अहमदाबाद में क्लीनिकल ट्रायल के जरिये गरीबों का शिकार
6 अप्रैल 2025 की टाइम्स ऑफ इण्डिया अखबार में खबर छपी कि अहमदाबाद के गरीब लोगों को 20 से 40 हजार रुपये के लिए क्लीनिकल ट्रायल माफिया बना रहे हैं। समाज की यह घिनौनी तस्वीर क्राइम ब्रांच के छापों में सामने आयी है।
हमें आज भी कोरोना का वह दौर याद है जब हर तरफ हाहाकार मचा था। हर रोज सैकड़ों मौतें सुर्खियों में थीं। उस समय जब वैक्सीन तैयार की जा रही थी तब आम लोग भी इसके परिक्षण के लिए आगे आये। उन्हीं में एक 40 वर्षीय व्यक्ति ने परिक्षण के बाद गम्भीर ‘न्यूरोलॉजिकल’ समस्या की शिकायत की और मुआवजे की माँग की। लेकिन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इण्डिया ने उसके दावे को सिरे से नकारते हुए कहा कि व्यक्ति की स्थिति और वैक्सीन परीक्षण में कोई सम्बन्ध नहीं है। उल्टा संस्था ने आरोप लगाने और गलत जानकारी फैलाने के लिए उस व्यक्ति के खिलाफ मुकदमा दायर करने की धमकी दी।
उस समय बड़ी चतुराई से यह मामला दबा दिया गया। लेकिन आज महामारी के कुछ साल बाद हम अक्सर लोगों से सुनते हैं कि वैक्सीन लेने के बाद से वह ज्यादा बीमार रहने लगे हैं। इन चिन्ताओं के बावजूद किसी मेडिकल संस्थान ने जवाबदेही तय नहीं की।
महामारी के बाद भी क्लीनिकल ट्रायल का सिलसिला रुका नहीं। आज कई संस्थाएँ हैं जो अवैध तरीके से मेडिकल ट्रायल चला रही हैं। इसमें हजारों लोग शामिल हैं जिसमें ज्यादातर के पास स्थायी रोजगार या आमदनी का कोई जरिया नहीं है। नूरजहाँ ऐसी ही एक महिला है। वह अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे विस्थापित लोगों के लिए बसाई गयी बस्ती गणेशनगर में रहती हैं। परिवार के भरण–पोषण और बेटी की शादी के लिए कुछ पैसे जमा करने के मकसद से वह एक दवा कम्पनी के ट्रायल मे शामिल हुई। कुछ दिन पहले अपने बच्चे और पति को छोड़कर उसे तीन दिन एक रिसर्च लैब में बिताने पडे़े जहाँ उस पर नयी दवाओं का परीक्षण हुआ। उसे तरह–तरह की दवाएँ दी गयीं, उसके खून के नमूने लिये गये। जब उससे पूछा गया कि इसमे जान का खतरा भी होता होगा तो नूरजहाँ ने कहा, “हम गरीब लोग हैं। हमें तो वैसे भी इसी छोटी सी झोपड़ी में ही मरना है।” कम्पनी ने उन्हें 51 हजार रुपये देने वादा किया। 15 हजार रुपये शुरू में दिये गये, बाकी के ट्रायल के बाद देने का करार हुआ।
60 साल की जस्सीबेन चुनारा भी इसी तरह के क्लिनिकल ट्रायल्स में हिस्सा लेती हैं। लगभग एक साल पहले उसके पति और बेटे की मौत हो गयी थी जिसके बाद न रोजगार बचा, न कोई सहारा। वह पहले सब्जियाँ बेचती थीं, लेकिन अब बीमार रहने लगी हैं। शरीर में जलन और हाथों में दर्द रहता है फिर भी जस्सीबेन हर ट्रायल में जाती हैं क्योंकि उसी के शब्दों में, “कुछ तो करना पड़ेगा, वरना भूखे मर जायेंगे।”
विस्थापितों की बस्ती गणेशनगर के लोग अब साबरमती रिवरफ्रंट विकास परियोजना की भेंट चढ़ा दिये गये हैं। करीब 15 हजार लोगों को यहाँ से विस्थापित कर दिया गया। यहाँ रहने वाले आदमी पहले अहमदाबाद की मंडियों में दिहाड़ी मजदूरी करके और महिलाएँ बाजार में या घरों में काम करके रोजाना 200 से 400 रुपये तक कमाती थीं। लेकिन अब ज्यादातर लोग बेरोजगार हैं और मजबूरी में क्लीनिकल ट्रायल का हिस्सा बन रहे हैं ताकि घर का खर्चा चल सके। ये ट्रायल अहमदाबाद के वाडीलाल साराभाई (वीएस) अस्पताल में किये जाते हैं। कुछ वैध हैं और काफी ज्यादा अवैध।
वीएस अस्पताल में 2021 से 2025 तक लगभग 58 अलग–अलग फार्मास्यूटिकल कम्पनियों से करोड़ों रुपये ले कर अवैध परिक्षण किये गये जिसमें 500 से भी अधिक गरीब परिवार शामिल रहे। क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री–इण्डिया (सीटीआरआई) की अनुमति के बिना किये गये, जो क्लिनिकल परीक्षणों में शामिल लोगों के पंजीकरण के लिए एक ऑनलाइन रिकॉर्ड प्रणाली है। सीटीआरआई किसी व्यक्ति को एक साल मे केवल दो बार किसी क्लीनिकल परीक्षण का हिस्सा बनने की अनुमति देता है। लेकिन ये कम्पनियाँ पंजीकरण के बिना लोगों को साल में 4 से 5 बार ट्रायल में शामिल कर रही हैं।
क्राइम ब्रांच के जरिये जो सच्चाई बाहर आयी है, वह समुद्र की सतह पर तैरते हिमखण्ड जितनी भी नहीं है। इतना बड़ा घोटाला बिना सरकारी संरक्षण के सम्भव ही नहीं। अगर ढंग से इसकी जाँच हो जाये तो न जाने कितने सफेदपोश नेता सलाखों के पीछे होंगे।
–– जैनब
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