दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा
(मैं मुहम्मद खान हूँ, आतंकवादी नहीं)
–– डॉ– जसबीर सिंह औलख
क्या कोई संवेदनशील इनसान यह सोच सकता है कि एक सत्रह साल की उम्र के लड़के ने तीन राज्यों में 19 बम धमाके किये होंगे ? पहली नजर में ही आपके दिमाग में ‘यह तो नहीं हो सकता’ का ख्याल आएगा, पर हमारी पुलिस तो आखिर पुलिस है। जरा सोचो कि एक उन्नीस साल के लड़के को 20 फरवरी 1998 से सात दिन पहले अगवा करके दिल्ली पुलिस ने गैर कानूनी हिरासत में रखा तथा 1996–97 में दिल्ली, हरियाणा, तथा उत्तर प्रदेश में एक के बाद एक हुए बम धमाकों के पूरे 19 मामलों में नामजद कर दिया जिस कारण उसको और दो महीने कानूनी पुलिस रिमाण्ड में रहना पड़ा। गैर कानूनी तथा कानूनी पुलिस रिमाण्ड में हर तरह की यातनाएँ जैसे की चड्डे फाड़ने, कच्ची फांसी, बिजली के झटके, मुँह पानी में डुबो देना, जबरदस्ती सर्फ वाला पानी पिलाना, जगाकर रखना, रगड़ना, तेज रोशनी डालना, सख्त वृक्ष के साथ बांधकर कोड़े मारना, आदि के दौर से गुजरना पड़ा। पूरे 14 साल लग गये सभी केसों से बरी होने के लिए, लेकिन इस दौरान उसके पिता इस जहाँ से रुखसत हो गये तथा माँ अघरंग का शिकार होकर चारपाई पर पड़ गयी। लेकिन इन 14 सालों में उसके बचपन की दोस्त लड़की उसका इन्तजार करती रही जिसने उसके बरी होने के बाद उसकी हमसफर बनकर उसकी पीड़ा कम करने में योगदान दिया।
उपरोक्त कहानी 9/11 के बाद शाहरुख खान की आयी फिल्म ‘माय नेम इज खान एण्ड आई एम नॉट ए टेरेरिस्ट’ की स्क्रिप्ट नहीं बल्कि दिल्ली में रहने वाले 19 साल के मुहम्मद आमिर खान की असल कहानी है।
मुहम्मद आमिर खान ने नंदिता दास के साथ मिलकर 2016 में अपनी आपबीती को अंग्रेजी में लिखी पुस्तक ‘फ्रेम्ड ऐज ए टेरेरिस्ट’ में वर्णन किया था। इस किताब का दक्षिण भारत की भाषाओं, बंगाली, तथा हिन्दी भाषा में तो अनुवाद पहले ही हो चुका था, अब बूटा सिंह महमूदपुर ने पंजाबी में दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा के शीर्षक से इस पुस्तक का अनुवाद किया है।
मुहम्मद आमिर खान की पारिवारिक पृष्ठभूमि उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद की है। उसके दादा मुहम्मद इब्राहिम खान के परिवार ने सन् 47 के विभाजन के समय पाकिस्तान जाने के बजाय अपनी इच्छा से हिन्दुस्तान में रहना चुना था चाहे कि उनके सभी रिश्तेदारों में से लगभग 30 प्रतिशत मेंबर पाकिस्तान चले गये थे। आमिर के अब्बा मुहम्मद हाशिम खान अपने भाई के साथ दिल्ली आकर बस गये थे।
आमिर का जन्म दिल्ली में ही हुआ था। उसको आज तक अफसोस है कि उसको जन्म दिलाने वाली दाई, जो एक ईसाई साध्वी थी, की कोई फोटो उसके पास नहीं है। उसके अब्बा कांग्रेस के अल्पसंख्यक सेल के मेंबर थे और उन्होंने मुहम्मद आमिर खान को धार्मिक कट्टरवाद से बचाकर रखा।
आमिर खान की बड़ी बहन चमन आरा का कराची (पाकिस्तान) के एक व्यापारी मुहम्मद बतला के साथ तथा उसकी छोटी बहन रोशन आरा का विवाह बेंगलुरु में हुआ। आमिर खान की उम्र उस समय छोटी थी। जब आमिर खान कुछ बड़ा हुआ तो उसके अब्बा और अम्मी ने सोचा कि अब आमिर अपने आप को सम्भालने योग्य हो गया है और अब वह कराची अपनी बहन को मिलने जा सकता है। आमिर के मोहल्ले में से कई पड़ोसी अपने रिश्तेदारों तथा दोस्तों–मित्रों को मिलने अक्सर पाकिस्तान जाते रहते थे। कराची जाने के लिए आमिर ने काफी कोशिशों के बाद वीजा हासिल कर लिया। जब वीजा लेकर आमिर अपने घर वापस आ रहा था