साहित्य लिखने की इच्छा
दिमाग में खयाल बहुत आते हैं। कई बार मन होता है कि उन खयालों को जोड़कर कुछ कविता, कहानी या उपन्यास बना दूँ। बहुत से पात्र भी दिमाग में घूमने लगते हैं। सभी पात्र संघर्षरत स्थिति में हैं। ये भी डर रहता है कि किसी पात्र के साथ अन्याय न हो। किसी का जरूरत से ज्यादा महिमामण्डन न हो जाये। लिखते–लिखते किसी अच्छे उपन्यास के पात्र सामने आने लगते हैं। कभी ‘पहला अध्यापक’ लघु उपन्यास का दूइसेन आ खड़ा होता है तो कभी ‘माँ’ उपन्यास (मैक्सिम गोर्की) की नायिका पेलाग्या निलोवना जो शुरुआत में एक डरी–सहमी घरेलू महिला होती हैं, जो अपने पति के अत्याचार सहती है। लेकिन अपने बेटे पावेल के क्रान्तिकारी विचारों से प्रभावित होकर वह खुद एक बहादुर और निडर क्रान्तिकारी बन जाती है। पावेल व्लासोव एक फैक्ट्री मजदूर है जो मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ता है।
उधर खेती किसानी करते गाँव के लड़कों पर नजर डालो तो मुंशी प्रेमचन्द के पात्र जीवन्त नजर आने लगते हैं। ‘गोदाान’ का होरी, एक गरीब, सीधा–साधा और ईमानदार किसान, जिसकी जीवनभर की एक ही इच्छा है–– एक गाय पालना। वह कर्ज के जाल उलझा और सामाजिक मर्यादा के बोझ तले दबा रहता है। गाँव से पलायन करने वाले आज के छोटे किसान और मजदूर कर्ज के जाल में वैसे ही फँसे हैं। होरी की पत्नी धनिया बहुत साहसी, मुँहफट और स्वाभिमानी है, जो समाज के ठेकेदारों और शोषण के खिलाफ खुलकर आवाज उठाती है। आज भी गाँव में किसान–मजदूरों की पत्नियाँ ज्यादा रोबीली, शोषण के खिलाफ आवाज उठाने वाली मौजूद हैं। गोबर–– होरी का बेटा, जो पुरानी रूढ़ियों को नहीं मानता और शहर जाकर नयी सोच अपनाता है। ऐसे भी नौजवान हैं पर आज भी शहर में धक्के खा रहे हैं। दो जून की रोटी के जुगाड़ में ही उनके शरीर जर्जर होते जा रहे हैं।
शहर के फुटपाथों पर नजर डालो तो ‘मेरा बचपन’ उपन्यास के अलेक्सी की याद आती है। एक छोटा बच्चा जो बहुत कम उम्र में अनाथ है और दुनिया की क्रूरता तथा गरीबी को करीब से देख रहा है। लगता है कहाँ है उसकी दादी माँ इकुलिना, जो बेहद दयालु, धार्मिक और ममतामयी हैं। वह अलेक्सी के कठिन जीवन में प्रेम और उम्मीद की किरण होती हैं। अगर नहीं तो बिना दादी के फुटपाथ पर सो रहे इन करोड़ों बच्चों के अन्दर इनसानियत कौन भरेगा? क्या सरकारों और समाज से हम ऐसी जिम्मेदारी की उम्मीद कर सकते हैं? तो सरकार क्या हम महज खनिजों के बन्दरबाँट करवाने के लिए चुनते हैं?
कभी अलेक्सान्द्र फादेयेव के उपन्यास ‘तरुण गार्ड’ के पात्र आकर पूछते हैं कि भाई हमने नाजियों से लड़ने के लिए यंग गार्ड बनाये थे। नाजियों के वंशज आज दुनिया भर में राज कर रहे हैं। लोकतंत्र को उन्होंने खूँटी पर टाँग दिया है। आज हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी क्या है? मुक्तिबोध उठकर पूछने लगते हैं–– पार्टनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है? हाल में हुए जन्तर–मन्तर आन्दोलन में जिस तरह लड़कियों ने पुलिस–प्रशासन के दमन का डटकर मुकाबला किया, लगा कि ‘तरुण गार्ड’ की उल्याना ग्रोमोवा और ल्युबोव शेवत्सोवा जैसी निडर और जाँबाज युवतियाँ, जो बिना डरे देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर देती हैं, लौट आयी हैं।
निराशा में डूबे लोगों को देखता हूँ तो लगता है कि इनकी जिजीविषा मिखाइल शोलोखोव के पात्रों की तरह क्यों नहीं? हमारे देश में हताश–निराश लोग क्यों आत्महत्या का रास्ता चुन रहे हैं? ‘इन्सान का नसीबा’ जिसमें एक रूसी सैनिक आन्द्रेई सोकोलोव जो द्वितीय विश्व युद्ध में सब कुछ खो देता है–– उसका परिवार मारा जाता है और वह खुद जर्मन बन्दी शिविर की भयानक यातनाएँ झेलता है। सब कुछ तबाह होने के बाद भी वह हिम्मत नहीं हारता और जीवन जीने की उत्कट आकांक्षा से भरकर एक अनाथ बच्चे को अपना बेटा बना लेता है।
अपने चारों तरफ समाज में नजर डालें तो मुंशी प्रेमचन्द के उपन्यास ‘गबन’ के पात्र रमानाथ नजर आने लगते हैं। रमानाथ एक कमजोर इच्छाशक्ति वाला युवक, जो अपनी पत्नी को खुश करने और समाज में झूठी शान दिखाने के लिए कर्ज के जाल में फँस जाता है। बाद में वह सरकारी पैसों का गबन कर बैठता है और डरकर भाग जाता है। खैर, बाद में रमानाथ को उसकी पत्नी लाइन पर ले आती है जिसका कर्त्तव्यबोध और त्याग भावना अनुकरणीय है।
दूसरी तरफ ऐसे लोगों की भी भरमार है जो रविन्द्रनाथ टैगोर के गोरा की तरह हैं। गोरा एक कट्टर हिन्दू संन्यासी की तरह व्यवहार करता है और राष्ट्रवाद व परम्पराओं का कड़ा समर्थक है। बाद में उसे पता चलता है कि वह असल में एक अनाथ आयरिश (विदेशी) बच्चा था, जिसे एक हिन्दू परिवार ने पाला था। यह सत्य उसके भीतर के सारे भेदभाव मिटाकर उसे एक सच्चा ‘इनसान’ बनाता है। इसमें बड़ा हाथ उसके उदारवादी और आधुनिक विचारों वाले दोस्त बिनय का है। फिर सोचता हूँ गोरा के चरित्र तो बहुत हैं पर उनके दोस्त बिनय कहाँ गायब हो गये हैं? आगे और भी––––––
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