कैफ़ी आज़मी : मेरी आवाज़ सुनो
कैफ़ी आज़मी सचमुच हिन्दी–उर्दू साहित्य के सूरज–चाँद हैं। ख़्ाुशवन्त सिंह उन्हें उचित ही आज के उर्दू साहित्य का बादशाह कहते हैं। उन्होंने बादशाही के नये कीर्तिमान गढ़े, नयी मंज़िलों को फ़तह किया। हिन्दी और उर्दू के बीच उनकी उपस्थिति एक चमकते हुए तारे की तरह है जो हमें अँधेरे से लड़ने और रौशनी की तलाश करने की प्रेरणा देता है। अपने आत्मकथ्य में उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया है। इस्लाह लेने के लिए वह लखनऊ के मशहूर शायर सफ़ी साहब के घर पहुँच गये। उस्ताद और शागिर्द के बीच हुई बातचीत का एक अंश पेश है, “तुम एक ख़्ाास अक़ीदत से मेरे पास इस्लाह के लिए आये हो, लेकिन इस्लाह के बाद जब जाओगे तो कुढ़ते हुए जाओगे कि मेरी ग़ज़ल ख़्ाराब कर दी। मेरी राय यह है कि अगर वाह–वाह से गुमराह न हो तो लिखते रहो और पढ़ते रहो। शे’र की कमियाँ सूखे पत्तों की तरह गिरती चली जाएँगी और ख़्ाूबियाँ नयी कोपलों की तरह फूटती रहेंगी।” और हुआ भी यही,
किसी ने आज इक अँगड़ाई लेकर
नज़र में रेशमी गिरहें लगा दीं
तलातुम, वलवले, है जान, अरमान
वहीं चिंगारियाँ फिर मुस्कुरा दीं
वह लगातार लिखते रहे, पढ़ते रहे और नित नये साँचे में ढलते रहे। उनका जीवन और साहित्य हमें निर्बलों के पक्ष में और शोषण के नये–नये उपकरण गढ़ते महाबलियों के विपक्ष में खड़ा करता है। वह अपने जीवन और अपनी कृतियों में सच्चे और ईमानदार रहे। उन्होंने ग़रीबी देखी थी। अपने एक बच्चे की मौत भी देखी थी। कॉमरेड सज्जाद ज़हीर ने लिखा है कि, “कैफ़ी की शायरी क़दीम–ओ–जदीद (पुराने और नये) की अदबी ग़लाज़तों (गन्दगी) से पाक है। इस में सच्ची तरक़्क़ी–पसन्दी की झलक नज़र आती है।”
तरक़्क़ीपसन्द शायर कैफ़ी आज़मी ने हमेशा हर प्रकार के ज़ुल्म, शोषण और वहशीपन के ख़्िालाफ़ अपनी ओज और सोज़ से भरी आवाज़ उठायी है। ग़्ाुलाम और आज़ाद भारत की वह बेशक़ीमती आवाज़ हैं। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की मौत पर उन्होंने 1967 में राज मारब्रॉस के निर्देशन में बनी फ़िल्म ‘नौनिहाल’ के लिए एक गीत लिखा था, ‘मेरी आवाज़ सुनो, प्यार का राज़ सुनो।’ इस गीत को बार–बार सुना जाना चाहिए और आज के भारत को बारीक़ी से देखना और परखना चाहिए। इस गीत के दो बन्द पेशे ख़्िादमत हैं, एक बीच की और दूसरा आख़्िारी।
ज़िन्दगी भर मुझे नफ़रत सी रही अश्कों से
मेरे ख़्वाबों को तुम अश्कों में डुबोते क्यों हो
वो जो मेरी तरह जिया करते हैं, कब मरते हैं
थक गया हूँ, मुझे सो लेने दो, रोेते क्यों हो
सो के भी जागते रहते हैं, जाँबाज़ सुनो
मेरी आवाज़ सुनो––––
आख़िरी बन्द में वो लिखते हैं कि,