तो एक आदमी उसको मिला जिसने अपने आप को खुफिया महकमें का अफसर तथा अपना नाम ‘गुप्ता जी’ बताया। बस यह एक मुलाकात मुहम्मद आमिर खान के लिए आने वाली मुसीबत की आहट थी। ‘गुप्ता जी’ अपने एक और अधिकारी जो उसको ‘सर’ कहकर सम्बोधित करता था, आमिर के घर भी चक्कर लगाते थे। ‘देश की खातिर कुछ करने के लिए’ का वास्ता भी देते थे और जैसे कि जासूसों को तैयार किया जाता है, लालच भी देते थे। कई मुलाकातों में कराची की फैजल रोड पर स्थित पाकिस्तान की नेवी के हेडक्वार्टर, आते–जाते वाहनों तथा बोर्डाें की तस्वीरे लेने की हिदायत की। यह भी बताया कि कराची में एक चैधरी नाम का व्यक्ति उसको मिलेगा और कुछ डॉक्यूमेंट देगा। ‘गुप्ता जी’ ने आमिर को एक कैमरा, अपना पेजर नम्बर तथा 5000 रूपये दिये। इसी दौरान आमिर के वीजे की, उसकी बहन के कराची में रहने की, तथा कराची में लैंडलाइन फोन नम्बर की जानकारी भी ‘गुप्ता जी’ ने हासिल कर ली।
हिन्दुस्तान में खुफिया संस्थाएँ कार्यकारी हुक्मों से बनायी जाती हैं ना की पार्लियामेंट में पास किये कानून के जरिए। इसलिए इनकी पार्लियामेंट या जनता के प्रति कोई जवाबदेही नहीं होती तथा न ही सूचना के अधिकार कानून के तहत आती हैं। देश भक्ती के नाम पर आमिर को उस कार्य के लिए तैयार किया गया जिसकी उसको कोई सिखलायी नहीं थी। उसको तो उस व्यक्ति का असली नाम और न ही उसकी संस्था का नाम पता था जिन्होंने उसको यह काम सौंपा था। हिन्दुस्तानी खुफिया एजेंसियों में पश्चिमी देशों जैसा यकीन तथा भरोसेमन्दी भी नहीं है।
12 दिसम्बर 1997 को चलकर समझौता एक्सप्रेस के जरिये मुहम्मद आमिर खान अटारी वाघा सरहद पार कर लाहौर के रास्ते अपनी बहन के पास कराची पहुँच गया। कोई दो महीने वह वहाँ रुका, पहली बार समुन्दर देखा, भाँजे–भाँजी के साथ मस्ती की। बीमारी ने भी आमिर को घेर लिया। इसी दौरान ‘गुप्ता जी’ ने लैंडलाइन फोन से आमिर को उसका काम याद करवाया और धमकियाँ भी दी। डरा हुआ आमिर बहन–बहनोई से चोरी–चोरी कैमरा लेकर फैजल रोड की तरफ चला गया, लेकिन कड़े सुरक्षा प्रबन्ध देखकर डर गया, फोटो भी नहीं ली, वापस घर जाकर कैमरे को फिर से कपड़ों के बीच छुपा दिया। आमिर ने कैमरे का जिक्र भी बहन के परिवार में से किसी के साथ नहीं किया। आमिर को दुविधा भी थी और एक डर भी था कि अगर वह पकड़ा गया तो उसकी बहन के परिवार की जिन्दगी भी नरक बन जायेगी। फिर एक दिन चैधरी नाम का व्यक्ति साबर होटल में उसको मिला तथा आमिर को पीले लिफाफे में कुछ दस्तावेज सौंप दिये।
11 फरवरी 1998 को मुहम्मद आमिर खान अपनी बहन और बहनोई से विदा लेकर हिन्दुस्तान वापस आने के लिए लाहौर चल पड़ा। पाकिस्तान के कस्टम विभाग की सख्ती देखकर वह घबरा गया। पीले लिफाफे में पड़े दस्तावेज उसको डराने लगे। पकड़े जाने के डर तथा बहन के परिवार की जिन्दगी के बारे में सोचकर आमिर वॉशरूम में गया तथा उसकी छत के ऊपर पीले लिफाफे को फेंक दिया। कस्टम क्लियर कर वह 13 फरवरी को वापस दिल्ली अपने घर आ गया। अगले दिन 14 फरवरी को आमिर ने ‘गुप्ता जी’ को कैमरा वापस कर अपनी आपबीती सुना दी। पर ‘गुप्ता जी’ ने आमिर के फेंके हुए पीले लिफाफे को दो दिन में ढूंढने का हुक्म सुना दिया, साथ ही धमकी भी थी कि अगर पीला लिफाफा ना मिला तो उसके साथ बहुत बुरा होगा। ‘गुप्ता जी’ की धमकी सच साबित हुई तथा मुहम्मद आमिर खान को 20 फरवरी 1998 को, जब वह जुम्मे की नमाज पढ़ने के लिए घर से बाहर गया तो दिल्ली पुलिस घर वालों को बिना बताये उसको अगवा कर ले गयी। 