मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

श्रम और साहित्य पर दो दिवसीय संगोष्ठी सम्पन्न

दिल्ली में 27–28 दिसम्बर 2025 को आयोजित ‘साहित्य में मजदूर’ विषयक संगोष्ठी ने यह प्रश्न केन्द्र में रखा कि आधुनिक हिन्दी साहित्य और व्यापक सामाजिक विमर्श में मजदूर जीवन, उसके संघर्ष और उसकी राजनीति को किस प्रकार फिर से स्थापित किया जाये। यह दो दिवसीय आयोजन दिल्ली के सुरजीत भवन में हुआ, जिसमें विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों से आये मजदूर साथियों, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, लेखकों, रंगकर्मियों, शोधकर्ताओं और जनपक्षधर प्रकाशन कार्य से जुड़े लोगों ने सक्रिय भागीदारी की। कार्यक्रम का उद्देश्य साहित्य और मजदूर जीवन के बीच बढ़ती दूरी को चिन्हित करना और उसे कम करने की दिशा में वैचारिक और व्यावहारिक पहल करना था। इस संगोष्ठी की रूपरेखा वरिष्ठ लेखक रणेन्द्र तथा मजदूर आन्दोलन से जुड़े साथियों ने मिलकर तैयार की, ताकि मजदूर अनुभवों और साहित्यिक अभिव्यक्ति के बीच प्रत्यक्ष संवाद स्थापित हो सके।

चर्चाओं में यह बात बार–बार सामने आयी कि 1980 और 1990 के दशक के बाद नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रभाव से न केवल मजदूर वर्ग पर आर्थिक और राजनीतिक हमले तेज हुए, बल्कि साहित्य और कला की दुनिया में भी उत्पादक वर्गों–– मजदूरों और मेहनतकश किसानों के जीवन से दूरी बढ़ती गयी। बाजारोन्मुख सांस्कृतिक प्रवृत्तियों के कारण मजदूर जीवन के यथार्थ, उसकी कठिनाइयों, सपनों और संघर्षों को साहित्यिक विमर्श के केन्द्र से धीरे–धीरे हाशिए पर धकेल दिया गया। इस पृष्ठभूमि में यह संगोष्ठी उस बढ़ती खाई को पाटने के प्रयास के रूप में सामने आयी, जहाँ साहित्यकारों और मजदूर कार्यकर्ताओं के बीच प्रत्यक्ष संवाद की आवश्यकता को रेखांकित किया गया।

फैक्ट्री मजदूरों का अनुभव

संगोष्ठी में 2011–12 के ऐतिहासिक ‘मारुती सुजुकी मजदूर संघर्ष’ से जुड़े मजदूर साथियों ने अपने अनुभव साझा किये। अंजली देशपाण्डे और नन्दिता हक्सर की किताब ‘कम्पनी जापानी, प्रतिरोध हिन्दुस्तानी’ का जिक्र भी आया। आन्दोलन के अग्रणी साथियों में से एक सरबजीत ने बताया कि किताब में बहुत कम है जितना हमने देखा और सहा है। उन्होंने बताया कि पूरे आन्दोलन के दौरान हरियाणा सरकार बेशर्मी से पूँजीपतियों के साथ खड़ी रही और मजदूरों को जेल में डाल दिया गया। उन्होंने संघर्ष की पृष्ठभूमि, उसके दमन और कारावास के अनुभवों का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने बताया कि 2012 से 2022 तक एक दशक तक जेल में रहने के दौरान मजदूर कैदियों ने कठिन परिस्थितियों में भी अध्ययन और आत्मविकास के प्रयास जारी रखे। जेल में जापानी भाषा सीखने से लेकर छोटे–छोटे संसाधनों को साझा कर जीवन को आगे बढ़ाने तक के अनुभव उन्होंने जीवन्त रूप में प्रस्तुत किये।

