डैनियल कोहन-बेंडिट: मई-68 आन्दोलन का लोकप्रिय छात्र नेता
1968 का साल पूरी दुनिया में उथल-पुथल का साल था। जगह-जगह छात्र, नौजवान, मजदूर और आम लोग पुराने ढाँचे, राजनीति और दमनकारी सरकारों के खिलाफ सड़कों पर उतर रहे थे। अमरीका में वियतनाम युद्ध के खिलाफ आन्दोलन चल रहा था। अफ्रीका और एशिया के देशों में उपनिवेशवाद के खिलाफ लड़ाइयाँ जारी थीं। चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति चल रही थी। इसी दौर में फ्रांस में भी एक ऐसा विस्फोट हुआ जिसने पूरी दुनिया को हिला दिया। इस आन्दोलन का सबसे चर्चित चेहरा बना एक दुबला-पतला, लंबे बालों वाला 22 साल का छात्र-- डैनियल कोहन-बेंडिट। वे मई-68 आन्दोलन के सबसे लोकप्रिय छात्र नेता थे।
डैनियल कोहन-बेंडिट का जन्म 1946 में फ्रांस में हुआ था। उनके माता-पिता जर्मन यहूदी थे, जो हिटलर और नाज़ीवाद के दौर में जर्मनी से भागकर फ्रांस आये थे। इस वजह से डैनियल के पास फ्रांस और जर्मनी-- दोनों देशों की नागरिकता थी। बाद में यही बात फ्रांसीसी सरकार के लिए उन्हें निशाना बनाने का बहाना भी बनी।
उस समय फ्रांस पर चार्ल्स डी गॉल की सरकार का शासन था। डी गॉल को दूसरे विश्व युद्ध का हीरो माना जाता था, लेकिन 1960 के दशक तक उनका शासन तानाशाही और दमन का प्रतीक बन गया था, ऊपर से वह युवाओं से भी कट गया था। फ्रांस के आमिर आर्थिक रूप से समृद्ध हो रहे थे, लेकिन जनता के भीतर बेचैनी बढ़ती जा रही थी। खासकर छात्रों और नौजवानों के बीच।
फ्रांस के विश्वविद्यालयों की हालत खराब थी। छात्रों की संख्या लगातार बढ़ रही थी, लेकिन सुविधाएँ नहीं बढ़ रही थीं। क्लासरूम भरे रहते थे, छात्रावास कम थे और शिक्षा व्यवस्था बेहद नीरस और अफसरशाही वाली थी। विश्वविद्यालयों में छात्रों को केवल पढ़ाई करने वाली मशीन समझा जाता था। उनके सामाजिक जीवन, लोकतांत्रिक अधिकारों और स्वतंत्र सोच की कोई परवाह नहीं करता था। विश्वविद्यालय के प्रशासनिक अधिकारी बेहद जालिम थे।
डैनियल पेरिस के बाहरी इलाके में बने नए नान्टेरे विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र पढ़ते थे। यह विश्वविद्यालय फ्रांस की शिक्षा व्यवस्था की सारी समस्याओं का प्रतीक बन चुका था। वहाँ इमारतें तो थीं, लेकिन छात्रों के लिए कोई सामाजिक माहौल नहीं था। चारों तरफ बेरंग कंक्रीट की इमारतें थीं। छात्रों में गुस्सा बढ़ रहा था।
धीरे-धीरे यह गुस्सा केवल विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ सीमित नहीं रहा। छात्रों को लगने लगा कि पूरी व्यवस्था ही दम घोंटने वाली है। सरकार, पुलिस, शिक्षा व्यवस्था, पुरानी नैतिकता-- सब कुछ सवालों के घेरे में आने लगा। डैनियल कोहन-बेंडिट और उनके साथी इस बेचैनी को आवाज दे रहे थे।
मार्च 1968 में एक छोटी-सी घटना ने बड़े विस्फोट का रूप ले लिया। 22 मार्च को नान्टेरे विश्वविद्यालय में एक सरकारी कार्यक्रम था। डैनियल और उनके साथियों ने इस कार्यक्रम में बाधा डाली और विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। इसके बाद उन छात्रों को अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए बुलाया गया। सुनवाई 3 मई को पेरिस के मशहूर सोरबोन विश्वविद्यालय में होनी थी।