क्यों सँवारी है यह चन्दन की चिता मेरे लिए
मैं कोई जिस्म नहीं हूँ कि जला दोगे मुझे
राख के साथ बिखर जाऊँगा मैं दुनिया में
तुम जहाँ खाओगे ठोकर, वही पाओगे मुझे
हर क़दम पर है नये मोड़ का आगाज़ सुनो
मेरी आवाज़ सुनो––––
इतिहास की विडम्बना देखिए कि आज धर्मनिरपेक्ष समाजवादी आवाज़ को मिटाने की हर चन्द कोशिश की जा रही है। नेहरू को आत्मकेन्द्रित और परिवारवादी साबित करने के दाँव–पेंच खेले जा रहे हैं। केन्द्र और प्रदेशों में काबिज़ साम्प्रदायिक सत्ताधारी आम जनता की याददाश्त को मिटाने में लगे हुए हैं। हिन्दुस्तान ही नहीं, पूरी दुनिया में ब्रेन–वाशिंग का काम दिन–रात चल रहा है। मन्तव्य साफ़ है कि वे नया इतिहास गढ़ना चाहते हैं। जो वे नहीं हैं, वह दिखना और दिखाना चाहते हैं। यह अक्षम्य अपराध है। ऐसे में चुप रहना गुनाह है। कैफ़ी साहब का एक शेर है,
जुर्म है तेरी गली से सर झुका कर लौटना
कुफ्ऱ है पथराव से घबराना तेरे शहर में
भाग्य का सितारा तो देश की रियाया (प्रजा) और उनके सच्चे और ईमानदार रहनुमाओं से ही चमकता है। कायर हमेशा पीठ पीछे वार करता है। देश को धोका देता है। क्रांतिकारी किसी मदद या लाभ–लोभ के वश में नहीं आते। वह तो शहीदे आज़म भगत सिंह और उनके जाँबाज़ दोस्तों के साथी हैं। उन्हें न तो जेल का भयावह अकेलापन तोड़ सकता है, ना ही फाँसी का तख़्ता।
29 अक्टूबर 1982 को जगदलपुर में आयोजित मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के तीसरे राज्य–सम्मेलन में कैफ़ी आज़मी ने ऐतिहासिक उद्घाटन भाषण दिया था। अपने सम्बोधन में न सिर्फ़ प्रगतिशील आन्दोलन के संघर्ष, उसकी उपलब्धि, उसके जीवन्त अस्तित्व को रेखांकित किया है बल्कि उन लोगों के हश्र की ओर इशारा किया है, जिन्होंने प्रगतिशील आन्दोलन की तेज़ धारा को रोकने का असफल प्रयास किया और जो आज भी प्रगतिशील लेखक संघ के इतिहास और उसकी अहम् भूमिका के सम्बन्ध में ग़लतबयानियाँ कर रहे हैं।
कैफ़ी आज़मी ने कहा, ‘‘दोस्तो, मेरी सेहत आप देख रहे हैं, इसमें ज़्यादा कुछ बताने की ज़रूरत नहीं है। इस सेहत का तक़ाज़ा तो ये था कि मैं घर से निकलूँ तो सीधा किसी नर्सिंग होम में जाऊँ या अस्पताल में जाऊँ। बम्बई से यहाँ आने की इजाज़त न मेरी सेहत दे रही थी, न मेरे घर वाले इजाज़त दे रहे थे। इसके बाद भी मैं आया और ये कह के उनसे आया कि देखिए, मेरा इलाज बम्बई के किसी अस्पताल में नहीं है। मेरा इलाज अपने साथियों के बीच पहुँच के हो जायेगा। एक पुराना शे’र है फ़ारसी का––
हरचन्द पीरो ख़्ास्ता दिलो–नातवाँ शुदम
हद्द्ह नज़र बरूए, तो करदम जवाँ शुदम
(माना कि मैं बूढ़ा हो चुका हूँ, कमज़ोर हो चुका हूँ लेकिन जब मेरी नज़र तुम्हारे चेहरे पे पड़ती है तो मैं जवान हो जाता हूँ।)
