अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

वन संशोधन अधिनियम : पर्यावरण–आदिवासियों के खिलाफ

–– उत्सा प्रवीण

 

जब भारत के किसी आदिवासी गाँव में सुबह होती है, तो वहाँ की जिन्दगी पैसे या बाजार के भाव से नहीं, बल्कि जंगल के हिसाब से शुरू होती है। सुबह–सुबह जंगल जाकर महुआ चुनना, तेंदू पत्ता इकट्ठा करना, जड़ी–बूटियाँ खोजना और अपनी पुरानी ‘सरना’ या ‘देवगुड़ी’ की पूजा करना–– यह सब सिर्फ पेट पालने और लकड़ी देने वाला कोई जरिया नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा सामाजिक–पारिस्थितिकी तंत्र है, जिस पर उनकी पूरी जिन्दगी, संस्कृति और पहचान टिकी है। अंग्रेजों के जमाने में ‘इण्डियन फॉरेस्ट एक्ट, 1927’ जैसे कानूनों के जरिये सरकार ने इन प्राकृतिक जंगलों पर अपना कब्जा जमा लिया था। इस वजह से जो आदिवासी सदियों से जंगलों की रक्षा कर रहे थे, वे अपनी ही जमीन पर ‘अतिक्रमणकारी’ घोषित कर दिये गये। इसी ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने के लिए आदिवासी संघर्षों के दबाव में भारत सरकार ने फॉरेस्ट राइट्स एक्ट (एफआरए), 2006 बनाया।

इस कानून ने न केवल आदिवासियों को व्यक्तिगत वन अधिकार (आईएफआर) के तहत जमीन का हक दिया, बल्कि सामुदायिक वन अधिकार (सीएफआर) के जरिये ग्राम सभा को अपने जंगलों की रक्षा और प्रबन्धन करने का पूरा कानूनी अधिकार भी सौंपा। इस कानून की धारा 4(5) साफ–साफ कहती है कि जब तक वन अधिकारों को जाँचकर उन्हें मान्यता देने का काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक किसी भी वनवासी को उसकी जमीन से हटाया नहीं जा सकता।

लेकिन इस मजबूत कानून के बनने के बावजूद असली संकट की शुरुआत वर्ष 1991 की उदारकीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण नीतियों से हुई, जिसने देश के आर्थिक ढाँचे को बदल दिया। 1991 के बाद अपनाये गये पूँजी केन्द्रित विकास मॉडल के कारण सरकारों ने जंगलों को देखने का नजरिया ही बदल दिया। वनों को एक जैव–विविधता से भरपूर समृद्ध प्राकृतिक क्षेत्र मानने के बजाय केवल कच्चा माल, खनिज और पारिस्थितिकी सेवा जुटाने का साधन माना जाने लगा।

छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य कोयला, बॉक्साइट, लौह अयस्क, शाल और सागौन के घने जंगल तथा हाथियों का क्षेत्र है। यहाँ बड़ी संख्या में आदिवासी आबादी, निवास करती है। ओडिशा का नियमगिरि पर्वत बॉक्साइट, मैंगनीज, पानी के प्राकृतिक स्रोत और पवित्र देव–शिखर का क्षेत्र है। यह डोंगरिया कोन्ध जनजाति का निवास स्थल है। झारखण्ड का सारंडा क्षेत्र लोहा, कोयला और एशिया के सबसे बड़े शाल वन के लिए जाना जाता है। यहाँ मुण्डा और संथाल जनजाति निवास करती है।

विडम्बना यह है कि भारत के सबसे घने प्राथमिक वन वहीं स्थित हैं, जहाँ जमीन के नीचे कोयला, बॉक्साइट और लोहे के बड़े–बड़े भण्डार हैं। 1991 के बाद सरकार ने कम्पनियों के लिए माइनिंग लीज देना बेहद आसान बना दिया। नतीजतन, पर्यावरण और वन मंत्रालय का काम जंगलों को बचाने के बजाय कम्पनियों को तेजी से ‘फॉरेस्ट क्लीयरेंस’  देने का बन गया।