7 दिन गुप्ता जी की हाजिरी में बदल–बदल कर आते पुलिसकर्मियों ने मुहम्मद आमिर खान को हर वो यातना दी जो पुलिस की डिक्शनरी में थी। अपने माता–पिता के नाम उर्दू में एक पत्र लिखवाया, इसके बहाने उसके घर से उसके पासपोर्ट समेत कुछ दस्तावेज पुलिस सादे कपड़ों में जाकर उठा लायी, लेकिन अपनी पुलिसिया पहचान नहीं बतायी। कोई सौ–डेढ़ सौ खाली पन्नों पर जबरन हस्ताक्षर करवाये गये तथा उर्दू में भिन्न–भिन्न तारीखों में कई डायरियाँ लिखवायी गयी। सात दिनों बाद उसको अदालत में बम धमकियों के संगीन दोष तथा एक विदेशी रिवाल्वर की रिकवरी के साथ पेश किया गया। दिल्ली, हरियाणा के रोहतक तथा उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में 1996–97 के दौरान हुए बम धमाकों के कुल 19 केसों में मुहम्मद आमिर खान को नामजद कर दिया गया। 28 फरवरी से 26 अप्रैल 1998 के दो महीनो के दौरान वह पुलिस की कानूनी रिमाण्ड में रहा। दहशत का दौर निरन्तर जारी रखा गया। पुलिस वाले खुद कहते रहे कि केस तो झूठे हैं, कुछ सालों में वह बरी हो जायेगा।
लेकिन पेशी पर मीडिया ‘खतरनाक दहशतगर्द’ की झलक लेने पहुँच गयी ताकि अपनी स्टोरी कर सके। आमिर के अब्बू हर तारीख पर समय से पहले पहुँच जाते, अर्जी नवीसों से अर्जियाँ लिखवाते, कोशिश करते कि आमिर के साथ पेशी पर कोई बात हो जाये। एक पेशी पर उसके अब्बू नहीं आये, जज ने पूछा कि “उसके अब्बू क्यों नहीं आये ?” आमिर के वकील ने अदालत को बताया कि वह अस्पताल में दाखिल हैं। अब्बू को मिलने की पुलिस हिरासत में ही आमिर को 2 घण्टे की पैरोल दी गयी। वह हथकड़ियों में जकड़ा (कानून की नजरों में ‘खतरनाक दहशतगर्द’ जो था) वह अपने अब्बू को अस्पताल में मिला। अब्बू ने तारीख पर ना आने के लिए अपने बेटे से माफी माँगी। यह पिता पुत्र की आखिरी मुलाकात थी। अगली पेशी पर उसके वकील ने उसको अब्बू की मौत की खबर दी। मुहम्मद आमिर खान की पैरवी की जिम्मेवारी अब उसकी अम्मी ने सम्भाली, लेकिन उसने भी एक दिन अधरंग का शिकार होकर चारपाई पकड़ ली।
तिहाड़ जेल सहित आमिर भिन्न–भिन्न जेलों की अमानवीय हालातों से रूबरू हुआ। एक के बाद एक केसों में सबूतों की कमी के कारण उसको बरी कर दिया गया। कुछ केसों में उसको शक का लाभ देकर बरी किया गया। यही ‘शक का लाभ’ उसको मुआवजे तथा उसके दुखों के लिए जिम्मेवार पुलिस अधिकारियों को जवाबदेह बनाने के लिए अड़चन बन गया। राष्ट्रीय मानव अधिकार कमीशन ने उसको 5 लाख की तुच्छ राशी का मुआवजा दिया पर ‘खतरनाक दहशतगर्द’ के लगे ठप्पे के साथ उसको तथा उसके परिवार को गहरे सामाजिक तथा मानसिक सदमे से गुजरना पड़ा। उसके अब्बू ने तो लोगों के साथ मिलना जुलना तक बन्द कर दिया था।
अगर पुलिस द्वारा पेश की गयी चार्ज शीट की तरफ नजर डालें तो उसमें लिखा है कि मुहम्मद आमिर खान 10 दिसम्बर 1997 से 11 फरवरी 1998 तक कराची में रहा तो उसका आतंकवाद की तरफ झुकाव हुआ और उसने बम बनाना सीखा, लेकिन हैरानी की बात यह है कि मुहम्मद आमिर खान पर जिन बम धमाकों के केस डाले गये वह तो उसके तकरीबन 2 साल पहले हो चुके थे। किसी ने भी इस पुलिसिया कहानी की कड़ियों की तरफ ध्यान देना मुनासिब नहीं समझा।
