21 मई, 2026 (ब्लॉग पोस्ट)

पश्चिम एशिया संकट की वैश्विक चुनौतियाँ

ईद से ठीक एक दिन पहले ईरान द्वारा जारी किये गये दुनिया के नाम एक कड़े सन्देश में स्पष्ट तौर से कहा गया है कि यह लड़ाई सिर्फ क्षेत्रीय लड़ाई नहीं है बल्कि वैश्विक स्तर पर उस चैधराहट (इजराइल–अमरीका फासिस्ट गठजोड़) के खिलाफ है जो अपने वर्चस्व और निजी आर्थिक हितों के लिए पूरी दुनिया को अपनी सैन्य और आर्थिक ताकत के बलबूते ठेंगे पर रखना चाहता है और अपने इशारों पर नचाना चाहता है।

सोवियत संघ के विघटन के बाद एक धु्रवीय दुनिया में पूँजीवादी–साम्राज्यवादी अमरीका और उसके पिछलग्गू देशों ने जो तबाही मचाई है वह किसी से छिपी नहीं है। अमरीका द्वारा दुनिया पर थोपक गये युद्धों, जैसे कोरियाई युद्ध, वियतनाम युद्ध, जापान पर एटमी हमला, खाड़ी युद्ध (लीबिया, सीरिया, इराक), अफगान के अतिरिक्त दक्षिण अमरीकी देशों में अपनी साजिश से तख्ता पलट और फिलिस्तीन लेबनान की बर्बादी जैसी गिरी हुई हरकतों ने पूरी दुनिया में तबाही मचा रखी है जिसमें अमरीका ने 8 से 10 ट्रिलियन डॉलर खर्च के रूप में युद्ध की आग में र्इंधन की तरह झोंक दिये।

हाल ही में 03 जनवरी 2026 को वेनेजुएला में “ऑपरेशन एब्सोलूट रिजोल्व” के तहत राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उसकी पत्नी का अपहरण अमरीकी राष्ट्रपति के रूप में एक व्यक्ति यानी डोनाल्ड ट्रम्प की बर्बरता का खुला सबूत है। इसी तरह क्यूबा की  नाकेबन्दी का अमरीकी दुष्चक्र हमारे सामने है।

ईरान बर्बरताओं की वर्चस्ववादी आग की लपटों में झुलसते देशों की ओर ध्यान खींचना चाहता है। वह अपने ऊपर हुए इजराइल–अमरीकी संयुक्त हमले का जवाब दे रहा है जिसमें ईरान के सुप्रीम नेता अयातुल्ला खैमनेई मारे गये जिन्हें ईरानी लोग अपना रहबर भी कहते हैं। वह 170 स्कूली बच्चों की निर्मम हत्या के हवाले से यह साफ करना चाहता है कि उसके निशाने पर सिर्फ और सिर्फ इजराइल–अमरीका का नापाक गठजोड़ और उन्हें सहयोग दे रहे देश हैं। ईरान इसे अमरीका के घमण्ड और वर्चस्व को तोड़ने की कोशिश कहता है। दुनिया की लोकतांत्रिक सम्प्रभुताएँ खतरे में हैं। इसलिए दुनिया की शैतानी ताकतों के खिलाफ जेन्युइन लोकतांत्रिक ताकतों को एकजुट होने का यह एक बेहतरीन और अपेक्षित मौका है। इसके परिप्रेक्ष्य में नयी वैश्विक सामाजिक–आर्थिक व्यवस्था की संरचना पर नये सिरे से सोचा जा सके और दुनिया उस माफिया जैसी ताकत के दबदबे से मुक्त हो सके जिसके पास न कोई नैतिकता है और न इनसानियत।

ईरान के इस सन्देश में यह भी दोहराया गया है कि जंग का केन्द्रीय सवाल फिलिस्तीन की आजादी और जायनिस्ट रंगभेदी राज्य के खात्मे से भी जुड़ा है। ईरान ने दुनिया को सम्बोधित करते हुए एकजुटता का अह्वान किया है कि हम एक अभूतपूर्व समय में जी रहे हैं जहाँ होमुर्ज (जल डमरूमध्य) की लहरें कह रहीं हैं कि अब सब कुछ वाशिंगटन के इशारे पर नहीं चल सकता। विगत लगभग 600 वर्षों तक यूरोप और अमरीका ने धरती पर शासन किया, उसके संसाधनों को लूटा और लोगों को दबाया। पूरी दुनिया बर्बर उपनिवेशवाद के साये तले सिसकती रही। पर अब यह नहीं चलेगा।