इसी क्रम में मारुति प्रोविजनल कमेटी से जुड़े साथी खुशीराम ने औद्योगिक मजदूरों की कार्यस्थल स्थितियों, श्रम की अमानवीय परिस्थितियों और कारावासित मजदूरों के लिए न्याय की लड़ाई के लम्बे अनुभव साझा किये। उन्होंने कहा कि केवल साहित्य में मजदूर जीवन का चित्रण कर देना पर्याप्त नहीं है। जरूरी यह है कि ऐसा साहित्य स्वयं मजदूरों के जीवन और चेतना का हिस्सा बने। मारुति के इण्टरव्यू में जाति, फेमिली और उसकी आर्थिक स्थिति के बारे में पूछा, लेकिन मेरे काम के बारे में नहीं पूछा। मारुति आन्दोलन के दौरान हरियाणा में मजदूर विरोधी दुष्प्रचार फैलाया गया कि ये काम नहीं करना चाहते, बैठकर ताश खेलते हैं। मुफ्त में खाने के लिए यूनियनबाजी करते हैं। सवाल यह है कि ऐसे मजदूर विरोधी विचारों से कैसे लड़ें?

इसी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए साथी सतीश ने कहा कि मजदूर और साहित्य के बीच वास्तविक सम्बन्ध स्थापित करने के लिए लेखकों को बन्द कमरों से बाहर निकलकर मजदूर जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से प्रत्यक्ष रूप में जुड़ना होगा। फैक्ट्रियों, मजदूर बस्तियों और श्रम स्थलों के अनुभव के बिना मजदूर जीवन का यथार्थपूर्ण चित्रण सम्भव नहीं है। जैसे–– व्हाइट कॉलर वर्कर खुद को मजदूर नहीं मानता। वह फ्लैट में रहता है। संशोधनवादी यूनियनों के नेता बिकाऊ हैं। वे ऊँची बातें करते हैं। डींग हाँकते हैं और मजदूरों के साथ गद्दारी करके मालिक के साथ खड़े हो जाते हैं। इनसे सावधान रहना जरूरी है। मीडिया ने हमारे ऊपर झूठा आरोप लगाया था कि हमने मारुति के मजदूर को जिन्दा जला दिया था। इसके खिलाफ हमने गाँव–गाँव रैली निकाली थी।

मानेसर क्षेत्र की बेलसोनिका कर्मचारी यूनियन से जुड़े नेता अजित ने यह बताया कि वर्गीय समाज में साहित्य तटस्थ नहीं रह सकता। यदि साहित्य मजदूर वर्ग की दृष्टि और अनुभवों का प्रतिनिधित्व नहीं करता, तो वह अनिवार्य रूप से शासक और पूँजीपति वर्गों के हितों का प्रतिनिधित्व करने लगता है। आज शासक वर्ग वर्गीय विभाजन को छिपाने और मजदूर एकता को कमजोर करने के लिए जाति, धर्म और भाषा के आधार पर समाज को विभाजित करने की गन्दी चाल चल रहा है। ऐसे विभाजनों को केवल राजनीतिक संघर्ष ही नहीं, बल्कि साहित्यिक हस्तक्षेप भी चुनौती दे सकते हैं। उन्होंने इस सन्दर्भ में कार्ल मार्क्स, मक्सिम गोर्की और मुंशी प्रेमचन्द की रचनाओं का उल्लेख करते हुए बताया कि इन लेखकों की कृतियों ने मजदूरों के बीच वर्ग चेतना विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

उन्होंने यह भी बताया कि साहित्य में आज की जमीनी हकीकत आनी चाहिए। जैसे–– मालिक मजदूरों से कहता है कि फैक्ट्री तुम्हारी है, मेहनत से काम करो। लेकिन कम मजदूरी का मजदूर जब विरोध करता है तो मालिक कहता है कि तुम्हारी यही औकात है। मालिक ने हमसे कहा कि गिफ्ट स्थायी मजदूरों को ही देेंगे, ठेका मजदूरों को नहीं। वह मजदूरों की एकता तोड़ रहा था। हमने कहा कि हमारी यूनियन को दे दो, हम बाँट देंगे। उसने मना कर दिया। साफ है कि वह वर्गीय एकता के बिल्कुल खिलाफ है। मालिक ने हमारी ट्रेनिंग के लिए जापान से एक यूनियन लीडर बुलाया। उसने हमसे कहा कि आप लोग जैसी यूनियन चला रहे हो, वैसी नहीं चलती। पदाधिकारी आम मजदूरों की तरह काम नहीं करते। मालिक उसे यूनियन के काम के लिए तनख्वाह देता है। मालिक का ध्यान रखो, वह तुम्हारा रखेगा।

