मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

सट्टेबाजी और ऑनलाइन धोखाधड़ी को बढ़ावा देने में शासन–प्रशासन की भूमिका

बे–खुदी बे–सबब नहीं ‘गालिब’

कुछ तो है जिस की पर्दा–दारी है।

आज भारत में सट्टेबाजी, ऑनलाइन ट्रेडिंग फ्रॉड, फर्जी इन्वेस्टमेंट ऐप्स, टेलीग्राम–व्हाट्सऐप “टिप्स ग्रुप” और डिजिटल ठगी का जो विस्फोट दिखायी देता है, उसे केवल कुछ अपराधियों की चालाकी कहकर टाला नहीं जा सकता। यह मौजूदा व्यवस्था की पूरी विफलता का नतीजा है, जिसमें सरकार, नियामक संस्थाएँ, डिजिटल कम्पनियाँ और वित्तीय ढाँचा–– सब किसी–न–किसी रूप में जिम्मेदार हैं। सरकार कई सालों से यह दावा कर रही है कि वह “डिजिटल इण्डिया” बना रही है, लेकिन उसकी असलियत यह है कि उसी “डिजिटल इण्डिया” में करोड़ों लोग असुरक्षित छोड़ दिये गये हैं। किसी की मेहनत की कमाई लूट ली जा रही तो किसी की इज्जत से खिलवाड़ किया जा रहा है। इतना ही नहीं,  आन्दोलन में शामिल मजदूरों और उनके नेताओं के खिलाफ शासन–प्रशासन झूठे मुकदमे लाद रहा है, ऑनलाइन धोखाधड़ी करके सबूत जुटा रहा है। देश की जनता का डाटा और उसकी पहचान को सरेआम नीलाम कर दिया गया है।

सबसे पहली बात यह है कि सरकार ने डिजिटल वित्तीय क्षेत्र का विस्तार तो बहुत तेजी से किया, लेकिन उसके साथ सुरक्षा, निगरानी और जन–सुरक्षा का कोई तन्त्र विकसित नहीं किया। यूपीआई, ऑनलाइन ट्रेडिंग, इंस्टैंट लोन, मोबाइल वॉलेट और डिजिटल निवेश प्लेटफॉर्म को देशभर में आक्रामक तरीके से फैलाया गया। लोगों को कैशलेस अर्थव्यवस्था की ओर धकेला गया। लेकिन आज वही डिजिटल ढाँचा सट्टेबाजी, ठगी और आर्थिक अपराध का जरिया बन गया है, ऐसे में सरकार पूरी तरह असहाय दिखायी दे रही है। इसका अर्थ यह है कि सरकार ने बाजार विस्तार में रुचि दिखाई, लेकिन नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता नहीं दी। इस क्षेत्र में सरकार का फिसड्डीपना कहीं उसकी ओढ़ी हुई असफलता तो नहीं है, जिसकी आड़ में अपने चहेतों के स्वार्थ पूरे किये जा सकें।

सट्टेबाजी और फर्जी निवेश का पूरा कारोबार “तेज मुनाफा” और “रातों–रात अमीर बनने” की मानसिकता पर टिका होता है। यह मानसिकता कोई अचानक पैदा नहीं हुई। पिछले वर्षों में सरकार और कॉर्पाेरेट मीडिया ने लगातार शेयर बाजार, ऑनलाइन ट्रेडिंग और “इन्वेस्टमेंट कल्चर” को सफलता के मॉडल के रूप में प्रचारित किया। टीवी चैनलों पर दिनभर शेयर बाजार के “विशेषज्ञ” दिखायी देते हैं। सोशल मीडिया पर ट्रेडिंग ऐप्स के विज्ञापन युवाओं को यह सस्ता नशा बेचते हैं कि नौकरी या उत्पादन से नहीं, बल्कि मोबाइल स्क्रीन पर बटन दबाकर पैसा कमाया जा सकता है। सरकार इस पतनशील–परजीवी संस्कृति को रोकने के बजाय उसे आर्थिक विकास और “फाइनेंशियल इन्क्लूजन” का हिस्सा बताती रही है।

