने हवाई किला तैयार कर रखा था। जबकि जमीनी हकीकत एकदम इसके उलट थी। घर से निकलने से लेकर कुम्भ मेले में स्नान करके घर वापस आने तक तमाम लागों को तकलीफों का सामना करना पड़ रहा था। स्पेशल बस, स्पेशल ट्रेन चलाने का दावा हवा में उड़ गया। लोग भेड़–बकरियों से भी बुरी हालत में ठूँस–ठूँस कर आ–जा रहे थे। इतने बुरे हालात में रहते हुए भी लोग ट्रैफिक जाम में बीस–बीस घण्टे तक फँसें रहने को विवश थे। उनके साथ हर वक्त एक बड़ी दुर्घटना होने की आशंका बनी रहती थी।

29 फरवरी, मौनी अमावस्या के दिन अव्यवस्था का दुष्परिणाम एक वीभत्स भगदड़ के रूप में आया। इस भगदड़ को सरकार ने छिपाने की भरपूर कोशिश की। पत्रकारों के ऊपर दबाव बनाया गया कि इसको बहुत छोटी घटना के रूप में पेश कर दिया जाये। लेकिन घटना इतनी भयावह थी और सोशल मीडिया के माध्यम से भगदड़ की वीडियो वायरल होने लगीं। प्रशासन की तरफ से कुम्भ में केवल एक जगह भगदड़ होने की बात कही जा रही थी। लल्लनटाप की एक रिपोर्टिंग के अनुसार भगदड़ एक नहीं दो जगह हुई थी। इस रिपोर्टिंग में भगदड़ स्थल पर पड़े लोगों के चप्पल, कपड़ों को जेसीबी से उठा–उठाकर ट्रैक्टर में डालते देखा जा सकता है। चप्पलों में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के चप्पलों को देखकर दिल सहम जाता है। एक सफाई कर्मचारी के अनुसार 10 से ज्यादा ट्रैक्टरों से केवल लोगों के चप्पलों और कपड़ों को लादकर फेंका गया। चप्पल तो छोड़िये मरने वालों की लाशों को 8 घण्टों के बाद ले जाया गया। लोग अपनी जान बचाने के लिए बगल में गड़े बिजली के टावर तक पर चढ़ गये थे। वे सोच रहे होंगे कि इस भीड़ में हमारा मरना तय है हो सकता है, इस पर चढ़कर ही जान बच जाये।

प्रशासन ने दावा ठोका कि 67 करोड़ लोगों ने कुम्भ में स्नान किया, लेकिन भगदड़ में मृतकों और घायलों की संख्या बताने से बचता रहा। लोगों की आलोचना, विपक्ष के विरोध के बाद सरकार ने 30 लोगों की मौत और 60 से 70 लोगों के घायल होने की बात स्वीकार की। जबकि ग्राउण्ड रिपोर्टिंग कर रहे दैनिक भास्कर के एक पत्रकार के अनुसार केवल सेक्टर–2 में बने सेंट्रल हास्पिटल में तीन घण्टे में 60 एम्बुलेंस घायलों से भरकर आयी। मरने वालों की कुल संख्या 59 से अधिक थी। वहीं प्रत्यक्षदर्शियों के हिसाब से मरने वालों की संख्या सैकड़ों में थी और घायलों की तो कोई गिनती ही नहीं। कुम्भ मेले में आने को लेकर 16 फरवरी को नयी दिल्ली स्टेशन पर भगदड़ हुई जिसमें 18 लोगों की मौत हो गयी थी।

