8 जनवरी, 2026 (ब्लॉग पोस्ट)

लम्पट-उन्मादी ट्रम्प द्वारा वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति का अपहरण

लम्पट और उन्मादी ट्रम्प की आपराधिक कारवाई ने हमेशा की तरह इस बार भी शोर ज़्यादा पैदा किया है, उसके लिए फायदा कम। वेनेजुएला पर जिस आपराधिक कार्रवाई को वह निर्णायक झटका मान रहा था, उसकी हवा इतनी जल्दी निकल जाएगी, इसका अंदाज़ा शायद उसके सबसे करीबी सलाहकारों को भी नहीं था। नए साल की यह घटना ट्रम्प की शक्ति का प्रतीक बनने के बजाय उसकी हताशा और बौखलाहट का उदाहरण बन गई है। जिस कार्रवाई से वेनेज़ुएला को घुटनों पर लाने की योजना थी, वही कार्रवाई ट्रम्प को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और अधिक अलग-थलग कर गई है।

नए साल पर पूरी दुनिया ने इस खुली गुंडागर्दी को देखा और हतप्रभ रह गई। अमरीकी सत्ता के शीर्ष पर बैठे ट्रम्प ने वेनेज़ुएला के राष्ट्रपति के साथ जो किया, उसे अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और सभ्य राजनीतिक व्यवहार-- तीनों के मुँह पर तमाचा माना जा रहा है। यह संदेश साफ़ है कि साम्राज्यवादी ताक़तें आज भी छोटे देशों के राष्ट्राध्यक्षों को अपहृत करने, दबाव में लेने और सार्वजनिक रूप से अपमानित करने को अपना अधिकार समझती हैं। यह कोई भूल नहीं है, बल्कि शक्ति-प्रदर्शन की सोची-समझी कोशिश है, ताकि वेनेज़ुएला की जनता और सरकार दोनों को मानसिक रूप से तोड़ा जा सके।

लेकिन इतिहास बार-बार बताता है कि सब कुछ बंदूक, बम और सैनिक अड्डों से तय नहीं होता। असली ताक़त जनता की राजनीतिक चेतना और संगठित प्रतिरोध में होती है। वेनेज़ुएला की सरकार ने यह साबित किया कि जब सरकार जनता के साथ हो, जब वह सामाजिक समर्थन और वैधता के सहारे खड़ी हो, तब सबसे उग्र साम्राज्यवादी दबाव भी दरकने लगता है। बिना किसी सैन्य टकराव के, केवल जनसमर्थन, राजनीतिक धैर्य और अंतरराष्ट्रीय नैतिक दबाव के ज़रिये, अमरीकी धौंस को झेल लेना अपने-आप में एक बड़ी जीत है।

इस पूरे प्रकरण में असली बाज़ी कूटनीति ने मारी। वेनेज़ुएला सरकार ने भावनात्मक और सैन्य प्रतिक्रिया देने के बजाय धैर्य, संवाद और रणनीतिक चुप्पी का रास्ता चुना। उपराष्ट्रपति रोड्रिग ने जिस तरह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्थिति को रखा, उसने अमरीकी नैरेटिव को उलट दिया है। आक्रामक बयानबाज़ी से बचते हुए भी उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि वेनेज़ुएला किसी दबाव में नहीं आएगा। यही वह बिंदु है जहाँ साम्राज्यवादी घमंड को पहली गंभीर चोट लगती दिखाई दे रही है।

फासीवादी ट्रम्प जिस नोबेल पुरस्कार विजेता मचाडो को ‘लोकतंत्र की नायिका’ की तरह पेश कर रहे थे, वह अचानक हाशिये पर चली गई। कठपुतली की डोर तभी तक काम करती है, जब तक उसे खींचने वाला मंच पर मजबूत दिखे। जैसे ही अमरीकी योजना डगमगाई, मचाडो की राजनीतिक उपयोगिता भी खत्म हो गई। न तो वह वेनेज़ुएला की जनता को लामबन्द कर सकी, न ही किसी वैकल्पिक सत्ता केंद्र का रूप ले सकी।

