अधूरी पेंटिंग की उल्टी गिनती
हवा गर्म और उदास है, मानो धरती ने अपनी सारी गर्मी समेट ली हो और उसे दिल्ली के वायुमण्डल में बिखेर दिया हो। आसमान का रंग धुँधला और बोझिल है। सूरज की तेज रश्मियाँ, सड़कों पर लपलपाती ताप की लहरों की तरह चुभ रही हैं। इमारतों के ऊपर से उड़ते धुएँ और गैस के बादल, जो हवा में फैलकर हर दिशा में अपनी छाया बना रहे हैं, उस घुटन को और भी बढ़ाते हैं। गाड़ियों की हॉर्न और इंजन की आवाजें इस भारी सन्नाटे को चीरने की कोशिश करती हैं, लेकिन वह भी सिर्फ एक और शोर की परत में दब जाती हैं। हवा में घुला हुआ जहर हर साँस के साथ घुटन को और बढ़ा देता है।
दिलशाद गार्डन के एक छोटे से फ्लैट में बियाबान सन्नाटा पसरा हुआ है। आसपास के सभी लोग अपने–अपने कामों में व्यस्त हैं, लेकिन उस फ्लैट के एक कमरे में अजीब सी खामोशी है। जो आवाजें कभी गूँजती थीं–– हँसी की, बातें करने की–– वह अब खो चुकी हैं। फ्लैट से उठने वाली दुर्गंध ने धीरे–धीरे सबका ध्यान खींच लिया। सबकी फुसफुसाहट किसी गहरी गवाही की तरह है। किसी को भी यह अनुमान लगाने में दिक्कत नहीं हुई कि वह शरीर के सड़ने की भारी बदबू है।
जिन पेड़ों से कभी ठण्डी हवाएँ आती थीं, आज वे भी लू से बेजान खड़े हैं। दुकानदार सड़क के किनारे पानी के छिड़काव से थोड़ी राहत पाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह राहत भी क्षणिक है। हर तरफ आपाधापी है, रफ्तार से चलने वालों के चेहरे पर हल्की सी थकान और घबराहट छाई हुई है, जैसे हवा में फैले जहर ने उनके भीतर की ऊर्जा को धीरे–धीरे सोख लिया हो। आखिरकार, फ्लैट वालों ने पुलिस को बुला लिया। पुलिस ने दरवाजा खोला, तो एक और अँधेरे की कहानी सामने आयी।
रमेश, जो कभी अपने पिता के नक्शे–कदम पर चलने का सपना देखता था, एक निजी कम्पनी में काम करता था। और पिंकी, जो एमबीए की पढ़ाई कर रही थी, वह भी किसी और ही दुनिया में खो चुकी थी। वे अक्सर जिन्दगी, अस्तित्व और सपनों के बारे में बातें करने लगे थे।
रमेश ने एक दिन पिंकी से कहा था, “हम कहाँ से चले थे, कहाँ पहुँच गये हैं? कभी–कभी लगता है जिन्दगी बड़ी बेमानी हो गयी है।”
पिंकी ने जवाब दिया था, “ भैया शायद आप ठीक कह रहे हैं। सफलता के पीछे भागते–भागते आज हमारी जिन्दगी किसी कटी पतंग की तरह हो गयी है जिसका कोई ठौर–ठिकाना नहीं है।”
रमेश ने बहुत चिन्तनशील मुद्रा में कहा, “हमारे पास कोई बड़ा काम नहीं है जिससे समाज में हमारी कोई पहचान बने। हम शहर की भीड़ में खो गये लगते हैं। अपनी पहचान तलाशते हम उस घुड़दौड़ में शामिल हो गये हैं जिसका नाम प्रतियोगिता है।”
पिंकी बोली, “अब तो कॉलेज जाना, कोर्स का नोट बनाना, एक्जाम देना और प्रेजेंटेशन देना, यही जिन्दगी बन गयी है।”
रमेश ने हामी भरते हुए कहा, “हम कहीं घूमने भी नहीं जा पा रहे हैं। बॉस छुट्टी नहीं देता, छुट्टी मिल भी जाये तो पैसे की तंगी रहती है। अगर पहाड़ों में सैर के लिए चले जायें तो इस मनहूस जिन्दगी से कुछ दिन के लिए छुटकारा मिले।”
घूमने के बारे में सुनकर पिंकी की आँखों में चमक आ गयी, “बोली, कब चल रहे हैं घूमने? दिन–रात मोबाइल और इंटरनेट में घुसे रहने से जिन्दगी मनहूस बन गयी है।”
रमेश ने मजाकिया अन्दाज में कहा, “शादी क्यों नहीं कर लेती? बाल–बच्चे होंगे, मन लगा रहेगा।”
“न बाबा, दहेज हत्याओं की खबरे पढ़कर दिल दहल जाता है। मैं सबसे पहले अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूँ। तुम क्यों नहीं करते शादी?”