पतनशील–परजीवी संस्कृति के प्रचार–प्रसार में विज्ञापनों की भूमिका पर ध्यान देना जरूरी है। क्रिकेट मैचों, आईपीएल, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और टीवी पर लगातार ट्रेडिंग ऐप्स, फैंटेसी गेमिंग प्लेटफॉर्म और “इन्वेस्टमेंट” ऐप्स के विज्ञापन चलते रहे हैं। इन विज्ञापनों की भाषा अक्सर “जल्दी अमीर बनो”, “स्मार्ट कमाई”, “ट्रेड करो और जीतों” जैसी होती है। यह भाषा निवेश को दीर्घकालीन आर्थिक योजना के बजाय रोमांच और तेज लाभ के खेल के रूप में पेश करती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म कम्पनियों की भूमिका भी बेहद संदिग्ध है। फेसबुक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम और गूगल पर फर्जी ट्रेडिंग ऐप्स और निवेश योजनाओं के विज्ञापन खुलेआम चलते हैं। लाखों मासूम लोग लालच में फँसकर इन्हीं विज्ञापनों के जरिये ठगी का शिकार बनते हैं। लेकिन सरकार इन कम्पनियों पर कठोर कार्रवाई से लगातार बचती रही है। जनता की सुरक्षा से ज्यादा महत्व कॉर्पाेरेट हितों को दिया जाता है।

हम जानते हैं कि आज सट्टेबाजी और निवेश के बीच की रेखा धुँधली हो गयी है। जब हर तरफ “जल्दी पैसा कमाओ” का माहौल बनाकर लोगों को लालची बनाया जाएगा, तो स्वाभाविक है कि लाखों लोग जोखिम और भ्रम के जाल में फँसेंगे। सरकार इस संस्कृति को नियंत्रित करने के बजाय उसे बढ़ावा और वैधता देती है, क्योंकि इससे बाजार में पैसा घूमता है, ट्रेडिंग कम्पनियों का कारोबार बढ़ता है, टैक्स आता है और डिजिटल अर्थव्यवस्था के आँकड़े चमकते हैं।

इन गतिविधियों से सरकार की कमाई होती है। शेयर बाजार के कारोबार पर प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी), ब्रोकरेज कम्पनियों से टैक्स, डिजिटल प्लेटफॉर्म्स से जीएसटी और कॉर्पाेरेट टैक्स–– ये सभी सरकार की आय का हिस्सा बनते हैं। जितना बड़ा कारोबार, लेनदेन आधारित सरकारी आय में उतना ही बढ़ोतरी। इसलिए सरकार इस पूरे गिरोह को बढ़ावा देती रही है।

कोरोना महामारी के बाद लाखों नये “रिटेल इन्वेस्टर्स” बाजार में आये। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) और विभिन्न स्टॉक एक्सचेंजों के आँकड़े बताते हैं कि डीमैट खातों की संख्या कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ी। सरकार और मीडिया ने इसे “आर्थिक लोकतंत्रीकरण” और “वित्तीय भागीदारी” की सफलता बताया। लेकिन इसी दौरान इंट्राडे ट्रेडिंग, ऑप्शंस और फ्यूचर्स ट्रेडिंग जो भविष्य के उत्पादन पर सट्टेबाजी के उपकरण हैं, इन अत्यधिक जोखिमपूर्ण क्षेत्रों में छोटे निवेशकों की भागीदारी विस्फोटक रूप से बढ़ी है।

खुद सेबी के एक अध्ययन में सामने आया कि फ्यूचर्स और ऑप्शंस ट्रेडिंग करने वाले अधिकांश छोटे निवेशकों को भारी नुकसान हुआ है। सेबी ने 2024 में जारी विश्लेषण में कहा था कि व्यक्तिगत डेरिवेटिव ट्रेडर्स का बहुत बड़ा हिस्सा घाटे में रहता है, जबकि कुछ बड़ी संस्थाएँ और पेशेवर खिलाड़ी अकूत लाभ कमाते हैं। इसका मतलब यह है कि जिसको आम जनता के बीच “कमाई का मौका” बताकर प्रचारित किया गया, वह व्यवहार में बड़े पैमाने पर उनके लिए नुकसान का खेल साबित हुआ है। इस नुकसान के चलते लाखों परिवार बरबाद हो गये हैं। सैकड़ों लोगों ने आत्महत्या कर ली।

सरकार अक्सर कहती है कि “लोगों को जागरूक होना चाहिए।” लेकिन यह तर्क अपनी जिम्मेदारी से बचने का तरीका है। अगर कोई व्यक्ति सड़क पर लूट लिया जाये, तो क्या राज्य यह कहकर मुक्त हो सकता है कि “सावधान रहना चाहिए था”? फिर डिजिटल ठगी में यही तर्क क्यों दिया जाता है? सरकार का काम केवल सलाह देना नहीं, बल्कि सुरक्षा तंत्र बनाना भी है। लेकिन यहाँ स्थिति यह है कि थाने और साइबर सेल में शिकायत दर्ज कराने तक में पीड़ितों को अपमान और टालमटोल का सामना करना पड़ता है।