तो मैं आप में अपने ट्रीटमेंट के लिए आया हूँ, कोई भाषण देने नहीं आया हूँ। मैं बूढ़ा सही पर इतनी जवानी है पंडाल में कि अगर चार–चार चिनगारियाँ भी उनकी मुझ तक पहुँची तो मेरे अन्दर जो ख़्ाून जमा हुआ है वो दौड़ने लगेगा और मुझे लगेगा कि मैं अच्छा हो गया हूँ।”(1) अच्छा होने और स्वस्थ रहने के लिए ज़रूरी है कि साथियों से मिला जाये। उनसे दिल की बात की जाये, सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक मुद्दों पर बहस–मुबाहिसा हो। गरमा–गरमी हो, तीर–तलवार चलें, लेकिन जब विदा हों तो मन प्रेम, उल्लास और ऊर्जा से भरा हुआ हो। कैफ़ी साहब अदब को सियासत से दूर नहीं करते। स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों में हम अध्यापकों की सुनते आये हैं कि साहित्य को राजनीति से दूर रहना चाहिए। यह राजनीति का बहुत पुराना खेल है। जब कोई नया खिलाड़ी पूछता है कि जब हर तरफ़ राजनीति है, सत्ता में बने रहने के लिये राजनीतिज्ञों की कुटिल चालें हैं, कुत्सित चालबाज़ियाँ हंै, खेमेबन्दी है तो क्यों हमें राजनीति से दूर रहना चाहिए? इस सवाल का उत्तर देते हुये अपने उद्बोधन के अन्त में वे कहते हैं कि, ‘‘सवाल यह नहीं है कि अदब का सियासत (राजनीति) से सम्बन्ध है या नहीं है। अगर ज़िन्दगी से सम्बन्ध है तो ज़ाहिर है कि ज़िन्दगी तो सियासत से जुड़ी हुई है, उससे अदब जुड़ा ही रहेगा। मैं कम्युनिस्ट हूँ और मैं चाहता हूँ और मैं अपने तजुर्बे से समझता हूँ, इस दुनिया में ज़िन्दा रहने के लिए, सर उठा के चलने के लिए हर आदमी को कम्युनिस्ट होना पड़ेगा। जो हैं या जो नहीं हैं वो भी हांेगे और दूसरा कोई रास्ता नहीं है। लेकिन इसके बावजूद मैं आपसे कहता हूँ कि तरक़्कीपसन्द तहरीक़ का रूबन (सदस्य) होने के लिए या तरक़्कीपसन्द अदीब होने के लिये कम्युनिस्ट पार्टी का मेम्बर होना ज़रूरी नहीं है। तब भी ज़रूरी नहीं था, अब भी नहीं है। ये कम्युनिस्ट पार्टी की कोई शाखा नहीं है। इसमें विचारों में इख़्तलाफ़ (मतभेद) रहा है थोड़ा सा और वो रह सकता है, लेकिन बुनियादी चीज़ें जो हैं कि हम इन्सान की भलाई चाहते हैं। हम जंग नहीं अम्न चाहते हंै। हम फ़िरक़ापरस्ती के ख़िलाफ़ हैं। हम इंटीग्रेशन (एकता) चाहते हैं। ये कुछ हमारी बुनियादी सियासत है और मैं समझता हूँ कि हर शरीफ़ आदमी, हर शरीफ़ शायर और कवि के लिये यह नारे हैं जो वो अपना सकता है और उसको अपनाना चाहिए। तरक़्कीपसन्द मुसन्नीफ़ीन (लेखक) के अलावा मुझे कोई दूसरा प्लेटफॉर्म दिखाया जाये जहाँ कि ये नारे बुलन्द किये जाते हों। इसलिए अपनी गिरती हुई सेहत के बावजूद मैं अपनी ज़िन्दगी में किसी चीज़ पर फ़ख्र (गर्व) कर सकता हूँ कि कोई बात मेरी ज़िन्दगी में ऐसी है कि फ़ख़्ा्र से बयान कर सकूँ अवाम के सामने तो वो यह है कि मैं इस तहरीक़ का एक रूबन (सदस्य) था और हूँ। मैं ग़ुलाम हिन्दुस्तान में पैदा हुआ था, आज़ाद हिन्दुस्तान में जी रहा हूँ और सोशलिस्ट हिन्दुस्तान में मरूँगा।”(2) उनका ये अधूरा ख़्वाब आज भी हम सबका ख़्वाब है।
