अली सरदार जाफ़री : इनसानियत और मोहब्बत का शायर
सरदार जाफ़री की याद आयी और जे़हन में उनका एक शे’र कौंध गया,
हो जाता हूँ शहीद हर अहले–वफ़ा के साथ
हर दास्ताने–शौक़ मेरी दास्ताँ है आज
जो शख़्स हर प्रेम–कहानी में अपनी दास्ताँ देखे वही सच्चा शायर हो सकता है, कमाल का नग़मानिगार हो सकता है, प्रखर आलोचक हो सकता है। सरदार की रचनाओं में साहित्य की तीनों विधाएँ पूरी कलात्मकता के साथ मौजूद हैं। उर्दू और हिन्दी साहित्य के मर्मज्ञ प्रकाश पंडित ठीक लिखते हैं कि, “वह एक मुस्तकिल मिज़ाज नौजवान, निडर सिपाही और पाकीज़ा दिल दोस्त है। अपनी नज़रियात के इज़हार और ऐलान से उसे कोई ताक़त रोक नहीं सकती। लेकिन वह मुख़ालिफ़िन (विद्राहियों) के एतराज़ात (आरोप) सुनकर तिलमिला उठने का आदी नहीं। उसका दिमाग़ मुतवाज़न (सन्तुलित) है।”(1) अपने सन्तुलित और तीक्ष्ण बु़द्धि से न सिर्फ़ शायरी की और उपन्यास लिखे, बल्कि उन्होंने सम्पादन के काम में भी महारत हासिल की और भक्ति आन्दोलन के साथ यात्रा–वृतान्त, संस्मरण, रेखाचित्र की रचना की। उनके पूरे लेखन में ग़ज़ब की पठनीयता है।
वह रूढ़िवादी, मध्यवर्गीय परिवार में जन्मे थे। घर पूरी तरह से धार्मिक पाबंदियों और तौर–तरीक़ों का हिमायती था। नये ज़माने की नयी लहर से उसका कोई वास्ता न था। सरदार पर इसका गहरा असर पड़ा और वो मर्सिया (शोकगीत) लिखने लगे। लम्बे समय तक वो इस काम में जुटे रहे। उन्होंने लिखा है कि,
है कौन शमाए–इमानत लिए हुए
अपने जिलो में फ़ौजे–सदाकत लिए हुए।
—
अल्लाह रे हुस्न फ़ात्मा के माहताब का
ज़र्रों में छुपता फिरता है नूर आफ़ताब का
और उसे मेम्बर पर बैठकर पढ़ा तो वालिद और चचा ने बहुत गले से लगाया और माँ ने सर पर हाथ रखकर दुआएँ दीं। मेरे चचा बार–बार मर्शिये को आख़िरी दो मिसरे को पढ़ते थे और रोते थे।”(2) कहते हैं ना कि ज़िन्दगी से बड़ा विश्वविद्यालय और कोई नहीं। हम जो देखते हैं, सुनते हैं – उसी के अक्स, उसी की गूँज हमारी रचनाएँ होती हैं। यानी, शायरी अक्स और गूँज का ही सम्मिश्रण है। इस सत्य को अपने शे’रों में सरदार व्यक्त करते हैं,
तुम्हारे एजाज़े–हुस्न1 की मेरे दिल में लाखों इनायतें2 हैं।
तुम्हारी ही देन मेरे ज़ौक़े–नज़र3 की सारी लताफ़तें4 हैं।।
जवाँ है सूरज, ज़बीं पे जिसके तुम्हारे माथे की रौशनी है।
सहर हसीं है कि उसके रुख़5 पर तुम्हारे रुख़ की सबाहतें6 हैं।।
(1. सुन्दरता के चमत्कार 2. कृपाएँ 3. सुन्दरता 4. कोमलताएँ 5. मुखड़े पर 6. खूबसूरती)
