अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

सत्य निकेतन हादसा : सत्ता के खून सने हाथ

हाल ही में, दिल्ली के सत्य निकेतन में हॉस्टल की पाँच मंजिली इमारत ढहने की घटना ने सबको झकझोर दिया है। इस दर्दनाक हादसे में छ: छात्रों की मौत हो गयी और दर्जनों घायल हुए। देश के दूर–दराज इलाकों से निकल कर दिल्ली पहुँचने वाले इन छात्रों और उनके परिवारों के सभी सपने टूट–बिखर गये। शिक्षा, नौकरी और सम्मानजनक जिन्दगी जीने का उनका सफर हमेशा–हमेशा के लिए खत्म हो गया।  शासन, प्रशासन, मीडिया, अभिवावक और प्रत्यक्षदर्शियों के गुस्से का केन्द्र पीजी मालिक बने हुए हैं। यह स्वाभाविक भी है क्योंकि तत्काल और प्रत्यक्ष तौर पर दोषी पीजी मालिक ही है कि उसने अवैध निर्माण किया, समय पर जरूरी जाँच और मरम्मत नहीं करायी, आदि। लेकिन जर्जर और खस्ताहाल पीजी में रहने को मजबूर किसने किया? छात्र बिना हवा और धूप वाले कमरों में आकर कैदी जैसी जिन्दगी गुजर–बसर करने को क्यों मजबूर हुए? इन सवालों के उत्तर जाने बिना हम समस्या की तह तक नहीं पहुँच पाएँगे।

दिल्ली जैसे महानगरों में जनसंख्या घनत्व देश के बाकी इलाकों से ज्यादा है, क्योंकि देशभर के दूरस्थ इलाकों में शिक्षा, इलाज और नौकरियों का बुरा हाल है। इसलिए दिल्ली जैसे महानगर इन सभी मूलभूत सुविधाओं के लिए आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना है–– दिल्ली चलो। कोई गम्भीर बीमारी है, प्राइवेट अस्पतालों में इलाज कराके मरीज की शारीरिक और आर्थिक हालत पस्त हो गयी है–– दिल्ली चलो। सरकारी नौकरी की तैयारी करनी है–– दिल्ली चलो। नौकरी नहीं लग रही, प्राइवेट ही कुछ करना है–– दिल्ली चलो। अगर शिक्षा, अस्पताल और रोजगारों के अवसर दूर–दराज गाँवों तक होते तो दिल्ली जैसे महानगरों में जनसंख्या दबाव इतना नहीं बनता। यह सब केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली असफलता है। देश के छात्र, युवा और घरों से बाहर गुजर करने वाले करोड़ों मेहनतकश–मजदूर इस असफलता की कीमत चुका रहे हैं। कभी किसी इमारत में दबकर, कभी दूषित वातावरण में घुटकर, कहीं टीबी जैसी जानलेवा बीमारियों का शिकार होकर, कहीं फूड पॉइजनिंग के चंगुल में आकर।

शिक्षा के लिए जरूरी बुनियादी ढाँचा क्यों नहीं हैं? जब कोई कॉलेज तैयार होता है तो उसमें कितने दाखिले होंगे, ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट और पीएचडी की कितनी सीट होंगी यह सब निर्धारित होता है। जैसे किसी भी आईआईटी, एम्स, सेंट्रल यूनिवर्सिटी, एनआईटी और यहाँ तक कि राज्य स्तरीय कुछ कॉलेजों में आज भी एडमिशन की सीटों के बराबर ही हॉस्टल सीट होती हैं। उनके छात्रों को किराये के कमरों पर धक्के नहीं खाने होते।

यह शिक्षा मंत्रालय और यूजीसी सब की साझी असफलता है कि वे न तो देश के नौजवानों के हिसाब से पर्याप्त कॉलेज बना पा रहे हैं। जहाँ कॉलेज हैं तो उनके लिए पर्याप्त हॉस्टल नहीं बना पा रहे हैं और न ही भविष्य में हॉस्टल बनाने की, देशभर के दूरस्थ इलाकों में कॉलेज खोलने की उनकी कोई योजना है। शिक्षा मंत्रालय और सम्बन्धित विभागों में यह कोई चर्चा का विषय ही नहीं है। आजकल उनकी चर्चा के केन्द्र में है कि किसी तरह विदेशी यूनिवर्सिटीज के साथ साँठ–गाँठ करके कॉलेजों और कैम्पसों को औने–पौने दाम पर बेच दिया जाये। विश्वगुरु होने का फर्जी झंडा फहरा दिया जाये।