स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि ट्रम्प को वेनेज़ुएला में अब कोई तथाकथित ‘वैकल्पिक सरकार’ दिखाई ही नहीं दे रही। जिन्हें कल तक “राष्ट्रपति” घोषित किया जा रहा था, उनसे बातचीत करने की ज़रूरत ही नहीं रह गई। हताशा में अब ट्रम्प प्रशासन को उसी उपराष्ट्रपति रोड्रिग से बात करनी पड़ रही है, जिन्हें वे नज़रअंदाज़ करना चाहते थे। दिलचस्प यह है कि बातचीत के समानांतर रोड्रिग खुलेआम अमरीका-विरोधी बयान भी दे रही हैं और अमरीका चाहकर भी उसे रोक नहीं पा रहा। यह सत्ता-संतुलन के पलटने का स्पष्ट संकेत है।

सबसे अहम बात यह है कि वेनेज़ुएला के तेल, सोना और रेयर अर्थ मेटल पर कब्ज़े की पूरी योजना विफल होती नज़र आ रही है। जिस आर्थिक लूट के लिए यह सारा नाटक रचा गया था, वही अमरीकी लक्ष्य अब धुँधला पड़ता जा रहा है। साफ़ होता जा रहा है कि न तो तेल संसाधनों पर सीधा नियंत्रण मिल पायेगा, न ही वेनेज़ुएला की सरकार को गिराया जा सकेगा। उलटे, यह प्रकरण दुनिया भर में इस सच्चाई को और उजागर कर गया कि साम्राज्यवाद की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी अपनी हड़बड़ी, लालच और अहंकार है और जनता की संगठित ताक़त उसके सामने आज भी सबसे बड़ा हथियार बनी हुई है।

यह सब बातें किसी भावनात्मक आवेग या तात्कालिक उत्तेजना में कही गई टिप्पणियाँ नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे एक लंबा राजनीतिक अनुभव, ऐतिहासिक स्मृति और ठोस तथ्यों की श्रृंखला है। वेनेज़ुएला को लेकर जो वैश्विक दुष्प्रचार रचा गया है, उसे केवल नारों से नहीं, बल्कि तर्क और इतिहास के सहारे ही समझा और चुनौती दी जा सकती है।

निकोलस मादुरो को महज़ एक राष्ट्रपति के रूप में नहीं, बल्कि बोलिवेरियन क्रान्ति की निरंतरता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए। वे उस परियोजना के सजग प्रहरी हैं जिसे ह्यूगो शावेज़ ने साम्राज्यवाद-विरोध, सामाजिक न्याय और संसाधनों पर राष्ट्रीय अधिकार के आधार पर खड़ा किया था। शावेज़ के बाद जिस दबाव, साज़िश और आर्थिक घेराबंदी के दौर में मादुरो ने सत्ता संभाली, उसमें सत्ता में बने रहना ही नहीं, बल्कि क्रान्तिकारी दिशा को जीवित रखना अपने-आप में नेतृत्व की बड़ी परीक्षा थी। उन्होंने सेना, जनता और राजनीतिक संगठनों के बीच संतुलन बनाए रखते हुए यह दिखाया कि बोलिवेरियन क्रान्ति किसी एक व्यक्ति पर टिकी नहीं, बल्कि एक सामाजिक-राजनीतिक चेतना है जिसकी जनता में जबरदस्त पैठ है। अमरीका की मौजूदा आपराधिक कार्रवाई की हड़बड़ी ने भी यह साबित कर दिया कि मादुरो सरकार की जड़ें जनता में गहराई तक जमी हुई हैं, हालांकि अमरीका और उसकी मीडिया पूरी दुनिया में यह प्रोपगेंडा चला रही हैं कि वे “तानशाह” हैं जो खुला झूठ है।

ट्रम्प ने ही एक बार कहा था कि अमरीका के पूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन के मुकाबले जॉर्ज डब्ल्यू. बुश महाभियोग के ज़्यादा हकदार हैं। क्यों? क्लिंटन की गलतियाँ "पूरी तरह से मामूली" थीं। इराक के बारे में उसने कहा, "बुश ने हमें झूठ बोलकर इस भयानक युद्ध में फंसा दिया-- झूठ बोलकर, यह कहकर कि उनके पास “जनसंहार के विनाशकारी हथियार” (वीपन्स ऑफ मास डिस्ट्रक्शन) हैं और ऐसी कई बातें कहकर जो सच नहीं निकलीं।" और वह आज खुद झूठ बोल रहा है कि मादुरो ड्रग तस्कर हैं! कौन यकीन करेगा? झूठा प्रोपगेंडा फैलाना तो अमरीकी साम्राज्यवाद की पुरानी चाल है।