सरदार जाफ़री की ज़िन्दगी और शायरी कई मोड़ों से गुज़री है और हर मोड़ उन्हें नये अनुभवों से भरती रही है। वो मर्सिया की दुनिया से नयी ताज़गी के साथ अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में जाकर नयी दुनिया में लौटते हैं। उच्च शिक्षा के लिए जब वह अलीगढ़ पहुँचते हैं तो उनकी मुलाक़ात दिग्गज और निडर मार्क्सवादी दोस्तों से होती है। अख़्तर हुसैन रायपुरी, सिब्ते हसन, मजाज़, जाँ निसार अख़्तर और ख़्वाज़ा अहमद अब्बास से मिलकर वह कम्युनिस्ट ऊसूलों के मुरीद हो जाते हैं। वह जीवन भर कम्युनिस्ट रहे। वह परतंत्र और स्वतंत्र भारत में जेल जाते रहे और जैसे आग में जलकर लोहा फौलाद में बदलता है, उसी तरह जेल के एकान्त और यातनाओं ने उन्हें फौलाद बना दिया। देखते–देखते जाफ़री राजनीतिक नज़्में, ग़ज़लें और समीक्षाएँ लिखने लगे। उनके ये अशआर देखिए,
गो मेरे सिर पे सियह1 रात की परछाई है
मेरे हाथों में है सूरज का छलकता हुआ जाम
मेरे अफ़कार2 में है तल्खी–ए–इमरोज़3 मगर
मेरे अशआर4 में है इशरते–फ़र्दा5 का पयाम
(1. काली 2. चिन्तन में 3. आज की कटुता 4. शे’रों मे 5. भविष्य के सुख का)
सियह रातें उन्हें घेरती रहीं लेकिन वह डरे नहीं, उनका सामना किया और ‘सूरज का छलकता हुआ जाम’ अपनी और आने वाली नस्लों के नाम करते रहे। उन्होंने जीवन भर निडर रहकर झूठ के ख़िलाफ़ लगातार लड़ कर सच को सामने लाने का आह्वान किया। झूठ का कोई मसौदा उन्हें मंज़ूर नहीं था। उन्होंने अपनी रचनाओं में मुसलसल झूठ के पर कतरे हैं। उनके कुछ अशआर पेश हैं,
जितने ऊँचे हैं मुसीबत के पहाड़
हिम्मतें उतनी ही बेबाको–सरफ़राज़ो बुलन्द1
हौसले हैं कि हिमालय के उकाबों2 की उड़ान
जिनके शह पर की हवा बर्फ़ की आँधी बनकर
आसमानों की बुलन्दी से गुज़र जाती है।
(1. निडर और बेबाक 2. गरुणों की)
उनकी उड़ान को, उनके हौसले को कोई नहीं रोक सका। उन्होंने पाकिस्तान की उर्दू शायरा परवीन शाकिर की मौत पर एक नज़्म लिखी। उन्वान था ‘परवीन शाकिर’। नज़्म की आख़िरी पंक्तियाँ दिल को दर्द में डूबो देती हैं,
जन्नत में है जश्ने–नौ का सामाँ
महफ़िल में मजाज़–ओ–बायरन हैं
मौजूद हैं कीट्स और शैली
ये मर्गे–जवाँ के सारे आशिक़
ख़ुश हैं ज़मीने–पाक से इक
नौमर्ग1 बहार आ गयी है
लिपटी हुई ख़ाक की है ख़ुशबू
और साय:फ़िगन2 सहाबे–रहमत3
(1. जिसकी युवावस्था में मृत्यु हुई हो 2. छाया करने वाले 3. कृपा के बादल)
मृत्यु केवल अन्त नहीं होती, वह शुरुआत भी होती है। मशहूर तुर्की शायर नाज़िम हिकमत ने लिखा है कि,
भाइयो!
