दिल्ली के उत्तम नगर में दंगे की कोशिश नाकाम
बीते मार्च में दिल्ली के उत्तम नगर में दो परिवारों के बीच हुई झड़प को साम्प्रदायिक रंग देकर दंगा कराने की नाकामयाब कोशिश की गयी। दरअसल, दो परिवारों की पुरानी रंजिश के चलते होली पर विवाद बढ़ गया जिसमें एक युवक घायल हुआ जिसकी इलाज के दौरान मौत हो गयी थी। इस घटना में मरने वाला युवक हिन्दू था और जिससे उसकी लड़ाई हुई थी वह मुस्लिम था। इसी बात का फायदा उठाकर कुछ हिन्दुत्वादी संगठनों ने पूरे इलाके में यह खबर फैला दी कि होली पर रंग लगाने के चलते एक मुस्लिम ने हिन्दू की हत्या कर दी है। साम्प्रदायिक रंग देने के लिए बेताब मुख्यधारा की मीडिया ने इस खबर को खूब दिखाया। सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखकर मुस्लिम समुदाय के प्रति घृणा फैलाने का काम जोर–शोर से शुरू हो गया। इस तरह कुछ ही समय में इस झूठी और भ्रामक खबर को देशभर में फैला दिया गया।
दंगे के मकसद से इलाके में मुसलमानों के खिलाफ नफरती–भड़काऊ बयानबाजी शुरू कर दी गयी। ईद के दिन “खून की होली खेलने” जैसे नारे दिये गये और साम्प्रदायिक दंगे का माहौल बनाया गया। इतना ही नहीं, प्रशासन पर मुस्लिम आरोपियों के घरों पर बुलडोजर चलाने और उनका एनकाउंटर करने का दबाव बनाया जाने लगा। आरोपी युवक के घर पर बुलडोजर चलवा भी दिया गया। जब इसका विरोध हुआ, तो प्रशासन इसे अवैध निर्माण के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई बताने लगा। लेकिन सवाल यह उठा कि प्रशासन ने यह कार्रवाई विरोध प्रदर्शन में की गयी बुलडोजर की माँग के बाद ही क्यों की? क्या दिल्ली प्रशासन हिन्दुत्वादी संगठनों इशारे पर काम कर रही है?
इस साम्प्रदायिक–नफरती अभियान के खिलाफ जब कुछ प्रगतिशील लोगों ने जाँच की, तो साफ हो गया कि यह हिन्दू–मुस्लिम की नहीं, बल्कि दो परिवारों की पुरानी रंजिश थी। आखिर में समाजसेवी संगठनों और इलाके के इनसाफपसन्द लोगों की पहलकदमी के चलते दंगा टाल दिया गया। लेकिन झूठी खबर फैलाने और दंगे कराने की साजिश के लिए किसी भी हिन्दुत्वादी संगठन पर प्रशासन की तरफ से कोई कार्रवाई नहीं की गयी। झूठी और नफरती खबर के लिए किसी न्यूज चैनल ने माफी माँगना तो दूर, सही जानकारी सामने आने पर उसे प्रसारित तक नहीं किया।
पिछले कुछ सालों में इस तरह की अनेक घटनाएँ घटी हंै जिनमें हिन्दुत्ववादी संगठनों और खुद भाजपा शासित राज्य सरकारों द्वारा साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश की गयी है। उत्तर–प्रदेश और उत्तराखण्ड प्रशासन द्वारा काँवड़ यात्रा के दौरान दुकानों पर नाम प्लेट लगवाने का आदेश, हिन्दुत्ववादी संगठनों द्वारा दुकानों के नाम बदलवाना, छोटे मांस व्यापारियों को परेशान करना, उत्तराखण्ड के हर मन्दिर के पाँच किलोमीटर के दायरे में गैर हिन्दुओं का प्रवेश वर्जित करने की माँग, मस्जिदों के सामने भड़काऊ नारेबाजी करना और धर्म संसदांे का आयोजन कर उसमें मुस्लिमों के खात्मे जैसी बात करना, आदि इसी प्रायोजित साम्प्रदायिक माहौल बनाने का हिस्सा हैं। उत्तराखण्ड में वन–गुज्जर परिवारों को रुद्र सेना नामक संगठन से दस से ज्यादा जगहों पर जमीन खाली करने की धमकियाँ देने और मुस्लिम दुकानदारों से जबरन दुकान खाली करवाने की कोशिश में प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। जनता के विरोध के बाद ही उनकी कोशिशें नाकामयाब हुर्इं।