आज भी हिन्दुस्तान सोशलिज़्म (समाजवाद) की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहा है। विभिन्न मोर्चों पर उजागर और छुपे हुए दुश्मनों से लड़ रहा है। यह लड़ाई साम्राज्यवादी संस्कृति और समाजवादी संस्कृति के बीच है। यहाँ टेक्नोलॉजी की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। इसे समझने की ज़रूरत है।
कैफ़ी आज़मी उम्मीद के फूलों को खिलाते हैं और ख़्ाुशबू सेे हर सांस भर देते हैं। वह लिखते हैं,
शगुुुफ़्तगी1 का, लताफ़त2 का शाहकार3 हो तुम
फ़क़त बहार नहीं, हासिले–बहार4 हो तुम
जो एक फूल में है क़ैद, वो गुलिस्ताँ हो
जो इक कली में है पिन्हाँ वो लालाज़ार5 हो तुम
हलावतों6 की तमन्ना, मलाहतों7 की मुराद
ग़्ाुरूर कलियों का, फूलों का इनकिसार8 हो तुम
जिसे तरंग में फ़ितरत ने गुनगुनाया है
वो भैरवी हो, वो दीपक हो, वो मल्हार हो तुम
तुम्हारे जिस्म में ख़्ााबीदा9 हैं हज़ारों राग
निगाह छेड़ती है जिसको वो सितार हो तुम
(1– प्रफुल्लता 2– कोमलता 3– श्रेष्ठ कृति 4– वसन्त ऋतु की उपलब्धि 5– उपवन 6– मिठास 7– लावण्य 8– विनम्रता 9– सोए हुए)
आज पूरी दुनिया से कोमलता, विनम्रता और मिठास जैसे गुण ग़ायब ही रहे हैं। उनकी जगह घृणा, शत्रुता और कड़ुवेपन लेती जा रही है। उपवन उजाड़ दिया गया है। हर ओर भांय–भांय करता हुआ सन्नाटा है। आदमी धीरे–धीरे शैतान में तब्दील होता जा रहा है। शैतानियत ने इस धरती और उस पर बसने वाले मनुष्यों के दिल–दिमाग़ को ज़हरीला बना दिया है। सब एक–दूसरे को लूट रहे हैं। मार–काट रहे हैं। क्या यही विकास है? क्या यही तरक्की है? क्या यही सच्ची मानवीयता है? साम्राज्यवादी शक्तियों से लड़ते हुए देश पर जान न्योछावर करने वाले हज़ारों–हज़ार शहीदों ने क्या इसी दिन का सपना देखा था? कैफ़ी साहब की एक शानदार नज़्म है, ‘बहुरूपनी’। उसके कुछ हिस्से पेश हैं,
एक गर्दन पे सैकड़ों चेहरे
और हर चेहरे पर हज़ारों दाग़
और हर दाग़ बन्द दरवाज़ा
रौशनी उन से आ नहीं सकती
रौशनी उन से जा नहीं सकती
तंग सीना है हौज़ मस्जिद का
दिल वो दोना पुजारियों के बाद
चाटते रहते हैं जिसे कुत्ते
कुत्ते दोना जो चाट लेते हैं
देवताओं का काट लेते हैं
जाने किस कोख ने जना उसको
जाने किस सहन में जवान हुई
जाने किस देस से चली कमबख़्त
वैसे यह हर ज़बान बोलती है
जख़्म खिड़की की तरह खोलती है