मैं मरना नहीं चाहता।
वो मुझे क़त्ल कर देंगे तो मैं तुम्हारे दिलों में ज़िन्दा रहूँगा:
उन मिसरों में जो आने वाले ख़ूबसूरत दिनों की बशारत देते हैं।
मैं पिकासो के फ़न में जिन्दा रहूँगा।
रॉब्सन के गीतों में ज़िन्दा रहूँगा।
और सबसे ज़्यादा
और सबसे बेहतर तरीक़े से
मैं रफ़ीक़ों के कामयाब व कामराँ के क़हक़हों में ज़िन्दा रहूँगा।
सरदार जाफ़री सचमुच क़हक़हों में, हँसी में और आँसुओं में जिन्दा रहे। कोई भी बला, कोई भी भँवर उन्हें डूबो न सकी। उनका सफ़ीना शान से समन्दर में तैरता रहा। उनकी एक नज़्म है ‘एक याद’,
वो समन्दर का किनारा, वो चमकती हुई रेत
मौजें1 पिघले हुए नीलम की तिलिस्मी2 परियाँ
रक्स3 करती हुई आती थीं तेरे क़दमों में
और फिर रेत में खो जाती थीं
डूबती शाम के सूरज की सुनहरी किरनें
तेरे काकुल4, तेरे रुख़सार5 पे सो जाती थीं
और हवाएँ तेरे आँचल को, तेरे शानों6 को
शौक़ से चूम के दीवानी–सी हो जाती थीं
और मैं रक़ीबों पे हँसा करता था।
(1. लहरें 2. जादुई 3. नृत्य 4. केशपाश 5. गालों पर 6. कंधों)
रक़ीबों पर वही हँस सकता है जिसके दिल में सच की आग धधकती हो और जो बेधड़क झूठ को नंगा कर सकता हो। सरदार जाफ़री की यही सिफ़त उन्हें एक बड़ा और सच्चा रचनाकार बनाती है। वह जीवन भर जनता को जागरूक बनाने की कोशिश करते रहे। पूँजीपति वर्ग जन–इतिहास को तोड़–मरोड़ कर पेश करता रहा है, ताकि वह धन कमाता रहे। रुपया–पैसा से बढ़कर उसके लिए कुछ भी नहीं है। न ज़िन्दगी की कोई क़ीमत है, न ही मौत की। वह पैसे के लिए निर्दाेष लोगों को मार सकता है। क़त्ले–आम कर सकता है। दुनिया भर की जो करेंसीज़ (मुद्राएँ) हैं, वह उनका दीवाना है। वह शान्ति का दुश्मन है और दौलत का मुरीद। संसार का इतिहास उसके काले कारनामों से भरा पड़ा है। सरदार जाफ़री ने लिखा है कि, “दूसरी जंगे–अज़ीम में हिटलर और मुसोलोनी की फ़ासिस्ट फौजों ने सारे यूरोप को रौंद डाला, उनके फौजी बूटों की डरावनी आवाज़ें सारी दुनिया में सुनाई दे रही थीं। इस क़त्ल व ग़ारतगिरी ने इनसानी फ़िक्र और तहज़ीब की बेशुमार क़दरें ख़ून में नहा गयी, अनगिनत शायर और अदीब, मेयार और फ़नकार मौत के घाट उतार दिये गये।”(3)
यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है। इज़राइल का फ़िलस्तीन पर बर्बर हमला इनसानियत पर हमला है। सरदार जाफ़री ने हर प्रकार की बर्बरियत का हमेशा विरोध किया है। वह लिखते हैं,
एक जूए–दर्द1 दिल से जिगर तक रवां2 है आज
पिघला हुआ रगों में इक आतिशफ़िशां3 है आज
(1. पीड़ा की नदी 2. बह रही है 3. ज्वालामुखी)
रगों में ज्वालामुखी का लावा और दिल में मोहब्बत और सच्चाई की आँधी लिये हुए वह मेहनतकशों को ज़िन्दगी भर पुकारते रहे। उन्हें सँवारते रहे। कोई भी बाधा उन्हें न रोक सकी। अपनी एक नज़्म ‘गुफ़्तगू’ में लिखा कि,
गुफ़्तगू बन्द न हो
बात से बात चले
सुब्ह तक शामे–मुलाक़ात चले
हम पे हँसती हुई तारों भरी रात चले
उनका इसरार बस इतना था कि किसी भी हालत में गुफ़्तगू बन्द न हो। बातचीत चलती रहे, लोग मिलते रहें तो बात यक़ीनन बन जाएगी। आज का माहौल देखिए लोग अपने में सिमट गये हैं। मिलते भी हैं तो चुप रहते हैं, डरते हैं कि बोले तो कुछ उल्टा–सीधा न बोल दें। डर ने सारे रास्ते बन्द कर दिये हैं। लोग अन्याय देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। नतीजा? सरदार अपनी नज़्म ‘ख़ूनी हाथ’ में लिखते हैं कि,
