अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

गोबर और गोमूत्र की भेंट चढ़ी शोध की रकम

गाय, गोबर और गोमूत्र हमारे देश में वैज्ञानिक शोधकार्यों की रकम डकारने का जरिया बन गये हैं। फरवरी 2019 में मोदी सरकार ने एक ‘राष्ट्रीय कामधेनु आयोग’ बनाया था। इसका काम गायों का ‘संरक्षण और संवर्धन’ करना बताया गया और इसके लिए 500 करोड़ रुपये का बजट दिया गया। घोषणा की गयी कि गोबर और गोमूत्र के बिजनेस स्टार्टअप शुरू करने वाले को शुरुआती लागत का 60 फीसदी सरकार देगी।

2020–21 में इस आयोग के दो कारनामे चर्चा में आये। पहला, गोबर चिप––  राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के अध्यक्ष ने एक गोबर की चिप लॉन्च की और दावा किया कि इससे मोबाइल का रेडिएशन रोकने में मदद मिलेगी। इसे वैज्ञानिक जामा पहनाने की कोशिश भी की गयी। दूसरा, गौ–विज्ञान परीक्षा–2021 में राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने यूजीसी को एक चिट्ठी लिखी। इसमें एक गौ–विज्ञान परीक्षा आयोजित कराने की बात की गयी थी। इस परीक्षा के लिए तैयार किये गये कोर्स में बताया गया था कि देशी गाय के दूध में सोना होता है, उसका गोबर रेडिएशन रोकने में सक्षम है, आदि। इस मूर्खतापूर्ण कृत्य का 600 से अधिक वैज्ञानिकों, यूनिवर्सिटी के प्रोफेसरों और छात्रों ने कड़ा विरोध किया। आखिरकार पशुपालन मंत्रालय ने कह दिया कि इस परीक्षा का कोई औचित्य नहीं है और परीक्षा रद्द हो गयी। लेकिन इस बेवकूफी के लिए दी गयी 500 करोड़ रुपये की मोटी रकम कहाँ गयी, इसका कुछ पता नहीं चला।

2020 में जब देश कोरोना महामारी से जूझ रहा था, कोरोना किट और ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी से लोग मर रहे थे, वैक्सीन पर शोध के लिए पैसा नहीं था, उसी समय, अप्रैल 2020 में ‘विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग’ ने एक योजना पर हस्ताक्षर किये थे। इस योजना का नाम सूत्र–पिक था। इसका उद्देश्य था देशी गाय के गोबर और गोमूत्र पर शोध करना। इसके लिए 98 करोड़ रुपये दिये गये। कोरोना के समय जब सरकार को देश के शोध संस्थानों को कोरोना से बचाव के उपायों पर शोध करने में लगाना चाहिए था, तब उन्हें गाय के गोबर और गोमूत्र में कौन सा रसायन है, यह ढूँढने के काम में लगा दिया गया। जब बताया गया कि इसके बारे में पहले से सारी जानकारी मौजूद है, तो गोबर और गोमूत्र से कैंसर का इलाज ढूँढने का काम दे दिया गया। नतीजे के तौर पर पता चला कि गोबर और गोमूत्र से फर्श लीपा जा सकता है। मान लिया गया कि 98 करोड़ रुपये पवित्र काम पर खर्च हुए हैं। इसी बहाने गोबर और गोमूत्र से बने कुछ सामानों पर विज्ञान का ठप्पा भी लगवा लिया गया।

साल 2020 में सौ से ज्यादा वैज्ञानिकों ने गाय के गोबर और मूत्र पर शोध करने में सरकारी फण्ड की बर्बादी का कड़ा विरोध करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग को चिट्ठी लिखी थी। उन्होंने यह सवाल भी पूछा था कि सिर्फ गाय को ही क्यों चुना गया, भैंस, बकरी या ऊँट आदि पशुओं के गोबर और मूत्र को शोध के लिए न चुनने का क्या कारण है? इसका कोई सटीक जवाब विभाग ने आज तक नहीं दिया है।

विरोध और ज्यादा बढ़ा, देश के 500 से ज्यादा वैज्ञानिकों ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा मूर्खता को वैज्ञानिकता का जामा पहनाने की कोशिश के खिलाफ कड़ी चिट्ठी लिखी और पौराणिक ग्रंथों का सम्मान करने के बजाय उन्हें वैज्ञानिक शोधकार्यों का बजट हजम करने का जरिया न बनाने की सलाह दी। सीधी बात थी, अगर विभाग आयुर्वेद ग्रंथों के आधार पर मान चुका है कि गाय का गोबर–मूत्र दवा हैं तो फिर शोध की क्या जरूरत है। और अगर नहीं मानता तो वैज्ञानिक आधार पर आयुर्वेद का खुला और लिखित खण्डन जारी करे। फिर गाय क्या, सभी पशु–पक्षियों के गोबर और मूत्र पर शोध करने के लिए सरकार चाहे तो देश के सारे वैज्ञानिकों को लगा दे।

हाल ही में द प्रिंट द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि गोबर–गोमूत्र पर शोध के कुल 10 प्रोजेक्ट मंजूर हुए थे जिनमें से दो प्रोजेक्ट आईआईटी बनारस, एक–एक प्रोजेक्ट आईआईटी, आइएसएम धनबाद, एक आईआईटी कानपुर को और बाकी नेशनल फॉरेंसिक साइंस यूनिवर्सिटी और आईसीएआर जैसे चोटी के संस्थानों को दिये गये थे। द प्रिंट ने आरटीआई के जरिये 98 करोड़ का हिसाब माँगा तो मंत्रालय ने कोई जवाब नहीं दिया। शायद वह भी गोमूत्र और गोबर की भेंट चढ़ गये। 

इसी साल अगस्त में कैग ने एक रिपोर्ट पेश की जिसमें शोध से जुड़ी एक–दो महत्वपूर्ण बातें सामने आयी। देश में चोटी की सीएसआईआर की 38 सरकारी प्रयोगशालाओं में कई सालों से देश की जनता के लिए नहीं, बल्कि कम्पनियों के लिए ठेके पर शोधकार्य करवाया जा रहा है। भारत अनुसंधान और विकास पर जीडीपी का एक फीसदी भी खर्च नहीं करता। जो थोड़ा–बहुत पैसा मिलता है वह भी गाय–गोबर के नाम पर अंधभक्तों में बाँट दिया जाता है। सरकार की विज्ञान–विरोधी नीतियों से तंग आकर पिछले 10 साल में देश के सैंकड़ों वैज्ञानिक देश छोड़कर जा चुके हैं, केवल इसरो से ही 70 से ज्यादा वैज्ञानिक देश छोड़ गये हैं।

––अंकुश ‘इंकलाबी’

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