ईरान का दुनिया को सम्बोधित यह सन्देश इस बात का सबूत है जो जाँबाज कौमें शहादतों को अपनी ताकत बना लेती हैं और बेखौफ होकर अपने वतन की हिफाजत में खड़ी होती हैं। वियतनाम इसका सबसे बेहतरीन उदहारण है कि युद्ध सिर्फ पैसे और हथियारों की ताकत से नहीं बल्कि जाँबाज वतनपरस्ती और रणनीति से भी जीते जाते हैं क्योंकि वे बर्बरता के खिलाफ इनसानी मूल्यों के लिए लड़े जाते हैं।

आज खतरा इस बात का है कि अमरीका में इस युद्ध के असर से जब आर्थिक तबाही बढ़ेगी तो डोनाल्ड ट्रम्प अपने ही देश के जनाक्रोश के शिकार होंगे। तब अमरीका अपनी साख बचाने के लिए ईरान पर परमाणु हमला जैसा घातक कदम उठा सकता है। इतिहास गवाह है कि अमरीका दुनिया का इकलौता देश है  जिसने पहले भी परमाणु बमों से तबाही मचाई है और लगातार इस मौके की फिराक में रहता है। इसलिए यह चुप्पी खासकर तीसरी दुनिया के देशों के लिए महँगी पड़ सकती है जिन्हें अमरीका अपने जूतों की नोक पर रखना चाहता है।

अगर अन्तरराष्ट्रीय नियमों के आइने से देखा जाये तो ईरान पर इजराइल–अमरीका का हमला युद्ध अपराध है जिसके लिए दोनों देशों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में मुकदमा चलना चाहिए और समुचित दण्ड भी दिया जाना चाहिए। जब राष्ट्रीय–अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ सत्ता की गुलाम हो जायें तो युद्ध अपराधियों पर मुकदमा नामुमकिन है। यह साफ तौर पर अवैध साम्राज्यवादी युद्ध है जो “ग्रेटर इजराइल” के मनसूबे और तेल–गैस पर कब्जे की लालसा से शुरू किया गया है और वह एक महीने से अधिक का वक्त पार कर चुका है। ईरान में शासन बदलने और अपनी मनमाफिक शासन लाने का इजराइली–अमरीकी सपना बुरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

बेशक, ईरान जानमाल की गम्भीर तबाही से गुजर रहा है। पर ईरान ने जो असरदार जबाब दिया है उसने इजराइल–अमरीकी गठजोड़ की चूलें हिला दी हैं। अमरीका इस बात को स्वीकारता है कि ईरान से ऐसी जवाबी कार्रवाई की कतई उम्मीद नहीं थी। उसे तो लगता था एक आध हफ्ते में युद्ध खत्म हो जायेगा और ईरान आत्मसमर्पण कर देगा। इजराइल के शहरों और खाड़ी देशों के अमरीकी सैन्य अड्डों पर ईरानी मिसाइलें, ड्रोन और क्लस्टर बमों की बरसात जैसी झड़ी ने जो तबाही मचाई है उससे इजराइल और अमरीका के पसीने छूट गये। ईरान की यह लम्बी तैयारी का परिणाम है क्योंकि वह अमरीकी इरादों से खास कर ट्रम्प और नेत्यन्याहू की गिरी सोच और साजिशों से बखूबी वाकिफ था। खाड़ी देशों को अमरीकी सैन्य ठिकानों के लिए अपने यहाँ जगह देने की कीमत चुकानी पड़ रही है।