जिनकी फुँकारों ने बिस1 घोल दिया पानी में
जिनकी परछार्इं ने झुलसा दिया सहराओं2 को
हाँ वही हाथ वही ख़ून में डूबे हुए हाथ
क़त्लो–ग़ारत3 के इरादों ने जना है जिनको
(1. विष 2. रेगिस्तानों को 3. हत्या और विनाश)
इन हाथों का टूटना ज़रूरी है। यदि ये गुनहगार हाथ नहीं टूटे तो हम अपनी अभिव्यक्ति का अधिकार खो देंगे। बहुत हद् तक खो भी चुके हैं। आज सीधी–सच्ची बातें कहने वालों को जेल मिलती है। यह हर सदी में हुआ है। इतिहास अपने को दोहरा रहा है और ताक़ीद भी कर रहा है कि औरत और मर्द में फ़र्क करना बन्द करो, राम के भेस में छुपे रावण हो पहचानो। भरी सभा में द्रौपदी को नंगा करने की कोशिशों को नाकाम करो। सीता को वनवास देने वालों को दण्ड दो। अपनी नज़्म ‘अवध की ख़ाके–हसी’ में जाफ़री अपना दर्द और ग़ुस्सा दर्ज करते हैं,
ग़रीब सीता के घर पे कब तक रहेगी रावन की हुक्मरानी
द्रौपदी का लिबास उसके बदन से कब तक छिना करेगा
शकुन्तला कब तक अंधी तक़दीर के भँवर में फँसी रहेगी
ये लखनऊ की शगुफ़्तगी1 मक़बरों में कब तक दबी रहेगी
सिरों के ऊपर मुसीबतों के पहाड़ कब तक गिरा करेंगे
बिलकती आँतों को भूख कब तक डसा करेगी
ज़मीं के सीने पे क़ातिलों के गिरोह कब तक चला करेंगे
ख़बासते2 कब तलक अहिँसा का रूप धारे फिरा करेंगी
(1. प्रफुल्लता 2. दुष्टताएं)
इस नज़्म को पढ़ते हुए बारहा ख़्याल आता है कि हमें ग़ुस्सा क्यों नहीं आता? क्यों हम अपने दिल–दिमाग़ की नहीं सुनते?
बलात्कार, अपहरण, टॉर्चर और हत्या हमें उद्वेलित क्यों नहीं करते? वजह साफ़ है कि हम बचे रहें, हमारा परिवार सुरक्षित रहे। बाक़ी दुनिया जाये भाड़ में। यही तो साम्प्रदायिक शक्तियाँ चाहती हैं। हम उनके हाथों की कठपुतली बने रहें और वो जैसा चाहें, हमें नचाएँ। पिछले दिनों भारत में जो घटनाएँ घटी हैं, वह परेशान करने वाली हैं। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश माननीय श्री रामकृष्ण गवई पर साम्प्रदायिक सोच रखने वाले वकील श्री राकेश किशोर ने जूता चलाया, यह कहते हुए कि ‘सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेगा हिन्दुस्तान।’ क्या किसी दलित का चीफ़ जस्टिस बन जाना धर्मनिरपेक्ष कहे जाने वाले हिन्दुस्तान का अपमान है? हालाँकि इस काण्ड में माननीय गवई जी ने अभियुक्त वकील को माफ़ कर दिया हैय लेकिन सवाल दूसरे हैं। क्या किसी को भी यह हक़ है कि वह विरोध का हिँसक मार्ग अपनाए? मैं स्वयं हिँसा का विरोधी हूँ लेकिन जब मामला हद् से ज़्यादा बढ़ जाये तो जनाक्रोश को रोका नहीं जा सकता। महाभारत का युद्ध इस बात का गवाह है। देश के जन–धन को, मनुष्य के निर्मन मन को बचाये रखने के लिए भी हिँसा का सहारा लिया गया है। महात्मा गाँधी ने भी ‘करो या मरो’ का उद्घोष किया था। देश सर्वोपरि है, व्यक्ति नहीं। हिँसा और अहिँसा का मार्ग उस समय की परिस्थितियों पर निर्भर करता है। नेकी और बदी की लड़ाई युगों से चली आ रही है। सरदार जाफ़री ने अपनी तवील नज़्म ‘अवध की ख़ाके–हसीं’ में लिखा है कि,
कहाँ हो ऐ नेकियों की फौजो!
