उपभोक्तावाद की संस्कृति
–– श्यामाचरण दुबे
धीरे–धीरे सब कुछ बदल रहा है। एक नयी जीवन–शैली अपना वर्चस्व स्थापित कर रही है। उसके साथ आ रहा है एक नया जीवन–दर्शन–– उपभोक्तावाद का दर्शन। उत्पादन बढ़ाने पर जोर है चारों ओर। यह उत्पादन आपके लिए है, आपके भोग के लिए है, आपके सुख के लिए है। ‘सुख’ की व्याख्या बदल गयी है। उपभोग–भोग ही सुख है। एक सूक्ष्म बदलाव आया है नयी स्थिति में। उत्पाद तो आपके लिए हैं, पर आप यह भूल जाते हैं कि जाने–अनजाने आज के माहौल में आपका चरित्र भी बदल रहा है और आप उत्पाद को समर्पित होते जा रहे हैं।
विलासिता की सामग्रियों से बाजार भरा पड़ा है, जो आपको लुभाने की जी तोड़ कोशिश में निरन्तर लगी रहती हैं। दैनिक जीवन में काम आने वाली वस्तुओं को ही लीजिए। टूथ–पेस्ट चाहिए? यह दाँतों को मोती जैसा चमकीला बनाता है, यह मुँह की दुर्गंध हटाता है। यह मसूड़ों को मजबूत करता है और यह ‘पूर्ण सुरक्षा’ देता है। वह सब करके जो तीन–चार पेस्ट अलग–अलग करते हैं, किसी पेस्ट का ‘मैजिक’ पफार्मूला है। कोई बबूल या नीम के गुणों से भरपूर है, कोई )षि–मुनियों द्वारा स्वीकृत तथा मान्य वनस्पति और खनिज तत्वों के मिश्रण से बना है। जो चाहे चुन लीजिए। यदि पेस्ट अच्छा है तो ब्रुश भी अच्छा होना चाहिए। आकार, रंग, बनावट, पहुँच और सपफाई की क्षमता में अलग–अलग, एक से बढ़कर एक। मुँह की दुर्गंध से बचने के लिए माउथ वाश भी चाहिए। सूची और भी लम्बी हो सकती है पर इतनी चीजों का ही बिल कापफी बड़ा हो जायेगा, क्योंकि आप शायद बहुविज्ञापित और कीमती ब्रांड खरीदना ही पसन्द करें। सौन्दर्य प्रसाधनों की भीड़ तो चमत्कृत कर देने वाली है––हर माह उसमें नये–नये उत्पाद जुड़ते जाते हैं। साबुन ही देखिए। एक में हलकी खुशबू है, दूसरे में तेज। एक दिनभर आपके शरीर को तरोताजा रखता है, दूसरा पसीना रोकता है, तीसरा जर्म्स से आपकी रक्षा करता है। यह लीजिए सिने स्टार्स के सौन्दर्य का रहस्य, उनका मनपसन्द साबुन। सच्चाई का अर्थ समझना चाहते हैं, यह लीजिए। शरीर को पवित्र रखना चाहते हैं। यह लीजिए शु( गंगाजल में बना साबुन। चमड़ी को नर्म रखने के लिए यह लीजिए––महँगा है, पर आपके सौन्दर्य में निखार ला देगा। सम्भ्रान्त महिलाओं की ड्रेसिंग टेबल पर तीस–तीस हजार की सौन्दर्य सामग्री होना तो मामूली बात है। पेरिस से परफ्रयूम मँगाइए, इतना ही और खर्च हो जायेगा। ये प्रतिष्ठा–चिन्ह हैं, समाज में आपकी हैसियत जताते हैं। पुरुष भी इस दौड़ में पीछे नहीं हैं। पहले उनका काम साबुन और तेल से चल जाता था। आफ्रटर शेव और कोलोन बाद में आए। अब तो इस सूची में दर्जन–दो दर्जन चीजें और जुड़ गयी हैं।
छोड़िए इस सामग्री को। वस्तु और परिधान की दुनिया में आइए। जगह–जगह बुटीक खुल गये हैं, नये–नये डिजाइन के परिधान बाजार में आ गये हैं। ये ट्रेंडी है और महँगे भी। पिछले वर्ष के पफैशन इस वर्ष? शर्म की बात है। घड़ी पहले समय दिखाती थी। उससे यदि यही काम लेना हो तो चार–पाँच सौ में मिल जायेगी। हैसियत जताने के लिए आप पचास–साठ हजार से लाख डेढ़ लाख की घड़ी भी ले सकते हैं। संगीत की समझ हो या नहीं, कीमती म्यूजिक सिस्टम जरूरी है। कोई बात नहीं यदि आप उसे ठीक तरह चला भी न सकें। कम्प्यूटर काम के लिए तो खरीदे ही जाते हैं, महज दिखावे के लिए उन्हें खरीदने वालों की संख्या भी कम नहीं है। खाने के लिए पाँच सितारा होटल हैं। वहाँ तो अब विवाह भी होने लगे हैं। बीमार पड़ने पर पाँच सितारा अस्पतालों में आइए। सुख–सुविधाओं