अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

उर्वरक संकट : सरकारी बदइन्तजामी और जमाखोरी का नतीजा

इस साल जून और जुलाई का महीना खाद और उर्वरक की कमी किसानो के लिए बेहद पीड़ादायक रहा। देश के कोने–कोने से किसानों की बेचैन करने वाली अनेक तस्वीरें सामने आयी थीं जिनमें किसान कड़ी धूप में सुबह से शाम तक उर्वरक दुकानों के बाहर खड़े थे। कई जगह पर दो–दो दिनों तक किसानों को लाइन में लगने को मजबूर होना पड़ा जब जाकर उन्हें थोड़ा बहुत खाद मिल पाया। पंजाब, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, कर्नाटक समेत देश के कई हिस्सों में खाद के इस संकट के चलते किसान प्रदर्शन करने को मजबूर हुए। बिहार में तो हालत इतने खराब हो गये कि उर्वरक की माँग करने पर पुलिस ने किसानों पर लाठी चार्ज कर दिया। केवल पंजाब में ही 74 जगहों पर किसानों ने खाद और यूरिया न मिलने के चलते विरोध प्रदर्शन किया। इसी तरह के प्रदर्शन उत्तर प्रदेश, बिहार समेत देश के अन्य हिस्सों में भी देखने को मिले।

बुवाई के सीजन में खाद बेहद जरूरी होता है, किसानों की इसी जरूरत का फायदा उठाकर कालाबाजारी भी खूब चलती थी। कई जगहों पर किसानों को मजबूरन खाद के लिए दोगुनी कीमत तक चुकानी पड़ी। पहले से संकटग्रस्त किसानों पर यह मार उन्हें और अधिक कर्जमन्द बनाने वाली साबित हुई है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार इसने पिछले साल के मुकाबले किसानों की औसत आय को घटा दिया है। खाद न मिलने के चलते कई किसान तो फसल नहीं बो पाये। लेकिन आखिर सवाल यह उठता है कि यह संकट पैदा क्यों हुआ? अमरीका–ईरान युद्ध के चलते ईरान के पास होर्मुज जलडमरूमध्य का रास्ता बन्द हो गया जिससे उर्वरकों कि आपूर्ति बाधित हो गयी। क्या सिर्फ यही संकट का कारण है या फिर सरकार की गलत नीतियों का नतीजा?

अमरीका–ईरान युद्ध की शुरुआत में सरकार ने यह भरोसा दिलाया था कि इससे भारत की आपूर्ति पर कोई असर नहीं पड़ेगा। केन्द्रीय उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा ने लोकसभा में कहा कि “देश में खाद का पर्याप्त स्टॉक है और जरूरत पड़ने पर किसानों को यह उपलब्ध कराया जाएगा।” इसी के साथ कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान ने भी बार–बार अपने वक्तव्यों में यह कहा कि आगामी खरीफ सीजन के लिए भारत के पर्याप्त खाद है। लेकिन कुछ ही समय बाद इनके ये आश्वासन कोरी लफ्फाजी साबित हुए। दरअसल होर्मुज जलडमरूमध्य के बन्द होने से भारत को खाड़ी देशों से आने वाली 60 फीसदी एलएनजी गैस और 40 फीसदी यूरिया की आपूर्ति ठप्प हो गयी। इसका नतीजा यह हुआ कि मार्च तक भारत का उर्वरक उत्पादन लगभग 25 फीसदी घट गया। लेकिन संकट का एकमात्र कारण यही नहीं है। इस संकट का एक बड़ा कारण सरकारी वितरण में हुई अनियमितता भी है। एक ओर जहाँ सरकारी आँकड़ों में पर्याप्त स्टॉक दिखाया जा रहा था वहीं जमीनी स्तर पर वितरण का ताना–बाना पूरी तरह चरमरा गया है। कालाबाजारी और जमाखोरी अपने चरम पर है जिसमें बड़े अधिकारीयों से लेकर छोटे दुकानदार तक शामिल हैं। केवल उत्तर प्रदेश में 4091 छापे मारे गये, वहीं देशभर में यह संख्या लगभग 4 लाख 84 हजार है।

हकीकत यह है कि प्रशासन के कुछ लोग खुद इन संकटों को पैदा करने और बढ़ाने में लगे हैं। खेती के लिए यूरिया जैसी जरूरी लागत की कालाबाजारी और खाद प्रबन्धन के बजट का दुरुपयोग करने के मामले सामने आये हैं। ‘फर्जी किसान और ई–पीओएस घोटाला’ (2018–2023) इसकी बड़ी मिसाल है, जिसमें सहकारी समितियों और कृषि विभाग के अधिकारियों ने मृत या निष्क्रिय किसानों के आधार और उँगलियों के नकली निशान का इस्तेमाल करके मशीनों में झूठी बिक्री दिखायी और सस्ती सब्सिडी वाली यूरिया को कालाबाजार में महँगे दामों पर बेच दिया। कैग की जुलाई 2024 की रिपोर्ट बताती है कि मध्य प्रदेश में किसानों के लिए बने ‘फर्टिलाइजर डेवलपमेण्ट फण्ड’ का 90 फीसदी हिस्सा करीब 4–79 करोड़ रुपये अधिकारी डकार गये।

इसके अलावा किसानों की सहायता के लिए बनी सरकारी संस्था मार्कफेड ने खाद कम्पनियों से मिली साढ़े दस करोड़ रुपये की छूट का लाभ किसानों तक नहीं पहुँचाया जिससे सीधे किसानों की जेब पर बोझ बढ़ा। इसके साथ ही उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में हजारों सहकारी समितियाँ खाद की कालाबाजारी में रंगे हाथों पकड़ी गयीं। विशेषज्ञों और विभागीय आँकड़ों के मुताबिक, देश में बनने या आयात होने वाली करीब 20 से 25 फीसदी सब्सिडी वाली यूरिया गैर–कृषि उद्योगों जैसे प्लाईवुड, रेजिन और गोंद फैक्ट्रियों को सप्लाई कर दी जाती है। इन सबके बावजूद आज तक किसी बड़े अधिकारी या नेता को सजा नहीं हुई।

होर्मुज जलडमरूमध्य के बन्द होते ही देशभर के लालाओं ने छोटे किसानों के लिए अपने गोदामों के दरवाजे बन्द कर लिये और कालाबाजारी से खूब मुनाफा कमाया। इससे साफ जाहिर है कि सरकार द्वारा संरक्षण प्राप्त ये लोग “आपदा में अवसर” तलाशने और उसका फायदा उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

–– वसीम

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