बदी के ऊँचे महल गिरा दो
सदाकतो1, आओ झूठ के साँप को कुचल दो
हयात2 की तेज़ो–तुंद मौजो फ़ना3 के ख़ाशाक4 को बहा दो
सहर5 की किरनों, अंधेरी रातों के सिर पर बरसो
अवाम के दुश्मनों का नामो–निशाँ मिटा दो।
(1. सच्चाइयों 2. जीवन 3. मृत्यु 4. कूड़े–करकट को 5. सुबह)
सुबह की किरणों से हम सभी को अंधेरी रातों के सायों को रौशन करना होगा। यह तब ही सम्भव होगा जब हम एकजुट होकर धरती पर मँडराते हर संकट का सामना करेंगे। फ़िलहाल ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है क्योंकि हर तरफ़ व्यक्तिगत लाभ–लोभ की आँधी चल रही है। सत्तारूढ़ दल इस बात को समझते हैं और यहीं से जालसाज़ी शुरू हो जाती है। विभिन्न पेशों से जुडे़ हुए लोग ईनाम–इकराम के लिए, पदोन्नति के लिए अपनी आत्मा तक बेच दे रहे हैं। भारत में जन्मीं और पाकिस्तान में पली–बढ़ीं मशहूर शायरा किश्वर नाहीद अपनी नज़्म ‘ज़हर का डंक’ में लिखती हैं,
आधी रात को उठकर आईने में अपना चेहरा देखो
मेरी आँखों की बेख़्वाबी1 तुम्हारे गुनूदगी2 में जाग रही होगी
किताबों में मरी हुई मकड़ियों की तरह
तुम मेरी ज़ात3 को उठाकर बाहर कैसे फेंकोगे
कि हज़ीमत4 के जाले तुम्हारी आँखों पे तने हुए हैं
(1. अनिद्रा 2. गहरी नींद 3. अस्तित्व 4. पराजय)
अपने अस्तित्व को हर हाल में बचा कर ही हम आगे बढ़ सकते हैं। अपनी पराजय को विजय में बदल सकते हैं। दुनिया भर के शायरों, ख़ास कर तरक्कीपसन्दों ने मिल–जुल कर अपने घुटन भरे माहौल में ताज़गी पैदा करने की कोशिश की है। सरदार जाफ़री ने भी यही किया। उनकी रचनाओं के केन्द्र में सदैव मेहनतकश वर्ग प्रमुख रहा है। ईमानदारी से काम करने वाला चाहे वह किसान हो या मज़दूर हो उनकी नज़र में सर्वोपरि रहा है। उनका एक शे’र है,
तिरे हाथ की बुलन्दी में फ़रोगे–कहकशां1 है
ये हुजूमे–माहो–अंजुम2 तिरे इन्तिज़ार में हैं
(1. आकाशगंगा 2. सितारे)
ये मेहनतकश हाथों का ही कमाल है कि उसके वश में आकाशगंगा और सितारे हैं। इतना ही नहीं वह हौसले के साथ आगे बढ़ता है तो आकाशगंगा और सितारे भी उसके साथ हो लेते हैं और पूरी दुनिया को रचनात्मक और अर्थपूर्ण बनाने में जुट जाते हैं। वह खुद में ब्रह्मांड हो जाता है। अपनी नज़्म ‘तुम्हारी आँखें’ में लिखते हैं कि,
वो नन्हे–नन्हे चमकते हीरों की नन्हीं कनियाँ
जो मेरी आँखों का नूर लेकर तुम्हारे आँचल में झाँकती है
फिर और आँखें, फिर और आँखें, फिर और आँखें
ये सिलसिला ता–अबद1 रहेगा
ज़माने की गोद में सितारों के हुस्न की नदियाँ बहेंगीं
वो सब तुम्हारी
वो सब हमारी ही आँखें होंगी
हमारी आँखें कि जिनसे शोले बरस रहे हैं
मगर वो कल का हसीन दिन देखो कितना नज़दीक आ गया है
हमारी आँखों से जब बहारें छलक पड़ेंगी।
(1. अनन्त काल तक)