आज भाजपा सरकारें केवल इन उपद्रवियों को संरक्षण ही नहीं दे रहीं, बल्कि खुद भी सरकारी मशीनरी के साथ इस काम में लिप्त हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण मणिपुर है। ‘स्क्रॉल’ की खबर के अनुसार 2023 की ऑडियो रिकॉर्डिंग में वहाँ के तत्कालीन मुख्यमंत्री बीरेन सिंह खुद हिंसा कैसे और क्यों शुरू हुई, इसका श्रेय लेते सुने गये थे और वे एक समुदाय को प्रशासन के हथियारों को लूटने की हिदायत भी दे रहे थे। यह एक घटना बताती है कि कैसे सत्ता में बैठी भाजपा साम्प्रदायिक माहौल बना रही है।
न्यायपालिका में भी धार्मिक आधार पर फैसले सुनाने के मामले बढ़ते जा रहे हैं। 2024 की ‘द वायर’ की खबर के अनुसार इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ नारे पर सख्ती दिखाते हुए जमानत देने से इनकार किया और कहा कि अदालतों की उदारता से ऐसे मामले बढ़ते हैं। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने दाढ़ी खींचने के मामले को साम्प्रदायिक होने से मना कर दिया। सीएए के दौरान हुए दिल्ली दंगों में अभी तक 116 मामलों के फैसले आ चुके हैं जिनमें 97 मामलों में से कम से कम 93 में अदालतों ने प्रक्रियात्मक खामियों, दिल्ली पुलिस द्वारा साक्ष्यों–गवाहों के बयानों की सरासर हेराफेरी और झूठे गवाह और बयान तैयार किये जाने की ओर इशारा किया है। जहाँ न्यायालय को प्रशासन के खिलाफ सख्त कार्रवाई करनी थी, वहाँ सिर्फ फटकार भर से ही प्रशासन को छोड़ दिया गया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2020 में नफरती भाषण के 1,804 मामले दर्ज हुए, लेकिन ऐसे मामलों में सजा महज 20 फीसदी को हुई। ‘द एक्सप्रेस ट्रिब्यून’ के अनुसार 2023 में देशभर में नफरती भाषण के 668 मामले दर्ज हुए जो 2025 में करीब दो गुना बढ़कर 1,318 हो गये। इनमें से 88 प्रतिशत उन राज्यों/केन्द्र शासित प्रदेशों में हुए जहाँ भाजपा सीधे या गठबन्धन के जरिये सत्ता में है। भाजपा सरकारों और उनके समर्थित हिन्दुत्ववादी– प्रतिक्रियावादी संगठनों के तमाम भाषणों, गतिविधियों और फैसलों से यह साफ है कि साम्प्रदायिक माहौल को बढ़ाने में वे जी–जान से लगे हुए हैं।
साम्प्रदायिकता की आड़ में सरकार पिछले एक दशक से देशी–विदेशी धन्नासेठों के हित में जनविरोधी कानून लागू कर रही है। मजदूर विरोधी चार श्रम संहिताएँ, किसान विरोधी कानून, अमरीका के साथ व्यापार समझौता, जल–जंगल समेत बिजली और सरकारी संस्थानों का निजीकरण, जैसी जनविरोधी नीतियों के खिलाफ लोग विरोध–प्रर्दशन कर रहे हैं। इसे दबाने के लिए सरकार धार्मिक, साम्प्रदायिक, जातीय और क्षेत्रीय विभाजनों को बढ़ावा दे रही है। केरला स्टोरी, कश्मीर फाइल, धुरन्धर जैसी फिल्मों के जरिये प्रोपेगेण्डा फैलाकर लोगों को साम्प्रदायिक बनाया जा रहा है। हाल की कुछ घटनाएँ यह बता रही हैं कि लोग अब इनकी चाल समझने लगे हैं। कोटद्वार में इनके खिलाफ खड़ा होने वाला युवक दीपक हो या फिर दुकानों पर नाम प्लेट बदलवाने और पार्कों में लव जिहाद के नाम पर मॉरल पुलिसिंग के खिलाफ आम जनता की प्रतिक्रियाएँ इसका सबूत हैं। वह दिन दूर नहीं जब इनके मुँह पर कालिख पुतेगी और इनके मंसूबों का जनाजा निकलेगा।
–– विकास खतौली
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