कुम्भ मेले में हुई भगदड़ की इस घटना का दोष जनता के ही मत्थे पर मढ़ने की कोशिश की गयी जबकि इसका कारण मेला प्रशासन की लापरवाही और अव्यवस्था थी। मीडिया ने मौनी आमवस्या के दिन अमृत स्नान का जोर–शोर से प्रचार किया था। सरकार एक दिन में 10 करोड़ से ज्यादा लोगों के स्नान कराने का दावा कर रही थी। तो क्या 10 करोड़ लोगों के हिसाब से व्यवस्था की गयी थी? नहीं, इतनी भीड़ में पुलिस कर्मचारियों की संख्या ‘ऊँट के मुँह में जीरा’ के समान थी। लोगों के पास न तो आने–जाने का कोई स्पष्ट रोडमैप था और न ही ठहरने या विश्राम करने की जगह। लोग सिर्फ भीड़ को फालो करते हुए चलते चले जा रहे थे। सरकार ने लोगों को अपने हाल पर छोड़ दिया था। भीड़ बहुत ज्यादा हो गयी थी। लोग भीड़ में फसें रहे। भीड़ इतनी थी कि लोगों का दम घुट रहा था। जिनका पानी खत्म हो गया था उनके पास पानी लेने तक की स्थिति नहीं थी। भूख प्यास से बच्चे रो रहे थे। लोग चिल्ला रहे थे कि किसी तरह बस हम यहाँ से निकल जायें। किसी तरह से हमारी जान बच जाये।

सरकार मेले में हुई भगदड़ की गलती मानने के बजाय पर्दा डालती रही। भाजपा के छुटभैया नेता और भाजपा के आईटी सेल ने सोशल मीडिया के माध्यम से भगदड़ की इस दुर्घटना को मेले में गये लोगों के मत्थे मढ़ने की कोशिश करते रहे–– “वहाँ घाट पर नहाने गये थे या सोने। अगर घाट पर सोवोगे तो मरोगे ही इसमें सरकार की कोई गलती नहीं है।” भाजपा के एक नेता ने बयान दिया कि जो ईश्वर में आस्था नहीं रखते वे सनातन को बदनाम करने की कोशिश कर रहे हैं। कुम्भ में अफवाह फैलाने वाले लोग हिन्दू विरोधी हैं। बाबा धीरेन्द्र शास्त्री ने असंवेदनशील बयान दिया कि जो लोग कुम्भ भगदड़ में मरे हैं उनकी मृत्यु नहीं हुई, उन्हें मोक्ष मिला है। यह वही बाबा हैं जो थोड़े दिन पहले कुम्भ में स्नान न करने वालों को देशद्रोही बता रहे थे। मीडिया इन तमाम इनसानियत विरोधी और घटिया लोगों का पर्दाफाश करने के बजाय सरकार और मेला प्रशासन को बचाती रही। टाइम्स ऑफ इडिया समाचार ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि जितने लोग कुम्भ में मरे उससे ज्यादा लोग तो अल्जाइमर से मर जाते हैं। अगर कुछ मरे हैं तो कुछ जिन्दा भी बचे हैं। यह कितनी बेहूदी बात है। भगदड़ स्थल से 7 किमी दूर स्थित इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस घटना पर संज्ञान लेने की जरूरत भी न समझी। इस घटना से सरकार और गोदी मीडिया के साथ–साथ न्याय व्यवस्था का भी चरित्र सबके सामने खुल के आ गया।

जहाँ एक तरफ कुम्भ में आये लोगों के लिए पूरी यात्रा दुख का सबब थी, वहीं नेताओं, सेलिब्रिटी, पूँजीपति और साधु–सन्यासियों जिन्हें वीआईपी/वीवीआईपी कहा गया, उनके लिए कुछ घाट अलग से आरक्षित कर दिये गये थे। उनके ऐशो–आराम में कोई तकलीफ न हो, प्रशासन पूरी मुस्तैदी से लगा रहा। उनके कार को पास कराने के लिए रोड को ब्लॉक कर दिया जाता था। इससे ट्रैफिक जाम और अव्यवस्था फैल जाती थी। जबकि 2017 में प्रधानमंत्री मोदी ने वीआईपी संस्कृति को खत्म करने की बड़ी–बड़ी डीगें हाँकी थी। कुम्भ के ठीक सात महीने पहले यूपी के मुख्यमंत्री योगी ने भी ऐसा ही बयान दिया था। लेकिन यह सब जनता को गुमराह करने के लिए खोखली बयानबाजी थी।