अमरीकी अदालतों में मादुरो पर लगाए गए ड्रग तस्करी जैसे संगीन आरोप भी इसी प्रोपगेंडा का हिस्सा हैं। इन आरोपों का उद्देश्य कानूनी न्याय से ज़्यादा राजनीतिक बदनामी है, ताकि वेनेज़ुएला पर किसी भी अमरीकी हस्तक्षेप को ‘नैतिक’ जामा पहनाया जा सके। लेकिन जब ये आरोप 6 जनवरी को अदालतों में टिक नहीं पाए और धराशायी हो गए, तब यह साफ़ हो गया कि तथ्यों से ज़्यादा अफ़वाह, झूठ और राजनीतिक दुर्भावना के सहारे एक संप्रभु राष्ट्राध्यक्ष को अपराधी साबित करने की चाल चली गई थी जो विफल हो गयी है। यह विफलता अमरीकी दावों की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लगाती है।

लातिन अमरीका के संदर्भ में यदि किसी गंभीर विश्लेषक की बात मानी जानी चाहिए, तो विजय प्रसाद का नाम सामने आता है। ट्राई-कंटीनेंटल: इंस्टीट्यूट फॉर सोशल रिसर्च के अध्यक्ष के रूप में और एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी बुद्धिजीवी के तौर पर उन्होंने वेनेज़ुएला पर दिए अपने इंटरव्यू में बार-बार यह रेखांकित किया है कि मादुरो सरकार के खिलाफ संघर्ष लोकतंत्र बनाम तानाशाही का नहीं, बल्कि साम्राज्यवादी नियंत्रण बनाम राष्ट्रीय संप्रभुता का सवाल है। उनके विश्लेषण इस बात को पुष्ट करते हैं कि वेनेज़ुएला में संकट कृत्रिम रूप से पैदा किया गया है, ताकि तेल, राजनीति और भू-रणनीति पर बाहरी नियंत्रण स्थापित किया जा सके। वेनेज़ुएला को आर्थिक रूप से तबाह करने के लिए अमरीका ने दस सालों से उसकी आर्थिक घेरेबंदी कर रखी है, फिर भी वह शान से खडा है, यह किसी अचरज से कम नहीं।

इतिहास पर नज़र डालें तो 7 अप्रैल 2002 के आसपास घटित घटनाएँ आज भी चेतावनी की तरह मौजूद हैं। उस समय ह्यूगो शावेज़ के खिलाफ अमरीकी समर्थन से किया गया तख्तापलट कुछ घंटों से ज़्यादा नहीं टिक पाया था। जनता, सेना के राष्ट्रवादी-निचले तबकों और क्रान्तिकारी संगठनों की सक्रियता ने उस साज़िश को ध्वस्त कर दिया था। आज जब वेनेज़ुएला के खिलाफ वही भाषा, हथकंडे और ‘वैकल्पिक नेतृत्व’ सामने लाए जा रहे हैं, तो ऐसा लगता है कि इतिहास सचमुच अपने को दोहरा रहा है, फर्क सिर्फ़ इतना है कि इस बार अमरीकी साम्राज्यवादी खेमे की स्थिति और भी डाँवाडोल दिखाई दे रही है।

ट्रम्प की इस आपराधिक और एकतरफ़ा कार्रवाई ने वैश्विक राजनीति की वास्तविक दरारों को फिर से उजागर कर दिया है। यूरोपीय देश, जो सामान्यतः अमरीकी विदेश नीति के साथ क़दम मिलाकर चलने के आदी रहे हैं, इस बार खुलकर समर्थन करने की स्थिति में नहीं हैं। एक ओर वे अमरीका से अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते तोड़ नहीं सकते, दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय क़ानून, संप्रभुता और “लोकतांत्रिक मूल्यों” की खुली अवहेलना का समर्थन करना उनके अपने राजनीतिक ढोंग को भी बेनक़ाब कर देता है। इसी दुविधा के कारण यूरोप की प्रतिक्रियाएँ आधे-अधूरे बयान, “चिंता” जताने और अस्पष्ट अपीलों तक सीमित रह गई हैं। यह चुप्पी या अनिर्णय दरअसल समर्थन नहीं, बल्कि अमरीकी दबाव और अपनी सीमाओं की स्वीकारोक्ति है।

