मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

तुच्छ जीवन की महान गाथा

इस धरती का मैं जूठे नाम का तुच्छ गरीब

नहीं, मैं नहीं बन सकता महान!

राम प्रसाद शर्मा

ओह माँ

उनके दादा की थी सात गाँवों में जमीन्दारी

दो–बीस (40) ठण्डी बरसातें

मेरे बाप ने काटी थी उनके ही घर में

हरुआ की जिन्दगी

लेकिन वे आदमी थे कितने त्यागी

छोड़ दी वैसी हरी–भरी जमीन्दारी औरों के लिए

अमर होनी ही थी उनकी कथा

मैं तो राम प्रसाद शर्मा नहीं

मैं बन नहीं सकता महान!

 

हिकमत सिंह ठकुरी

ओह!

ओह!

उनके बाप का तीस गाँवों में था बड़ा रुतबा

मेरे घर में पेशाब की गन्ध से भरी रजाई भी नहीं थी

घोड़ा होते हुए भी वे चल देते थे

दास के कंधे पर सवार ढल–मल, ढल–मल

लेकिन थे गजब के भले आदमी

त्याग दी शानो–शौकत औरों के लिए

चर्चा होनी ही थी सर्वत्र उनके नाम की

मैं तो हिकमत सिंह ठकुरी नहीं

मैं बन नहीं सकता महान!

 

हरी नारायण झा

राम! राम!

आँगन में तुलसी के चैरे पर घुमाते चाँदी की थाली

18 गाँवों के मालिक के दुलारे बेटे वे

आधी उमर बीत गयी उनके आँगन में ढोते–ढोते

मरे हुए मवेशियों की लाश

लेकिन कितने बड़े धर्मात्मा थे वे

चीर डाली जात–पात का उतनी बड़ी चादर हमारे लिए

होनी ही थी उनकी पूजा

मैं तो हरिनारायण झा नहीं

मैं बन नहीं सकता महान!

 

तुलसी लाल श्रेष्ठ

सच! सच!

पोथियों के ढेर पर जन्मे थे

उनके दादा से ही लेखकों की पुश्त चल रही थी

बचपन में धाक जमाते किताबें फेंक–फेंक

लेकिन थे सचमुच नेता

फाड़ दिया सर्टिफिकेट

छोड़ दी नौकरी

राष्ट्र के लिए

बननी ही थी उनकी मूर्ति

मैं तो तुलसी लाल श्रेष्ठ नहीं

मैं बन नहीं सकता महान!

 

मेरे पास खाने के लिए दादा की जमीन्दारी नहीं

छोड़ने के लिए खानदान की शानो–शौकत नहीं

त्यागने के लिए मेरी कोई उच्च जाति नहीं

नौकरी पर लात मारने के लिए कोई सर्टिफिकेट नहीं

नहीं! नहीं!

इस धरती का मैं जूठे नाम का तुच्छ गरीब

मैं कदापि बन नहीं सकता महान!

 

मैं खेतों में हल चलाता हूँ

कारखानों में ठोंकता हूँ पेंच और कीलें

कर सकने वाला सभी जरूरी काम करता हूँ

बच्चे बीमार हों तो रात भर जागता हूँ

पड़ोस में मरे पड़े शव को बेझिझक ढोता हूँ

पड़ोसी की खुशहाली में कमर लचका कर नाचता हूँ

आनन्द से एक दिन बच्चों को गले लगा पाने का

ख्वाब देखता हूँ रोज–रोज आँखें मूँद

झूठ बोलूँ तो मर जाऊँ

देर–सवेर कैसे–कैसे समय निकाल

जुलूस में कभी–कभी खड़ा होने जा पहुँचता हूँ

नहीं!

इस धरती का मैं

जूठे नाम का तुच्छ गरीब

ऐसा ही है मेरा तुच्छ संसार

मैं बन नहीं सकता महान

मैं नहीं बन सकता महान!

–– आहुति

Leave a Comment

लेखक के अन्य लेख

अवर्गीकृत
समाचार-विचार
कविता
साक्षात्कार
साहित्य
सामाजिक-सांस्कृतिक
कहानी
अन्तरराष्ट्रीय
श्रद्धांजलि
राजनीति
जीवन और कर्म
राजनीतिक अर्थशास्त्र
व्यंग्य
विचार-विमर्श
मीडिया
फिल्म समीक्षा