पाकिस्तान का अफगानिस्तान पर हवाई हमला
पाकिस्तान का अफगानिस्तान पर हवाई हमला सिर्फ सीमित सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि एक व्यापक भू–राजनीतिक संकेत है–– एक ऐसा संकेत जो बताता है कि वैश्विक ताकतें फिर से युद्ध की ओर झुकती जा रही हैं। नानहारगर और पक्तिया जैसे सीमान्त इलाके, जो ऐतिहासिक रूप से पश्तून इलाके हैं, हमेशा से दोनों देशों के बीच संवेदनशील रहे हैं। लेकिन इस बार हमला ऐसे समय हुआ जब अफगानी तालिबान सरकार के विदेश मंत्री आमिर खान मुत्तकी भारत में मौजूद थे। यह संयोग नहीं, बल्कि अमरीका की नीति का हिस्सा प्रतीत होता है–– दक्षिण एशिया में तनाव पैदा कर चीन और रूस दोनों पर अप्रत्यक्ष दबाव डालना।
पाकिस्तान की यह नीति नयी नहीं है। इतिहास गवाह है कि उसने हमेशा अमरीकी रणनीति के तहत अपने पड़ोसियों पर सैन्य दबाव बनाया। 1980 के दशक में जब अमरीका ने सोवियत संघ के खिलाफ “ऑपरेशन साइक्लोन” के तहत अफगान मुजाहिदीन को हथियार और प्रशिक्षण दिया, तब पाकिस्तान ही वह केन्द्र था जिसने इस युद्ध की अगुवाई की। आज वही पाकिस्तान फिर से अमरीका के मोहरे की भूमिका निभाता दिख रहा है, ताकि अमरीका अपनी वैश्विक आर्थिक और सामरिक स्थिति बनाये रख सके। अमरीकी साम्राज्यवाद की पुरानी चाल यही है–– युद्ध के जरिये अपनी अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना। यह काम उसके भाड़े के आर्थिक हत्यारे करते हैं।
जॉन पर्किन्स ने अपनी किताब ‘कनफेशन ऑफ एन इकोनामिक हिटमैन’ की भूमिका का वर्णन इस प्रकार करते हैं–– “इकोनामिक हिटमैन (आर्थिक हत्यारे) उच्च वेतन पाने वाले पेशेवर होते हैं जो दुनिया भर के देशों से खरबों डॉलर की ठगी करते हैं। वे विश्व बैंक, अमरीकी अन्तरराष्ट्रीय विकास एजेंसी (यूएसएआईडी) और अन्य विदेशी “सहायता” संगठनों से पैसा लेकर बड़ी कम्पनियों और ग्रह के प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण रखने वाले कुछ धनी परिवारों के लिए काम करते हैं। उनके हथकण्डों में फर्जी वित्तीय रिपोर्ट, धाँधली वाले चुनाव, रिश्वत, जबरन वसूली, यौन सम्बन्ध और हत्या शामिल हैं। वे साम्राज्य जितना पुराना खेल खेलते हैं, लेकिन वैश्वीकरण के इस दौर में इसने नये और भयावह आयाम ले लिये हैं।”
आज अमरीका का डॉलर लगातार दबाव में है। चीन और रूस दोनों “डी–डॉलराइजेशन” की दिशा में तेजी से बढ़ रहे हैं। ब्रिक्स देशों की नयी मुद्रा पर चर्चा और सऊदी अरब जैसे देशों का अमरीकी ट्रेजरी बॉन्ड से पीछे हटना, अमरीकी वित्त पूँजी के लिए खतरा है। ऐसे में एशिया में जंग का माहौल बनाना–– चाहे वह रूस–यूक्रेन, चीन–ताइवान या अफगानिस्तान–पाकिस्तान सीमा पर हो–– अमरीका के लिए दोहरा लाभ है–– पहला, हथियार उद्योग को खड़ा रखना और दूसरा, डॉलर की माँग बढ़ाना।
यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की का “तीसरे विश्व युद्ध” का बयान इसी भयावह परिदृश्य का विस्तार है। अमरीका ने यूक्रेन को टॉमाहॉक जैसी मिसाइलें देकर रूस को सीधे चुनौती दी है। रूस की प्रतिक्रिया भी उतनी ही आक्रामक रही–– यूक्रेन के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमलों का संकल्प लेकर उसने यह स्पष्ट कर दिया कि वह पीछे हटने वाला नहीं। इस पूरी स्थिति में यूरोप फिर से अमरीकी नीतियों का बन्धक बन गया है।