अपने कॉलेजों की हालत कैसे सुधरे, छात्रों की पढ़ाई की समस्या, रहने की समस्या, प्रयोगशालाओं की समस्या, पुस्तकालय की समस्या कैसे हल हो? यह उनकी चिन्ता का विषय ही नहीं है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में लगभग 3 लाख छात्र पढ़ते हैं। हॉस्टल सीट महज 7 हजार के लगभग हैं। वहीं केन्द्रीय विश्वविद्यालय जेएनयू में 10 हजार छात्र पढ़ते हैं और 5500 छात्रों के रहने की व्यवस्था है। यहाँ भी कमी है, पर दोनों मॉडल में फर्क साफ है। शिक्षा का जो मॉडल, जितना बजट केन्द्र और राज्य सरकारें आवंटित कर रही हैं, उस मॉडल में खामियाँ हैं, वह बजट अपर्याप्त है।

कर्मचारियों के लिए क्वार्टर क्यों नहीं हैं? यह भी देश में 1990 के बाद लागू हुए निजीकरण के मॉडल की ही देन है कि कम्पनियाँ नौकरी देती हैं पर रहने को क्वार्टर नहीं। जबकि पहले हमारे देश में यह मॉडल नहीं था। आज भी सरकारी नौकरियों में और कुछ जगहों पर राज्य सरकारों की नौकरियों में चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को भी रहने के लिए क्वार्टर मिलता है। छोटा ही सही, पर उसके पास इस भीड़ भरे शहर में एक सुरक्षित कैम्पस के अन्दर अपने बीबी–बच्चों संग रहने के लिए सिर पर छत रहती है।

लेकिन दूसरी तरफ मल्टीनेशनल कम्पनी की हालत पतली है। निजी कम्पनियों को कर्मचारी सुबह 9 बजे दफ्तर में होने चाहिए। बाकी वह कहाँ रहता है, कैसे रहता है इससे उन्हें कोई लेना–देना नहीं। अगर अपने कर्मचारियों के रहने का इन्तजाम इन कम्पनियों की जिम्मेदारी होती तो निश्चित रूप से ऐसे हालात पैदा नहीं होते जिसमें कर्मचारियों को दुर्दशा झेलनी पड़ रही है। कर्मचारी जिन लोगों के लिए मुनाफा कमा रहे हैं, वे आलीशान कोठियों और आधुनिक फ्लैटों में जिन्दगी गुजार रहे हैं और कर्मचारी सड़कों पर जाम में फँसा हुआ है, रात को पीजी में दबने का खतरा है, दिनभर के लिए बॉस ने टारगेट सेट कर दिये हैं।

क्या यही वजह नहीं कि आज हमारे देश के 18–34 साल के युवा का मानसिक स्वास्थ गुणांक महज 33 है। इसे विशेषज्ञों के अनुसार बहुत खराब श्रेणी में माना जाता है। वहीं 55 साल से ज्यादा उम्र के भारतीयों में यह गुणांक 96 है। यह तीन गुने का अन्तर इस नयी निजीकरण व्यवस्था की देन है। इसमें छात्रों के लिए न पढ़ने को कॉलेज हैं, न हॉस्टल हैं। नौकरी करने वालों के लिए न पेंशन है, न रहने को क्वार्टर है, न कोई अन्य सुविधा जैसे मेडिकल लीव, बोनस, पीएफ इत्यादि।

ऐसी हालत में पढ़ने और नौकरियों के लिए आये युवाओं के ऊपर आर्थिक और मानसिक दवाब रहता है। उन्हें सस्ते से सस्ता रहना, खाना और आना–जाना करना होता है, भले ही इसके लिए उन्हें अपनी जान की बाजी क्यों न लगानी पड़े। ऑफिस के समय आप देखिए–– मेट्रो, बस और सड़क पर अपनी जान पर खेलकर लोग यात्रा करते हैं। स्ट्रीट फूड, चाउमिन, मोमोज, वेज बिरयानी स्टाल पर कभी भीड़ खत्म नहीं होती, यानी लोग सस्ते से सस्ते कार्बाेहाइड्रेट्स से पेट भर रहे हैं।

कुल मिलाकर इस क्रूर व्यवस्था ने छात्रों–नौजवानों के सामने तनाव, असुरक्षा और इनसानी गरिमा से रहित जीवन परोस दिया है। अब छात्रों–नौजवानों को ही सोचना है कि वे इस जन–विरोधी व्यवस्था को बर्दाश्त करते हैं या इससे बेहतर व्यवस्था का निर्माण करते हैं, जहाँ हर नौजवान को साफ सुथरे हॉस्टल तथा ताजा और पोषण युक्त खाना मिले। पुस्तकालय में किताबें हों। प्रयोगशाला में उपकरण हों और शिक्षा ऋण का बोझ दिमाग पर न हो। नौकरी करने जायें तो सम्मानजनक रोजगार मिले। पेंशन हो, मेडिकल सुविधा हो जिससे छोटे से छोटा कर्मचारी भी एक गरिमामयी, जिन्दगी गुजार सके। दुर्भाग्य ही समझिए कि आजादी के अस्सी साल बाद भी देश की बड़ी आबादी को बुनियादी सुविधाएँ मुहैया नहीं है। दूसरी तरफ दावा ये कि हम विश्वगुरु हैं।

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