नरसंहार पर पर्दा डालने वाले आर्थिक सिद्धान्त के लिए नोबेल
अल्फ्रेड नोबेल की याद में आर्थिक विज्ञान में नोबेल पुरस्कार स्वीडिश सेंट्रल बैंक द्वारा दिया जाता है। अर्थशास्त्र में यह तथाकथित नोबेल दूसरे नोबेल पुरस्कारों की शुरुआत के 68 साल बाद, पहली बार 1969 में प्रदान किया गया था। अल्फ्रेड नोबेल की इच्छानुसार नोबेल फाउण्डेशन द्वारा पाँच नोबेल पुरस्कारों की स्थापना भौतिकी, रसायन विज्ञान, साहित्य, शांति और शरीर विज्ञान या चिकित्सा के क्षेत्र में की गयी थी। प्रामाणिक नोबेल पुरस्कारों के विपरीत, स्वीडिश रिक्सबैंक पुरस्कार के लिए धन नोबेल की सम्पत्ति से नहीं लिया गया था और इसका मकसद साफ था ––1960 के दशक के अन्त में उभरने वाली आमूल परिवर्तनवादी धाराओं के खिलाफ नवक्लासकिय अर्थशास्त्र को वैचारिक रूप से मजबूत करना।
अपनी शुरुआत से ही यह पुरस्कार नवक्लासकिय अर्थशास्त्र के पैरोकारों के लिए आरक्षित था और पूरे इतिहास में इस पर शिकागो स्कूल से जुड़े दक्षिणपंथी–मुक्त बाजार समर्थक रूढ़िवादी अर्थशास्त्रियों का जबरदस्त नियन्त्रण रहा है। संकट के समय में रिक्सबैंक पुरस्कार उन अर्थशास्त्रियों को दिया गया जो लफ्फाजी करने, वामपंथी विश्लेषणों का विरोध करने तथा पूँजीवादी संस्थाओं की हिफाजत करने में खास तौर पर चतुर रहे हों और कभी–कभी यह मुख्यधारा के ज्यादा करीबी उदारवादी विश्लेषणों का प्रतिनिधित्व करने के उद्देश्य से दिया गया।
2008 के वित्तीय संकट के समय रिक्सबैंक पुरस्कार पॉल क्रुगमैन को दिया गया जो तुलनात्मक रूप से प्रगतिशील नव–कीन्सियन अर्थशास्त्री थे और मौजूदा व्यवस्था के मजबूत संरक्षक थे। 2018 में वैश्विक जलवायु आन्दोलन के तेज होने के समय विलियम डी नॉर्डहॉस को जलवायु पर उनके आर्थिक मॉडल के लिए इस पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, जिसने जानबूझकर जलवायु संकट के आर्थिक प्रभावों को कम करके दिखाया और जलवायु परिवर्तन से हो रही तबाही को रोकने के लिए कठोर कार्रवाई की जरूरत को टाल दिया।
इसलिए, कोई ताज्जुब नहीं कि जब इजरायल एक अधिवासी उपनिवेशवादी राष्ट्र के तौर पर अमरीका द्वारा भारी मात्रा में दिये गये हथियारों से गाजा में फिलिस्तीनियों का नरसंहार कर रहा है, हर रोज बड़ी संख्या में फिलिस्तीनियों का कत्ल कर रहा है और मिसाइलें दाग रहा है, उसी समय यह पुरस्कार उन अर्थशास्त्रियों को दिया गया जिनके शोध ने इस धारणा का समर्थन किया कि अधिवासी उपनिवेशवाद ने बेहतर, अधिक “समावेशी” राजनीतिक–आर्थिक संस्थाओं का निर्माण किया है। इस प्रकार, 2024 का रिक्सबैंक “नोबेल” पुरस्कार डेरॉन ऐसमोग्लू, साइमन जॉनसन और जेम्स ए रॉबिन्सन (जिन्हें सामूहिक रूप से “एजेआर” के नाम से जाना जाता है) को “कोलोनियल ओरिजंस ऑफ कम्पेरेटिव डवलपमेंट” पर उनके काम के लिए दिया गया।
