दिसंबर 2025, अंक 49 में प्रकाशित

उत्तराखण्ड के पेपर लीक पर मुख्यमंत्री धामी के नफरती बयान

उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का यह बयान कि–– “नकल माफियाओं और नकल जिहादियों को मिट्टी में मिला देंगे”, उस वक्त सामने आया जब परीक्षा घोटाले का भंडाफोड़ और गिरफ्तारियों के बाद भी बेरोजगार नौजवान सड़कों पर उतरे। सरकार ने इस मामले की जाँच के लिए एसआईटी गठित करने की घोषणा की। लेकिन आन्दोलनकारी इससे संतुष्ट नहीं हुए। इसी बीच एक मुस्लिम आरोपी की गिरफ्तारी के बाद इस मुद्दे को साम्प्रदायिक रंग देने के लिए धामी ने इस तरह का बयान दिया। सवाल यह है कि वास्तविक साजिश का असली मास्टरमाइण्ड कोई मुस्लिम या जेहादी है या इससे बड़ी सच्चाइयों को ढकने की कोशिश की गयी।

आरोपियों में जो नाम सबसे ज्यादा उठता है, वह है हकम सिंह–– जिसे हालिया गिरफ्तारियों में आरोपी बताया गया और जो पहले भी इसी तरह के काण्डों में फँस चुका हैय उस पर 2022 में चार्जशीट भी दाखिल हुई थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली थी। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया है कि हकम सिंह पर आरोप है कि उसने परीक्षा–उम्मीदवारों से भारी रकम लेकर सफलता की गारण्टी देने जैसी कोशिशें कीं। लेकिन यही वह शख्स है जिसके बारे में कुछ राजनेताओं और नागरिकों का तर्क है कि उसे केवल एक “बड़़े पैमाने” के मामले का चेहरा बना दिया जा रहा है–– जबकि उससे जुड़े राजनीतिक कनेक्शनों और संरचनात्मक विफलताओं का व्यापक नेटवर्क अभी भी सवालों के घेरे से बाहर है।

यदि यह सच है कि हकम सिंह जैसे लोग गिरफ्तार हुए और जेल गये, छूट गये, तो उससे यह निष्कर्ष निकलना कि हर दोषी केवल व्यक्तिगत स्तर का जिम्मेदार है, काफी तर्कहीन है। दादाजी का वह कथन याद आने लायक है–––– “जिस खेत की बाड़ ही उजियाड खाने लग जाएगी, वहाँ भगवान भी कुछ नहीं कर सकता।” यह बात यहाँ बिल्कुल सटीक बैठती है –– जब संस्थागत पारदर्शिता, जवाबदेही और निगरानी ढीली पड़ जाती है, तो व्यक्तिगत विकृतियाँ ही नहींय पूरा तंत्र भ्रष्ट होने लगता है। परीक्षा व्यवस्था की कमजोरी और उस पर राजनीतिक संरक्षण का असर केवल कुछ नामों तक सीमित नहीं रहता–– यह युवा पीढ़ी के अवसरों, संवैधानिक भरोसे और समाज के नैतिक ताने–बाने को खोखला कर देता है।

अगर भाजपा के भीतर वाकई हकम सिंह जैसा कोई व्यक्ति है जिसने अपराधों में संलिप्तता दिखायी, तो सवाल उठता है कि क्या भाजपा एक छोटे–से जिला पंचायत सदस्य को त्वरित कार्रवाई कर के बाहर नहीं रख सकती थी? राजनीतिक व्यवहार में ‘दूर हटाना’ असल में नैतिक दायित्व भी है–– पद की गरिमा, पार्टी की साख और देश के नौजवानों का विश्वास बचाने का जिम्मा। लेकिन जब वही लोग जिन्हें आप अपने ही समूह का मानते हो, बार–बार विवादों में आते हैं और सरकारी संरक्षण पाते हैं, तो लोगों का विश्वास टूटता है और आक्रोश जन्म लेता है। यह विस्फोट तब और तेज हो जाता है जब सरकार सार्वजनिक तौर पर “हम सब पर कड़ी कार्रवाई करेंगे” कहती है पर जाँच–प्रक्रिया में पारदर्शिता को अपने जूते के नीचे रौन्द देती है–– जैसे सीबीआई जाँच को टालने या मामले के कुछ पहलुओं को अन्धेरे में रखने की प्रवृत्ति।

