जुलाई 2025, अंक 48 में प्रकाशित

रक्षा बजट में रिकार्ड बढ़ोतरी किसके लिए

1 फरवरी को भारतीय रक्षा मंत्रालय ने अपने 2025–26 के बजट की घोषणा की। यह 5 लाख करोड़ रुपये का है और कुल बजट का 9–53 फीसदी है। पिछले साल के बजट की तुलना में रक्षा बजट में रिकार्ड़ तोड़ बढ़ोतरी दर्ज की गयी है। इसका कारण यह बताया गया है कि देश की सीमाओं पर तनाव चल रहा है इसलिए सशस्त्र बलों का आधुनिकीकरण और रक्षा उत्पादन में बढ़ोतरी जरूरी है।

सरकार द्वारा दी जा रही ये दलीलें बहुत बचकाना है। सीमाओं पर तनाव की स्थिति लम्बे समय से कायम है। पिछले दिनों खबरों में चीन द्वारा भारत की सीमा में घुसपैठ कर सड़क निर्माण और बस्तियाँ बसाने जैसी घटनाएँ खूब चर्चा का विषय रही थी। तब रक्षा मंत्रालय ने चीन पर कोई कार्रवाई करने के बजाय बयान जारी किया कि चीन ने भारत की सीमा में कोई घुसपैठ नहीं की है। तब देश की सुरक्षा का सवाल कहाँ गायब हो गया था? जब अमरीकी युद्धपोत ने बिना किसी इजाजत के भारतीय समुद्री क्षेत्र में घुसपैठ की तब देश का रक्षा मंत्रालय चुप्पी साधे बैठा रहा।

रक्षा मंत्रालय ने नये बजट का खूब महिमा मण्डन किया और बताया कि भारत का रक्षा बजट अमरीका, चीन और रूस के बाद दुनिया का चैथा सबसे बड़ा बजट होगा। लेकिन जिन देशों से रक्षा बजट की तुलना की जा रही है उनकी कुल आर्थिक स्थिति का भी आकलन कर लेना चाहिए। दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में अमरीका की हिस्सेदारी 26 प्रतिशत और चीन की 16 प्रतिशत है जबकि भारत की हिस्सेदारी केवल 4 प्रतिशत है। इन तथ्य से तो यही जाहिर होता है कि अमरीका और चीन का उत्पादक आधार भारत की तुलना में बहुत बड़ा है। वे देश भारी रक्षा बजट का बोझ सह सकते है लेकिन उनसे होड़ के चक्कर में भारत ने रक्षा का बोझ जरूरत से ज्यादा बढ़ाया तो औंधे मुँह गिरने का खतरा है।

4 फरवरी 2025 को भारत ने एंटी–शिप क्रूज मिसाइलो की खरीद के लिए रूस के साथ एक समझौता किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 10 साल पहले ‘आत्मनिर्भर भारत अभियान’ (मेक इन इंडिया) के तहत देश में ही रक्षा सम्बन्धी उत्पाद बनाने का वादा किया था। वह भी जुमला ही साबित हुआ। मोदी सरकार भारत को आत्मनिर्भर बनाने के बजाय परनिर्भर बना रही है। इन नीतियों का ही नतीजा है कि आज भारत दुनिया के सबसे बड़े हथियार आयातक की श्रेणी में पहुँच गया है। अब एक और नया जुमला चल रहा है। 2030 तक देश को मानवरहित हवाई वाहनों (यूएवी) और ड्रोन निर्माण का हब बनाने के दावें किये जा रहे है। इसका जो हश्र होगा उसका अन्दाजा अभी से लगाया जा सकता है।

जो सरकार सैन्य खर्च घटाने के लिए ‘अग्निवीर’ जैसी योजना लाकर अपने सैनिकों का भविष्य तबाह कर चुकी है वह रक्षा बजट में बेहताशा वृद्धि किसके लिए कर रही है? इसका सीधा मतलब है कि इस राशि को सेना के अधिकारियों की अय्याशी के लिए या रक्षा क्षेत्र का सामान मुहैया कराने वाली कम्पनियों के लिये नये बाजार उपलब्ध कराकर उनके मुनाफे को बढाने के लिए इस्तेमाल किया जायेगा।

आज दुनिया भयानक मन्दी के दौर से गुजर रही है। दुनिया के शीर्ष देशों अमरीका, रूस, चीन जैसे देश भी मन्दी की गिरफ्त में हैं। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प की बौखलाइट से यह साफ जाहिर होता है। उसने दुनिया में अपना माल ज्यादा से ज्यादा बेचने के लिए ‘टैरिफ वार’ छेड़ दिया है। अमरीका अति उत्पादन के संकट से जूझ रहा है। अच्छे सेवक की तरह भारत के शासकों ने अमरीका के लिए अपने सीमा शुल्क घटा दिये हैं और रक्षा बजट में बढ़ोत्तरी करके हथियार कम्पनियों को बाजार मुहैया करवाया है। गौरतलब है कि अमरीका दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक है।

आज के दौर में युद्ध की वजह भौगोलिक विस्तार करना ही नहीं रह गया है। व्यापार घाटा और व्यापारिक प्रतिद्वन्द्विता ही एक हद से बढ़कर युद्ध का रूप ले लेती है या फिर युद्ध किसी देश के संसाधनों को कब्जा करने या दबाव बनाने के लिए होता है। भारत तो पहले से ही अमरीका का पिछलग्गू बना हुआ है। भारत के साथ व्यापार में चीन बहुत लाभ में है तो वह भारत से क्यों युद्ध करेगा। पाकिस्तान के मामले में भी स्पष्ट है कि वह भारत से युद्ध नहीं कर सकता उसका मकसद केवल अस्थिरता पैदा करना है। फिर भारत को युद्ध का खतरा क्यों है?

दरअसल दुनियाभर के साम्राज्यवादी और उनकी हथियार निर्माता कम्पनियाँ युद्ध का हव्वा खड़ा करके अपना माल बेचते हैं और हमारे जैसे देश के शासक जनता की गाढ़ी कमाई से इसलिए हथियार का सौदा करते है क्योंकि उसमें भारी कमीशन खाने का मौका मिलता है। राफेल विमान घोटाला सभी के सामने है। रूस और अमरीका दोनों हथियार बेचकर अपना वारा न्यारा कर रहे हैं और हमारे देश के शासक उनसे हथियार खरीदकर अपने देश के नागरिको को भूखा, नंगा, अनपढ़, बीमार और लाचार बनाने की कीमत पर रक्षा बजट बढ़ा रहे है।

–– आशीष

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