भारत की स्थिति और भी अधिक असहज है। मौजूदा भारतीय सरकार पहले से ही ट्रम्प और अमरीकी सत्ता प्रतिष्ठान के आगे नतमस्तक है। सामरिक साझेदारी, हथियारों की ख़रीद, व्यापार समझौते और भू-राजनीतिक संरक्षण की आकांक्षा ने भारत सरकार को खुलकर बोलने से रोके रखा है। नतीजा यह कि जब वेनेज़ुएला जैसे संप्रभु देश पर खुला हमला होता है, तब भारत सरकार न तो स्पष्ट विरोध करती है और न ही नैतिक साहस दिखा पाती है। यह चुप्पी केवल कूटनीतिक संतुलन नहीं, बल्कि डर और निर्भरता की अभिव्यक्ति है, जो सरकार की घोषित “स्वतंत्र विदेश नीति” के दावों की पोल खोल देती है।

इसके ठीक उलट तस्वीर रूस, चीन, ईरान और ब्राज़ील जैसे देशों में दिखाई देती है। ये देश बिना किसी हिचक के, सीना तानकर ट्रम्प की दादागिरी के खिलाफ खड़े हैं। रूस और चीन इसे केवल वेनेज़ुएला का प्रश्न नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अमरीकी मनमानी को चुनौती देने का सवाल मानते हैं। ईरान, जो स्वयं लंबे समय से अमरीकी प्रतिबंधों और हस्तक्षेप का शिकार रहा है, वेनेज़ुएला में हो रही घटनाओं को अपने अनुभवों से जोड़कर देखता है। ब्राज़ील, तमाम आंतरिक उथल-पुथल के बावजूद, इस मुद्दे पर वेनेजुएला को खुला समर्थन देकर यह संकेत दे रहा है कि लातिन अमरीका अब बिना शर्त अमरीकी पिछलग्गू बनने को तैयार नहीं है।

वेनेज़ुएला रूस और चीन की “कठपुतली” नहीं है क्योंकि वेनेज़ुएला की रूस और चीन से निकटता किसी वैचारिक अधीनता का परिणाम नहीं, बल्कि अमरीकी दबाव, प्रतिबंधों और हस्तक्षेप की सीधी प्रतिक्रिया है। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति में, हम देखते हैं कि जब किसी देश को आर्थिक घेराबंदी, वित्तीय नाकेबंदी और सत्ता-परिवर्तन की धमकियों का सामना करना पड़ता है, तो उसके पास विकल्प सीमित हो जाते हैं। ऐसे में वह उन अंतरराष्ट्रीय शक्तियों की ओर झुकता है जो उसकी संप्रभुता को औपचारिक रूप से स्वीकार करती हैं और बिना राजनीतिक शर्तों के सहयोग देने को तैयार होती हैं।

रूस और चीन का वेनेज़ुएला से रिश्ता मूलतः रणनीतिक और लेन-देन आधारित है-- तेल, ऊर्जा, ऋण, तकनीक और रक्षा सहयोग के स्तर पर। चीन न तो वेनेज़ुएला में अपनी राजनीतिक प्रणाली थोप रहा है, न ही वहाँ किसी “वैकल्पिक सरकार” को खड़ा कर रहा है। रूस भी सैन्य अड्डों या प्रत्यक्ष प्रशासनिक नियंत्रण की कोशिश नहीं कर रहा। इस अर्थ में यह रिश्ता अमरीकी साम्राज्यवाद के पारंपरिक “कठपुतली शासन” मॉडल से बुनियादी तौर पर अलग है। आज की दुनिया में अमरीकी साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़ा होना अपने-आप में रूस या चीन की कठपुतली बन जाना नहीं है।