आर्थिक विज्ञान में “नोबेल” मेमोरियल पुरस्कार के लिए स्वीडिश अकादमी द्वारा जारी की गयी 2024 की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि पुरस्कार पाने वालों ने वह आधार स्थापित किया है जिस पर कुछ देशों का समृद्ध होना और दूसरों का असफल होना तय था। “कुछ जगहों पर (जैसे अफ्रीका के अधिकांश हिस्से में) यूरोपीय उपनिवेशवादियों का उद्देश्य मूल निवासी आबादी का शोषण करना और उपनिवेशवादियों के मुनाफे के लिए संसाधनों को निचोड़ना था। ऐसे देशों में आखिरकार आर्थिक विकास असफल रहा। इसके विपरीत, संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे अधिवासी उपनिवेश में, जहाँ यूरोप के लोग बड़ी संख्या में बस गये, वहाँ आर्थिक विकास को बढ़ावा देने के लिए “समावेशी संस्थान” शुरू किये गये। जाहिर है, न तो स्वीडिश अकादमी ने और न ही रिक्सबैंक पुरस्कार विजेताओं ने अपने काम में समावेशी संस्थाओं की चर्चा करते समय इस तथ्य का कोई उल्लेख किया कि मूल निवासियों का समूलनाश करने और मार भगाने का काम भी उन्हीं आधीवासी उपनिवेशक देशों ने किया था और न ही अमरीकी बागान गुलामों की व्यवस्था या जिम क्रो संस्थाओं का जिक्र कियाय जिसे मार्क ट्वेन ने “द यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ लिंचरडम” कहा था।
जैसा कि स्वीडिश अकादमी की प्रेस विज्ञप्ति में बताया गया है, 2024 के “नोबेल” पुरस्कार विजेताओं का तर्क यह था कि अच्छा आर्थिक प्रदर्शन समावेशी संस्थानों (जिससे उनका तात्पर्य निजी सम्पत्ति और पूँजीवाद के संस्थानों से है, जिनकी जड़ें दूसरों की सम्पत्ति हथियाने और मार भगाने में मजबूती से धँसी हुई हैं) पर आधारित होता है। लेकिन ये तथाकथित समावेशी संस्थान कुछ देशों में दूसरों के बजाय ज्यादा असरदार क्यों रहे? एजेआर का जवाब था कि ऐसे समावेशी (पूँजीवादी) संस्थान वहाँ पैदा हुए जहाँ यूरोपीय अधिवासी उपनिवेशवादी बड़ी संख्या में थे और यह दुनिया के सिर्फ उन हिस्सों में ही हुआ जहाँ जलवायु और बीमारी ने प्रवासियों के अधिवासी उपनिवेशवाद को बाधित नहीं किया। उपनिवेशों में, मुख्य रूप से उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में, जहाँ यूरोपीयों के बीमारी से मरने की दर अधिक थी, वहाँ यूरोपीय उपनिवेशवादियों ने अधिवासी उपनिवेश के बजाय विशुद्ध रूप से “निष्कर्षणवादी” उपनिवेश स्थापित किये, जहाँ मुनाफे को वापस उपनिवेशवादियों के वतन भेजा जाता था। इसके विपरीत जहाँ अनुकूल जलवायु और अधिवासियों की कम मृत्यु दर के कारण बड़े यूरोपीय घराने बने, वहाँ “समावेशी संस्थान” या मजबूत निजी सम्पत्ति सम्बन्ध स्थापित किये गये। बाद में इसे यह समझाने के लिए पेश किया जाता है कि संयुक्त राज्य अमरीका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैण्ड के अधिवासी उपनिवेश आन्तरिक पूँजीवादी विकास को बढ़ावा देने में क्यों सक्षम थे, जबकि अन्य उपनिवेश विफल रहे।
फिर भी, बकनैल विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर शाराम अजहर ने ह्यूमन ज्योग्राफी में 2025 में लिखे अपने एक लेख में अर्थशास्त्र में 2024 के “नोबेल” पुरस्कार विजेताओं के काम को ध्वस्त कर देने वाली आलोचना की है। अजहर के लेख का शीर्षक है–– ‘पुरस्कार डेरन ऐसमोग्लू को या पॉल बरान को?–– अर्थशास्त्र के लिए 2024 के नोबेल पुरस्कार की आलोचना।’ जैसा कि अजहर बताते है, पॉल ए बरान ने 1957 में ही ‘द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ ग्रोथ’ में 2024 के रिक्सबैंक “नोबेल” विजेताओं के मुख्य तर्क को पेश कर दिया था। इसके अलावा, बरान ने इन मुद्दों को व्यापक विश्लेषण के सन्दर्भ में देखा था, जिसमें न केवल जलवायु प्रभाव (यानी अप्रवासियों की बीमारी/ मृत्यु दर) शामिल है, बल्कि विकास का स्तर और यूरोपीय उपनिवेशवादियों के सामने प्रतिरोध जैसे कारक भी शामिल हैं। बरान के तर्क से जो निष्कर्ष निकले वे रिक्सबैंक पुरस्कार विजेताओं के विपरीत थे।