“घर का खर्चा चलाने भर का कमाऊँ, तब तो शादी करूँ, तुम्हारी पढ़ाई भी तो देखनी है।”
“तो––– मैं तुम्हारे ऊपर बोझ बन गयी हूँ?”
“नहीं, पगली, ऐसा मैंने कब कहा? तू मेरी सबसे प्यारी बहन है। तू जब तक साथ है मुझे किसी की जरूरत नहीं है।”
इसी तरह दोनों भाई–बहन एक दूसरे का सहारा बनते, एक–दूसरे से झगड़ते और मजाक में दिन काटते, लेकिन उन्हें इसका आभास नहीं था कि वे धीरे–धीरे बन्द गली की तरफ बढ़ रहे हैं जिससे वापसी का कोई रास्ता नहीं है।
रमेश और पिंकी की उम्र ज्यादा नहीं थी, अब वे हमेशा के लिए खामोश हो गये हैं। इसने समाज की उस घुटन को उजागर किया, जिसे हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। एक वक्त था जब रमेश अपने पिता से उनके सैन्य जीवन की कहानियाँ सुना करता था और पिंकी अपनी माँ के साथ जीवन के छोटी–छोटी खुशियों के पल बिताती थी। लेकिन धीरे–धीरे, समय ने उन खुशियों को छीन लिया। माता–पिता की मृत्यु ने उन्हें एकदम अकेला छोड़ दिया। उनके पास कुछ नहीं बचा था सिवाय गाँव की कुछ जमीन और पुराने घर के। उन्हें इस बात का एहसास था कि छोटी खेती से उनकी जिन्दगी नहीं काटने वाली। इसलिए वे शहर आ गये नौकरी करने। लेकिन वहाँ भी उन्हें जानलेवा फ्लैट मिला और टूटती उम्मीदों का सिलसिला। उनका जीवन रेत के ढेर की तरह बिखरने लगा था। रिश्तेदारों से किसी तरह का कोई सम्पर्क नहीं था। शहर में वे दोनों अकेले थे, अजजबी थे, बेमकसद और बेमंजिल। मानो इस समाज ने उन्हें ठुकरा दिया हो।
आखिरी दिन उनके बीच ऐसी बातें हुर्इं जो सचमुच डरावनी थीं। कमरे में हल्का अँधेरा था। पंखा चल रहा था। उमस इतनी कि हवा नहीं लगती थी। मेज पर अधखुली किताब और चाय का कप रखा हुआ था। मोबाइल की स्क्रीन के सामने चुप्पी थी। दीवार पर पिंकी की बनायी अधूरी पेंटिंग टंगी थी। उस पर अंकित थे–– अँधेरी घाटी, बिना चेहरों की भीड़, लाल रंग की छाया––––
पिंकी ने धीरे से कहा, “भैया––– कभी–कभी लगता है जैसे हम जिन्दा नहीं, बस चल रहे हैं। जैसे घड़ी की सूइयाँ––– टिक–टिक, पर बेवजह।”
खिड़की से बाहर देखते हुए रमेश ने जवाब दिया, “हाँ। जैसे कोई पुरानी मशीन चल रही है, सिर्फ इसलिए क्योंकि प्लग अभी खींचा नहीं गया है।”
“क्या तुम कभी सोचते हो कि हम असल में क्या करना चाहते थे? मतलब––– अगर पैसा, नौकरी, डिग्री कुछ न होता, तो क्या करते?”