अभी तक ईरान ने युद्ध–विराम की सभी अमरीकी पेशकश यह कहते हुए ठुकरा दी हैं कि हमला हम पर हुआ है हम इसकी कीमत वसूलेंगे भले ही कितनी भी शहादतें देनी पड़ें। यही संकल्प तो वियतनाम का भी था। इजराइल ने युद्ध–विराम का उल्लंघन कर लेबनान पर हमला किया जिसने भारी तबाही मचाई। बेरुत को गाजा जैसा निस्तनाबूत करने की धमकी दी जा रही है। तेहरान में मिनाब क्षेत्र के एक स्कूल में 175 बच्चियों के बर्बर कत्लेआम ने पूरे ईरान की आवाम के दिलों को दहला दिया। वे रो नहीं रहे हैं पर खासा गुस्से में तमतमाये इसका बदला लेने पर आमादा हैं। स्कूल की खण्डहर इमारत और बच्चियों के 175 शवों का मंजर आँखों में आँसू नहीं इस वहशत के खिलाफ गुस्से की लपटें पैदा करता है।

ईरान आज वतनपरस्ती के जज्बे से इजराइल–अमरीका के मंसूबांे को नेस्तनाबूत करने पर तुला है भले ही दुनिया उसके साथ खड़ी हो या न हो।  पहली बार अमरीका और इजराइल दुनिया में अलग–थलग दिख रहे हैं। कई यूरोपीय देशों ने अमरीका और इजराइल को युद्ध अपराधी मानते हुए उनके साथ खड़े होने से साफ इनकार कर दिया।

ईरान में मरने की खबरों को दबाया नहीं जा रहा है, बल्कि पुष्टि की जा रही है और सरकार उनके आँकड़े खुद पेश करती है क्योंकि वहाँ शहादत की संस्कृति रही है। जबकि अमरीका और इजराइल युद्ध में तबाही के आँकड़ों को छिपाते हैं। ईरानी सुरक्षा प्रमुख अली लारिजानी, बासिज कमाण्डर सुलेमानी और खुफिया मन्त्री इस्माइल खातिब की हत्याओं को ईरान ने कभी छिपाया नहीं। ईरान के नेता बंकरों में नहीं छिपते। खैमनेई जानते थे कि वे निशाने पर हैं पर वे छिपे नहीं। लारिजानी तो युद्ध के बीचोबीच घूम रहे थे और हत्या के समय वे अपनी बेटी से मिलने गये थे। तमाम दु%ख के बावजूद ईरान कभी अपने किसी नेता के मरने पर हताश या निराश नहीं हुआ। बल्कि उनकी एक समानान्तर टीम तैयार रहती है क्रिकेट के खेल की तरह एक खिलाड़ी आउट हुआ कि दूसरा पैड बाँधे बल्ला लिये मैदान में खड़ा है।

इसी ईरानी जज्बे ने आज अमरीकी चैधरी ट्रम्प की चैधराहट की कलाई पकड़ते हुए कहा जनाब जाते कहाँ हैं ? आइये जंगे मैदान में दो–दो हाथ करते हैं। ईरान का साफ ऐलान है कि जब तक ईरान में एक भी शख्स जिन्दा है और जिस्म में खून का एक भी कतरा बाकी है हम लड़ेंगे अपनी आखिरी साँस तक। यह जंग इनसानों, इनसानियत और इनसानी उसूलों को बचा कर रखने की है। ईरान के इस जज्बे को दुनिया सलाम करती है और इजराइल–अमरीकी फासिस्ट गठजोड़ की रूह फना हो रही है।

सच कहें तो अमरीका इस जंग में बुरी तरह फँस गया है और इजराइल ने उसे अपना हित साधने के लिए बुरी तरह फँसा दिया है। नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प दोनों की साख उनके अपने देश में लगातार गिर रही है और जनता उनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रही है। ट्रम्प ने खाड़ी देशों को आगाह कर दिया है कि वे अपना बचाव खुद करें। अमरीका अपनी सैन्य शक्ति और धन खर्च नहीं करेगा। उसके पास पर्याप्त तेल है। इससे खाड़ी देश हतप्रभ हैं और खासा तनाव में हैं। सऊदी अरब इजराइल की तरह अमरीका को उकसाता रहा है–– ईरान के खिलाफ युद्ध के लिए। इस युद्ध में ईरान की फतेह पूरी अरब दुनिया की मुक्ति साबित होती दिखती है जिसमें एक बार मुस्लिम एकता कायम हो सकती है जो पेट्रोलियम और गैस ऊर्जा का बड़ा इलाका है। इससे पश्चिमी दुनिया को बड़ा धक्का लगाने वाला है और वैश्विक समीकरण भी बदल सकते हैं खास कर ब्रिक्स जैसे अन्तरराष्ट्रीय संगठन जिसको अमरीका अपने लिए बड़ा खतरा मान रहा है।