और कहती हैं झाँक कर दिल में
तेरा मज़हब, तेरा अज़ीम ख़्ाुदा
तेरी तहज़ीब के हसीन सनम
सबको ख़्ातरे ने आज घेरा है
बाद उनके जहाँ अँधेरा है
पल–पल भेस बदलने वाले बहुरूपिये को पहचान कर, उसे नेस्तानाबूद कर के ही अँधेरे को हराया जा सकता है और एक नयी सुबह का इस्तक़बाल (स्वागत) किया जा सकता है। कैफ़ी साहब ‘मकान’ शीर्षक नज़्म में आह्ववान करते हैं,
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूँ, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जाएगी
खिड़की खोलने के लिए सामूहिक प्रयत्न करना होगा। बन्द खिड़की खुलेगी तब ही ताज़ी हवा और धूप भीतर आएगी। हवा हमें शीतल करेगी और धूप हमें तप्त करेगी। यह हवा और धूप का ही जादू है कि,
फूल खिलने लगते हैं उजड़े–उजड़े गुलशन में
प्यासी–प्यासी धरती पर अब्र1 छाने लगते हैं (1– बादल)
इसलिए धरती और मनुष्यों की रक्षा के लिए हमें एक होना होगा। प्रकृति को हर हाल में बचाना होगा। कैफ़ी आज़मी के संघर्ष और उपलब्धियों पर हमारे महान कवि, शायर और आलोचक शमशेर बहादुर सिंह लिखते हैं कि, “इस सदी के उत्तरार्द्ध में हर गम्भीर कलाकार को इस मंज़िल से गुज़रना पड़ा है और अन्त में इसी निष्कर्ष पर आने को मजबूर हुआ है कि इतिहास के द्वन्द्वात्मक–भौतिकवादी विश्लेषण की रोशनी में, स्वस्थ परम्पराओं, यानी सार्थक आदर्श मूल्यों से अपने आपको रचनात्मक ढंग से जोड़ने के सिवाय उसके आगे और कोई रास्ता नहीं है। कैफ़ी ने उस दौर का अनुभव मुझे इन शब्दों में बताया–– ‘मैं अक्सर रोमानी नज़्में लिखता था। जब मैं कम्युनिस्ट पार्टी के कारकुन की हैसियत से मज़दूरों में काम करने लगा तो मैंने महसूस किया कि उनके बीच रह कर शायराना तक्कलुफ़ की ज़बान नहीं चलेगी। मेरे नग़्मों को सहज और स्वाभाविक होना होगा। यानी ज़बान को उनके दिलों के और नज़दीक लाना होगा। मज़दूरों से मेरा बराहरास्त राबता था–– एकदम डायरेक्ट। ‘झनकार’ की बहुत सी नज़्में कानपुर और लखनऊ के मज़दूरों के बीच रह कर लिखी गयीं। मुझे इसका अहसास होने लगा कि मेरे जज़्बात (भावनाएँ) कहाँ उनके इनक़लाबी हितों का साथ देते हैं और कहाँ वो उनके ख़्िालाफ़ पड़ सकते हैं। फिर, ‘44–45 में जब मैं बम्बई आया तो मैंने मदनपुरा के कामगारों में काम करना शुरू कर दिया। शू–वर्कर्स की यूनियन बनायी। वगैरह। और जब फ़िल्म में लिखना शुरू किया तो पार्टी की एक्टिविटी और बढ़ा दी। बीड़ी–मज़दूरों की यूनियन बनायी। किरायेदारों का एसोसिएशन क़ायम किया। फ़िल्मी दुनिया में जाकर मैं आम आदमी के संघर्ष को भूल नहीं गया। वहाँ भी बहुतांे को अपने साथ लाया।’”(3)