यहीं से इतिहास ने करवट ली।
3 मई 1968 को जब कुछ छात्र सुनवाई के लिए सोरबोन पहुँचे, तब उनके समर्थन में थोड़े छात्र बाहर इकट्ठा हुए। यह कोई बहुत बड़ा प्रदर्शन नहीं था। लेकिन अचानक पुलिस विश्वविद्यालय परिसर में घुस आयी। सदियों में पहली बार ऐसा हुआ था कि पुलिस ने सीधे विश्वविद्यालय के अंदर प्रवेश करके छात्रों पर हमला किया हो।
पुलिस ने छात्रों को पीटना शुरू किया, गिरफ्तारियाँ कीं और पूरे इलाके को युद्धक्षेत्र में बदल दिया। यह खबर पूरे पेरिस में फैल गयी। महीनों से दबा हुआ छात्र गुस्सा अचानक विस्फोट की तरह बाहर आ गया।
अगले कई दिनों तक पेरिस की सड़कों पर लगातार प्रदर्शन होते रहे। छात्र सड़कों पर उतर आये। पुलिस हर प्रदर्शन को लाठी, आंसू गैस और हिंसा से कुचलने की कोशिश कर रही थी। लेकिन हर दमन के बाद आन्दोलन और फैलता जा रहा था। चीन की सर्वहारा सांस्कृतिक क्रान्ति की प्रेरणा भी काम कर रही थी।
10 और 11 मई की रात को हालात पूरी तरह बदल गये। इस रात को बाद में “बैरिकेड्स की रात” कहा गया। छात्रों और नौजवानों ने पेरिस की सड़कों पर बैरिकेड बना दिये। पत्थर उखाड़कर सड़कें रोक दी गयीं। जगह-जगह आग जल रही थी। पुलिस बख्तरबंद गाड़ियों, लाठियों और गैस के साथ आगे बढ़ रही थी।
पूरा पेरिस क्रान्ति के रंग में सराबोर हो गया।
इस दौरान डैनियल कोहन-बेंडिट आन्दोलन का सबसे मशहूर चेहरा बन चुके थे। लोग उन्हें “डैनी द रेड” कहने लगे थे। “रेड” यानी लाल। लेकिन दिलचस्प बात यह थी कि वे किसी बड़े संगठन के औपचारिक नेता नहीं थे। आन्दोलन इतना व्यापक और स्वत:स्फूर्त था कि कोई एक संगठन उसे नियंत्रित नहीं कर सकता था। डैनियल केवल इसलिए सामने आ गये क्योंकि वे शुरू से संघर्ष में सक्रिय थे और खुलकर बोलते थे।
उनकी भाषा सीधी, तीखी और मजाकिया थी। वे पुराने नेताओं की तरह भारी-भरकम भाषण नहीं देते थे। वे छात्रों की बेचैनी और गुस्से को उन्हीं भाषा में व्यक्त करते थे जिसे युवा समझते थे। यही वजह थी कि वे हजारों छात्रों के बीच लोकप्रिय हो गये।
लेकिन असली मोड़ तब आया जब मजदूर वर्ग इस आन्दोलन में शामिल होने लगा।
फ्रांस के मजदूर पहले से सरकार और मालिकों से नाराज थे। कम मजदूरी, खराब काम की स्थिति और सरकारी दमन के खिलाफ उनमें भी गुस्सा था। जब उन्होंने देखा कि छात्र पुलिस की मार खा रहे हैं और सरकार को चुनौती दे रहे हैं, तो उनके भीतर भी हलचल शुरू हुई।
ट्रेड यूनियनों ने समर्थन में हड़ताल का आह्वान किया।
फिर जो हुआ, उसने पूरी दुनिया को चौंका दिया।
लाखों मजदूर हड़ताल पर चले गये। कारखानों पर कब्ज़ा होने लगा। रेलवे, फैक्ट्री, अखबार, रेडियो स्टेशन-- हर जगह आन्दोलन फैल गया। कुछ ही दिनों में लगभग एक करोड़ मजदूर हड़ताल में शामिल हो गये। पूरा फ्रांस लगभग ठप्प पड़ गया।
छात्र और मजदूर साथ-साथ मार्च कर रहे थे। यह केवल शिक्षा सुधार का आन्दोलन नहीं रह गया था। अब सवाल पूरी व्यवस्था बदलने का था।