मालिक कहता है कि वह हमसे समझौता नहीं करेगा क्योंकि हम जेएनयू, किसान आन्दोलन और सीएए–एनआरसी के आन्दोलन को समर्थन देते हैं। इनके अलावा लैंगिक, ठेका, अस्थायी काम, ट्रेनिंग और फैक्ट्री की दूसरी समस्याओं को कैसे साहित्य अपनी आवाज देगा और हल करेगा, यह सवाल हमारे सामने है। वर्ग–संघर्ष विकसित करने से ही सवाल हल होंगे और साहित्य का विकास भी होगा। लफ्फाजी करने या केवल बहसबाजी से कुछ नहीं होगा।

असंगठित मजदूरों का अनुभव

संगोष्ठी में घरेलू कामगारों के मुद्दों को भी प्रमुखता से उठाया गया। संग्रामी घरेलू कामगार यूनियन से जुड़ी साथी श्रेया ने कहा कि श्रम–साहित्य को केवल फैक्ट्री मजदूरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे घरेलू कामगारों, देखभाल कार्यों और अन्य अदृश्य श्रम के क्षेत्रों को भी शामिल करना चाहिए। उन्होंने बताया कि घरेलू कामगारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे न सामाजिक मान्यता प्राप्त है और न ही पर्याप्त कानूनी संरक्षण। जैसे–– लोग अपनी नौकरानी को मौसी या दीदी बोलेंगे, लेकिन उसे ठीक से मजदूरी भी नहीं देंगे। प्रवासी और महिला मजदूरों की हालत और भी खराब है। इस स्थिति को बदलने के लिए श्रम के सामाजिक चरित्र को फिर से परिभाषित करने की जरूरत है।

फरीदाबाद की एक मजदूर बस्ती से आये साथी नरेश ने अपने जीवन के कड़वे अनुभव साझा करते हुए बताया कि किस प्रकार एक मजदूर कार्यकर्ता, फैक्ट्री मजदूर, छोटा दुकानदार और बाद में गिग मजदूर के रूप में उन्होंने पूँजीवादी श्रम व्यवस्था की दुखद परिस्थितियों का सामना किया। माता–पिता बिहार के गोपालगंज से, पिता एटक के नेता, जेल भी गये।

उन्होंने बताया कि सबसे पहले 11 साल की उम्र में लखानी की वेण्डर कम्पनी में 450 रुपये मासिक की नौकरी की। एक कम्पनी में रोटरी पंचिंग मशीन पर काम करते हुए दाहिना हाथ दबकर खराब हो गया। मालिक ने मेरा ठीक से इलाज नहीं करवाया। फिर एसटीडी–पीसीओ खोला जिसमें पैसा डूब गया। जनरल स्टोर खोला। फिर हैण्डीकैप लोन से गाड़ी खरीदी, लेकिन गाड़ी जल गयी। बीमा क्लेम नहीं मिला। मैं डिप्रेशन में आ गया। मैं जहांँ रहता हूँ, वहाँ कई लोगों के पास अपना टायलेट नहीं है। रेलवे लाइन पर टायलेट करते हैं। कुछ लोग कटकर मर भी गये। यूनियन से जुड़कर मजदूरों की लड़ाई लड़ता हूँ।