जेल में रहने के दौरान ही 13 दिसम्बर 2001 को मुल्क की पार्लियामेंट पर हमला हुआ। तिहाड़ जेल का माहौल एकदम बदल गया। सारे मुसलमान कैदी शक के घेरे में आ गये। जेल अधिकारियों को लगा कि वह सब इस हमले में शामिल हैं। जाँच पड़ताल के बहाने अपमानित किया जाने लगा। जैसे जेल की कैंटीनों से खरीदे सर्फ के पैकेट फाड़कर बिखेर देने तथा किसी कथित नाजायज चीज की तलाश में तेल की शीशी गिरा देनी। जेल की कैंटीनो से सामान खरीदने पर रोक लगा दी गयी, यहाँ तक कि कैंटीन से चाय का कप भी नहीं खरीद सकते थे। जज साहब का रवैया भी उसके बाद बदल गया। उसके बाद आये दो अदालती फैसलों में एक में तो उम्र कैद की सजा सुनायी गयी (जो बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने रद्द कर दी) तथा दूसरे में 10 साल की कैद की सजा सुनायी गयी (जिसकी अपील का फैसला अभी आना बाकी है)। ऐसे 12 केसों में मुहम्मद आमिर खान पहले बरी हो चुका था।
2007 में मुहम्मद आमिर खान को गाजियाबाद की डासना जेल में भेज दिया गया। इस जेल की हालत तिहाड़ जेल से भी तरस के योग्य थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट के हुक्म के बावजूद मुकदमे की कार्रवाई जल्दी शुरू नहीं की गयी। डासना जेल में बन्द एक विचाराधीन कैदी शकील ने खुदकुशी कर ली। इस आत्महत्या की चर्चा अखबारों में हुई। तकरीबन 12 साल बाद ‘टू सरकल डॉट नैट’ के मुहम्मद अली तथा ‘सहारा उर्दू’ के अजीज बरनी को मुहम्मद आमिर खान की बेगुनाही का पता लगा तथा वह इसे दुनिया के सामने लेकर आये। यहाँ ही सुनवाई कर रहे एक जज ने आमिर के वकील पंचोली को सलाह दी कि वह आमिर खान की माँ को बतौर गवाह अदालत में पेश करे जो कि उस समय तक अधरंग के कारण चारपाई पर ही पड़ी थी। वकील पंचोली दिल्ली से आमिर खान की माँ को अपनी कार में लाये तथा गाजियाबाद कोर्ट में बतौर गवाह पेश किया जिसमें उन्होंने मुहम्मद आमिर खान के 20 फरवरी 1998 से ही पुलिस हिरासत में होने का सच बयान किया। 18 जुलाई 2011 को जज संजीव यादव ने मुहम्मद आमिर खान की कहानी फैसले में विस्तार से लिखकर आमिर को बाइज्जत बरी कर दिया। इसके बाद 12 जुलाई 2012 को जेल में 13 साल 10 महीने सड़ने के बाद मुहम्मद आमिर खान रोहतक बम धमाके के केस से बरी हो गया लेकिन मुहम्मद आमिर खान को जेल से ले जाने के लिए कोई नहीं आ सका। अन्धेरा होने के बाद उसको जेल से बाहर कर दिया गया, लेकिन 20 फरवरी 1998 की याद का खौफ उसको इस कदर डरा रहा था कि कहीं फिर––––वह जल्दी से रोहतक के बस अड्डे पहुँचा और एक टेलीफोन बूथ से अपने बचपन की दोस्त आलिया को फोन किया ताकि अगर पुलिस उसको फिर अगवा कर ले तो किसी न किसी को तो पता हो कि क्या हो गया है। जेल में रहने के दौरान आमिर के कुछ सह–दोषी इस कारण मुकदमों में पहली स्टेज पर ही डिस्चार्ज कर दिये गये कि उनके परिवारों ने पुलिस द्वारा अगवा करने के दिन ही मानव अधिकार कमिशन आदि को सूचित कर दिया था। बस पकड़कर वह देर रात अपनी अम्मी के पास पहुँचा, बहुत रोया। अम्मी ने उसको उसके अब्बा की एक डायरी दिखायी जिसमें उसने हर मुकदमे की हर पेशी का वर्णन किया हुआ था।
14 साल की शारीरिक, मानसिक और सामाजिक यातनाओं तथा सदमों ने मुहम्मद आमिर खान को बदला लेने या कट्टरता की तरफ नहीं झुकाया, बल्कि वह हर्ष मंदर की कारवां–ए–मोहब्बत तथा शबनम हाशमी की संस्था के साथ जुड़ा रहा। आमिर की कहानी विशेषकर जेल से रिहा होने के बाद की कहानी घोर अन्धेरे में रोशन चिराग जैसी है। जरा सोचिए कि आप बिल्कुल बेकसूर हैं फिर भी अपनी जवानी के 14 साल जेल की सलाखों के पीछे गुजारते हैं, इन 14 सालों में यह भी यकीन नहीं कि आप आजाद हो सकेंगे। ऐसा नहीं है कि मुहम्मद आमिर खान की इस दास्तान में कोई उसके साथ नहीं खड़ा, बहुत अच्छे लोग उसके अंग संग रहे, विशेष तौर पर उसके बचपन की दोस्त आलिया। बरी होने के बाद वह उसकी हमसफर बनी, आज उनके पास एक बेटी अनुषा है। आलिया आमिर के संघर्ष भरे जीवन में उसके साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर शामिल रही।