यह पूरा ताना–बाना कोई छोटा–मोटा खेल नहीं हैय यह बड़े पैमाने की सरकारी दिशा का नतीजा है–– जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोग संसाधनों और अवसरों को कुछ चुने हुए लोगों के लिए खोल देते हैं, तो प्रदेश का लोक–हित दाँव पर लग जाता है। यह ठोस षड्यंत्रकारी संरचना केवल भ्रष्टचार में लिप्त कर्मियों की नहीं रहतीय यह राजनीतिक संरक्षण, मीडिया फ्रेमिंग और संस्थागत बचाव की मिलीभगत बन जाती है। प्रदेश में नौजवानों की व्यापक स्तर गोलबन्दी दिखाती है कि जनता अब जाग रही है–– यह जागृति केवल नारों से नहीं, वास्तविक सच्चाइयों के रूप में सामने आना चाहिए–– जो लोग बिहार, उत्तराखण्ड जैसे प्रदेशों के सार्वजनिक संसाधनों को निजी कॉर्पाेरेट और भाई–भतीजे के हवाले कर रहे हैं, या जो स्थानीय नौकरियों–उम्मीदवारों के भविष्य को बाजार में नीलाम कर रहे हैं, उन्हें जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।

मुख्यमंत्री धामी का “नकल जिहाद” वाला बयान साम्प्रदायिक मानसिकता का घृणित उदाहरण है। परीक्षा घोटाला, जो सीधे–सीधे भ्रष्टाचार, सरकारी संरक्षण और अपराध का मामला है, जिसमें हिन्दु अपराधियों की संख्या कहीं ज्यादा है, सिर्फ एक मुस्लिम का नाम आता ही उसे “जिहाद” से जोड़ देना दरअसल साम्प्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति की मिसाल है। यहाँ “जिहाद” शब्द आम जनता के दिमाग में मुसलमान से घृणा और आतंकवाद की तस्वीर पेश करती है। इस तरह, असली अपराधियों से ध्यान हटाकर मुद्दा हिन्दू–मुस्लिम विभाजन की ओर मोड़ दिया जाता है।

लेकिन हकीकत यह है कि इस काण्ड के मुख्य आरोपी–– जैसे––हकम सिंह–– खुद हिन्दू पृष्ठभूमि से आते हैं। ऐसे में “जिहाद” का टैग पूरी तरह नकली और भ्रामक है। इसका इस्तेमाल दो मकसद से होता है–– पहला, सरकार की नाकामियों से ध्यान हटानाय दूसरा, जनता में साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण पैदा करना। यानी जनता यह न सोचे कि सरकार अपने ही लोगों को क्यों बचा रही है, या सीबीआई जाँच से क्यों कतराती हैय बल्कि वह यह सोचे कि यह “मुस्लिम जिहाद” है, जिससे हिन्दू समाज को बचाना है।

साम्प्रदायिक राजनीति की यही साजिश है–– जहाँ असली गुनाहगारों की पहचान और सत्ता की जिम्मेदारी पर सवाल उठने चाहिए, वहाँ धार्मिक पहचान थोप दी जाती है। इससे न केवल न्याय प्रक्रिया विकृत होती है बल्कि सामाजिक सौहार्द भी बिगड़ता है। पेपर लीक जैसा अपराध जाति या धर्म से परे एक संगठित भ्रष्टाचार है–– इसे “जिहाद” कहना न केवल झूठ है, बल्कि युवाओं के भविष्य के साथ दुहरा खिलवाड़ है।

असल में धामी का साम्प्रदायिक वक्तव्य जनता की नाराजगी और विपक्षी सवालों को “देश–धर्म” की भावनाओं में डुबो देने की चाल है। सवाल यह है कि क्या नौजवानों की बेरोजगारी और भविष्य को बचाने के लिए सरकार साम्प्रदायिक शिगूफे छोड़ेगी या फिर असल दोषियों पर बिना भेदभाव सख्त कार्रवाई करेगी ?

अन्त में, यह भी स्पष्ट है कि मौजूदा आरोप–प्रत्यारोपों के बीच बेहद मेहनत से बनती हुई सार्वजनिक राय और भावनाएँ हैं–– कभी चुपके से चोरी, कभी अखबार या चैनल के खरीद–फरोख्त के आरोप, कभी–कभी सत्ता के दोगलापन की शिकायतें। अगर सचमुच चोर वही हैं, तो उन्हें रोना–धोना छोड़कर कानून के सामने लाया जाना चाहिएय लेकिन साथ ही यह भी माँग होनी चाहिए कि जाँच पूरी तरह स्वतंत्र और प्रभावी हों–– ताकि केवल चेहरों को टोकन तरीके से बदलकर मामला दबा न दिया जाये। लेकिन यह माँग किससे की जाये? सत्ता गूँगी–बहरी बनी बैठी है और आन्दोलन के क्रूर दमन पर आमादा है। ऐसे में व्यवस्था का आमूल परिवर्तन ही सकी विकल्प है।

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