कैफ़ी साहब कभी उन लोगों को नहीं भूले जिनके बीच रहकर उन्होंने कविता लिखने का हुनर पाया था, भाषा को माँजा था और जाना था कि शब्द ब्रह्मास्त्र से भी ज़्यादा मारक और शक्तिशाली होता है। ब्रह्मास्त्र के प्रहार से शायद बच जायें लेकिन शब्दों के वार से बचना असम्भव है। शब्द चमत्कारिक हैं तो मारक भी हैं। इसके प्रमाण ‘महाभारत’ के कई प्रकरणों में हैं। शकुनि और दुर्योधन के विध्वंसक शब्द–प्रयोग ने कौरव और पाण्डवों को युद्ध भूमि में ला खड़ा किया था। युद्ध–भूमि में कृष्ण–अर्जुन संवाद को कैफ़ी साहब आधुनिक सन्दर्भों में पेश करते हैं। वह लिखते हैं,
जंंग रहमत है कि लानत, ये सवाल अब न उठा
जंग जब आ ही गयी सर पे तो रहमत होगी
दूर से देख न भड़के हुए शोलों का जलाल
इसी दोज़ख़्ा के किसी कोने में जन्नत होगी
दोज़ख़्ा में जन्नत की तलाश आदमी सदियों से कर रहा है। यह तलाश आज भी मुकम्मल नहीं हुई है। ज़िन्दगी और कुछ नहीं बस एक अन्तहीन सफ़र और शान्ति की खोज है। इसी नज़्म में वह आगे लिखते हैं,
हमने चाहा था रहें साथ दिलो–जाँ की तरह
वो मगर इसको सियासत ही सियासत समझे
हमने चाहा था अलग हो के भी नज़दीक रहें
वो मगर इसको कोई ताज़ा शरारत समझे
अन्तिम बन्द में लिखते हैं कि,
हम अहिंसा के पुजारी सही, दीवाने सही
जंग होती है फ़क़त जंग के ऐलान के बाद
हाथ भी उनसे मिलें, दिल भी मिलें, नज़रें भी
अब ये अरमान हैं सब फ़तह के अरमान के बाद
साथियो, दोस्तो, हम आज के अर्जुन ही हैं
हमसे भी कृष्ण यही कहते हैं।
आज के भारत की हालत कमोबेश यही है। ‘महाभारत’ के कई पात्र रंग बदलते गिरगिट की तरह आपको घर और बाहर सर्वत्र मिलेंगे। राजनीति में सक्रिय ऊँचे पदों पर बैठे ज़्यादातर लोग झूठ बेच रहे हैं। डंके की चोट पर जनता को गुमराह कर रहे हैं। जनता तबाह हाल है और ये ज़ालिम मज़हब का सहारा लेकर सियासत–सियासत खेल रहे हैं। इस खेल का पर्दाफ़ाश होना चाहिए। कैफ़ी आज़मी सचेत करते हैं। जागो, देखो और अन्याय का, शोषण का हर सम्भव प्रतिकार करो,
इसको मज़हब कहो या सियासत कहो
ख़्ाुदकुशी का हुनर तुम सिखा तो चले
इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊंगा
आप र्इंटों की हुरमत1 बचा तो चले (1–आबरू)
बेलचे लाओ, खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ, कुछ पता तो चले
ज़मीं की तहें जब भी खुलती हैं तब कई रहस्य सामने आते हैं। ज़मीन्दोज़ ख़्ाज़ानों का पता चलता है,़ नयी खोजों का नुस्ख़्ाा मिलता है तो नरकंकाल भी मिलते हैं। ये नरकंकाल हत्या और आत्महत्या की दिल दहला देने वाली कहानियाँ कहती हैं और हमसे पूछती हैं कि क्या ऐसे जीवन की कल्पना की थी? क्या इसी तरह की धरती और आसमान का तसव्वुर किया था? कैफ़ी साहब ने मास्को, सितम्बर 1974 में एक ग़ज़ल लिखी थी,