इधर पश्चिम एशिया में इजरायल–ईरान तनाव अभी शान्त नहीं हुआ और अब दक्षिण एशिया में पाक–अफगान युद्ध की आशंका बढ़ रही है। यह संयोग नहीं, बल्कि पूँजीवादी विश्व–व्यवस्था की अनिवार्यता है, जो मार्क्स के अनुसार, संकटों से ही अपना अस्तित्व टिकाये रखती है। पूँजीवाद जब उत्पादन अधिक कर देता है, तो उसे बाजार चाहिएय जब बाजार नहीं मिलता, तो वह युद्ध के जरिये नया बाजार बनाता है। यानी संकट ही उसके लिए वरदान है।
पाकिस्तान की स्थिति इसी वैश्विक खेल में कमजोर खिलाड़ी की है। उसकी अर्थव्यवस्था आईएमएफ के कर्जों में जकड़ी हुई है, सेना की नीति अमरीकी सहायता पर टिकी है और घरेलू राजनीति अराजकता से भरी है। अफगानिस्तान पर हमला कर पाकिस्तान अमरीका को यह दिखाना चाहता है कि वह “विश्वसनीय सहयोगी” है। लेकिन असल में वह अपने ही भूगोल में नयी आग लगा रहा है–– वह आग जो शायद पूरे क्षेत्र को झुलसा सकती है।
ऐसे हालात में चीन का “सब्र” दरअसल सामरिक धैर्य है। चीन जानता है कि अमरीका को युद्ध चाहिए और वह तब तक मौन रहेगा जब तक अमरीका खुद थक न जाये। लेकिन अगर यह जंग व्यापक हुई तो एशिया एक बार फिर शीतयुद्ध के नये संस्करण का मैदान बनेगा या अधिक भयानक युद्ध की आग में धधक उठेगा जिसकी लपटें हमारे घरों तक पहुँच जायेंगी। और हमारा विश्व गुरु नेता फैशनपरस्ती में मस्त रहेगा। यह बात याद दिलाती है कि रोम जल रहा था और नीरो बाँसुरी बजा रहा था।
संक्षेप में, पाकिस्तान की यह “बिना उकसावे की” स्ट्राइक असल में अमरीकी पूँजी के संकट, यूक्रेनी मोर्चे की असफलता और डॉलर की गिरती हैसियत का सैन्य प्रतिफल है। हम जानते हैं कि युद्ध पूँजीवाद की सबसे नृशंस चिकित्सा है, जो बीमार अर्थव्यवस्था को क्षणिक राहत देती है। मगर यह राहत मानवता के लिए विनाश का रास्ता भी खोलती है।
आज पाकिस्तान–अफगानिस्तान सीमा पर जो अस्थिरता, आतंकी नेटवर्क और अमरीकी दखल का सिलसिला जारी है, उसकी जड़ें ठीक “ऑपरेशन साइक्लोन” में हैं। ऑपरेशन साइक्लोन (1979–1992) शीतयुद्ध का वह अभियान था जिसमें अमरीकी खुफिया एजेन्सी सीआईए ने पाकिस्तानी खुफिया एजेन्सी आईएसआई के जरिये अफगान मुजाहिदीनों को हथियार, प्रशिक्षण और धन मुहैया कराया ताकि वे सोवियत समर्थित डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ अफगानिस्तान के खिलाफ लड़ सकें। अमरीका का घोषित उद्देश्य “कम्युनिज्म के विस्तार को रोकना” था, परन्तु असल लक्ष्य सोवियत संघ को आर्थिक–सामरिक रूप से थकाना था।
इस कार्यक्रम की शुरुआत मामूली हथियारों, जैसे ली–एनफील्ड राइफल से हुई, लेकिन 1986 तक यह आधुनिकतम अमरीकी हथियारों, जैसे–– एफआईएम और 92 स्टिंजर मिसाइलों तक जा पहुँचा। सीआईए अधिकारियों–– विलियम केसी, मिल्टन बेयरडेन, माइकल पिल्सबरी और अमरीकी राजनयिक मॉर्टन अब्रामोविट्ज–– ने इसे “अमरीकी विदेशी नीति की सबसे सफल परियोजना” बताया था। परन्तु विडम्बना यह रही कि यह “सफलता” आगे चलकर अमरीका, पाकिस्तान और पूरे दक्षिण एशिया के लिए विनाशकारी साबित हुई।