र्इंट–भट्ठा मजदूर परिवार से आने वाली शामली की साथी नीशू ने महिला मजदूरों के जीवन की कठिनाइयों और उनके सामने प्रतिदिन उपस्थित होने वाली सामाजिक–आर्थिक चुनौतियों का मार्मिक चित्रण किया। उन्होंने बताया कि जब मैं छोटी थी तो पापा के साथ र्इंट–भट्ठे पर जाया करती थी। जहाँ पापा के साथ मिट्टी खोदती थी। फिर र्इंट बनाना सीखा। बहुत कठिन और मेहनत का काम है। वहाँ साँप–बिच्छू का डर होता है। महिलाओं को भी खुले में शौच जाना पड़ता था। उनके पास पैड न होने से अकसर इन्फेक्शन हो जाता है। हमने खुद अपना टायलेट बनाया जिसमें अब 40 लोगों से अधिक जाते हैं। हालत बहुत बुरी है। छोटे बच्चों को नींद से जगाकर काम कराया जाता है।

इसी क्रम में मजदूर साथी रेनू ने अपने अनुभव के जरिये महिला मजदूरों पर पड़ने वाले दोहरे दबाव–– एक ओर पूँजीवादी शोषण और दूसरी ओर पितृसत्तात्मक भेदभाव की वास्तविकताओं को साझा किया। उन्होंने बताया कि आईटीआई से टॉप करने के बावजूद मुझे 13 हजार रुपये की नौकरी मिली, वहाँ भी मुझे 9500 रुपये ही मिलते थे। सुपरवाइजर लेट होने पर मुझे गाली देता था। नौकरी छोड़ दी। उसके बाद मेरठ मेट्रो में काम किया। मैनेजर की गन्दी सोच थी, बोलता था कि लड़कियों खूब सज–सँवर कर आओ, ग्राहक आकर्षित हांेगे।

मजदूर कार्यकर्ताओं और संगठनकर्ताओं का अनुभव

महिला मजदूरों के अनुभवों पर भी संगोष्ठी में गम्भीर चर्चा हुई। मेरठ की मजदूर कार्यकर्ता जैनब ने कहा कि मजदूर वर्ग की एकता स्थापित करने के लिए मजदूरों में मौजूद पितृसत्तात्मक सोच और व्यवहार के खिलाफ भी संघर्ष जरूरी है। उन्होंने एक मजदूर परिवार का उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे घर की बड़ी बेटी का पति उसके साथ दुर्व्यहार करता था। वह अफेयर के शक में अपनी पत्नी को बुरी तरह पीटता था। मजदूर परिवारों में भी पितृसत्तात्मक बुराई मौजूद है जिसके खिलाफ लड़ने की जरूरत है।

मौजूदा साहित्य में मजदूर वर्ग की अनुपस्थिति पर सवाल उठाते हुए ‘मजदूर संघर्ष संगठन’ के साथी विक्रम प्रताप ने कहा कि साहित्य में मजदूर कहाँ है, इसे पता करने से पहले हमें पूछना होगा कि जिन्दगी में मजदूर कहाँ है। असंगठित मजदूरों की हालत बहुत बुरी है। उनमें जाति–धर्म के तफरके तो हैं ही। नशाखोरी, सट्टेबाजी और अन्धविश्वास भी है। एक मजदूर के घर में बीमारी से चार–पाँच भागों में मुड़ी हुए एक बच्ची लेटी हुई मिली। एक मोहल्ले में 50 विधवा महिलाएँ मिली। जिस शहर में चमकीली सड़क वाली पाश कोलोनी है, उसमें कुछ मोहल्लों की गलियाँ इतनी संकरी हैं कि दो लोग साथ–साथ नहीं गुजर सकते। एक शिक्षित महिला ने कहा कि उसे अक्षर देखकर डर लगता है। यह सब साहित्य में कहाँ है? क्यों नहीं है?