अगर हम आँकड़ों पर नजर डालें, तो 1991 के बाद से वनों की कटाई और विस्थापन का सच बेहद डरावना दिखता है। सरकारी आँकड़ों के अनुसार, वर्ष 2008 से 2023 के बीच ही सड़कों, खदानों, बिजली लाइनों और फैक्ट्रियों के लिए 3,000 वर्ग किलोमीटर (लगभग 3,000,000 हेक्टेयर) से ज्यादा वन भूमि को गैर–वानिकी कामों के लिए सौंप दिया गया। आजादी के बाद से अब तक विकास परियोजनाओं के नाम पर बेदखल हुए करीब 5 करोड़ लोगों में से 40 से 50 प्रतिशत केवल आदिवासी समुदाय के लोग हैं। इतना ही नहीं, देश भर में आदिवासियों द्वारा दाखिल किये गये 30 से 40 प्रतिशत मामलों को खारिज कर दिया गया है। ओडिशा, झारखण्ड और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में ये दावे सबसे ज्यादा खारिज किये गये, ताकि खदानों के लिए जमीन आसानी से दी जा सके।

आदिवासियों और जंगलों के इस संकट को नये वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 ने और ज्यादा बढ़ा दिया है। इस नये कानून ने 1980 के पुराने वन संरक्षण कानून के सुरक्षा दायरे को बहुत छोटा कर दिया है। वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम, 2023 की मुख्य कमियाँ–– 1– संकुचित दायरा–– यह केवल सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज जंगलों पर लागू होता है। 2– 100 किमी सीमा छूट–– सुरक्षा के नाम पर पूर्वोत्तर और हिमालयी जंगलों की छूट। 3– गैर–वानिकी छूट–– चिड़ियाघर, सफारी और इको–टूरिज्म को खुली छूट। 4– ग्राम सभा की अनदेखी–– बड़ी परियोजनाओं में स्थानीय लोगों की राय जरूरी नहीं।

2023 का यह नया संशोधन कहता है कि यह कानून सिर्फ उन्हीं जमीनों पर लागू होगा, जो 1980 या उसके बाद सरकारी रिकॉर्ड में ‘वन’ के रूप में दर्ज की गयी हैं। इससे लाखों हेक्टेयर ऐसे घने जंगल जो रिकॉर्ड में दर्ज नहीं थे जिन्हें डीम्ड फॉरेस्ट कहा जाता है, वे कानूनी सुरक्षा से बाहर हो गये। इसके अलावा, देश की अन्तरराष्ट्रीय सीमाओं के पास 100 किलोमीटर के दायरे में आने वाले जंगलों को ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ और सड़क–रेलवे जैसे प्रोजेक्ट्स के नाम पर बिना किसी फॉरेस्ट क्लीयरेंस के काटने की छूट दे दी गयी है। इससे भारत का पूरा पूर्वाेत्तर और हिमालयी इलाका खतरे में पड़ गया है। साथ ही जंगलों में सफारी, चिड़ियाघर और इको–टूरिज्म बनाने को इस कानून की कुछ पाबन्दियों से बाहर कर दिया गया है, जिससे कम्पनियाँ बिना किसी रुकावट के जंगलों के बीच में निर्माण कर सकती हैं।

इन सब के बीच भारत का सर्वोच्च न्यायालय हमेशा से जंगलों और आदिवासियों का बड़ा सहारा रहा है। वर्ष 1996 के मशहूर टीएन गोदवर्मन थिरुमुलपाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा था कि ‘वन’ शब्द का मतलब सिर्फ सरकारी कागज नहीं, बल्कि उसका आम शब्दकोषीय अर्थ माना जाएगा–– चाहे वह जमीन सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो या न हो। जब 2023 के नये कानून से इस फैसले को कमजोर करने की कोशिश हुई, तो सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी 2024 में आदेश दिया कि सरकारें 1996 के गोदवर्मन फैसले के हिसाब से ही जंगलों की पहचान जारी रखेंगी। इसके बाद फरवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र और राज्यों को सख्त आदेश दिया कि देश में कुल जंगलों के क्षेत्रफल में कोई कमी नहीं आनी चाहिए और जंगलों को काटने के एवज में केवल असली गैर–वन भूमि पर ही नये पेड़ लगाये जाने चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बावजूद जमीनी स्तर पर जंगलों का कटान और उनको बचाने की लड़ाई जारी है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण छत्तीसगढ़ का हसदेव अरण्य है, जिसे ‘मध्य भारत का फेफड़ा’ कहा जाता है। 1,70,000 हेक्टेयर में फैला यह जंगल एक बड़ा हाथी कॉरिडोर और हसदेव नदी का मुख्य स्रोत है। यहाँ की कोयला खदानों (जैसे पिएकेबी खदान) के लिए लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं और 2,73,000 से ज्यादा पेड़ और काटने की तैयारी है। यहाँ के गोंड और ओराँव आदिवासियों का कहना है कि इसके लिए फर्जी ग्राम सभा प्रस्ताव बनाये गये हैं, जिसके खिलाफ वे लगातार आन्दोलन कर रहे हैं। दूसरी ओर, ओडिशा के नियमगिरि में डोंगिरिया कोन्ध जनजाति ने यह साबित कर दिया कि एफआरए में कितनी ताकत है। जब वेदान्ता कम्पनी वहाँ बॉक्साइट खनन करना चाहती थी, तो 2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर हुई सभी 12 ग्राम सभाओं ने एकमत होकर खनन के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