वेनेज़ुएला रूस और चीन का “डॉलर उपनिवेश” (या आर्थिक उपनिवेश) भी नहीं है क्योंकि अमरीका का डॉलर उपनिवेश बनने से बचने के लिए ही वह रूस और चीन की ओर गया है, न कि उनके अधीन होने के लिए। बता दूँ कि डॉलर उपनिवेश वह होता है जिसकी अर्थव्यवस्था, मुद्रा, ऋण, व्यापार और नीतियाँ किसी बाहरी शक्ति के वित्तीय तंत्र से नियंत्रित हों-- जैसे आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक, अमेरिकी डॉलर आधारित कर्ज़ और निजी पूँजी की शर्तें। यदि वेनेज़ुएला सचमुच उनका आर्थिक उपनिवेश होता, तो वहाँ खुले रूप से अमरीका-विरोधी नीति अपनाने की स्वतंत्रता, तेल नीति पर राज्य का नियंत्रण और घरेलू राजनीति में स्वायत्त निर्णय संभव नहीं होते। लेकिन वेनेज़ुएला में एक गंभीर संरचनात्मक समस्या मौजूद है। अमरीकी प्रतिबंधों, वित्तीय नाकेबंदी और बाज़ारों से बहिष्कार ने उसे ऐसी स्थिति में धकेल दिया है जहाँ उसे सीमित विकल्पों में सौदे करने पड़े हैं। इस दबाव में किए गए समझौते अक्सर दीर्घकालिक निर्भरता पैदा करते हैं। यह स्थिति आर्थिक उपनिवेश नहीं, बल्कि घेराबंदी में फँसे राज्य की असमान सौदेबाज़ी है। इसका अर्थ यह है कि वह रूस-चीन के आर्थिक दबावों और निर्भरताओं से मुक्त भी नहीं है।

रूस-चीन बनाम अमरीका का वैश्विक विभाजन इस बात का प्रमाण है कि ट्रम्प का दौर केवल आक्रामकता का नहीं, बल्कि अमरीकी वर्चस्व के क्षरण का भी दौर है। जहाँ कुछ देश डर, अवसरवाद या निर्भरता के कारण चुप हैं, वहीं कुछ देश खुलकर यह कहने की स्थिति में आ चुके हैं कि दुनिया अब एकध्रुवीय आदेश को बिना सवाल स्वीकार नहीं करेगी। वेनेज़ुएला का प्रश्न इस मायने में केवल एक देश का संकट नहीं, बल्कि उस उभरती हुई बहुध्रुवीय दुनिया का संकेत है, जिसमें साम्राज्यवादी धौंस को चुनौती देना धीरे-धीरे संभव होता जा रहा है।

इस पूरी प्रक्रिया में सिलिया एडेला फ्लोरेस की भूमिका को नज़रअंदाज़ करना भारी भूल होगी। उन्हें केवल “राष्ट्रपति मादुरो की पत्नी” के रूप में देखना राजनीतिक अज्ञानता का परिचय है। वे स्वयं एक अनुभवी क्रान्तिकारी नेता हैं, जिन्होंने 2006 से 2011 तक वेनेज़ुएला की राष्ट्रीय सभा की अध्यक्षता की और 2015 से अपने गृह राज्य कोजेडेस से उप-सदस्य के रूप में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं। बोलिवेरियन क्रांति की राजनीतिक कमान के अध्यक्ष के रूप में वे उस सामरिक ढाँचे का हिस्सा रहीं, जिसने शावेज़ के दौर में क्रांति की राजनीतिक मशीनरी को संचालित किया।

2002 के तख्तापलट प्रयास से ठीक पहले, फ्लोरेस ने गुइलेर्मो गार्सिया पोंस और फ्रेडी बर्नाल जैसे नेताओं के साथ मिलकर बोलिवेरियन सर्किलों को संगठित करने की जो योजना बनाई थी, वह किसी अराजक हिंसा की नहीं, बल्कि चुनी हुई सरकार और राष्ट्रपति भवन मीराफ्लोरेस की रक्षा की रणनीति थी। विपक्षी मार्चों और तख्तापलट की कोशिशों के सामने जनता को ब्रिगेडों में संगठित कर खड़ा करना इस बात का प्रमाण था कि बोलिवेरियन क्रांति केवल संस्थानों में नहीं, बल्कि सड़कों और मोहल्लों में भी अपनी जड़ें रखती है।