उन्होंने कहा कि जब हमने मजदूर पत्रिका की शुरुआत की तो हमें मजदूरों से जुड़ी कहानियों, कविताओं और दूसरे साहित्य का हिन्दी में अकाल दिखायी दिया। मन में यह बेचैनी पैदा हुई कि देश का मजदूर आन्दोलन सौ साल पुराना है, लेकिन हमारे पास मजदूर साहित्य न के बराबर है। आज का साहित्यकार मजदूरों की जिन्दगी से दूर है। दूसरी ओर मजदूर आन्दोलन, उसका नेतृत्व और बुद्धिजीवी मेहनतकशों का साहित्य पैदा नहीं कर पा रहे हैं। मजदूर आन्दोलन को यह समस्या सुलझानी पड़ेगी।

ग्रामीण श्रम की परिस्थितियों पर बोलते हुए मनरेगा मजदूर यूनियन के महासचिव सोमनाथ ने ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती बेरोजगारी, कर्ज और मानसिक तनाव की स्थितियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि ग्रामीण मजदूरों और धनी किसानों के बीच अन्तर्विरोध भी कई क्षेत्रों में तीव्र होते जा रहे हैं, जिससे सामाजिक तनाव की नयी स्थितियाँ पैदा हो रही हैं। जैसे–– किसान–मजदूर संयुक्त पंचायत में मजदूर किसानों की माँगों पर सहमत नहीं हुए और पंचायत छोड़ कर चले गये। गाँव के मजदूरों में एक नकारात्मक बात बैठ गयी है कि उनमें एकता नहीं हो सकती। इस सोच के खिलाफ हमें लड़ना होगा।

निर्माण मजदूरों के संगठनात्मक अनुभवों पर बोलते हुए बिहार निर्माण व असंगठित मजदूर यूनियन से जुड़े इन्द्रजीत ने बताया कि निर्माण क्षेत्र में मजदूरों को केवल आर्थिक माँगों के आधार पर ही नहीं बल्कि वर्गीय राजनीति के आधार पर भी संगठित करने की जरूरत है। उन्होंने यह भी बताया कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को संगठित करने में अस्थायी रोजगार, प्रवासी स्थिति और ठेकेदारी प्रणाली जैसी अनेक चुनौतियाँ सामने आती हैं।

लेखकों और बुद्धिजीवियों का अनुभव

संगोष्ठी में अन्तरराष्ट्रीय अनुभवों पर भी चर्चा हुई। वरिष्ठ रंगकर्मी विनीत तिवारी ने अपने यात्रा–वृत्तान्त के माध्यम से फिलिस्तीन में मजदूरों और आम नागरिकों के जीवन, संघर्ष और इतिहास से जुड़े अनुभव साझा किये। वरिष्ठ लेखिका कविता ने समकालीन साहित्य में मजदूर जीवन पर केंद्रित महत्वपूर्ण रचनाओं के उदाहरण प्रस्तुत किये और यह रेखांकित किया कि साहित्यिक हस्तक्षेप सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

स्वास्थ्य के प्रश्न को उठाते हुए उदयपुर से आये चिकित्सक विदित ने पत्थर खनन क्षेत्र के मजदूरों की जीवन परिस्थितियों का उल्लेख किया। वे दक्षिणी राजस्थान के प्रवासी–जनजाति मजदूरों में काम करते हैं। उन्होंने बताया कि खदानों में काम करने वाले मजदूरों के बीच सिलिकोसिस और तपेदिक जैसी घातक बीमारियाँ व्यापक रूप से फैली हुई हैं, जिसके कारण उनकी औसत आयु कई क्षेत्रों में लगभग 35 वर्ष तक सीमित हो गयी है। यह स्थिति श्रम सुरक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था की गम्भीर विफलता को दर्शाती है।

