18 मई, 2026 (ब्लॉग पोस्ट)

हम कॉकरोच हैं

हम कॉकरोच हैं 
नौजवान हैं, मचलती हुई सोच हैं
निज़ाम के पैरों में आ गई मोच हैं 
हम कॉकरोच हैं
 
बेरोज़गार हैं 
दिशाहीन हैं, बहके हुए हैं 
टूटे हुए करार हैं 
घरों, परिवारों की हार हैं 
जीवन को तरसती हुई चाह हैं 
हम कॉकरोच हैं
 
ग्रैगर समसा
कभी तू भी कॉकरोच बना था 
और सबने तुझे नकार दिया 
पिता ने, बहन ने, भाई ने 
पूरे समाज ने 
सरमाये के राज ने 
हम भी नकारे गए हैं
 
कौन कहता है यह? 
कौन न्यायाधीश 
कौन सियासतदान
कौन देता है शब्दों का यह 'वरदान'
 
यह अलग बात है 
लोरका2 ने कभी शायर-कॉकरोच की
कल्पना की थी या कॉकरोच-शायर 
कॉकरोच ब्रह्मांड-जीवन का हिस्सा है 
मनुष्य उन्हें अपना दुश्मन समझता है 
मिटा देना चाहता है उनकी हस्ती
 
निज़ाम भी यही चाहता है 
बेरोज़गारी नहीं 
बेरोज़गारों की हस्ती मिटाना 
उन्हें कॉकरोच कहना 
लोरका या काफ़्का की तरह नहीं 
इश्तहारों में 
उबलती हुई नज़रों की तरह 
जो रसोइयों में चीखती हैं 
और रसायनों से कॉकरोच मारती हैं
 
हाँ, जज साहब
हम कॉकरोच हैं 
समाज के अंधेरे कोनों में 
अपनी होंद छुपाते, बचाते 
गिरते, लड़ते, डरते 
पल-पल समझौते करते 
रुकते और चलते 
अंधेरे मोड़ मुड़ते
कुचले जाते, खो जाते 
खुदकुशी करते 
हम कॉकरोच हैं
 
हम कॉकरोच हैं और मनुष्य हैं 
'बल्दे रुक्ख'3 हैं 
भविष्य की सुलगती हुई कोख हैं 
और हमें जीना है 
जज साहब 
आपके शब्दों में नहीं 
इन शब्दों की बेहूदगी के विरूद्ध
आग बनकर 
लौ बनकर 
जीने की आहट बनकर
 
आपके शब्दों को
आपके होठों पर उबलते रहना है 
इन शब्दों ने 
बार-बार आपसे यह कहना है 
आप मनुष्य नहीं कुछ और हैं 
मनुष्य न हो पाने की तासीर हो 
अमानवता की तस्वीर हो।
______________
 
1. फ़्रान्ज़ काफ़्का के उपन्यास 'द मेटामॉर्फोसिस' का नायक ग्रैगर समसा, जो एक सुबह अचानक खुद को कॉकरोच में बदला हुआ पाता है।
2. फेडेरिको लोरका के नाटक 'द बटरफ्लाई' में एक घायल तितली और नौजवान कॉकरोच-शायर की असंभव प्रेम-कहानी बताई गई है।
3. यह शब्द सुरजीत पातर के हैं, 'बल्दा रुक्ख' (मैं जलता हुआ वृक्ष हूँ)।
 
(साभार)

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