जिस तिहाड़ और डासना जेलों ने आमिर को ‘खतरनाक दहशतगर्द’ समझा आज उन्हीं जेलों में राष्ट्रीय मानव अधिकार कमिशन के प्रोजेक्टों के अधीन उसको कैदियों को लेक्चर देने के लिए बुलाया जाता है। कुछ टी–वी– चैनलों द्वारा आयोजित बहसों का भी वह हिस्सा होता है, लॉकडाउन के समय बेघर तथा प्रवासी मजदूरों के लिए वह खाने का प्रबन्ध करता है और पिलाणी, हैदराबाद, मुम्बई, रोहतक आदि शहरों में उसको सुनने के लिए सेमिनार करवाये जाते हैं। यह फर्जी दहशतगर्द आज हिन्दुस्तान की शानदार विरासत को आगे बढ़ा रहा है।
किसी बेगुनाह को इतने संगीन दोषों में जेल में डालने के साथ उसकी जिन्दगी तो बर्बाद होती ही है, बम धमाकों जैसे जुर्म के असल मुजरिम भी बचकर निकल जाते हैं जो बेगुनाह को दी हुई पीड़ा से भी अधिक खतरनाक है। मुहम्मद आमिर खान की कहानी पढ़कर एक प्रश्न यह भी उठाया जाना चाहिए कि कितने व्यक्तियों, जिनके पड़ोसी देश के वीजे लगे, उनको ‘गुप्ता जी’ जैसों ने इस्तेमाल किया ? उनमें से कितने दूसरे देशों की जेलों में सड़ने के लिए लावारिस छोड़ दिये गये ? सरबजीत सिंह की कहानी पंजाबियों को याद होगी ही।
मुहम्मद आमिर खान की इस पुस्तक को कॉलेजों, यूनिवर्सिटियों, ज्यूडिशल अकादमियों तथा अदालतों की लाइब्रेरियों में शामिल किया जाना चाहिए। कानून के हर विद्यार्थी को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। गोदी मीडिया के युग में सच्चाई जानने के लिए यह पुस्तक पढ़नी जरूरी है क्योंकि यह गोदी मीडिया मुसलमान के खिलाफ हर हिंसा को जायज ठहराने में लगा रहता है। मुहम्मद आमिर खान का केस पुलिस तंत्र और फौजदारी न्याय प्रणाली में जो भी गलत है उसकी एक मिसाल मात्र है (आईसबर्ग की टिप), ऐसे दूसरे आमिर भी होंगे जिन्होंने अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए अकेले तथा लम्बी लड़ाई लड़ी होगी। क्या उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए जिन्होंने उस पर जुल्म ढाया, झूठे इकबालिया बयान, डायरियाँ लिखवायी तथा अदालतों में झूठ बोला ? क्या भारत को मुहम्मद आमिर खान से हजार बार माफी नहीं माँगनी चाहिए ?
नवशरण सिंह के शब्दों में मुहम्मद आमिर खान के सामने कठिन रुकावटें थी, वह मुसलमान था, साधारण परिवार से था तथा इस बेमेल लड़ाई को लड़ने के लिए सामाजिक तौर पर असमर्थ था। आमिर की जिन्दगी के 14 साल इस लड़ाई की भेंट चढ़ गये, तब जाकर इस बेगुनाह कैदी को रिहाई मिली। यह सादगी, रवानगी के साथ लिखी आपबीती बयान करती पुस्तक बेहद खूबसूरत है, जिसमें आमिर किसी को बुरा नहीं कहते, यहाँ तक की यातनाएँ देने वाले पुलिसकर्मियों, सालों उसको लटकाए रखने वाली न्यायपालिका तथा मुश्किल के समय परिवार का साथ छोड़ जाने वाले दोस्तों–रिश्तेदारों को भी बुरा नहीं कहा। इस पुस्तक में शामिल आमिर खान का कथन – ‘जिन्दगी की कड़ियों को फिर से पकड़ने की कवायद’ बहुत ही खूबसूरती के साथ उन सवालों को दरपेश है, जिनमें वह घिरा हुआ है, “मेरी बेटी किस माहौल में बड़ी हो रही है ?” आमिर अपने हिस्से की लड़ाई मजबूती के साथ लड़ रहा है। नाउम्मीदी के इस दौर में उसका हौसला हमारे लिए उम्मीद की एक किरण है।
मुहम्मद आमिर खान की लड़ाई को सलाम भी, पुस्तक लिखने के लिए धन्यवाद भी!
आमीन!
