लद्दाख आन्दोलन और सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी
कुछ महीने पहले, लद्दाख आन्दोलन के दौरान भड़की हिंसा के बाद सोनम वांगचुक को गिरफ्तार कर लिया गया। यह एक चांैकाने वाली घटना थी क्योंकि एक ऐसा व्यक्ति जो शान्तिपूर्ण आन्दोलन और उपवास के जरिये अपनी माँग रख रहा था उसे अचानक उठाकर हिरासत में ले लिया गया, इससे यह संदेश तो गया ही कि सरकार आन्दोलनकारियों से बातचीत के बजाय दमन का रास्ता चुन रही है, साथ ही यह भी कि एक समय मोदी की तारीफ करने वाले वांगचुक जैसे लोगों को भी बख्शा नहीं जायेगा।
इस साल लद्दाख में पूर्ण राज्य की माँग का आन्दोलन फिर से जोर पकड़ने लगा। यह कोई अचानक फूटा भवनात्मक आक्रोश नहीं था, बल्कि यह उस गहरे असन्तोष का नतीजा था जो 2019 में अनुच्छेद 370 हटाये जाने और जम्मू–कश्मीर को तोड़कर लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बनाने के बाद लगातार पनप रहा है। केन्द्र सरकार ने इसे विकास और आधुनिकता का रास्ता बताकर पेश किया था, लेकिन हकीकत यह है कि लद्दाख की जनता अपने राजनीतिक अधिकारों से वंचित हो गयी। न विधानसभा, न प्रतिनिधित्व, न ही अपने संसाधनों पर नियंत्रण–– यह सब लद्दाखी समाज के लिए सीधी ठगी साबित हुआ।
अब जो आन्दोलन उठ खड़ा हुआ है, उसकी जड़ें गहरी हैं। लद्दाख में लोग यह भलीभाँति देख रहे हैं कि बिना पूर्ण राज्य के दर्जे के, उनकी जमीन, पानी और प्राकृतिक सम्पदा सीधा–सीधा कॉरपोरेट घरानों की लूट के लिए खोल दी गयी है। उदाहरण के लिए, अडानी समूह और अम्बानी समूह जैसे बड़े पूँजीपति लद्दाख के सौर ऊर्जा संसाधनों पर नजर गड़ाये हुए हैं। “ग्रीन एनर्जी हब” बनाने की बात सुनने में आकर्षक लग सकती है, लेकिन यह दरअसल वहाँ की जमीन को कॉरपोरेटों को सौंपने की एक चाल है। स्थानीय चरवाहा समुदाय, जिनकी पीढ़ियाँ खानाबदोश जीवन जीते हुए चरागाहों पर निर्भर रही हैं, उनकी जमीनें जबरन छीनी जा रही हैं।
‘डाउन टू अर्थ’ में रिपोर्ट छपी है–– ‘भारत की सबसे बड़ी सौर ऊर्जा परियोजना लद्दाख के खानाबदोशों और पश्मीना ऊन के लिए कैसे खतरा बन रही है ?’ इसमें बताया गया है कि पूर्वी लद्दाख (स्कयांग–चू–थांग क्षेत्र) में एक बड़ा सोलर पार्क परियोजना प्रस्तावित है, जिसके लिए लगभग 48,000 एकड़ चरागाह भूमि भारतीय सौर ऊर्जा निगम लिमिटेड (एसईसीआई) को हस्तान्तरित करने का समझौता हो चुका है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि लगभग 250 परिवारों को समद–रोकचन और 50 परिवारों को खरनाक में अपनी आजीविका पर प्रभाव होने की आशंका है। उन लोगों का कहना है कि उन्हें इस भूमि हस्तान्तरण के दस्तावेज नहीं दिखाये गये हैं और निर्णय “दरवाजों के पीछे” लिये जा रहे हैं।
केन्द्र शासित लद्दाख सरकार ने दावा किया है कि पेंग इलाके में एक पायलट सोलर परियोजना बनायी जाएगी जो चरवाहों के लिए अनुकूल होगीय सोलर पैनलों की ऊँचाई इस तरह से डिजाइन की जाएगी कि झोपड़ी–चरवाहे अपने पशुओं को पैनलों के नीचे चरने दे सकें। लेकिन इन मीठी और चिकनी–चुपड़ी बातों की असलियत कुछ और है।
भाजपा ने 2019 में लद्दाख को केन्द्र शासित प्रदेश बनाते समय वहाँ के लोगों से सुनहरे वादे किये थे–– “विकास”, “रोजगार”, “स्वशासन”, लेकिन इनमें से एक भी वादा पूरा नहीं हुआ। उलटे, आज स्थानीय लोग कह रहे हैं कि वे दिल्ली के नौकरशाही के शिकंजे में फँस गये हैं और उनका भविष्य कॉरपोरेट घरानों की मुनाफाखोरी के लिए दाँव पर लगा दिया गया है। यही कारण है कि हाल के दिनों में लद्दाख में आन्दोलन ने उग्र रूप ले लिया। भाजपा कार्यालय को जलाना महज गुस्से की एक झलक है–– यह जनता का साफ सन्देश है कि वे अब सिर्फ शान्तिपूर्ण याचना पर भरोसा नहीं करेंगे।