पर्यावरण और विज्ञान के नजरिये से देखें तो सरकारें काटे गये जंगलों की भरपाई के लिए कैम्पा फण्ड से जो नये पौधे लगाती हैं, वे असली जंगल का मुकाबला कभी नहीं कर सकते।

प्राकृतिक जंगल बनाम कैम्पा के पौधे

प्राकृतिक जंगल कई परतों वाली घनी छतरी होती है। यह तरह–तरह के पेड़–पौधे और जीव–जन्तु का घर है। यह भोजन, फल और जड़ी–बूटी का जरिया है। इसमें कार्बन को सोखने की भारी क्षमता होती है। जब कि कैम्पा के तहत एक ही तरह के पेड़ (जैसे सागौन या यूकेलिप्टस) रोपे जाते हैं और उसमें न के बराबर जीव–जन्तु होते हैं। आदिवासियों के लिए बेकार (कोई भोजन या औषधि नहीं) है और इससे मिट्टी क्षरण और जमीन के पानी का नुकसान होता है।

जब किसी घने जंगल के बीच से सड़क या खदान निकलती है, तो वनों का आवास विखण्डन होता है, जिससे इनसान और जंगली जानवरों के बीच टकराव बढ़ता है। सौ साल पुराना प्राकृतिक जंगल जो जमीन का पानी बढ़ाता है और कार्बन पृथक्करण करके हवा को साफ रखता है, नर्सरी में उगाये गये दो साल के सागौन या यूकेलिप्टस के पौधे उसकी जगह नहीं ले सकते। एक ही तरह के पौधे लगाने से न तो जैव–विविधता लौटती है और न ही आदिवासियों को खाने–पीने की चीजें मिलती हैं। इस चक्कर में आदिवासियों का पीढ़ियों पुराना पारम्परिक पारिस्थितिकी ज्ञान भी हमेशा के लिए लुप्त हो जाता है।

भारत में लगभग 27–5 करोड़ लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए महुआ, तेंदू पत्ता और गोंद जैसे छोटे–मोटे वन उत्पादों पर निर्भर हैं। जब जंगल खत्म होते हैं, तो उनकी आर्थिक सुरक्षा छिन जाती है, जिससे उन्हें संकटग्रस्त पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है। बेघर होकर ये आदिवासी परिवार बड़े शहरों की तरफ भागते हैं और वहाँ कंस्ट्रक्शन साइटों या र्इंट–भट्ठों पर कम दिहाड़ी में अनौपचारिक श्रम बल का हिस्सा बनकर रह जाते हैं। आदिवासियों के लिए जंगल केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि उनकी भाषा, लोकगीत, त्योहार और पूरी संस्कृति इससे जुड़ी है, इसलिए विस्थापन उनके पूरे समाज का विनाश कर देता है।

आज जब पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन से जूझ रही है और भारत अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर जैव–विविधता संरक्षण की बड़ी–बड़ी बातें करता है, तब अपने ही देश के सबसे बड़े पर्यावरण रक्षकों यानी आदिवासियों को बेदखल करना एक बड़ी साजिश है। हमें यह बात समझनी होगी कि विकास का मतलब सिर्फ खदानें या कंक्रीट की इमारतें बनाना नहीं है, बल्कि पारिस्थितिक स्थिरता और आम लोगों का भला करना है। अगर हमें भारत के जंगलों को बचाना है, तो जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए हो रहे आदिवासियों के संघर्ष को अपना सहयोग और समर्थन देना होगा।

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