मैं ढूँढता हूँ जिसे वह जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
नयी ज़मीन नया आसमां मिल भी जाए
नए बशर1 का कहीं कुछ निशां नहीं मिलता (1–इन्सान)
वह तेग़ मिल गयी जिससे हुआ है क़त्ल मेरा
किसी के हाथ का उस पर निशां नहीं मिलता
वह मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिनमें शोले तो शोले, धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़्ाुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यों
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नही मिलता
खड़ा हूँ कब से मैं चेहरों के एक जंगल में
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता
शायर रमेश चन्द्र द्विवेदी ‘शौक़’ अपने अनूठे संस्मरण ‘हम न मरब मरिहैइ संसारा’ में फ़िराक़ गोरखपुरी और कैफ़ी आज़मी के बीच हुई अन्तरंग बातचीत का विवरण देते हैं। एक अंश प्रस्तुत है, “ज़िन्दगी हर दौर से गुज़रती है। ये सब ज़िन्दगी की मंज़िलें हैं। एक मंज़िल का नाम है फ़ायदा, एक मंज़िल का नाम है नुकसान। ज़िन्दगी दोनों से बेनयाज़ या तटस्थ होकर आगे बढ़ती रहती है।” फिर उन्होंने राम की कहानी दोहरायी। उनका बचपन, राज्य वैभव, वनवास वग़ैरह। कैफ़ी साहब ने कहा, जितना दु:ख राम को उठाना पड़ा उतना तो शायद किसी पैगम्बर या अवतारी को नहीं झेलना पड़ा होगा। कैफ़ी को राम से बहुत प्रेम था। वह बात–बात में राम का ज़िक्र करते और मुझे सान्त्वना प्रदान करते। रमेश, ज़िन्दगी को प्यार करना सीखिए, ज़िन्दगी में विश्वास रखिए। सब ठीक है, सब ठीक होगा। उन्हंे फ़िराक़ का यह शेर बहुत पसन्द था––
हर लिया है किसी ने सीता को
ज़िन्दगी है कि राम का वनवास
कैफ़ी आज़मी ने भी लिखा कि,
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ
कभी क़ुरआँ, कभी गीता की तरह
चन्द रेखाओं में सीमाओं में
ज़िन्दगी कै़द है सीता की तरह
राम कब लौटेंगे, मालूम नहीं
काश रावण ही कोई आ जाता
सीता–राम के रूपक से यह स्पष्ट है कि मातृशक्ति की अवहेलना पितृशक्ति को बहुत भारी पड़ने वाली है। दोनों के बीच का संघर्ष सदियों से चल रहा है और अब यह निर्णायक मोड़ पर खड़ा है–– इस पार या उस पार। चुप रहना समस्या का समाधान नहीं। बोलना होगा। सोते हुए अवाम को जगाना होगा। राम और सीता के बिना रामराज्य की स्थापना असम्भव है। दक्षिणपंथी राजनीतिक दल सत्ता में बने रहने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं। धर्म के नाम पर दंगे कराते हैं। समाज में भेद–भाव फैलाते हैं। नफ़रत के बीज बोते हैं। निर्दोष नागरिकों की हत्या कराते हैं। राम को सायास सीता से अलग करते हैं। राम–रावण संग्राम सीताहरण के बाद ही होता है। इसीलिए कैफ़ी साहब कहते हैं कि, ‘काश रावण ही कोई आ जाता’, ताकी पाप का घड़ा जो अब तक भरा नहीं, पूरी तरह से भर जाये और निर्णायक युद्ध की शुरूआत हो और ‘रामराज्य’ का सपना पूरा हो।