 इस वीआईपी संस्कृति के कारण शहर ही नहीं, बल्कि आस–पास के सभी जिलों में, लगभग 300 किलोमीटर के घेरे में जाम के कारण लोगों जिन्दगी अस्त–व्यस्त रही। इसमें सबसे ज्यादा महिलाओं को दिक्कत का सामना करना पड़ा क्योंकि उन्हें टॉयलेट तक के लिए जगह नहीं मिली। लोग पानी के लिए तरस रहे थे। 40 रुपये का पराठा 400 से 500 में, 70 रुपये की थाली 700 से 800 रुपये में मिल रही थी। प्रयागराज के निवासी और बाहर से आकर तैयारी करने वाले छात्रों की स्थिति हाउस अरेस्ट जैसी हो गयी थी। दूध, सब्जी, तेल, चावल, आटा इत्यादि और भी ज्यादा मँहगे हो गये थे। पुलिस–प्रशासन द्वारा शहर के अन्दर वाहनों के संचालन पर रोक लगा देने से आने–जाने का किराया बहुत ज्यादा बढ़ गया था। जहाँ 40 से 50 रुपये तक किराया था वहीं 500 से 1000 रुपये तक की प्रति सवारी का किराया देकर सफर करने को लोग मजबूर थे। कुम्भ मेले की अव्यवस्था का भुक्तभोगी मैं खुद हूँ। मैं प्रयागराज में रहकर तैयारी करने वाला एक छात्र हूँ। कुँभ मेले के दौरान ही मेरी एक परीक्षा का परीक्षा–केन्द्र वाराणसी मिला जिसका सफर प्रयागराज से मात्र 2 से 3 घण्टे का है। 3 घण्टे के इस सफर को मुझे 16 घण्टे में तय करना पड़ा। मुश्किल से ही मैं परीक्षा केन्द्र पर समय से पहुँच पाया था।

लोग जिस गंगा में स्नान करके पाप खत्म करने की आस्था रखते हैं, वह मल–मूत्र से पट गयी। केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट पर गौर करने के बाद 17 फरवरी, 2025 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की प्रधान पीठ ने अपनी सख्त टिप्पणी में उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (यूपीपीसीबी) को फटकारते हुए कहा “आपने 50 करोड़ लोगों को सीवेज के दूषित पानी से नहला दिया। वह पानी जो नहाने लायक भी नहीं नहीं था, उससे लोगों को आचमन (पीना) तक करना पड़ा।” गंगा के पानी में अत्यधिक फीकल कोलीफॉर्म की मात्रा थी। यह कुल कोलीफॉर्म बैक्टिरिया का एक उपसमूह है, जो मुख्य रूप से मानव और पशुओं के मल से आते हैं। इनकी उपस्थिति दर्शाती है कि पानी मल से दूषित है, जिससे जलजनित रोग (टाइफाइड, डायरिया, हैजा आदि) फैल सकते हैं।

हर बार की तरह इस बार भी आम जनता के हिस्से में दुख, दर्द और मौत ही मिली। अब सवाल यह है कि क्या आस्था के नाम पर नेताओं द्वारा आम जनता को बरगलाया जाता रहेगा या जनता अंधविश्वास, अंधश्रद्धा को त्यागकर वैज्ञानिक मूल्यों को अपनाते हुए, नये विचारों से लैस होकर एक ऐसे समाज का निर्माण करेगी जिसमें न्याय और बराबरी हो।

––धीरज कुमार

Leave a Comment

लेखक के अन्य लेख

अवर्गीकृत
समाचार-विचार
कविता
साक्षात्कार
साहित्य
सामाजिक-सांस्कृतिक
कहानी
अन्तरराष्ट्रीय
श्रद्धांजलि
राजनीति
जीवन और कर्म
राजनीतिक अर्थशास्त्र
व्यंग्य
विचार-विमर्श
मीडिया
फिल्म समीक्षा