बहारें आती हैं लेकिन पतझड़ के बाद। हमारी आँखें देखती हैं कि पत्ते डाल से टूट कर गिर रहे हैं और मिट्टी उन्हें अपने आगोश में समेट रही है। यह टूटने, बिखरने, मिलने, गलने, जलने की अनन्त काल तक चलने वाली प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया को वैज्ञानिक, संगीतकार, संगतराश, वादक, गायक अपने–अपने ढंग से परिभाषित करते हैं और उसे अपनी कलात्मक दृष्टि से सजाते और निखारते हैं। यह सजाना–निखारना ही कला है। वह अपनी रचना ‘हुस्ने–कश्मीर’ में लिखते हैं,
इख़लासो–मोहब्बत1 की वो गूँधी हुई मट्टी,
अख़लाक़ो–मुरौव्वत2 के वो ढाले हुए इनसाँ।
शायर को यक़ी है कि निखर आएगा इक रोज़,
वो हुस्न जो इफ़्लास3 की चादर में है पिन्हाँ4।
(1. स्नेह 2. आपसी समझदारी 3. निर्धनता 4. छुपा हुआ)
मानव जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप निर्धनता है। आपसी भाईचारे और समझदारी को ख़ाक में मिलाकर ग़रीबी जीवन की सुन्दरता और मानवीयता को नष्ट कर देती है। भूख रोटी से मिटेगी और प्यास पानी से। यदि दोनों नहीं हैं तो जीवन नरक है।
यह नरक आज पूरी दुनिया में फैला हुआ है। सोचिए, धरती को शान्ति, सद्भाव और प्रेम से भरने की कामना करने वालों को हथियार की ज़रूरत क्यों है? बेहिसाब दौलत की हवस इसकी वजह है। यह हवस जब तक रहेगी, तब तक धरती स्वर्ग नहीं बनेगी। हमने जिस दिन से खेतों में, कारखानों में दिन–रात काम करने वालों की, उनके करिश्माई हाथ की अवहेलना की है, उस दिन से धरती अमृत नहीं विष उगलने लगी है। सरदार जाफ़री अपनी रचना ‘अनाज’ में लिखते हैं कि,
हवसे–ज़र1 ने मुझे आग में फँूका है कभी
कभी बाज़ार ने नीलाम चढ़ाया है मुझको
क़ैद रक्खा कभी लोहे में कभी पत्थर में
कभी गोदामों क़ब्रों में दबाया मुझको
सी के बोरों में मुझे फैंका है तहख़ानों में
चोर–बाज़ार कभी रास न आया मुझको
वो तरसते हैं मुझे और मैं तरसता हूँ उन्हें
जिनके हाथों की हरारत2 ने उगाया मुझको
(1. धन की लोलुपता 2. गर्मी)
इनसानी हाथों ने ही इस दुनिया को रहने लायक़ बनाया है। दूसरी ओर इन्हीं हाथों ने क़यामत भी बरपाया है। इस विरोधाभास के पीछे चल रहे खेल को समझना ज़रूरी है। अपने बुर्जुआ विशेषाधिकार को बरक़रार रखने के लिए राजसत्ता अपनी जनता को धोका देती रहती है। कहने को ‘जनता जनार्दन है’ अर्थात् ‘जनता ही भगवान है’य लेकिन भगवान यहाँ जनता नहीं सत्तालोलुप राजनेता है। जनता तो शोषण की शिकार है।
गालियाँ हर समाज में एक–दूसरे को दी जाती हैं। यह एक–दूसरे को अपमानित और तिरस्कृत करने के लिए किया जाता हैय लेकिन इसका दुरुपयोग अलग तरीक़े से सत्ता पर काबिज़ लोग करते हैं। अपने को दी गयी गाली का रोना रोते हुए नेता हर चुनावी रैली में अपने को ‘विक्टिम’ यानी पीड़ित साबित करता है और कहता है कि ‘मुझे सारी गालियाँ मंज़ूर हैं, अपनी जनता के लिए। यह बहुत सोची–समझी हुई चाल है जो अक्सर कामयाब होती है, लेकिन हमेशा नहीं। जनता अब समझने लगी है। यानी ‘नहले पर दहला’। सच को सच कहना ही होगा, बिना डरे ज़ालिम के सामने आना होगा। जाफ़री अपनी नज़्म ‘पैराहन–ए–शरर’ में कहते हैं कि,
कोई दिवाना है, लेता है सच का नाम अब तक
फ़रेबो–मक्र1 को करता नहीं सलाम अब तक
है बात साफ़ सज़ा उसकी संगसारी2 है