अनुवाद–– डा– वन्दना सुखीजा
Leave a Comment
लेखक के अन्य लेख
- साहित्य
-
- अव्यवसायिक अभिनय पर दो निबन्ध –– बर्तोल्त ब्रेख्त 17 Feb, 2023
- औपनिवेशिक सोच के विरुद्ध खड़ी अफ्रीकी कविताएँ 6 May, 2024
- किसान आन्दोलन : समसामयिक परिदृश्य 20 Jun, 2021
- खामोश हो रहे अफगानी सुर 20 Aug, 2022
- जनतांत्रिक समालोचना की जरूरी पहल – कविता का जनपक्ष (पुस्तक समीक्षा) 20 Aug, 2022
- जैक लण्डन का उपन्यास ‘आयरन हील’ के बारे में 1 Jan, 2025
- निशरीन जाफरी हुसैन का श्वेता भट्ट को एक पत्र 15 Jul, 2019
- फासीवाद के खतरे : गोरी हिरणी के बहाने एक बहस 13 Sep, 2024
- फैज : अँधेरे के विरुद्ध उजाले की कविता 15 Jul, 2019
- सामाजिक चेतना जगाने में नाटकों की भूमिका : नोबेल विजेता––दारियो लुइगी एंजेलो फो 1 Jan, 2025
- “मैं” और “हम” 14 Dec, 2018
- कविता
-
- अपने लोगों के लिए 6 May, 2024
- कितने और ल्हासा होंगे 23 Sep, 2020
- चल पड़ा है शहर कुछ गाँवों की राह 23 Sep, 2020
- जी एन साईबाबा की कविताएँ 1 Jan, 2025
- बच्चे काम पर जा रहे हैं 19 Jun, 2023
- जीवन और कर्म
-
- दहशतगर्दी का फर्जी ठप्पा 1 Jan, 2025
- रामवृक्ष बेनीपुरी का बाल साहित्य : मनुष्य की अपराजेय शक्ति में आस्था 14 Jan, 2021
- राजनीतिक अर्थशास्त्र
- राजनीति
-
- 106 वर्ष प्राचीन पटना संग्रहालय के प्रति बिहार सरकार का शत्रुवत व्यवहार –– पुष्पराज 19 Jun, 2023
- इलेक्टोरल बॉण्ड घोटाले पर जानेमाने अर्थशास्त्री डॉक्टर प्रभाकर का सनसनीखेज खुलासा 6 May, 2024
- कोरोना वायरस, सर्विलांस राज और राष्ट्रवादी अलगाव के खतरे 10 Jun, 2020
- जनसंख्या नियंत्रण विधेयक का तर्कहीन मसौदा 21 Nov, 2021
- डिजिटल कण्टेण्ट निर्माताओं के लिए लाइसेंस राज 13 Sep, 2024
- नया वन कानून: वन संसाधनों की लूट और हिमालय में आपदाओं को न्यौता 17 Nov, 2023
- नये श्रम कानून मजदूरों को ज्यादा अनिश्चित भविष्य में धकेल देंगे 14 Jan, 2021
- बेरोजगार भारत का युग 20 Aug, 2022
- बॉर्डर्स पर किसान और जवान 16 Nov, 2021
- मोदी के शासनकाल में बढ़ती इजारेदारी 14 Jan, 2021
- सत्ता के नशे में चूर भाजपाई कारकूनों ने लखीमपुर खीरी में किसानों को कार से रौंदा 23 Nov, 2021
- हरियाणा किसान आन्दोलन की समीक्षा 20 Jun, 2021
- सामाजिक-सांस्कृतिक
-
- एक आधुनिक कहानी एकलव्य की 23 Sep, 2020
- किसान आन्दोलन के आह्वान पर मिट्टी सत्याग्रह यात्रा 20 Jun, 2021
- गैर बराबरी की महामारी 20 Aug, 2022
- घोस्ट विलेज : पहाड़ी क्षेत्रों में राज्यप्रेरित पलायन –– मनीषा मीनू 19 Jun, 2023
- दिल्ली के सरकारी स्कूल : नवउदारवाद की प्रयोगशाला 14 Mar, 2019
- पहाड़ में नफरत की खेती –– अखर शेरविन्द 19 Jun, 2023
- सबरीमाला मन्दिर में महिलाओं के प्रवेश पर राजनीति 14 Dec, 2018
- साम्प्रदायिकता और संस्कृति 20 Aug, 2022
- हमारा जार्ज फ्लायड कहाँ है? 23 Sep, 2020
- ‘प्रतिरोध की संस्कृति’ पर केन्द्रित ‘कथान्तर’ का विशेषांक 13 Sep, 2024
- व्यंग्य
-
- अगला आधार पाठ्यपुस्तक पुनर्लेखन –– जी सम्पत 19 Jun, 2023
- आजादी को आपने कहीं देखा है!!! 20 Aug, 2022
- इन दिनों कट्टर हो रहा हूँ मैं––– 20 Aug, 2022
- नुसरत जहाँ : फिर तेरी कहानी याद आयी 15 Jul, 2019
- बडे़ कारनामे हैं बाबाओं के 13 Sep, 2024
- समाचार-विचार
-
- स्विस बैंक में जमा भारतीय कालेधन में 50 फीसदी की बढ़ोतरी 20 Aug, 2022
- अगले दशक में विश्व युद्ध की आहट 6 May, 2024