ईरान द्वारा होर्मुज जलसंधि में अमरीका और उसके सहयोगी देशों के जहाजों को रोकने का ऐलान सिर्फ सैन्य या राजनयिक सफलता भर नहीं है, बल्कि यह वैश्विक भू–राजनीति में एक बड़े बदलाव का संकेत भी है। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन, जापान, ब्रिटेन और फ्रांस समेत सात देशों से अपील की है कि वे होर्मुज को खुला रखने के लिए अपनी नौसेनाएँ भेजें। जवाब में मिली खामोशी कहीं ज्यादा असरदार सन्देश लिये हुए थी। पुराने सहयोगी जर्मनी और जापान ने साफ तौर पर दूरी बना ली।

दूसरी तरफ ईरान में माहौल बिलकुल अलग है। हर दिन हर रात बड़ी तादाद में लोग सड़कों पर उतर रहे हैं पूरे जोश–खरोश के साथ। सेना में भर्ती होने के लिए नौजवानों की लम्बी–लम्बी कतारें वतन परस्ती का सबूत पेश करती नजर आती हैं। जिस ईरान को महिला विरोधी कह कर पूरी दुनिया में बदनाम किया गया वहाँ लड़किया फौजी लिबास में मिसाइलों के कारखानों और बंकरों में मिसाइल असेम्बल और मिसाइल कैरियर लोड कर रही हैं। लोग ईरानी परचम लेकर सड़कों पर घूम रहे हैं, इजराइल–अमरीका के खिलाफ रैलियाँ निकाली जा रही हैं। लोगों में गुस्सा है पर लड़ने और मर मिटने के लिए गजब का धैर्य और जज्बा भी है।

कभी–कभी सोच कर सिर घूम जाता है कि वियतनाम जैसा आर्थिक और तकनीकी तौर से पिछड़ा देश फ्रांस और फिर अमरीका से कैसे लड़ा होगा ? जंग को रोजमर्रे का हिस्सा बनाना कितना मुश्किल रहा होगा ? यह मैंने वहाँ जाकर वहाँ के नागरिकों से बातचीत करके बड़ी गहराई से महसूस किया। ईरानियों के दिलों से एक बात गरम लावे की तरह फूट रही है कि हमारे नेताओं को शहीद किया गया है, बगैर बदला लिये यह जंग नहीं रुकेगी। न कोई समझौता, न अमरीका के सामने झुकना, बस अमरीका को उसकी औकात बताना। यह बड़ी बात है जो किसी देशभक्ति के जज्बे और नागरिक मनोबल की मिसाल है।

समझौते और युद्ध थमने की जो थोड़ी बहुत गुंजाइश बची थी सैन्य प्रमुख लारिजानी की हत्या के बाद वह भी खत्म हो गयी। कच्चे तेल के दाम 60 डॉलर प्रति बैरल से 105 तक पहुँच गये और इसके आगे भी जायेंगे। तेल की महँगाई ऐसी चेन है जो खेती, कारखानों, परिवहन सबको अपनी चपेट में ले लेगी। आम आदमी के निवाले को भी महँगा बनाकर छीन लेगी।

ट्रम्प साहब फरमा रहे हैं कि अमरीका के लिए तेल की कोई कमी नहीं है बाकी देश अपना–अपना देखें। यह कितना बड़ा दोगलापन है। इतना खुदगर्ज और बेहूदा नेता दुनिया के इतिहास में खोजने पर भी शायद ही मिले।

