जुलाई 2025, अंक 48 में प्रकाशित

अमरीका की हथकड़ी–बेड़ी नीति और भारतीय शासकों की बेहयाई

5 फरवरी 2025 को अमृतसर हवाई अड्डे पर एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने आजाद भारत के इतिहास में एक काला अध्याय जोड़ दिया। अमरीका के सैन्य विमान से 104 भारतीय नागरिकों को हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़कर दुर्दान्त अपराधियों की तरह भारत भेजा गया। इनमें 23 महिलाएँ, 12 बच्चे और 79 पुरुष थे। यात्रियों ने बताया कि 40 घण्टे की यात्रा के दौरान उन्हें अपनी सीट से हिलने की इजाजत नहीं थी। शौचालय जाने के लिए भी उन्हें हथकड़ियों–बेड़ियों के साथ घिसटना पड़ता था। भोजन के नाम पर जो दिया गया उसे हथकड़ियाँ पहने हुए ही खाना पड़ा।

इन्हें एहसास नहीं था कि जिस ट्रम्प को प्रधानमंत्री मोदी अपना यार बताते है वह भारत के नागरिकों के साथ इतना बर्बर व्यवहार करेगा। मोदी ने अपने प्रिय मित्र ट्रम्प के लिए क्या–क्या नहीं किया, भारत में हवन–यज्ञ करवाये, खुद अमरीका जाकर “हाउडी ट्रम्प” का तमाशा किया और “नमस्ते ट्रम्प” का ढोल भी पीटा। लेकिन ट्रम्प ने भारत को बेइज्जत किया और मोदी एक शब्द भी नहीं बोल पाये। साफ है कि मोदी और ट्रम्प के बीच मित्रता नहीं मातहती का रिश्ता है।

भारत के नागरिकों के साथ हुई बदसलूकी की इतिहास में कोई मिसाल नहीं नहीं है। अंग्रेजों ने आजाद हिन्द फौज के युद्धबंदियों के साथ भी ऐसी बदसुलूकी नहीं की थी। 1971 में बांग्लादेश युद्ध के दौरान गिरफ्तार किये गये 90 हजार पाकिस्तानी सैनिकों को भी भारत ने हथकड़ी–बेड़ी नहीं पहनायी थी। भारतीय कानून के मुताबिक भारत की धरती पर अदालती आदेश के बिना किसी को हथकड़ी–बेड़ी नहीं पहनायी जा सकती है। अमरीका ने भारत की धरती पर अपना सैन्य विमान उतारकर और भारतीय नागरिकों को हथकड़ी–बेड़ी पहनाकर भारत के कानून और उसकी सम्प्रभुता का मजाक उड़ाया है।

ट्रम्प ने कई दूसरे देशों के नागरिकों के साथ भी बर्बरता करने की कोशिश की लेकिन किसी ने इसे बर्दाश्त नहीं किया। कोलम्बिया और मेक्सिको ने तो अमरीकी सैन्य विमान को अपने देश में आने की इजाजत ही नहीं दी। मैक्सिको की महिला राष्ट्रपति क्लाउडिया शेनबौम ने ट्रम्प को कड़ी फटकार लगाते हुए साफ कहा कि मैक्सिकन नागरिकों का अपमान बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

भारत के आंध्र प्रदेश से भी कम आबादी वाले कोलम्बिया ने अपने नागरिकों को सम्मानजनक तरीके से लाने के लिए अपना यात्री विमान अमरीका भेजा। ट्रम्प की धमकी के जवाब में कोलम्बिया की सरकारी तेल कम्पनी ने अमरीकी तेल कम्पनी के साथ साझेदारी खत्म करके उसे अपने देश से भगा दिया।

कोलम्बिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने ट्रम्प को उसका घिनौना अतीत याद दिलाते हुए कहा कि “मैं दुनिया भर से आकर अमरीका को आज का अमरीका बनाने वाले मेहनतकश अमरीकियों को अमरीका मानता हूँ, उनका सम्मान करता हूँ, गुलामों के व्यापारी किसी गोरे गुलाम (ट्रम्प) से हाथ तक मिलाना मेरे जमीर को गँवारा नहीं है।” पेट्रो ने कोलम्बिया को खुद्दारों की दुनिया का दिल बताया और अमरीका की आर्थिक प्रतिबन्धों की धमकियों के जवाब में कहा कि “हम हवाओं, पहाड़ों, कैरेबियन समन्दर और स्वतन्त्रता की धरती के लोग है। हम किसी आर्थिक ताकत से नहीं डरते।” लातिन अमरीका और तीसरी दुनिया के खुद्दार नेताओं की हत्याओं के अमरीका के जघन्य रिकॉर्ड का उल्लेख करते हुए उन्होंने यहाँ तक कहा कि “आप (ट्रम्प) मुझे मार देंगे, लेकिन मैं अपने लोगों में जीवित रहूँगा, जो आपके लोगों से पहले अमरीका में है।”

दुनियाभर में भारत का डंका बजने का दावा करने वाले नरेन्द्र मोदी ने पेट्रो की तरह ट्रम्प को मुहतोड़ जवाब देने के बजाय उसे खुश करने के लिए इस शर्मनाक घटना के बाद ही अमरीकी ऑटोमोबाइल कम्पनियों के मालों पर से कस्टम ड्यूटी घटाने का फैसला लिया। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राज्यसभा में अवैध प्रवासियों को वापस भेजने की इस प्रक्रिया को सामान्य बताया और ट्रम्प का वकील बनकर भारत को जलील करने की हरकत को “अमरीकी नीति” कहकर जायज ठहराया। जब जयशंकर ट्रम्प की वकालत कर रहे थे उसी समय भारत में बैठा अमरीकी राजदूत माफी माँगने के बजाय “एलियंस” कहकर भारतीय नागरिकों का मजाक उड़ा रहा था।