इसी बीच भाजपा और उसके समर्थक हर असन्तोष को ‘विदेशी साजिश’ या ‘कांग्रेस–प्रेरित’ बताने लगे–– सरकारी बयान और कुछ मीडिया कवरेज ने प्रदर्शनकर्ताओं के पीछे राजनीतिक प्रेरणा या बाहरी एजेंट का चित्र खींचने की कोशिश कीय केन्द्र ने वांगचुक की कुछ टिप्पणियों को निन्दनीय बताते हुए कहा कि उन्होंने जनसमूह को भड़काया। इस तरह की ‘साजिश’ की थ्योरी हर बार संघर्ष के स्वरूप को बदलने और उसे अलग–थलग करने का काम करती है। हमने मोदी शासन में देखा है कि जब जनता के सवालों और उसके आन्दोलनों को ‘विदेशी साजिश’ या आतंकवादी घटना बताया जाता है तो यह आन्दोलन को कमजोर करके जनता को भटका देता है–– जहाँ असल दुश्मन छिप जाता है। लेकिन मोदी सरकार की चाल कामयाब नहीं हुई और देश भर में उसके इस जनविरोधी कार्रवाई पर सवाल भी उठे।
उदाहरण के तौर पर, जब युवा–समूह लेह में सड़कों पर उतरा और कुछ बेकाबू हुए, तो भाजपा–कहानी में यह जल्दी से “कांग्रेस/विदेशी साजिश” बन गया, जबकि स्थानीय–विरोधियों का कहना था कि वास्तविक कारण वर्षों से अनदेखा की गयी माँगें और संसाधनों पर बाहरी कब्जा है। वांगचुक ने हमला–प्रवृत्ति के बाद कहा, “मेरा शान्तिपूर्ण रास्ते का सन्देश विफल हुआ–– युवा हिंसा रोकें” –– एक स्वीकारोक्ति भी और अपील भी।
लद्दाख के वरिष्ठ बौद्ध नेता और पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के खिलाफ कुत्सा प्रचार की आँधी चलाकर आन्दोलन को बदनाम करने का भरपूर प्रयास किया गया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लद्दाख के लोग अपने जल, जंगल, जमीन और रोजगार को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। वे यह भी माँग कर रहे हैं कि लद्दाख को छठी अनुसूची में शामिल किया जाये ताकि वहाँ की संस्कृति और संसाधनों पर बाहरी पूँजी का कब्जा न हो।
आन्दोलन की मुख्य माँगें हैं––
–– लद्दाख को एक “राज्य” (स्टेटहुड) का दर्जा दिया जाये ताकि वहाँ की जनता को संवैधानिक अधिकारों के अधीन कृषि, भूमि, रोजगार इत्यादि में अधिक स्वायत्तता मिल सके।
–– संविधान के छठवें अनुसूची में शामिल किया जाना, जिससे जनजातीय/स्थानीय प्रावधानों के तहत भूमि और संसाधन सुरक्षा मिल सके।
–– पर्यावरणीय सुरक्षा, ग्लेशियरों की रक्षा, जिन्दगी–जल स्रोतों की रक्षा, अभिसरण और बड़ी परियोजनाओं द्वारा किये जा रहे भरी नुकसान और जैविक तथा पारम्परिक संसाधनों के दोहन को रोका जाये।
लद्दाख आन्दोलन सीधे तौर पर मजदूर वर्ग के संघर्ष जैसा नहीं है–– लेकिन यह उस मजदूर वर्ग के हितों से जुड़े स्थानीय संसाधन नियंत्रण, रोजगार के अवसर, प्रशासनिक स्वायत्तता, पर्यावरणीय सुरक्षा आदि माँगों का आन्दोलन है। यदि देखा जाये, तो यह आन्दोलन पूँजीवादी/राजनीतिक शक्ति और स्थानीय जनता के बीच है–– जहाँ मजदूर और स्थानीय कृषि–आधारित जीवन को बचाने की माँग उठ रही है।
इतिहास भी यही बताता है कि जब–जब जनता ने अपने अधिकार छीने जाते देखे, तब–तब संघर्ष का रास्ता अख्तियार किया। लद्दाख के लोग भी अब उसी परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। पूर्ण राज्य की माँग केवल प्रशासनिक ढाँचे का सवाल नहीं है, बल्कि यह उनकी संस्कृति, अस्तित्व और आत्मनिर्भरता की रक्षा का सवाल है। भाजपा कार्यालय को जलाने की घटना इसी संचित क्रोध का प्रतीक है–– यह जनता का ऐलान है कि वे अपने प्रदेश को किसी भी हालत में कॉरपोरेटों की लूट का चारागाह नहीं बनने देंगे।
असल में यह संघर्ष सिर्फ लद्दाख का नहीं है। यह पूरे देश की उस वास्तविकता को उजागर करता है जिसमें केन्द्र सरकार, राष्ट्रवाद और विकास के नारों की आड़ में जनता की जमीन–जायदाद कौड़ियों के मोल कॉरपोरेट घरानों को बेचने में लगी हुई है। लद्दाख के लोग इस लूट के खिलाफ खड़े होकर यह दिखा रहे हैं कि संघर्ष ही असली रास्ता है और यही उन्हें अपने प्रदेश को कॉरपोरेट कब्जे से बचाने की गारण्टी दे सकता है।
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