- अफगानिस्तान में तैनात और ऑस्ट्रेलियाई सैनिकों की आत्महत्या 14 Jan, 2021
- आरओ जल–फिल्टर कम्पनियों का बढ़ता बाजार 6 May, 2024
- इजराइल–अरब समझौता : डायन और भूत का गठबन्धन 23 Sep, 2020
- उत्तर प्रदेश : लव जेहाद की आड़ में धर्मान्तरण के खिलाफ अध्यादेश 14 Jan, 2021
- उत्तर प्रदेश में मीडिया की घेराबन्दी 13 Apr, 2022
- उनके प्रभु और स्वामी 14 Jan, 2021
- एआई : तकनीकी विकास या आजीविका का विनाश 17 Nov, 2023
- काँवड़ के बहाने ढाबों–ढेलों पर नाम लिखाने का साम्प्रदायिक फरमान 13 Sep, 2024
- किसान आन्दोलन : लीक से हटकर एक विमर्श 14 Jan, 2021
- कोयला खदानों के लिए भारत के सबसे पुराने जंगलों की बलि! 23 Sep, 2020
- कोरोना जाँच और इलाज में निजी लैब–अस्पताल फिसड्डी 10 Jun, 2020
- कोरोना ने सबको रुलाया 20 Jun, 2021
- क्या उत्तर प्रदेश में मुसलमान होना ही गुनाह है? 23 Sep, 2020
- क्यूबा तुम्हारे आगे घुटने नहीं टेकेगा, बाइडेन 16 Nov, 2021
- खाली जेब, खाली पेट, सर पर कर्ज लेकर मजदूर कहाँ जायें 23 Sep, 2020
- खिलौना व्यापारियों के साथ खिलवाड़ 23 Sep, 2020
- छल से वन अधिकारों का दमन 15 Jul, 2019
- छात्रों को शोध कार्य के साथ आन्दोलन भी करना होगा 19 Jun, 2023
- त्रिपुरा हिंसा की वह घटना जब तस्वीर लेना ही देशद्रोह बन गया! 13 Apr, 2022
- दिल्ली उच्च न्यायलय ने केन्द्र सरकार को केवल पाखण्डी ही नहीं कहा 23 Sep, 2020
- दिल्ली दंगे का सबक 11 Jun, 2020
- देश के बच्चे कुपोषण की गिरफ्त में 14 Dec, 2018
- न्यूज चैनल : जनता को गुमराह करने का हथियार 14 Dec, 2018
- बच्चों का बचपन और बड़ों की जवानी छीन रहा है मोबाइल 16 Nov, 2021
- बीमारी से मौत या सामाजिक स्वीकार्यता के साथ व्यवस्था द्वारा की गयी हत्या? 13 Sep, 2024
- बुद्धिजीवियों से नफरत क्यों करते हैं दक्षिणपंथी? 15 Jul, 2019
- बैंकों की बिगड़ती हालत 15 Aug, 2018
- बढ़ते विदेशी मरीज, घटते डॉक्टर 15 Oct, 2019
- भारत देश बना कुष्ठ रोग की राजधानी 20 Aug, 2022
- भारत ने पीओके पर किया हमला : एक और फर्जी खबर 14 Jan, 2021
- भीड़ का हमला या संगठित हिंसा? 15 Aug, 2018
- मजदूरों–कर्मचारियों के हितों पर हमले के खिलाफ नये संघर्षों के लिए कमर कस लें! 10 Jun, 2020
- महाराष्ट्र के कपास किसानों की दुर्दशा उन्हीं की जबानी 23 Sep, 2020
- महाराष्ट्र में कर्मचारी भर्ती का ठेका निजी कम्पनियों के हवाले 17 Nov, 2023
- महाराष्ट्र में चार सालों में 12 हजार से ज्यादा किसानों ने आत्महत्या की 15 Jul, 2019
- मानव अंगों की तस्करी का घिनौना व्यापार 13 Sep, 2024
- मौत के घाट उतारती जोमैटो की 10 मिनट ‘इंस्टेण्ट डिलीवरी’ योजना 20 Aug, 2022
- यूपीएससी की तैयारी में लगे छात्रों की दुर्दशा, जिम्मेदार कौन? 13 Sep, 2024
- राजस्थान में परमाणु पावर प्लाण्ट का भारी विरोध 13 Sep, 2024
- रेलवे का निजीकरण : आपदा को अवसर में बदलने की कला 23 Sep, 2020
- लोग पुरानी पेंशन योजना की बहाली के लिए क्यों लड़ रहे हैं 17 Nov, 2023
- विधायिका में महिला आरक्षण की असलियत 17 Nov, 2023
- वैश्विक लिंग असमानता रिपोर्ट 20 Aug, 2022
- श्रीलंका पर दबाव बनाते पकड़े गये अडानी के “मैनेजर” प्रधानमंत्री जी 20 Aug, 2022
- संस्कार भारती, सेवा भारती––– प्रसार भारती 14 Jan, 2021
- सत्ता–सुख भोगने की कला 15 Oct, 2019
- सरकार द्वारा लक्ष्यद्वीप की जनता की संस्कृति पर हमला और दमन 20 Jun, 2021
- सरकार बहादुर कोरोना आपके लिए अवसर लाया है! 10 Jun, 2020