साइबर सेल और पुलिस का रवैया इस संकट को और गहरा करता है। अधिकांश राज्यों में साइबर अपराध की जाँच के लिए पर्याप्त तकनीकी क्षमता, प्रशिक्षित स्टाफ और आधुनिक उपकरण ही नहीं हैं। अपराधी वीपीएन, क्रिप्टोकरेंसी, विदेशी सर्वर और फर्जी खातों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि पुलिस अब भी पारम्परिक तरीकों से काम कर रही होती है। नतीजा यह होता है कि ठगी का पैसा कुछ घंटों में देश से बाहर निकल जाता है और पीड़ित केवल एफआईआर की कॉपी लेकर घूमता रह जाता है।

नियमन की स्थिति और भी गम्भीर है। भारत में कोई भी व्यक्ति सोशल मीडिया पर खुद को “स्टॉक एक्सपर्ट”, “क्रिप्टो गुरु” या “इन्वेस्टमेंट एडवाइजर” घोषित कर सकता है। हजारों टेलीग्राम चैनल, यूट्यूब लाइव स्ट्रीम और व्हाट्सऐप ग्रुप रोज बनते हैं, जहाँ लोगों को “इनसाइड टिप्स” और “गारंटीड रिटर्न” का लालच दिया जाता है। सवाल यह है कि अगर सरकार करोड़ों लोगों की सोशल मीडिया गतिविधियों पर निगरानी रखने का दावा करती है, तो ऐसे खुलेआम चल रहे फ्रॉड नेटवर्क उसे क्यों नहीं दिखायी देते?

वास्तविकता यह है कि सरकार आम नागरिकों की राजनीतिक गतिविधियों, अभिव्यक्ति और विरोध पर तो बहुत निगरानी रखती है, लेकिन वित्तीय ठगी के संगठित नेटवर्क पर कार्रवाई करते हुए उसे लकवा मार जाता है। इससे यह स्पष्ट है कि सरकार की प्राथमिकताएँ नागरिकों की सुरक्षा नहीं, बल्कि उन पर राजनीतिक नियंत्रण कायम करना हैं। यह फासीवाद और तानाशाही के ही लक्षण हैं।

सट्टेबाजी को बढ़ावा देने में सरकार की भूमिका एक और स्तर पर दिखायी देती है–– आर्थिक नीतियों के जरिये। बेरोजगारी, महँगाई और अस्थिर आय के दौर में बड़ी संख्या में युवा तेज कमाई के रास्ते खोजते हैं। जब अर्थव्यवस्था पर्याप्त स्थायी रोजगार पैदा नहीं कर पाती, तब ट्रेडिंग, ऑनलाइन बेटिंग और सट्टेबाजी का झूठा विकल्प पेश किये जाते हैं। सरकार रोजगार संकट का समाधान नहीं करती, लेकिन दूसरी ओर ऐसे डिजिटल बाजारों को खुला छोड़ देती है जहाँ लोग अपनी बचत और उ/ाार या कर्ज ली गयी रकमतक गँवा देते हैं।

इस पूरी व्यवस्था में सबसे खतरनाक बात यह है कि पीड़ित व्यक्ति लगभग अकेला छोड़ दिया जाता है। बैंक जिम्मेदारी नहीं लेते, डिजीटल प्लेटफॉर्म का इससे कोई मतलब नहीं, पुलिस टालमटोल करती है और सरकार “जागरूकता अभियान” चलाकर अपना कर्तव्य पूरा मान लेती है। लाखों लोग जीवनभर की कमाई खो देते हैं, लाखों कर्ज के चक्रव्यूह में फंस जाते हैं लेकिन उनके लिए कोई मजबूत मुआवजा प्रणाली, बीमा सुरक्षा या त्वरित रिकवरी तंत्र मौजूद नहीं है।

इसलिए समस्या केवल कुछ ऑनलाइन ठगों की नहीं है। समस्या उस पूरे आर्थिक–राजनीतिक ढाँचे की है जिसने सट्टेबाजी, लालच और अनियंत्रित डिजिटल बाजार को सब तक पहुँचा दिया है। इसलिए इस ढाँचे को बदले बिना कोई सुधार नहीं हो सकता।

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