अजहर ने अपने लेख के बारे में लिखा है कि “यह निबन्ध, एजेआर के सिद्धान्त की प्रख्यात मार्क्सवादी अर्थशास्त्री पॉल बरान के मौलिक काम, ‘द पॉलिटिकल इकोनॉमी ऑफ ग्रोथ’ से विपरीतता को दिखाता है, जिसे देशों के बीच लम्बी अवधि के आर्थिक विचलन की समस्या को समझने के लिए बुनियादी पाठ माना जाता है, जिसे एजेआर ने आज तक अपने काम में मान्यता नहीं दी है। मेरा तर्क है कि बरान (1957) का योगदान, जो एजेआर के काम से लगभग पाँच दशक पहले का है, विचलन के लम्बी अवधि के पैटर्न की समस्या को यूरोपीय अधिवास के मुद्दे से जटिल रूप से जुड़ा हुआ बताने वाला पहला योगदान है।”
बरान ने लिखा था कि “एक ओर पश्चिमी यूरोप द्वारा उत्तरी अमरीका (और ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूजीलैण्ड) में घुसने के प्रभाव और दूसरी ओर पश्चिमी पूँजीवाद द्वारा एशिया, अफ्रीका या पूर्वी यूरोप के ‘दरवाजे खोलने’ के प्रभाव के बीच कोई भी बहुत स्पष्ट रूप से अन्तर नहीं कर सकता है।” उन्होंने बताया था कि न केवल “जलवायु और प्राकृतिक वातावरण, बल्कि स्थापित सभ्यताओं की मौजूदगी और अधिवासियों के आक्रमणों का विरोध करने की मूलनिवासी समाजों की सक्षमता के स्तर, दोनों ने यह निर्धारित करने में योगदान दिया कि यूरोपीय अधिवास उपनिवेशवाद कहाँ काबिज हो सकता है। जहाँ यूरोपीय उपनिवेशों में बाधा डालने वाली पर्यावरणीय स्थितियाँ बहुत गम्भीर थीं (जैसा कि अफ्रीका में) या जहाँ मूलनिवासी समाजों और आबादी को आसानी से हराया नहीं जा सकता था (अक्सर विकास के स्तर के कारण, जैसे एशिया के बड़े हिस्सों में हुआ) यूरोपीय लोग “मेजबान देशों से अधिकतम सम्भव लाभ निचोड़ने और उस लूट को जल्दी से जल्दी अपने देश ले जाने के लिए दृढ़ संकल्पबद्ध थे।” बरान के मुताबिक, हर तरह का उपनिवेशवाद क्रूर शोषण और/या विनाश था और कार्ल मार्क्स ने जिसे “दुनिया भर में पूँजी का तथाकथित आदिम या मूल, संचय” कहा था, उसका हिस्सा था। इनमें से किसी का भी तथाकथित समावेशी संस्थानों से कोई लेना–देना नहीं थाय बल्कि पूँजीवाद और साम्राज्यवाद के विकास को संचालित करने वाली व्यवस्थाएँ हमेशा बहिष्कार पर आधारित थीं।
एकाधिकारी पूँजीवाद/साम्राज्यवाद के बारे में, अजहर का मानना है कि, एजेआर का “यूरोसेंट्रिक विवरण” पूरी तरह से खोखला है–– “एजेआर अपने विश्लेषण में, वैश्विक “एकाधिकारी पूँजीवाद” की तो बात ही छोड़ दें, “पूँजीवाद” को भी उचित वैचारिक प्रवेश–बिन्दु के रूप में नहीं मानते हैं। आर्थिक संस्थाओं के बारे में वे हमें बताते है कि इन्हें पूँजी के तर्क और ऐतिहासिक विश्व व्यवस्था से अलग करके देखा जाना चाहिए, जिसने इन संस्थाओं को सबसे शुरू में पैदा किया था।