संगोष्ठी के एक महत्वपूर्ण सत्र में वरिष्ठ लेखक और संगठनकर्ता दिगम्बर ने मजदूरों के बीच साहित्य के प्रसार से जुड़े अपने अनुभव साझा किये। उन्होंने बताया कि समाज में वैचारिक और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के बिना केवल आर्थिक या राजनीतिक संघर्षों के जरिये आमूल–चूल परिवर्तन सम्भव नहीं है। इसी समझ के आधार पर मजदूरों और जनपक्षधर कार्यकर्ताओं ने मिलकर गार्गी प्रकाशन की स्थापना की, जिसका उद्देश्य क्रान्तिकारी, जनवादी और लोकप्रिय साहित्य को कम लागत पर प्रकाशित कर मजदूरों और मेहनतकश तबकों तक पहुँचाना है। उन्होंने बताया कि इसकी शुरुआत इस विचार से हुई कि साहित्य केवल शिक्षित मध्यवर्गीय पाठकों तक सीमित न रह जाये, बल्कि वह मजदूर वर्ग की चेतना के निर्माण का भी माध्यम बने। इसी तरह का काम चीन में लू शुन ने भी किया। उन्होंने ‘आह क्यू की सच्ची कहानी’ और ‘एक पागल की डायरी’ जैसी बहुचर्चित रचना की। वे चाहते तो और भी रचनात्मक लेखन कर सकते थे, लेकिन उन्होंने अपने देश के आन्दोलन के लिए नये लेखकों के विकास और पत्रिका निकालने पर अपना ध्यान केन्द्रित किया।

उन्होंने अपने अनुभवों के आधार पर यह भी स्पष्ट किया कि मजदूर बस्तियों, फैक्ट्रियों और मजदूर संगठनों के बीच साहित्य का संगठित प्रसार करना आसान काम नहीं है। इसके लिए नियमित सम्पर्क, अध्ययन समूहों का निर्माण, सामूहिक पठन–पाठन और चर्चा की परम्परा विकसित करना जरूरी है। इस प्रक्रिया में किताब वर्गीय चेतना के निर्माण और संगठनात्मक कार्यों के लिए एक प्रभावी उपकरण बन जाती है। जैसे–– माइकल डी यीट्स की किताब ‘क्या मजदूर वर्ग दुनिया को बदल सकता है?’ सभी मजदूर कार्यकर्ताओं को पढ़नी चाहिए।

लेखक ब्रम्ह प्रकाश ने समकालीन पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में उभरती नयी श्रम श्रेणियों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कम्पनियाँ शोषण के पारम्परिक तरीकों से आगे बढ़कर अब ऐसे मजदूर वर्गों का निर्माण कर रही हैं जिन्हें ‘परफॉर्मर’ के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। एयर होस्टेस, वेटर और गिग अर्थव्यवस्था में मजदूर का दायित्व सेवा प्रदान करना भर नहीं है, बल्कि सेवा करते हुए खुद को सन्तुष्ट और खुश दिखाना भी है। इस प्रकार श्रम का भावनात्मक और सांस्कृतिक आयाम भी बाजार की माँग के अनुरूप नियंत्रित किया जाता है।

संगोष्ठी में बोलते हुए वरिष्ठ लेखिका और संगठनकर्ता आशु वर्मा ने मजदूर वर्ग की रचनात्मक भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि मजदूरों को अपने जीवन, अनुभवों और संघर्षों पर खुद लिखने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, क्योंकि इतिहास में अनेक ऐसे उदाहरण मौजूद हैं जहाँ मजदूर पृष्ठभूमि से आये लेखकों ने बहुत महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियाँ दी हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मजदूर अनुभवों से उपजा साहित्य सामाजिक यथार्थ को अधिक प्रामाणिक रूप में सामने लाता है।

साथ ही उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि मजदूरों द्वारा लेखन की आवश्यकता को इस प्रकार नहीं देखा जाना चाहिए कि मध्यवर्गीय पृष्ठभूमि से आने वाले लेखक अपनी सामाजिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाएँ। उनके अनुसार साहित्य का जनपक्षधर चरित्र इस बात पर निर्भर करता है कि लेखक अपनी वर्गीय पक्षधरता किस दिशा में तय करता है। यदि कोई लेखक मेहनतकश वर्गों के संघर्षों और आकांक्षाओं के साथ खड़ा होता है, तो वह साहित्य के माध्यम से समाज में प्रगतिशील भूमिका निभा सकता है। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि मजदूर साहित्य का उत्पादन केवल मजदूर वर्ग तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रगतिशील लेखक भी इसमें सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं।

