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संपादकीय
बर्बरों का इन्तजार
कवि सी. पी. कवाफी की एक कविता का शीर्षक है– बर्बरों का इन्तजार।
कविता रोम के आर्थिक–राजनीतिक–सामाजिक–सांस्कृतिक–सामरिक– सम्पूर्ण पतन के काल से सम्बन्धित है। कुलीन रोमनों के पास रोम को आगे ले जाने के लिए कोई कार्यसूची नहीं थी। उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था। वे किंकर्त्तव्यविमूढ़ थे कि क्या करें ? भोग–विलासिता, अकर्मण्यता, सब कुछ अपनी सीमा पार कर चुके थे। ऐसे ही एक समय का चित्रण करती है यह कविता।
कवि कवाफी लिखता है कि इस संकट के समाधान के लिए रोम के कुलीनतन्त्र के राजनीतिक रहनुमा यूरोप से बर्बरों के आने की मनोकामना कर रहे थे। रोम नगर की बाहरी प्राचीर के मुख्य द्वार पर उनका इन्तजार किया जा रहा था। जब काफी इन्तजार के बाद भी बर्बर नहीं आये तो उनके हाथ–पाँव फूलने लगे कि अब क्या होगा, वे (बर्बर) नहीं आये।
जब कोई सामाजिक व्यवस्था अपनी ऊर्जा खो चुकी होती है, मृतप्राय हो जाती है और उसे आगे जाने का कोई रास्ता नहीं सूझता तो वह बर्बरों का इन्तजार करती है।
बर्बर आये
नीचे लिखी कहानी में बर्बर आये और समस्या का समाधान हो गया। इस कहानी में एक देश के शासक वर्ग और राजनीतिक रहनुमा एक ऐसे मुकाम पर पहुँच जाते हैं कि... आगे पढ़ें