(1. छल–छद्म 2. दण्ड का विधान, जिसके अनुसार अपराधी को पत्थर मारा जाता है)
छल–कपट से लड़ना आसान नहीं होता। इतिहास साक्षी है कि फ़रेब और जालसाज़ी को उजागर करने वालों को शाबाशी नहीं मिलती बल्कि ज़िल्लत मिलती हैय फूल और तारीफ़ की जगह संगसारी मिलती है। बावजूद सारी मुश्किलों के सच बोलने वाले रुकते नहीं हैं। कोई सुने या ना सुने उनकी आवाज़ फ़िज़ाओं में गूँजती रहती है। यह गूँज कई दिशाओं से टकरा कर लौटती है, बार–बार। कोई न कोई सुनेगा तो ज़रूर। झूठ का सफ़र छोटा और मायावी होता है जबकि सच का रास्ता बेहद लम्बा और थका देने वाला होता है। दोनों के बीच का अन्तर समझिए आपको धुंध के बीच प्रकाश की किरणें दिखेंगी। दुनिया भर के किस्से, कहानी और उपन्यास के मूल में एक ही रहस्य छुपा है कि अब आगे क्या होगा? क्या, क्यूँ और कैसे? यह जिज्ञासा ही जीने का सबब है। इसे मिटा दीजिए, सब कुछ ख़त्म हो जाएगा। यही तो इधर किया जा रहा है। बिना सोचे–विचारे आप रोबोट की तरह जिएँ, बिल्कुल यंत्रवत्। वही करें, वही कहें जो वो चाहते हैं। आपको ऐसा क़तई नहीं करना चाहिए बल्कि पलट के जवाव देना चाहिए। अली सरदार जाफ़री ने अपनी आख़िरी सांस तक इनसानियत और मोहब्बत की लड़ाई लड़ी। 86 वर्ष की उम्र में ब्रेन ट्यूमर से उनका देहान्त हो गया। उनकी देह नहीं रही लेकिन उनके नग्में, उनकी शायरी और समकालीन और गुज़रे ज़माने के शायरों पर लिखी तकरीरें आज भी हमें ज़िन्दादिली से भरती हैं और अन्याय के विरुद्ध खड़ा करती हैं।
सन्दर्भ
1– सरदार जाफ़री, लोकप्रिय शायर और उनकी शायरी, सम्पादक – प्रकाश पंडित, सह–सम्पादक – सुरेश सलिल, पृष्ठ – 16।
2– अली सरदार जाफ़री, लखनऊ की पाँच रातें, अनुवाद : कामना प्रसाद, चैथा संस्करण 2017, राजकमल पेपर बैक्स, नयी दिल्ली, पृष्ठ – 13।
3– उपर्युक्त, पृष्ठ – 109।
Leave a Comment
लेखक के अन्य लेख
- जीवन और कर्म
-
- अली सरदार जाफ़री : इनसानियत और मोहब्बत का शायर 1 Oct, 2026
- इब्ने इंशा: ख़ामोश रहना फ़ितरत में नहीं 5 May, 2026
- कैफ़ी आज़मी : मेरी आवाज़ सुनो 7 Jul, 2025
- जाँ निसार अख़्तर : मन मोरा बावरा 12 Dec, 2025
- जिगर मुरादाबादी : प्रेम के अप्रतिम कवि 13 Sep, 2024
- मजरूह सुल्तानपुरी : गा मेरे मन गा 1 Jan, 2025
- साहिर लुधियानवी : मेरे गीत तुम्हारे हैं 6 May, 2024
- साहित्य
-
- अकबर इलाहाबादी : जो अक्ल को न बढ़ाये वो शायरी क्या है 8 Feb, 2020
- असरार उल हक ‘मजाज’ : ए गमे दिल क्या करूँ 15 Oct, 2019
- इब्ने इंशा : ख़ामोश रहना फ़ितरत में नहीं 19 Jun, 2023
- जोश मलीहाबादी : अंधेरे में उजाला, उजाले में अंधेरा 20 Jun, 2021
- नजीर अकबराबादी : जनता और जमीन का शायर 10 Jun, 2020
- फिराक गोरखपुरी : जिन्दा अल्फाजों का शायर 14 Jan, 2021
- मखदूम मोहिउद्दीन : एक दहकती हुई आग 16 Nov, 2021
- मिर्ज़ा ग़ालिब : फिर मुझे दीद–ए–तर याद आया 20 Aug, 2022
- मीर तकी मीर : ‘पर मुझे गुफ्तगू आवाम से है’ 23 Sep, 2020
- हसरत मोहानी : उर्दू अदब का बेमिसाल किरदार 17 Nov, 2023