मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

जीवन रक्षक दवाइयाँ ही बन रहीं जानलेवा

देश को आजाद हुए 77 वर्ष हो चुके हैं। हमें यह भरोसा दिलाया गया था कि स्वास्थ्य सेवाएँ आम आदमी की पहुँच में होंगी, “एक रुपये की पर्ची” पर इलाज जैसी प्रतीकात्मक कल्पनाएँ इसी भरोसे का हिस्सा थीं। लेकिन आज हकीकत यह है कि सर्दी–बुखार में भी साधारण परिवारों की जेब खाली हो जाती है। सवाल केवल मँहगाई का नहीं है, बल्कि दवाओं की गुणवत्ता, नियमन और जवाबदेही का भी है।

पिछले वर्ष के घटनाक्रम ने इस भरोसे को गहरी चोट पहुँचाई है। एक कफ सिरप में ऐसे रसायन पाये जाने की खबरें सामने आयीं, जो औद्योगिक उपयोग, जैसे–– ब्रेक फ्लूइड और पेंट—में इस्तेमाल होते हैं।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीसन फार्मास्युटिकल्स द्वारा निर्मित “कोल्ड्रिफ” नामक सिरप के एक बैच में 48–6 प्रतिशत डायथिलीन ग्लाइकोल (डीईजी) पाया गया, जो स्वीकार्य सीमा से कई गुना अधिक है। इस सिरप की आपूर्ती राजस्थान मध्य प्रदेश, ओडिशा और पुद्दुचेरी तक की गयी थी। इस दवा के सेवन से मध्य प्रदेश और राजस्थान में 18 बच्चों की जान चली गयी। सभी बच्चों की उम्र पाँच साल से भी कम थी।

यह पहली बार नहीं है कि जान बचाने वाली दवाएँ ही मौत का कारण बनी। 2019 में, खाँसी–जुकाम से पीड़ित जम्मू के कई बच्चे स्थानीय डॉक्टरों द्वारा कफ सिरप दिये जाने पर ठीक होने के बजाय, गम्भीर रूप से बीमार पड़ गये। उन्हें उल्टी, तेज बुखार हुआ और गुर्दे फेल हो गये। जब तक रहस्य सुलझा, तब तक 11 बच्चों की मौत हो चुकी थी।

कफ सिरप में आम तौर पर प्रोपाइलिन ग्लाइकोल विलयक होता है, जो मानव उपयोग के लिए सुरक्षित माना जाता है। पर मुनाफाखोर कम्पनी मालिक लागत घटाकर और मुनाफा बढ़ाने के लिए इसकी जगह सस्ता, विषैला विकल्प डायथिलीन ग्लाइकोल इस्तेमाल कर रहे हैं। इसकी 2–4 खुराक मंे ही कुछ बच्चों की किडनी और लीवर काम करना बन्द कर देते हैं। अपने बच्चों को खो चुके माता–पिता इस गम के साथ ही इस बात के लिए भी खुद को माफ नहीं कर पा रहे कि उन्होंने अपने ही हाथों से अपने बच्चों को जहर पिला दिया!

मध्य प्रदेश के मुख्यमन्त्री मोहन यादव से जब पत्रकारों ने बच्चों की लगातार हो रही मौतों पर सवाल किया तो उनका जवाब था कि ‘कल की बात आज मत करो’। अगर ऐसे मन्त्रियों के भरोसे हमारे–आपके बच्चों की जान है, तो ऐसे हादसे हो जाना कोई ताज्जुब की बात नहीं।

हालाँकि पुलिस ने कम्पनी के मालिक रंगनाथन को गिरफ्तार कर लिया है, पर सवाल अब भी बरकरार है कि क्या एक गिरफ्तारी से न्याय पूरा हो जाता है? क्या नियामक संस्थाएँ स्वास्थ्य मंत्रालय और ड्रग कन्ट्रोल विभाग अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो सकती हैं?

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दवा उत्पादक देश है। ऐसे में एक कम्पनी के मालिक की गिरफ्तारी (जो तय है कि मामला ठण्डा होते ही जमानत पर बाहर आ जायेगा), मामले को दबाने की कोशिश मात्र है। क्या एक कम्पनी पर लगा प्रतिबन्ध सुरक्षित भविष्य की गारण्टी हो सकता है?

 

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार “भारत नकली दवाओं की बाढ़ से जूझ रहा है, जो ज्यादातर छोटे शहरों और गाँवों में बेची जाती हैं। कई राज्यों में सरकार द्वारा संचालित दवा परीक्षण प्रयोगशालाएँ कम वित्त पोषित, कम कर्मचारियों वाली और खराब परिस्थितियों मंे चलायी जा रही हैं।

2014 में, भारत के शीर्ष दवा नियामक ने एक समाचार पत्र को बताया कि अगर वे अमरीकी मानकों का पालन करते हैं तो उन्हें लगभग सभी दवा कम्पनियों को बन्द करना पड़ेगा।

इससे साफ है कि जिन दवाओं का सेवन हम करते हैं, अमरीका जैसे देशों में उन्हें इस्तेमाल लायक ही नहीं माना जाता। स्पष्ट है कि भारत के लोगों की जान इतनी भी कीमती नहीं कि कम्पनी मालिकों के मुनाफे को कम करके, उनकी जान बचायी जाये या यूँ भी मान सकते हैं कि यहाँ की आम जनता को सरकार और पूँजीपति ‘लैब रैट्स’ से ज्यादा नहीं मानते।

स्वास्थ्य सेवा कोई दया नहीं, हमारा संवैधानिक अधिकार है और सरकार की जिम्मेदारी। अगर सस्ती दवा के नाम पर जहर परोसा जाये, तो “एक रुपये की पर्ची” का सपना व्यंग्य बन जाता है और सरकार की भूमिका एक हत्यारे की।

अगर देश की सरकार अपनी आने वाली पीढ़ी को सुरक्षित स्वास्थ्य ही नहीं दे सकती, तो ऐसी सरकार से उनकी शिक्षा, रोजगार और सुरक्षित भविष्य की उम्मीद करना न सिर्फ बेमानी है बल्कि बेवकूफी है।

सरकार का पक्ष स्पष्ट है, वह मुनाफे के साथ है। अब समय है हमारे एक पक्ष चुनने का!

–– आशा

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