इन तमाम तथ्यों को एक साथ देखने पर स्पष्ट होता है कि मादुरो, वेनेज़ुएला सरकार और बोलिवेरियन नेतृत्व के खिलाफ चलाया जा रहा अभियान कोई आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक लंबे साम्राज्यवादी षड्यंत्र की कड़ी है। और उतना ही स्पष्ट यह भी है कि यह षड्यंत्र पहले भी विफल हुआ है और आज भी उसी ऐतिहासिक तर्क के तहत विफल होता हुआ दिखाई दे रहा है।

बोलिवेरियन क्रान्ति के प्रति मेरे समर्थन को इस तरह नहीं समझा जाना चाहिए कि मैं उसे रूस की समाजवादी क्रान्ति या चीन की नवजनवादी क्रान्ति के बराबर रख रहा हूँ। तीनों के बीच ऐतिहासिक, सामाजिक और वैचारिक स्तर पर स्पष्ट भिन्नताएँ हैं। समर्थन का अर्थ यांत्रिक समानता नहीं होता, बल्कि किसी ठोस ऐतिहासिक प्रक्रिया की प्रगतिशील भूमिका को पहचानना होता है।

किसी भी ऐतिहासिक प्रक्रिया को उसके अपने समय, परिस्थितियों और अंतर्विरोधों के संदर्भ में समझना अनिवार्य है। रूस की 1917 की समाजवादी क्रान्ति पूँजीवादी संक्रमणकालीन समाज में हुई, जहाँ विश्व युद्ध, ज़मींदारी उत्पीड़न, मज़दूर आंदोलनों और बोल्शेविक पार्टी जैसी संगठित क्रान्तिकारी शक्ति मौजूद थी। चीन की नवजनवादी क्रान्ति उपनिवेशवाद, अर्ध-सामंती ढाँचे और दीर्घकालीन सशस्त्र जनयुद्ध की उपज थी। इसके विपरीत बोलिवेरियन क्रान्ति एक ऐसे लातिन अमरीकी समाज में उभरी, जहाँ औपचारिक लोकतंत्र मौजूद था, लेकिन आर्थिक संप्रभुता पूरी तरह साम्राज्यवादी पूँजी के अधीन थी। इसलिए उसे उसी फ्रेम में तौलना ऐतिहासिक अन्याय होगा। इसके साथ ही आज दुनिया के किसी भी देश में वैसी परिस्थितियाँ मौजूद नहीं हैं जैसी रूस में ज़ारशाही के पतन के समय थीं। न तो वैसी क्रान्तिकारी पार्टी संरचनाएँ हैं, न ही वैसा अंतरराष्ट्रीय शक्ति-संतुलन, जहाँ समाजवादी राज्य के टिके रहने की संभावना वैसी हो। सोवियत संघ के विघटन के बाद पूँजीवादी व्यवस्था ने वैश्विक स्तर पर वर्चस्व कायम किया है। ऐसे दौर में वेनेजुएला जैसे उदाहरण भी जनता में बेहतर भविष्य के प्रति उम्मीद पैदा करते हैं।

आज साम्राज्यवाद का विरोध एक प्रगतिशील कदम है। जब विश्व व्यवस्था बहुराष्ट्रीय कंपनियों, वित्तीय पूँजी और सैन्य गठबंधनों के ज़रिये देशों की संप्रभुता को निगल रही हो, तब किसी भी देश द्वारा इस दबाव का प्रतिरोध करना जनता के पक्ष में खड़ा होना है। यह सोवियत रूस जैसा समाजवाद नहीं हो सकता, लेकिन समाजवाद की दिशा में एक कदम हो सकता है। बोलिवेरियन प्रक्रिया इसी स्तर पर ऐतिहासिक महत्त्व ग्रहण करती है।

शावेज़ और मादुरो द्वारा संचालित राज्य को इसी कारण एक कल्याणकारी राज्य के रूप में समझना चाहिए। उन्होंने पूँजीवादी ढाँचे को पूरी तरह उखाड़ फेंकने का दावा नहीं किया, लेकिन तेल संपदा को जनता के हित में इस्तेमाल करने, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और खाद्य सुरक्षा जैसी बुनियादी ज़रूरतों को राज्य की ज़िम्मेदारी बनाने का प्रयास किया। यह एक ऐसा मॉडल है जो नवउदारवादी कटौतियों और निजीकरण के दौर में सीधे जनता के जीवन को छूता है। यह समाजवादी क्रान्ति नहीं है, लेकिन समाज-विरोधी पूँजीवाद के मुक़ाबले जनता-पक्षधर राजनीति ज़रूर है।