इन साथियों के अलावा श्यामबीर, अनुपम सिंह, सविता पाठक, विभान्शु काला, राही डूमरचीर, रश्मी रावत, प्रो– जनार्दन, सिद्धान्त, पंकज मिश्र, अरुण असफल, कैफी हाशमी, जया मेहता, पल्लव, श्रीधर करुणानिधि और भारती रंजन ने बात रखी।

संगोष्ठी के समापन सत्र में साथी सन्तोष ने पूरे विमर्श को समेटते हुए सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों में श्रम के बदलते चित्रण पर ध्यान दिलाया। उन्होंने सिनेमा के उदाहरण के माध्यम से यह बताया कि भारतीय फिल्मों में समय के साथ नायक की सामाजिक पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। उनके अनुसार 1950 और 1960 के दशकों तक फिल्मों में नायक अक्सर मजदूर, किसान या किसी अन्य मेहनतकश वर्ग से आता था, जिससे श्रम और उत्पादन से जुड़े जीवन को सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व मिलता था।

इसके बाद 1970 और 1980 के दशकों में फिल्मों में नायक का चरित्र धीरे–धीरे मध्यवर्गीय पेशों–– जैसे सरकारी कर्मचारी, छोटे व्यापारी से आने लगा। 1990 के दशक के बाद नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के प्रभाव के साथ यह प्रवृत्ति और आगे बढ़ी, जहाँ फिल्मों का नायक अक्सर ऐसा व्यक्ति बन गया जिसका कोई स्पष्ट पेशा या उत्पादन प्रक्रिया से सम्बन्ध नहीं दिखाया जाता। दर्शकों के लिए यह बताना भी आवश्यक नहीं रह गया कि वह समाज में किस प्रकार के श्रम से जुड़ा हुआ है।

सन्तोष ने इस प्रवृत्ति को समाज में श्रम की गरिमा के क्षरण के संकेत के रूप में व्याख्यायित किया। उनके अनुसार यह परिवर्तन केवल सांस्कृतिक क्षेत्र की प्रवृत्ति नहीं है, बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक बदलावों से जुड़ा हुआ है। जब मजदूर आन्दोलनों की शक्ति कमजोर हो गयी और मजदूर वर्ग का राजनीतिक प्रभाव घट गया, तो उसका सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व भी कम होता चला गया। इससे साहित्य, सिनेमा और अन्य सांस्कृतिक माध्यमों में श्रम और मजदूर जीवन की उपस्थिति सीमित होती गयी।

इस दो दिवसीय चर्चा में यह बात उभरकर सामने आयी कि साहित्य सृजन, उसका प्रकाशन, वितरण और सांस्कृतिक कार्य मजदूर आन्दोलन में वर्गीय चेतना के निर्माण का महत्वपूर्ण जरिया हैं। मजदूरों के अनुभवों को कहानी, कविता, उपन्यास, लेख जैसे साहित्यिक रूप में व्यक्त करना, उन्हें व्यापक समाज तक पहुँचाना और श्रम की गरिमा को फिर से स्थापित करना जरूरी है। हमें इनको मजदूर आन्दोलन के दीर्घकालिक वैचारिक–सांगठनिक संघर्ष का अभिन्न अंग मानना चाहिए।

इसने साहित्य और मजदूर जीवन के बीच सम्बन्धों को फिर से स्थापित करने पर बल दिया। इसमें यह सहमति उभरी कि मजदूर जीवन के अनुभवों को साहित्य में स्थान देना और उसे समाज तक पहुँचाना एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक–राजनीतिक कार्यभार है। मजदूर आन्दोलनों, सामाजिक संघर्षों और साहित्यिक सृजन के बीच सक्रिय संवाद स्थापित किये बिना इस उद्देश्य को पूरा करना सम्भव नहीं होगा। इस दृष्टि से यह संगोष्ठी साहित्य और मजदूर आन्दोलन के बीच नये सहयोग और संवाद की सम्भावनाओं को विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के रूप में सामने आयी।

प्रस्तुति–– विक्रम प्रताप

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