इस कार्यक्रम में गुलबुद्दीन हिकमतयार और जलालुद्दीन हक्कानी जैसे कट्टरपंथी इस्लामी कमाण्डरों को सीआईए और आईएसआई का विशेष समर्थन मिला। ये वही लोग थे जिनके समूह बाद में अल–कायदा और तालिबान जैसे संगठनों की नींव बने। हिकमतयार को सीआईए ने करोड़ों डॉलर दिये और हक्कानी नेटवर्क बाद में ओसामा बिन लादेन के सबसे करीबी सहयोगी निकले। इस पूरी प्रक्रिया में अपेक्षाकृत उदार और धर्मनिरपेक्ष नेता अहमद शाह मसूद को हाशिए पर रखा गया, क्योंकि वह अमरीकी या पाकिस्तानी एजेंडे में फिट नहीं बैठते थे।
पाकिस्तान के तत्कालीन शासक जनरल जिया–उल–हक ने इस ऑपरेशन को अपने इस्लामीकरण अभियान के साथ जोड़ दिया। पाकिस्तान की मदरसा शिक्षा, जो पहले सीमित थी, सीआईए और सऊदी धन से विस्फोटक रूप से बढ़ी। अमरीकी डॉलर और सऊदी पेट्रो–डॉलर से हजारों “जिहादी स्कूल” बनाये गये जहाँ इस्लामी उग्रवाद को सोवियत–विरोधी “पवित्र युद्ध” के रूप में पढ़ाया गया। नतीजा यह हुआ कि 1990 के दशक में अफगानिस्तान से सोवियत सेना हटने के बाद वही प्रशिक्षित लड़ाके आपस में भिड़ गये और देश भयावह गृहयुद्ध में फँस गया।
“ऑपरेशन साइक्लोन” पूँजीवादी साम्राज्यवाद की वह योजना थी जिसमें एक देश के सामाजिक ढाँचे को नष्ट करके वैश्विक पूँजी की सुरक्षा की जाती है। साम्राज्यवाद के युग में पूँजी युद्धों के जरिये अपने संकट को हल करती है। अमरीका ने अफगानिस्तान को सोवियत–विरोधी मोर्चे के रूप में इस्तेमाल किया और पाकिस्तान ने अमरीकी सैन्य व आर्थिक सहायता के बदले अपने समाज को कट्टरवाद की भट्टी में झोंक दिया।
आज पाकिस्तान जिस आतंकी हिंसा, आर्थिक संकट और अस्थिरता से गुजर रहा है, उसकी जड़ें इसी ऑपरेशन में हैं। “तहरीक–ए–तालिबान पाकिस्तान” जैसी शक्तियाँ दरअसल उसी मुजाहिदीन परम्परा की अगली पीढ़ी हैं, जिन्हें सीआईए ने प्रशिक्षित किया था। अमरीका ने जिस आग को सोवियत संघ को जलाने के लिए भड़काया था, वही आग अब पूरे दक्षिण एशिया को झुलसा रही है।
इस तरह जब पाकिस्तान आज अफगानिस्तान पर “बिना उकसावे के स्ट्राइक” करता है या अमरीका उसकी पीठ थपथपाता है, तो यह उसी पुराने भू–राजनीतिक नाटक का नया अंक है–– जिसमें हथियार बदलते हैं, खिलाड़ी वही रहते हैं और जनता हमेशा बलि का बकरा बनती है।
विलियम ब्लम ने “किलिंग होप–– अमरीकी सैन्य और सीआईए हस्तक्षेप” और “अमरीका का सबसे घातक निर्यात–– लोकतंत्र” में तर्क दिया है कि सीआईए और अमरीकी विदेश नीति ने 1945 के बाद 50 से अधिक सरकारों को उखाड़ फेंका, जिनमें अधिकांश लोकतांत्रिक रूप से चुनी गयी सरकारें थीं। अमरीका ने “लोकतंत्र” के नाम पर हस्तक्षेप किये, लेकिन वास्तविक उद्देश्य अमरीकी आर्थिक और राजनीतिक हितों की रक्षा करना था। ओस लिखते हैं, “हम घरों पर बमबारी करते हैं और इन लोगों के परिवार मरते हैं और अमरीका इन नागरिकों की मौतों के लिए माफी माँगने से इनकार करता है। चिन्ता का अभाव उनकी कार्रवाई को लगभग जानबूझकर नागरिकों को निशाना बनाने के बराबर बना देता है।”
इस दृष्टि से “ऑपरेशन साइक्लोन” केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज की हर अमरीकी–पाकिस्तानी चाल की जड़ है। यह पाकिस्तान–अफगानिस्तान के बीच जारी मौजूदा तनाव की जड़ों में जाने का हमें मौका देता है।
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