अमरीकी संस्थाओं के मुताबिक 20 हजार से ज्यादा भारतीय उनके निशाने पर हैं। इनमे से 2,467 लोगों को डिटेंशन सेन्टरों में कैद किया गया है। इसके अलावा लगभग 18 हजार भारतीयों के पैरों में डिजिटल ट्रैकर (एंकल मॉनीटर) लगाकर उन पर चैबीसों घण्टे निगरानी रखी जा रही है।

कोलंबिया के राष्ट्रपति ने ठीक कहा “वैध–अवैध” का ठप्पा लगाने का हक ट्रम्प को किसने दिया? अवैध नागरिक तो ट्रम्प जैसे लुटेरे हैं जो अमरीका के मूल निवासी रेड इंडियंस, चेरोकी, नवाजो आदि का नरसंहार करके उनकी धरती कबजाये बैठे है। असल मसला “वैध–अवैध” या “बाहरी–अन्दरूनी” का नहीं बल्कि लूटेरी पूँजीवादी व्यवस्था का है जो वेंटिलेटर पर मरणासन्न पड़ी है। सारे इलाज बेअसर साबित हुए है। जिस तख्त पर कभी वाशिंगटन और लिंकन जैसे लोग बैठते थे, उस पर ट्रम्प जैसा नस्लवादी अपराधी बैठा है, अमरीकी पूँजीवाद के मरणासन्न होने का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है।

1991 में अमरीका के शासक दुनिया के समतल होने और इतिहास के अन्त का ढोल पीट रहे थे तथा वैश्वीकरण को अमृत बताते हुए “दुनिया एक गाँव” की धुन पर नाच रहे थे। लेकिन मात्र 34 साल में ही वैश्वीकरण का सारा नशा काफुर हो गया।

आज अमरीकी साम्राज्यवाद की सांसें उखड़ रही हैं बेरोजगारी आसमान छू रही है, गरीबी दबे पाँव घर में घुस चुकी है, आमदनी दूसरे विश्वयुद्ध के दौर से भी नीचे है, क्रय शक्ति सिकुड़ रही है, कारखाने बन्द हो रहे हैं। जो अमरीका कल तक दुनिया के दरवाजे खुलवाने का राग अलापता था आज वह अपने रोशनदान तक बन्द करके “अमरीका फर्स्ट” की दुहाई दे रहा है।

ट्रम्प का “मेरा पेट भरे, बाकी जाये भाड़ में” वाला रास्ता अमरीकी व्यवस्था के मर्ज का इलाज नहीं है, बल्कि टकरावों और युद्धों का जहर है जो दुनिया को आग के हवाले कर देगा।

ट्रम्प ने न सिर्फ भारतियों की बेइज्जती की है बल्कि भारत की सम्प्रभुता को ठेंगे पर रखकर यहाँ के शासकों को उनकी औकात भी बता दी है। बेशक यह अन्तरराष्ट्रीय कानूनों और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को कूड़े में फेंकने वाला सन्देश भी है लेकिन इस कदर अपमानित होकर भी देशभक्ति का माला फेरने वाले मोदी, संघ और भाजपा ट्रम्प के पीछे दुम हिलाते क्यों घूम रहे है? असल में इसका कारण इनकी गुलामी की मानसिकता, अंग्रेजों की चाटुकारिता का इनका इतिहास और अमरीका के प्रति भक्ति–भाव है। ताकतवर के आगे दुम हिलाना इनके खून में है और इनका यही हीनता का बोध अपने ही देश के गरीबों–वंचितों को सींग मारने की शेखी में बदल जाता है। ट्रम्प अमरीका में भारतीयों के साथ जो कर रहा है वही खेल ये यहाँ बांग्लादेशी, रोहिंग्या, असमिया, मराठी–बिहारी, या दिल्ली में उत्तर–पूर्वी राज्यों से आये लोगों के नाम पर खेलते है। अपने ही देश के प्रवासी मजदूरों को बाहरी कहकर बेइज्जत करना इनका पुराना पैंतरा है।

मोदी सरकार ट्रम्प के आगे नतमस्तक है क्योंकि उसके लिए अडानी–अम्बानी का मुनाफा भारत की प्रतिष्ठा से ऊपर है। खून में व्यापार होने का दावा करने वाला इनसान मेहनतकश भारतीयों के अपमान पर शर्मिन्दा नहीं होगा। जिन्होंने रोजी–रोटी की खातिर अमरीका का रुख किया वे वहाँ बेड़ियों में जकड़े जा रहे हैं, जो मेहनतकश यहाँ हैं वे लेबर कोड और कृषि कानूनों की जंजीरों में कैद किये जा रहे हैं। इतिहास बताता है कि जब हुक्मरान घुटने टेक देते है तो जनता मोर्चा सम्भालती है। रास्ता यही है कि इनसानी हक और देश की इज्जत बचाने के लिए एकजुट होकर लड़ा जाये, चाहे ट्रम्प सामने हो या मोदी।

–– अरुण मौर्या

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