और अच्छे इलाज के अतिरिक्त यह अनुभव कापफी समय तक चर्चा का विषय भी रहेगा, पढ़ाई के लिए पाँच सितारा पब्लिक स्कूल हैं, शीघ्र ही शायद कॉलेज और यूनिवर्सिटी भी बन जाये। भारत में तो यह स्थिति अभी नहीं आयी पर अमरीका और यूरोप के कुछ देशों में आप मरने के पहले ही अपने अंतिम संस्कार और अनन्त विश्राम का प्रबन्ध भी कर सकते हैं––एक कीमत पर। आपकी कब्र के आसपास सदा हरी घास होगी, मनचाहे पफूल होंगे। चाहे तो वहाँ पफव्वारे होंगे और मन्द ध्वनि में निरन्तर संगीत भी। कल भारत में भी यह सम्भव हो सकता है। अमरीका में आज जो हो रहा है, कल वह भारत में भी आ सकता है। प्रतिष्ठा के अनेक रूप होते हैं। चाहे वे हास्यास्पद ही क्यों न हों। यह है एक छोटी–सी झलक उपभोक्तावादी समाज की। यह विशिष्टजन का समाज है पर सामान्यजन भी इसे ललचाई निगाहों से देखते हैं। उनकी दृष्टि में, एक विज्ञापन की भाषा में, यही है राइट च्वाइस बेबी।
अब विषय के गम्भीर पक्ष की ओर आएँ। इस उपभोक्ता संस्कृति का विकास भारत में क्यों हो रहा है ?
सामन्ती संस्कृति के तत्व भारत में पहले भी रहे हैं। उपभोक्तावाद इस संस्कृति से जुड़ा रहा है। आज सामन्त बदल गये हैं, सामन्ती संस्कृति का मुहावरा बदल गया है।
हम सांस्कृतिक अस्मिता की बात कितनी ही करें’ परम्पराओं का अवमूल्यन हुआ है, आस्थाओं का क्षरण हुआ है। कड़वा सच तो यह है कि हम बौ(िक दासता स्वीकार कर रहे हैं, पश्चिम के सांस्कृतिक उपनिवेश बन रहे हैं। हमारी नयी संस्कृति अनुकरण की संस्कृति है। हम आधुनिकता के झूठे प्रतिमान अपनाते जा रहे हैं। प्रतिष्ठा की अन्धी प्रतिस्पर्धा में जो अपना है उसे खोकर छद्म आधुनिकता की गिरफ्रत में आते जा रहे हैं। संस्कृति की नियंत्रक शक्तियों के क्षीण हो जाने के कारण हम दिग्भ्रमित हो रहे हैं। हमारा समाज ही अन्य–निर्देशित होता जा रहा है। विज्ञापन और प्रसार के सूक्ष्म तंत्र हमारी मानसिकता बदल रहे हैं। उनमें सम्मोहन की शक्ति है, वशीकरण की भी।
अन्तत: इस संस्कृति के पफैलाव का परिणाम क्या होगा? यह गम्भीर चिन्ता का विषय है। हमारे सीमित संसाधनों का घोर अपव्यय हो रहा है। जीवन की गुणवत्ता आलू के चिप्स से नहीं सुधरती। न बहुविज्ञापित शीतल पेयों से। भले ही वे अन्तरराष्ट्रीय हो। पीजा और बर्गर कितने ही आधुनिक हों, हैं वे कूड़ा खाद्य। समाज में वर्गों की दूरी बढ़ रही है, सामाजिक सरोकारों में कमी आ रही है। जीवन स्तर का यह बढ़ता अन्तर आक्रोश और अशान्ति को जन्म दे रहा है। जैसे–जैसे दिखावे की यह संस्कृति पफैलेगी, सामाजिक अशान्ति भी बढ़ेगी। हमारी सांस्कृतिक अस्मिता का ह्रास तो हो ही रहा है, हम लक्ष्य–भ्रम से भी पीड़ित हैं। विकास के विराट उद्देश्य पीछे हट रहे हैं, हम झूठी तुष्टि के तात्कालिक लक्ष्यों का पीछा कर रहे हैं। मर्यादाएँ टूट रही हैं, नैतिक मानदंड ढीले पड़ रहे हैं। व्यक्ति–केन्द्रिकता बढ़ रही है, स्वार्थ परमार्थ पर हावी हो रहा है। भोग की आकांक्षाएँ आसमान को छू रही हैं। किस बिन्दु पर रुकेगी यह दौड़ ?
गाँधी जी ने कहा था कि हम स्वस्थ सांस्कृतिक प्रभावों के लिए अपने दरवाजे–खिड़की खुले रखें पर अपनी बुनियाद पर कायम रहें। उपभोक्ता संस्कृति हमारी सामाजिक नींव को ही हिला रही है। यह एक बड़ा खतरा है। भविष्य के लिए यह एक बड़ी चुनौती है।
(साभार: पुस्तक–– क्षितिज भाग–1, पृष्ठ 35, रचनाकार–– श्यामाचरण दुबे। प्रकाशन, एनसीईआरटी संस्करण, 2022 से)
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