हँसी की एक हल्की परत के नीचे दुख छुपाते हुए रमेश बोला, “शायद––– गाँव में छोटा सा स्कूल खोलता। बच्चों को पढ़ाता। माँ जैसे कहती थी न, ‘लोगों की जिन्दगी में कुछ रोशनी लाओ।’”
“मुझे पेंटिंग करना पसन्द था, भैया। याद है? माँ कहती थी, मेरी तस्वीरों में रंगों से ज्यादा सवाल होते हैं। अब तो जैसे वो रंग भी मुझसे डरते हैं–––”
“अब कोई रंग नहीं रहा, पिंकी। बस ईएमआई की तारीखें हैं। बिल हैं। और एक थकान है––– जो न पीठ पर है, न पैरों में––– सिर में है और आत्मा में।” दोनों कुछ देर चुप रहे।
गहरी चुप्पी के बाद पिंकी बोल उठी, “कभी लगता है––– हम खुद को जितनी बार देख रहे हैं, उतनी बार कोई और हमें देख रहा है। जैसे हमें कोई इनसान नहीं, एक ‘प्रोफाइल’ की तरह पढ़ रहा हो।”
“हम अब ‘हम’ नहीं हैं। हम बस वे हैं जो दिखते हैं–– नौकरी, डिग्री, सामान––– अन्दर कुछ हो भी तो वो दिखता कहाँ है?”
पिंकी ने धीरे से पूछा, “तुम कभी रोते हो भैया?”
“नहीं––– लेकिन अब आँखों में पानी जमा हो गया है। बहता नहीं।”
“मुझे डर लगता है, भैया। किसी दिन सब बन्द हो जाएगा–– फोन, इंटरनेट, पैसा––– और फिर मुझे कोई भी पहचान नहीं पाएगा।”
प्यार और मासूमियत से उसकी तरफ देखते हुए रमेश ने कहा, “तुम्हारी पहचान मैं हूँ। और मेरी––– शायद तुम हो। लेकिन क्या हम दो अधूरे लोग मिलकर एक पूरा बन सकते हैं?”
पिंकी ने धीरे से मुस्कुराकर कहा, “नहीं, शायद नहीं। लेकिन साथ मरना, अकेले जीने से थोड़ा कम डरावना लगता है।”
कमरे में चुप्पी थी। बाहर ट्रैफिक का शोर और दूर किसी टीवी की आवाज सुनाई दे रही थी।
दोनों का दर्द एक था, जो हमेशा चुप था–– वे कभी अपनी भावना को किसी से साझा नहीं करते थे। सफलता की अंधी दौड़ ने उन्हें अकेला कर दिया था। उनका जीवन एक दुश्चक्र में फँस गया था। उसका एक किनारा लुप्त होती पहचान थी, जिसे वे अमेजन और फ्लिपकार्ट से खरीदारी के जरिये फिर से पाने की कोशिश कर रहे थे।
माँ–बाप के जाने के बाद उनका समाज से जुड़ाव कम होता गया। गाँव से भेजे गये शादी के कार्ड का जवाब नहीं दिया। रिश्तेदारों से सम्बन्ध धीरे–धीरे किसी पुराने, भुला दिये गये फोटो की तरह धुँधला हो गया। किराया भी डेढ़ महीने से नहीं दिया गया था। न उनके घर में कोई आता था, न वे किसी के पास जाते। उनका अकेलापन धीरे–धीरे उस कमरे की दीवारों पर जमी धूल की तरह गहराता गया। ये सब संकेत थे कि वे दोनों मानसिक और आर्थिक रूप से टूट चुके थे। और इस सबका कारण था समाज का वह दबाव जो सिर्फ सफलता की चाह रखता है। उन्हें जरा सा भी यह भान नहीं था कि जिस समाज के सामने वे अपनी सफलता को दिखाना चाहते हैं, वह खुद ही आत्मघाती हो गया है और तिल–तिल कर मर रहा है।
यह केवल दो लोगों के अन्त की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस पूरी व्यवस्था का स्याह पहलू है, जिसने इनसानियत को ‘माल’ बना दिया है। पिंकी की डायरी के एक पन्ने पर लिखा था, “मैं हर दिन कुछ खरीदती हूँ, शायद इसलिए कि मैं खुद को खोती जा रही हूँ। और जो लोग हमें देखते हैं, उन्हें केवल हमारी चीजें दिखती हैं–– हम नहीं।”
इस व्यवस्था ने हमें इस हद तक तोड़ दिया है कि हम अपने रिश्तों को, अपनी भावनाओं को, सबकुछ बाजार में तब्दील कर चुके हैं। उस जीवन की क्या कीमत, जिसमें सिर्फ संख्या और पैसे का खेल हो और किसी के मन का दर्द न देखा जाये?