डैनियल कोहन-बेंडिट इस दौर में विश्व मीडिया के सबसे चर्चित चेहरों में से एक बन गये। अखबारों और टीवी पर उनकी तस्वीरें छप रही थीं। सरकार उन्हें आन्दोलन का खतरनाक चेहरा बताने लगी।
एक सरकारी अधिकारी ने उन्हें “वह जर्मन यहूदी” कहकर अपमानित करने की कोशिश की। सरकार सोच रही थी कि विदेशी और यहूदी कहकर लोगों को उनके खिलाफ भड़काया जा सकता है। लेकिन इसका उल्टा असर हुआ।
पेरिस की सड़कों पर हजारों लोग नारा लगाने लगे-- “हम सब जर्मन यहूदी हैं।”
यह केवल डैनियल के समर्थन का नारा नहीं था। यह नस्लवाद, राष्ट्रवाद और सरकारी घृणा की राजनीति के खिलाफ भी जवाब था।
लेकिन आन्दोलन के भीतर भी कई तरह के अन्तर्विरोध थे। छात्र बहुत उग्र थे, लेकिन मजदूर यूनियनों का नेतृत्व पूरी तरह क्रान्तिकारी रास्ते पर नहीं जाना चाहता था। संशोधनवाद का घुन उनकी जड़ों को खोखला कर चुका था। फ्रांस की बड़ी कम्युनिस्ट पार्टी और ट्रेड यूनियन नेतृत्व आन्दोलन को सीमित दायरे में रखना चाहते थे। वे सरकार के साथ अवसरवादी समझौते की तरफ बढ़ने लगे।
डी गॉल सरकार भी संभलने लगी। उसने समय लेकर अपनी ताकत इकट्ठी की। पुलिस और प्रशासन को फिर संगठित किया गया। धीरे-धीरे आन्दोलन पर दबाव बढ़ने लगा।
24 मई 1968 को सरकार ने डैनियल कोहन-बेंडिट को फ्रांस से निष्कासित कर दिया। उनकी दोहरी नागरिकता को बहाना बनाया गया। उन्हें फ्रांस में दोबारा प्रवेश करने से रोक दिया गया।
लेकिन तब तक वे दुनिया भर के युवाओं के लिए एक आदर्श बन गये थे।
हालाँकि 1968 का आन्दोलन तत्काल सत्ता परिवर्तन में नहीं बदल सका, लेकिन उसने यूरोप और पूरी दुनिया की राजनीति और संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। उसने यह दिखाया कि छात्र–नौजवान केवल पढ़ाई करने वाला निष्क्रिय समूह नहीं हैं। जब वे मजदूरों और आम जनता से जुड़ते हैं, तो पूरी व्यवस्था को चुनौती दे सकते हैं।
इस आन्दोलन ने विश्वविद्यालयों, संस्कृति, स्त्री अधिकारों, यौन स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक अधिकारों और सामाजिक जीवन पर गहरा असर डाला। पुरानी रूढ़ियाँ टूटने लगीं। लोगों ने सत्ता, परिवार, शिक्षा और समाज के पुराने ढाँचों पर सवाल उठाने शुरू किये।
लेकिन इस आन्दोलन ने कुछ सीमाएँ भी दिखायीं। केवल छात्र उभार काफी नहीं होता। अगर मजदूर वर्ग का संगठित और स्पष्ट राजनीतिक नेतृत्व न हो, तो इतना बड़ा विस्फोट भी अंततः बिखर जाता है। स्वत:स्फूर्त गुस्सा बहुत ताकतवर होता है, लेकिन उसे दिशा देने के लिए संगठन, रणनीति और क्रांतिकारी परिप्रेक्ष्य की जरूरत होती है।
डैनियल कोहन-बेंडिट बाद के वर्षों में मुख्यधारा की राजनीति की तरफ चले गये। वे बाद में यूरोपीय संसद के सदस्य भी बने और हरित राजनीति से जुड़ गये। लेकिन 1968 में उनकी भूमिका आज भी इतिहास में दर्ज है।
वे उस दौर के प्रतीक बन गये जब दुनिया भर के नौजवानों ने पुरानी दुनिया को चुनौती देने की कोशिश की थी। उनकी कहानी यह भी बताती है कि इतिहास में कई बार छोटे-से छात्र आन्दोलन अचानक पूरे समाज को हिला देने वाले विस्फोट में कैसे बदल जाते हैं।