मई 2026, अंक 50 में प्रकाशित

दिल्ली में ‘नरेन्द्र गैंग’ सक्रिय

यूँ तो देश भर में जालसाजों, बलात्कारियों, जमाखोरों और हत्यारों के छोटे–बड़े न जाने कितने गैंग सक्रिय होंगे और उनके होने से मुझ जैसे मध्यमवर्गीय स्कूल टीचर पर तब तक कोई खास फर्क नहीं पड़ता, जब तक ऐसा कोई गैंग हमारे दरवाजे पर न पहुँच जाये। इसलिए अगर आप सोच रहे हैं कि मैंने इतने छोटे गैंग की करतूतों को अपने लेख का विषय क्यों बनाया, तो आपका सोचना बिलकुल वाजिब है, खास कर तब जब यह लेख ‘देश–विदेश’ जैसी गम्भीर राजनीतिक–सामाजिक विश्लेषण देने वाली पत्रिका के लिए हो। दरअसल, मेरी नजर इसके नाम पर गयी और अभी कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर हिट हुआ गाना–– “देश हमारा कहाँ जा रहा, कहो नरेन्दर मजा आ रहा–––” मेरे जेहन में गूँजने लगा।

‘नाम बड़ा या व्यक्ति’ चाहे वह कुख्यात हो या विख्यात, इस साहित्यिक बहस में मैं नहीं जाऊँगा। ताजे मामले पर ही बात होगी। “नरेन्द्र” नाम के आगे कई लोग नतमस्तक हैं तो बहुतों के जेहन में अपराधी गिरोह की छवि कौंध जाती है। कौन है ये “नरेन्द्र” जिसके लिए मैं इतना कलम घिस रहा हूँ और पत्रिका के इतने पन्ने बर्बाद कर रहा हूँ? क्या वह इस लायक है कि जिन्दगी की आपाधापी में उस पर रुक कर सोचा जाये और अपना कीमती समय जाया किया जाये।

मुझे लगता है कि कई बार व्यक्ति उतना महत्वपूर्ण नहीं होता, जितना उसका नाम। खास कर तब जब वह अपराधी हो और कब्र में पैर लटकाये अपनी मौत का इन्तजार कर रहा हो। अगर जिन्दगी भर उसने लोगों को बर्बाद किया, देश–समाज को गर्त में पहुँचा दिया, तो वह मर भी जाये तो क्या उसके अपराध कम हो जायेंगे? माफ करिये, मुझसे उसकी तरीफ नहीं होगी। हाँ, यह जरूर है कि उसके “नाम” से उसके कुकर्मों और अपराधों को एक प्रवृत्ति के तौर पर याद रखा जायेगा और उससे आने वाली पीढ़ियाँ नफरत करंेगी।

आप आगे देखेंगे कि ऐसे किसी अपराधी से मेरे लेख का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, लेकिन “नरेन्द्र” नाम से मेरे जेहन में जो बातें आयीं, सोचा आपसे साझा कर दूँ। अब आते हैं असली विषय पर।

‘महँगाई’ विषय लेख के रूप में जितना घिसापिटा हो गया है, उतना जिन्दगी में हलचल मचाने वाला। क्योंकि यह लोगों की जिन्दगियों को तबाह तो कर ही रहा है। वह तमाम अनलिखी कहानियों का असली खलनायक है। तो इस महँगाई के दौर में बचत? यह तो बहुत बड़ी थुक्कम–फजीहत है, जो हर किसी के वश की बात नहीं। ऊपर से इस खूँखार, कुख्यात और बेरहम ‘नरेन्द्र गैंग’ ने आफत मचा रखी है, वह भी दिल्ली जैसे भलमानुसों की जिन्दगी में। जिधर देखो उधर लूट–खसोट, हत्या, बलात्कार। इन सबमें नरेन्द्र गैंग सीधे या छिपे शामिल है।

इस गैंग की हिम्मत इतनी बढ़ गयी है कि जिसे लूटता है उसे एक रात पहले 8:30 बजे बता देता है कि कल तुम्हारी बारी है। इस गैंग के सदस्य कनपटी पर तमंचा तानकर अवैध लूट को अंजाम देते हैं। आप पूछेंगे कि “अवैध लूट” का क्या मतलब? वैध लूट तो ‘खुला खेल फर्रूखाबादी’ की तरह चल ही रही है। व्यापारी, नौकरी पेशा, उद्योगपति और मजदूर–– सब इस गैंग से त्रस्त हैं। पुलिस इस गैंग का कुछ बिगाड़ नहीं पा रही या बिगाड़ना नहीं चाहती। यह गैंग रूप बदलने में माहिर है। पुलिस अधिकारियों को बाद में पता चलता है कि जिसे सुबह सलूट किया था वह इस गैंग का मुखिया है। लगभग यही हाल मीडिया का है। न तो प्रिंट मीडिया इस गैंग के बारे में छापती है, न डिजिटल मीडिया। मीडिया इतनी अपाहिज कैसे हो गयी? यह शोध का विषय है, लेकिन यहाँ कहे देता हूँ कि गैंग के गुर्गों ने मीडिया के मुँह में जरूर कुछ ठूँसा है, तभी उसकी आवाज नहीं निकल रही है।

14 अप्रैल 2026 को एक अखवार वाले ने हिम्मत करके एक छोटे कोने में इस गैंग के बारे में छापा, शायद डरते हुए। दिल्ली पुलिस की अपराधिक शाखा ने जहाँगीरपुरी इलाके में सक्रिय दो कुख्यात अपराधियों को गिरफ्तार किया है। आपराधिक शाखा के पुलिस आयुक्त ने बताया कि एक गुप्त सूचना मिली थी कि नरेन्द्र गिरोह के दो सदस्य भलस्वा झील के पास लूट की वारदात को अंजाम देने वाले हैं, जिसके बाद पुलिस टीम ने एक अभियान में दोनों को पकड़ लिया। पूछताछ के दौरान आरोपियों ने स्वीकार किया कि वे अलीगढ़ से नरेन्द्र गैंग को 30–35 हजार रुपये में एक पिस्तौल और 10 हजार में देशी कट्टा सप्लाई करते थे।

मेरी आप सभी महानुभावों से अपील है कि अभी नरेन्द्र गैंग को हथियार सप्लाई करने वाले सिर्फ दो गुर्गे गिरफ्तार हुए हैं, जब तक पूरा नरेन्द्र गिरोह सलाखों के पीछे नहीं पहुँचता तब तक सतर्क रहें, एकजुट रहें, किसी अकेले की पुलिस न सुने तो मिलजुलकर पुलिस थाने में रिपोर्ट लिखवाएँ। जब तक नरेन्द्र गैंग के असली खिलाड़ी बाहर बेखौफ लूट को अंजाम दे रहे हैं, तब तक चैकसी बनाये रहेे–– “कौड़ी–कौड़ी माया जोड़ी करिके जतन छुपाये/जनम–जनम के तोर कमइया चोरवा ना ले जाये/ता जागत रहा भइया/तू सोये मत जइया।––––”

Leave a Comment

लेखक के अन्य लेख

समाचार-विचार
अन्तरराष्ट्रीय
फिल्म समीक्षा
राजनीति
राजनीतिक अर्थशास्त्र
व्यंग्य
अवर्गीकृत