- सरकार, न्यायपालिका, सेना की आलोचना करना राजद्रोह नहीं 15 Oct, 2019
- सरकारी विभागों में ठेका कर्मियों का उत्पीड़न 15 Aug, 2018
- हम इस फर्जी राष्ट्रवाद के सामने नहीं झुकेंगे 13 Apr, 2022
- हाथरस की भगदड़ में मौत का जिम्मेदार कौन 13 Sep, 2024
- हुकुम, बताओ क्या कहूँ जो आपको चोट न लगे। 13 Apr, 2022
- कहानी
-
- जामुन का पेड़ 8 Feb, 2020
- पानीपत की चैथी लड़ाई 16 Nov, 2021
- माटी वाली 17 Feb, 2023
- समझौता 13 Sep, 2024
- विचार-विमर्श
-
- अतीत और वर्तमान में महामारियों ने बड़े निगमों के उदय को कैसे बढ़ावा दिया है? 23 Sep, 2020
- अस्तित्व बनाम अस्मिता 14 Mar, 2019
- क्या है जो सभी मेहनतकशों में एक समान है? 23 Sep, 2020
- क्रान्तिकारी विरासत और हमारा समय 13 Sep, 2024
- दिल्ली सरकार की ‘स्कूल्स ऑफ स्पेशलाइज्ड एक्सलेंस’ की योजना : एक रिपोर्ट! 16 Nov, 2021
- धर्म की आड़ 17 Nov, 2023
- पलायन मजा या सजा 20 Aug, 2022
- राजनीति में आँधियाँ और लोकतंत्र 14 Jun, 2019
- लीबिया की सच्चाई छिपाता मीडिया 17 Nov, 2023
- लोकतंत्र के पुरोधाओं ने लोकतंत्र के बारे में क्या कहा था? 23 Sep, 2020
- विकास की निरन्तरता में–– गुरबख्श सिंह मोंगा 19 Jun, 2023
- विश्व चैम्पियनशिप में पदक विजेता महिला पहलवान विनेश फोगाट से बातचीत 19 Jun, 2023
- सरकार और न्यायपालिका : सम्बन्धों की प्रकृति क्या है और इसे कैसे विकसित होना चाहिए 15 Aug, 2018
- श्रद्धांजलि
- अन्तरराष्ट्रीय
-
- अमरीका बनाम चीन : क्या यह एक नये शीत युद्ध की शुरुआत है 23 Sep, 2020
- इजराइल का क्रिस्टालनाख्त नरसंहार 17 Nov, 2023
- क्या लोकतन्त्र का लबादा ओढ़े अमरीका तानाशाही में बदल गया है? 14 Dec, 2018
- पश्चिम एशिया में निर्णायक मोड़ 15 Aug, 2018
- प्रतिबन्धों का मास्को पर कुछ असर नहीं पड़ा है, जबकि यूरोप 4 सरकारें गँवा चुका है: ओरबान 20 Aug, 2022
- बोलीविया में तख्तापलट : एक परिप्रेक्ष्य 8 Feb, 2020
- भारत–इजराइल साझेदारी को मिली एक वैचारिक कड़ी 15 Oct, 2019
- भोजन, खेती और अफ्रीका : बिल गेट्स को एक खुला खत 17 Feb, 2023
- महामारी के बावजूद 2020 में वैश्विक सामरिक खर्च में भारी उछाल 21 Jun, 2021
- लातिन अमरीका के मूलनिवासियों, अफ्रीकी मूल के लोगों और लातिन अमरीकी संगठनों का आह्वान 10 Jun, 2020
- सउ़दी अरब की साम्राज्यवादी विरासत 16 Nov, 2021
- ‘जल नस्लभेद’ : इजराइल कैसे गाजा पट्टी में पानी को हथियार बनाता है 17 Nov, 2023
- साक्षात्कार
-
- कम कहना ही बहुत ज्यादा है : एडुआर्डो गैलियानो 20 Aug, 2022
- चे ग्वेरा की बेटी अलेदा ग्वेरा का साक्षात्कार 14 Dec, 2018
- फैज अहमद फैज के नजरिये से कश्मीर समस्या का हल 15 Oct, 2019
- भारत के एक बड़े हिस्से में मर्दवादी विचार हावी 15 Jul, 2019
- अवर्गीकृत
-
- एक अकादमिक अवधारणा 20 Aug, 2022
- डीएचएफएल घोटाला : नवउदारवाद की एक और झलक 14 Mar, 2019
- फिदेल कास्त्रो सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के हिमायती 10 Jun, 2020
- बायोमेडिकल रिसर्च 14 Jan, 2021
- भाषा और साहित्य के क्षेत्र में भारत को मुसलमानों का महान स्थायी योगदान 23 Sep, 2020
- सर्वोच्च न्यायलय द्वारा याचिकाकर्ता को दण्डित करना, अन्यायपूर्ण है. यह राज्य पर सवाल उठाने वालों के लिए भयावह संकेत है 20 Aug, 2022
- मीडिया
-
- मीडिया का असली चेहरा 15 Mar, 2019
- फिल्म समीक्षा
-
- समाज की परतें उघाड़ने वाली फिल्म ‘आर्टिकल 15’ 15 Jul, 2019