आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के नाम क्या–क्या खेल
ईडब्ल्यूएस यानी आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग पर तब चर्चा शुरू हो गयी जब खबर मिली कि सुप्रीम कोर्ट ने 9 सितम्बर, 2026 को यथार्थ सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल को कड़ी फटकार लगायी। कारण यह है कि ईडब्ल्यूएस के मरीजों को आपातकालीन चिकित्सा सुविधा प्रदान करने के लिए मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार करने सम्बन्धी सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी अवमानना नोटिस का जवाब अस्पताल ने नहीं दिया था। दूसरी खबर है–– सत्य निकेतन की बिल्डिंग ढहने के मामले में पाया गया कि ईडब्ल्यूएस के तहत छोटी जमीन हासिल करने वाला मकान–मालिक करोड़पति है। यह इस योजना में भ्रष्टाचार को दिखाता है कि शासन–प्रशासन से मिलीभगत करके कैसे करोड़पति भी खुद को कमजोर वर्ग में शामिल करा लेते हैं।
कमजोर वर्ग समाज का वह समूह जिसके पास शहर में 100 गज से कम, देहात में 200 गज से कम जमीन हो, पाँच एकड़ से कम खेत हो और सभी स्रोतों से मिलाकर कुल वार्षिक आय 8 लाख रुपये से कम हो। एससी, एसटी और ओबीसी सभी समुदायों में यह वर्ग मौजूद है। उसकी जिन्दगी को आसान बनाने का दावा करने वाली सरकारी सुविधाएँ आती रहती हैं। सरकारी योजनाओं के नाम और प्रचार इस तरह होते हैं जैसे लगे कि इस वर्ग की चिन्ता में सरकार मरी जा रही है।
उच्च मध्यम वर्गीय लोग इस वर्ग के खिलाफ दिल में नफरत भी रखते हैं। उनका सवाल होता है कि हमारे टैक्स से इन गरीबों को सुविधाएँ क्यों दी जा रही हैं। खैर, यह भी एक भ्रम है। असल में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए चलने वाली योजनाओं की मलाई कोई और ही लूट रहा है। जैसे किसी ने कहा है कि इस देश में जितनी मर्जी योजना बना लो रुपया, पैसा, धन–दौलत सब चन्द पूँजीपतियों के हाथों में पहुँच जाता है। रास्ता उसका कुछ भी हो सकता है। कभी वह सीधे पूँजीपतियों के लोन माफ करके, कभी रोजगार सृजन के नाम पर उन्हें जमीन देकर तो कभी ईडब्ल्यूएस के नाम पर निजी अस्पतालों और कॉलेजों को जमीन देकर।
कमजोर वर्ग के लिए सरकारें आवास की व्यवस्था करती हैं, अस्पतालों को रियायती दरों पर जमीन देती हैं और बदले में गरीबों के लिए कुछ सुविधाएँ सुनिश्चित करती हैं। पर सरकारी और धन्ना सेठ मिलकर इस तरह जाल बुनते हैं कि इसका फायदा इस वर्ग को नहीं मिल पाता।
फिर कौन असली मलाई लूट लेता है–– गुरुग्राम में ईडब्ल्यूएस के लिए दिये गये छोटे–छोटे प्लॉटों के उदाहरण से समझते हैं। वर्षों पहले गरीब परिवारों के लिए भूखण्ड निर्धारित किये गये। नियमों को ताक पर रखकर उन पर पाँच–छह मंजिली इमारतें खड़ी कर दी गयीं। कई जगहों पर उन्हें पीजी तथा व्यावसायिक इस्तेमाल में बदल दिया गया। नियमों के अनुसार जहाँ दो–ढाई मंजिल के निर्माण की अनुमति थी, वहाँ पूरी जमीन पर बहुमंजिला इमारत खड़ी हैं। यह काम बिल्डरों ने नगर निगम के अधिकारियों के साथ मिली–भगत करके किया है। यह खुलासे दिल्ली में घटी सत्य निकेतन की दर्दनाक घटना के बाद हुए हैं। जो घटना दिल्ली में घटी वैसी ही परिस्थिति लिए आज दिल्ली–नोएडा–गुरूग्राम में दसियों हजार इमारतें हैं। वे मुनाफे की हवश में सभी नियम कानूनों को ताक पर रखकर बनायी गयी हैं।
अब जरा अस्पतालों की ओर आइए। सरकार ने बहुत सारे निजी अस्पतालों को रियायती दरों पर जमीन दी, बदले में उनके सामने गरीबों के इलाज की जिम्मेदारी रखी गयी। सुप्रीम कोर्ट के 2018 के निर्णय से जुड़े मामले में ऐसे अस्पतालों के लिए ईडब्ल्यूएस मरीजों को ओपीडी में 25 प्रतिशत और आईपीडी में 10 प्रतिशत मुफ्त उपचार देने की व्यवस्था का उल्लेख है। लेकिन यह कागज की लेखी बनकर ही रह गयी। असल में निजी अस्पताल या तो मेडिकल इंश्योरेंस वालों को भर्ती करते हैं या जो उन्हें नकद रुपये दे उनका इलाज करते हैं। इस तरह की लापरवाही पर जब कोर्ट ने 52 निजी अस्पतालों की एक बैठक बुलाई तो उनमें से केवल 12 पहुँचे। अन्य क्यों नहीं पहुँचे इसके पीछे शायद उनकी राजनीतिक पहुँच है। नोएडा का एक निजी अस्पताल है यथार्थ सुपरस्पेशलिटी हॉस्पिटल, वह भी न पहुँचने वालों में शामिल है। उसमें कोर्ट की अवमानना की हिम्मत उसके मालिक के राजनीतिक सम्बन्धों से आयी होगी। कुछ दिन पहले आगरा में यथार्थ हॉस्पिटल की एक ब्रांच खुली, उत्तरप्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री आदित्य योगीनाथ उसके उदघाटन में पहुँचे। कैलाश हॉस्पिटल के मालिक तो खुद बीजेपी सांसद महेश शर्मा हैं। यशोदा हॉस्पिटल के मालिक डॉ– दिनेश अरोड़ा के भी बीजेपी के साथ सम्बन्ध हैं। मेदान्ता के संस्थापक डॉ– नरेश बीजेपी और कांग्रेस दोनों के नजदीकी हैं।
इलाज पर लाखों खर्च करने के बजाय हॉस्पिटलों के मालिक नेताओं और सरकारी अफसरों की आवाभगत में खर्च करना ज्यादा पसन्द करते हैं। इससे उन्हें तरह–तरह की स्कीमों का फायदा मिलता है। आपने केन्द्रीय राज्यमंत्री भागीरथ चैधरी का जिक्र सुना होगा उन्होंने अपने ही मंत्रालय से खुद के लिए 99–60 लाख रुपये की सब्सिडी ले ली थी।
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