इस प्रकार, बरान के मूल योगदान के महत्व को समझने के लिए और क्यों एजेआर (2001) का विवरण इसका एक रहस्यमय बुर्जुआ संस्करण है, हमें वैश्विक पूँजीवाद के उपनिवेशवाद के साथ जुड़ने के क्षण पर गौर करना चाहिए। ठीक यहीं पर एजेआर बरान की बातों को भारी मात्रा में उधार लेते हैं, उनके ऐतिहासिक भौतिकवादी विवरण को रहस्यमय बनाते हैं और इसे एक नवउदारवादी संस्थागत विचारधारा में परिवर्तित करके इसे उल्टा कर देते है––– पूँजी के मालिकों के लिए एक सुविधाजनक अनुभववादी चाल। (अजहर, ‘पुरस्कार डेरॉन ऐसमोग्लू को या पॉल बरान को’, 3–4)
लेकिन 2024 के रिक्सबैंक “नोबेल” पुरस्कार विजेताओं के काम में लफ्फाजी और तर्कहीनता की पूरी सीमा केवल तभी स्पष्ट हो पाती है जब यह सामने आता है कि उन्होंने सैनिकों की मृत्यु दर के आँकड़ों का अधिवासियों की मृत्यु दर के बदले में इस्तेमाल किया है, जो कि फिलिप डी कर्टिन के 1989 के ‘डेथ बाई माइग्रेशन’ में किये गये शोध पर आधारित है, जो “1815 और 1914 के बीच उष्णकटिबन्धीय क्षेत्रों में यूरोपीय सैनिकों के स्थानान्तरण का एक मात्रात्मक अध्ययन” है। हालाँकि इस तरह की अदला–बदली कुछ मायनों में उचित हो सकती है, लेकिन सैनिकों की मृत्यु दर अधिवासियों की तुलना में बहुत अधिक है। इसके अलावा, सैनिकों का अधि: वासियों के रूप में सन्दर्भ देना मूलनिवासियों की इरादतन की गयी तबाही को हलका कर देता है। इस तरह से यह इस बात को नजरअन्दाज करता है कि आखिर सैनिक वहाँ क्या करने गये थे, यानी मूल निवासियों को मिटाने की बात को। इसके अलावा, अभियान के दौरान बीमारी और पेचिश से सैनिकों की मृत्यु दर हमेशा ही बैरक में रहने के समय की तुलना में अधिक होती थी। कर्टिन के शोध में बैरक और अभियान में सैनिकों की मृत्यु दर में अन्तर करने वाले आँकड़े मौजूद हैं, लेकिन एजेआर इस अन्तर को काफी हद तक नजरअन्दाज करते हैं और अक्सर अपने पक्ष को मजबूत करने की कोशिश में बैरक के बजाय अभियान में सैनिकों की मृत्यु दर को अधिवासियों की मृत्यु दर के आधार के रूप में लेते हैं। उनके विश्लेषण में उपनिवेशीकरण से जुड़ी मृत्यु दर में कभी भी खुद मूल निवासियों की मृत्यु दर का सन्दर्भ शामिल नहीं किया गया, जिनकी मृत्यु समावेशी संस्थानों से जुड़े उपनिवेशवाद के आर्थिक लाभों का नतीजा थी लेकिन उनके तर्क के सन्दर्भ में उनकी मृत्यु कोई खास मायने नहीं रखती है। उनके तर्क में केवल उपनिवेशवादियों या सैनिकों की मृत्यु दर ही मायने रखती है।
अगर 2024 के रिक्सबैंक “नोबेल” पुरस्कार विजेताओं ने सैनिक मृत्यु दर का उपनिवेशवादियों की मृत्यु दर के बदले में इस्तेमाल किया है, तो समावेशी संस्थान का इस्तेमाल निजी सम्पत्ति बनाने के प्रबन्धनों के बदले में किया है, जिसमें (निजी सम्पत्ति के मालिकों के लिए) “सम्पत्ति हरण का खतरा” कम होता है। (यहाँ इस तथ्य का कोई उल्लेख नहीं किया गया है कि समावेशी संस्थानों के लिए इस तरह के कम जोखिम वाली सम्पत्ति मूलत: मूलनिवासियों से हथियायी गयी थी।) इस प्रकार सम्पूर्ण विश्लेषण इस धारणा पर आधारित है कि जहाँ सैनिकों की मृत्यु दर कम थी वहाँ उपनिवेशवादियों के लिए रोग सम्बन्धी बाधाएँ भी कम थीं, जिसके कारण यूरोपीय लोगों ने निजी सम्पत्ति के रूप में समावेशी संस्थाओं की स्थापना की, जिनमें दूसरों की सम्पत्ति