इसलिए बोलिवेरियन क्रान्ति का समर्थन किसी ऐतिहासिक भ्रम या भावनात्मक आग्रह से नहीं, बल्कि इस समझ से निकलता है कि आज के दौर में हर वह प्रक्रिया जो साम्राज्यवादी वर्चस्व को चुनौती देती है और जनता के न्यूनतम सामाजिक अधिकारों की रक्षा करती है, वह वस्तुगत रूप से प्रगतिशील भूमिका निभा रही है-- भले ही उसकी सीमाएँ और अंतर्विरोध कितने ही गहरे क्यों न हों।

दोनों विरोधी शक्तियों की टकराव किस दिशा में आगे बढ़ेगी, यह देखना अभी बाकी है. क्या सम्भावनाएं हैं?

एक संभावना यह है कि यह टकराव नियंत्रित तनाव (managed conflict) के रूप में चलता रहे। अमरीका प्रतिबंध, कानूनी दबाव, मीडिया युद्ध और विपक्षी गुटों को सहारा देता रहेगा, जबकि वेनेज़ुएला रूस–चीन–ईरान जैसे देशों के साथ गठबंधन के सहारे किसी तरह आर्थिक और राजनीतिक संतुलन बनाए रखेगा। यह स्थिति न जीत है, न हार-- बल्कि दोनों पक्षों की थकान का खेल है। अभी सबसे यथार्थवादी संभावना यही दिखाई देती है।

दूसरी संभावना कूटनीतिक पुनर्संयोजन की है। यदि अमरीका को यह साफ़ दिखने लगे कि सत्ता-परिवर्तन की रणनीति असफल हो चुकी है और प्रतिबंधों से अपेक्षित नतीजे नहीं मिल रहे, तो वह धीरे-धीरे संवाद की ओर लौट सकता है-- जैसा कि इतिहास में क्यूबा, ईरान और वियतनाम के साथ हुआ। इसमें वेनेज़ुएला से कुछ सीमित रियायतें माँगी जाएँगी, लेकिन सत्ता ढाँचा गिराने का लक्ष्य पीछे खिसक सकता है। यह साम्राज्यवाद की पराजय नहीं, बल्कि रणनीतिक पीछे हटना होगा।

तीसरी संभावना वेनेज़ुएला के भीतर से जुड़े जोखिमों की है। आर्थिक संकट, महँगाई, प्रवासन और थकान यदि जनता के धैर्य को तोड़ती है और सरकार जनाधार बनाए रखने में विफल होती है, तो अमरीका इसी आंतरिक असंतोष को नया हथियार बना सकता है। यह बाहरी आक्रमण नहीं, बल्कि अंदर से दबाव पैदा करने की रणनीति होगी। इस स्थिति में टकराव का केंद्र वेनेज़ुएला के भीतर खिसक जाएगा।

चौथी संभावना-- हालाँकि कम संभावित, लेकिन पूरी तरह असंभव नहीं-- यह है कि वैश्विक शक्ति-संतुलन में बड़ा बदलाव आए। यदि दुनिया तेज़ी से बहुध्रुवीय होती है और अमरीकी वर्चस्व और कमजोर पड़ता है, तो वेनेज़ुएला जैसे देश अपेक्षाकृत अधिक आत्मविश्वास के साथ स्वतंत्र नीतियाँ अपना सकेंगे। तब यह टकराव किसी द्विपक्षीय संघर्ष से बदलकर एक वैश्विक व्यवस्था के पुनर्गठन का हिस्सा बन जाएगा।

पाँचवीं और सबसे खतरनाक संभावना प्रत्यक्ष सैन्य टकराव की है, लेकिन यह फिलहाल सबसे कम संभावित है। सैन्य हस्तक्षेप की क़ीमत-- लैटिन अमरीका में अस्थिरता, अंतरराष्ट्रीय विरोध, तेल बाज़ार में उथल-पुथल और रूस–चीन की प्रतिक्रिया-- अमरीका के लिए बहुत महँगी होगी। इसलिए यह विकल्प ज़्यादातर धमकी और दबाव की भाषा तक सीमित रहने की संभावना रखता है।

@विक्रम प्रताप

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