इस युद्ध संकट में दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त्र भारत सरकार की शर्मनाक भूमिका ने भारत की ऐतिहासिक साख पर जो कलंक लगाया है वह अमिट है। युद्ध की शुरुआत के ठीक 48 घंटे पहले भारत के प्रधानमंत्री का इजराइली दौरा, उन्हें ईरान पर इजराइल–अमरीका के संयुक्त हमले, जो एक अपराधिक युद्ध है, उसमें वास्तविक साझेदार बना चुका है। मोदी सरकार ने कहीं एकजुटता दिखायी तो खाड़ी देशों के साथ अपनी सहानुभूति व्यक्त करके। मोदी सरकार के मुँह से सुप्रीम नेता खैमनेई की हत्या पर आज तक शोक के दो औपचारिक शब्द भी नहीं फूटे जबकि ईरान हमारा हमेशा से पड़ोसी दोस्त रहा है। भारत और ईरान के सांस्कृतिक रिश्तों का एक लम्बा इतिहास है। भारतीय संसद में प्रधानमंत्री इस कूटनीतिक मुद्दे पर मुँह छिपाते रहे और चुनावी रैलियों में घूमते दिखे। इस गम्भीर मुद्दे पर विपक्ष के सवालों से बचने के लिए स्पीकर की नाकेबन्दी भी कम शर्मसार करने वाली नहीं रही।

गजब तो तब हो गया जब भारत सरकार संयुक्त राज्य सुरक्षा परिषद में अमरीकी युद्ध का सह प्रायोजक बन गयी जो विगत 11 मार्च को 2026 को 2 के मुकाबले 13 मतों से पारित हुआ। यह समर्थन मोदी सरकार पर अमरीकी दबाव के चलते  हासिल किया गया ताकि भारत चाहे तो भी ईरान के साथ खड़ा न हो सके। 2014 में नरेन्द्र मोदी के सत्ता में आने के बाद विदेश नीति को पूरी तरह इजराइल और अमरीका परस्त बना दिया गया। अब इस बात से पर्दा उठ गया है कि ईरान के खिलाफ इजराइल–अमरीकी युद्ध में भारतीय हुक्मरान बराबर के साझेदार हैं। लाख कोशिशों के बावजूद साम्राज्यवादी बर्बरता में अपनी हिस्सेदारी को मोदी सरकार छिपा नहीं पायी। अमरीका के टैरिफ  युद्ध, पश्चिम एशियाई युद्ध संकट और अमरीका के आगे समर्पण भारत को आर्थिक तबाही में झोंक देगा। 11–12 मई 2026 को प्रधानमन्त्री मोदी ने इस संकट को खुलकर स्वीकार भी किया। बावजूद इसके अमरीका परस्त नीतियाँ जारी हैं और संकट से बचने के लिए कुछ नहीं किया गया।

भारत ने ईरान के समुद्री जहाज आईआरआईएस पर अमरीकी पनडुब्बी द्वारा किये गये तारपीडो हमले की भी कोई निन्दा नहीं की जिसमें 150 ईरानी नाविक मारे गये। ईरानी जहाज भारत संयुक्त नौसेना अभ्यास में भारत के आमंत्रण पर आया था। यह अपने मेहमान की पीठ में छुरा भोंकने जैसा दुष्कृत्य है। भारत अमरीका के सामने इतना नतमस्तक है कि अमरीका ने इस दुष्कृत्य के लिए भारत की सहमति लेना भी जरूरी नहीं समझा।

ईरान का मानना है इनसानी इतिहास में सबसे वहशी और दरिन्दा नेता नेत्यान्याहू और डोनाल्ड ट्रम्प जिन्होंने शहरों को राख में बदला, कैद आबादी को कत्लगाहों में और कब्जाई जमीनों को सामूहिक कब्रों और लाशों से भर दिया। उन्हें अब और बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए भले ही कोई भी कीमत चुकानी पड़े। उनके रहते दुनिया की लोकतांत्रिक सम्प्रभुताएँ बड़े खतरे में हैं। संसाधनों की लूट पर उनकी गिद्ध नजर है चाहे वेनेजुला हो या फिलिस्तीन, लेबनान या क्यूबा। संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ अब बेमानी हो गयी हैं। वे कातिल हैं, मसखरें हैं, जाहिल हैं। बर्बर सत्ता की बागडोर उन्हीं के हाथों में है जिसे छीनना अब बेहद जरूरी हो गया है। जिसकी शुरुआत का जोखिम ईरान उठा रहा है। जरूरत इस श्रृंखला की कड़ी बनने वाले बिरादराना देशों की एकजुटता की है ताकि उनकी गर्दन इन जालिमों के खंजर की पहुँच से बच सकें।

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