हथियाने का जोखिम कम था, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला। हालाँकि एजेआर का उपनिवेशवाद का विश्लेषण यूरोपीय सैनिकों की मृत्यु दर पर आधारित है, खासतौर पर मूलनिवासियों के खिलाफ लड़े गये अभियानों में, उनके तर्क में मूलनिवासी केवल भूतिया तौर पर मौजूद हैं (मूलनिवासी वे “अन्य” है जिन्हें सैनिकों ने मारने की कोशिश की)। जैसा कि अजहर ने कहा है, “आरामदायक शब्द ‘समावेशीपन’ को मूलनिवासियों के नरसंहार का भाषाई पर्यायवाची बनाने पर कोई भी व्यक्ति भय से काँप सकता है, लेकिन, इस तरह के ‘मूल्यांकन’ हमारे नोबेल पुरस्कार विजेताओं को चिन्तित नहीं करते, “जो न केवल अधिवासी उपनिवेशवाद से जुड़े नरसंहार पर पर्दा डालने में कामयाब हुए हैं, बल्कि संयुक्त राज्य अमरीका में युद्ध–पूर्व गुलामी की वास्तविकता की भी अनदेखा करते हैं।”
कोई शक नहीं है कि यह सब फिलिस्तीन में चल रहे उपनिवेशवादी नरसंहार से घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है (2024 के पुरस्कार विजेताओं के लिए और निस्सन्देह रिक्सबैंक नोबेल समिति के उन लोगों के लिए जिन्होंने निर्णय लिया), एक लेख के जरिये यह साफ–साफ बताया गया था, जिसका शीर्षक था ‘अनकल्चर्ड’, जो 2012 में ऐसमोग्लू और रॉबिन्सन ने फॉरेन पॉलिसी पत्रिका में लिखा था। वहाँ (और अपनी किताब, ‘व्हाई नेशंस फेल’ में) उन्होंने तर्क दिया था कि “नये इजराइली”, इजराइल आने वाले यहूदी प्रवासी अपने साथ आर्थिक चरित्र की “समावेशी संस्थान” लेकर आये, जो यूरोप से निकल रहे थे, जिन्होंने शिक्षा, तकनीक और विकास को बढ़ावा दिया। इसके विपरीत, “फिलिस्तीनियों ने आर्थिक विकास उत्पन्न करने के लिए महत्वपूर्ण समावेशी––– संस्थानों के निर्माण में अच्छा प्रदर्शन नहीं किया है।” उनका दावा है कि इजराइल “मध्य–पूर्व का पहला लोकतन्त्र था लेकिन इसका प्रसार फिलिस्तीनियों तक नहीं किया गया”, जिससे एक लोकतान्त्रिक/समावेशी राज्य (इजराइल) और एक अपेक्षाकृत “असभ्य” सत्तावादी/अविकसित राष्ट्र (फिलिस्तीन) के बीच संघर्ष हुआ। इसका नतीजा युद्ध के रूप में सामने आया, वेस्ट बैंक और दूसरी जगहों पर फिलिस्तीन की खराब तरीके से प्रबन्धित भूमि को इजरायल के कथित रूप से अधिक समावेशी, लोकतान्त्रिक और आर्थिक रूप से विकसित समाज द्वारा जब्त कर लिया गया। इस प्रक्रिया में, अनगिनत फिलिस्तीनियों को मिटा दिया गया (हालाँकि यह स्वीकार नहीं किया गया है)। 2024 के रिक्सबैंक “नोबेल” पुरस्कार विजेताओं का तर्क है कि विनाशवाद पूँजीवाद के लिए अच्छा है, इसलिए यह दुनिया के लिए भी अच्छा है। फिर भी, जबकि अर्थशास्त्र में तथाकथित “नोबेल” पुरस्कार के पर्दे के पीछे छिपी ऐसी भद्दी वैचारिक चाल का उद्देश्य विकास के “समावेशी” रूप में अधिवासी उपनिवेशवाद को उचित ठहराना है, फिर भी यह केवल आधिपत्यवादी साम्राज्यवादी देशों में वैश्विक आबादी के अपेक्षाकृत एक छोटे हिस्से को ही आश्वस्त करता है। ऐसे सभी भ्रमों से मुक्त दुनिया के अधिकांश लोग इस नरसंहार के नकार और उसके मकसद को समझने में सक्षम है।
(मन्थली रिव्यू से साभार, 1 अपै्रल 2025,
अनुवाद–– निहारिका)
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