तीन दिन से फ्लैट से बाहर नहीं निकलने का मतलब है कि वे उस अँधेरे में, उस गहरी खामोशी में जी रहे थे, जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। न किसी से मदद की उम्मीद, न किसी से बात करने का साहस। और अन्त में, जब उनके शरीर की दुर्गंध पूरे इलाके में फैलने लगी, तो पुलिस को सूचित किया गया। आज उनका दुख, उनका अकेलापन पूरी दुनिया को महसूस हो रहा है, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी है।
पुलिस फ्लैट में दाखिल हुई। दरवाजा खोलते ही भीतर फैली बदबू उनके चेहरे पर खिंच गयी। बिजली चालू है, मगर बल्ब पीला–सा टिमटिमा रहा है, जैसे वह खुद यह दृश्य देखना नहीं चाहता। कमरे के एक कोने में दो इनसानी जिस्म पड़े हैं। शान्त, चुप, मानो किसी पुराने फोटो एल्बम के अन्दर कैद। सबसे पहले, पुलिस अधिकारी ने दीवार पर टंगी वह अधूरी पेंटिंग देखी। रंगों से टपकता था बियाबान, एक अँधेरी गली, जिसमें एक धुँधली भयावह आकृति बैठी है–– बिना चेहरा, बिना आँखों के। उसके ठीक ऊपर लाल रंग से कुछ आकृतियाँ उभरी हैं, जो किसी समय की उलटी गिनती–सी लगती हैं–– 7–––6–––5–––4–––3–––2–––1–––
पुलिस जब कमरे की तलाशी लेती है, तो पिंकी की मेज की दराज में एक बँधी हुई डायरी मिलती है। आखिरी पृष्ठ पर लिखा है, “कल रात हमने तय किया––– यह दुनिया हमें नहीं समझेगी। हमने कई बार मदद माँगी, कभी शब्दों से, कभी चुप्पी से। अब ये आखिरी शब्द हैं –– अगर कोई इन्हें पढ़े, तो जान ले, हम टूटी चीजें नहीं थे––– बस किसी ने हमें अपने साथ जोड़ने की कोशिश नहीं की।”
पुलिस को जो मोबाइल मिले, उसे जाँचने के लिए भेज दिया गया। वह शायद एक और सुराग होगा, लेकिन क्या वह हमें समझा सकेगा कि उनका असली दर्द क्या था? क्या वे सिर्फ अवसाद और अकेलेपन के कारण इस हद तक पहुँच गये थे, या फिर समाज का वो खौफनाक पहलू भी सामने आएगा, जिसने उन्हें यह कदम उठाने पर मजबूर किया था? पुलिस जब मोबाइल डेटा रिकवर करती है, तो दिखता है कि आत्महत्या से एक घंटे पहले पिंकी ने “काउंसलिंग फॉर द दिप्रेशन नियर मी” सर्च किया था। और रमेश ने एक अनुत्तरित कॉल गाँव के चचेरे भाई को किया था।
पुलिस कुछ दिन बाद दुबारा फ्लैट में दाखिल हुई। उसने देखा, बाहर शाम उतर चुकी है। परदे हिल रहे हैं और पिंकी की पेंटिंग की छाया फर्श पर धीरे–धीरे लम्बी होती जा रही है––– पुलिस अधिकारी ने लम्बी साँस ली। फ्लैट की खिड़की से छनती शाम की रोशनी अब फीकी हो चली है। बाहर की दुनिया फिर से अपनी गति में लौट रही है–– सड़कें शोर मचा रही हैं, ऑफिस ओवरटाइम में सिसक रहे हैं, पर इस छोटे से कमरे में समय कहीं ठहर गया है। और वहाँ––– अब बस एक अधूरी कविता रह गयी है।
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