पूँजीवादी–साम्राज्यवादी शक्तियाँ लगातार जनता पर चोट कर रही हैं। इजराइल भूखी–प्यासी फ़िलस्तीनी जनता पर बमबारी कर रहा है। विभिन्न देशों से भेजी गयी राहत सामग्री को नष्ट कर रहा है। अस्पतालों पर मिसाइलें दाग रहा है। राशन की लाइन में लगे निरीह बच्चों, महिलाओं और पुरुषों पर लगातार गोलीबारी हो रही है। हर ओर मौत है लेकिन ज़िन्दगी को बचाने की ज़िद भी है। कैफ़ी आज़मी की नज़्म ‘ज़िन्दगी’ तूफ़ान में भी पाँव टिकाये रखने की पुरज़ोर वकालत करती है,
आज अँधेरा मेरी नस–नस में उतर जाएगा
आँखें बुझ जाएँगी, बुझ जाएँगे एहसास–ओ–शऊर1
और यह सदियों से जलता सा, सुलगता सा वुजूद
इससे पहले कि सहर2 माथे पे शबनम3 छिड़के
इससे पहले कि मेरी बेटी के वो फूल से हाथ
गर्म रुख़्सार को ठण्डक बख़्शें
इससे पहले कि मेरे बेटे का मज़बूत बदन
तन–ए–मफ़्लूज4 में शक्ति भर दे
इससे पहले कि मेरी बीवी के होंठ
मेरे होंठ की तपिश पी जायें
राख हो जाएगा जलते–जलते
और फिर राख बिखर जाएगी
ज़िन्दगी कहने को बेमाया5 सही
ग़म का सरमाया सही
मैंने उसके लिए क्या–क्या न किया
कभी आसानी से इक साँस भी यमराज को अपना न दिया
(1– अनुभूति एवं चेतना 2– प्रात: 3– ओस 4– बेकार शरीर 5– अर्थहीन)
कैफ़ी आज़मी ज़िन्दगी को प्यार करते हैं। उसे हर हाल में बचाने और सँवारने के लिए कटिबद्ध हैं। यमराज भी आसानी से उनकी साँस छीन नहीं सकता। प्रवीण शेखर ने अपने आलेख ‘सिनेमा की भाषा में कैफ़ी के कैफ़ियत’ में लिखते हैं कि, ‘‘मन्दिर–मस्जिद मुद्दे पर बनी सईद मिर्ज़ा की फ़िल्म ‘नसीम’ (1992) के बूढ़े बाबा याद हैं? ‘नसीम’ की कहानी और उसकी प्रासंगिकता के साथ कैफ़ी की शानदार ‘कन्ट्रोल्ड परफ़ॉरमेन्स’ के लिए याद किया जाता है। हिन्दुस्तानी संस्कृति का ‘प्रतीक वह बूढ़ा छह दिसम्बर को ख़त्म हो जाता है। उसकी दोस्त जैसी प्यारी पोती नसीम को बाबा के मीठे गीत फिर सुनने को नहीं मिलते जो अक्सर नसीम के कानों में, मन में घुलते रहते थे। कैफ़ी के दोस्त जैसे उनके चाहने वालों को नये गीत कहाँ से मिलेंगे? ख़्ाास तौर से जब रचनात्मकता कम हो रही है। शुष्क भाव, दिवालिये विचार, ख़्ाुरदुरी होती संवेदनाओं वाले गीत स्थायी स्वर बनते जा रहे हैं। इनसे लड़ने के लिए ‘विवादी स्वर’ कहाँ से फूटेगा? रास्ता शायद कैफ़ी आज़मी और उनके साथियों –– साहिर, मज़रूह, प्रदीप, नीरज, नरेन्द्र शर्मा तथा गुलज़ार की परम्परा में ही हैं।”(5)
हमें रचनात्मकता को नयी धार देनी होगी। साहित्य हो या राजनीति, हर जगह विचारहीनता, संवेदनहीनता और हिंसा का बोलबाला है। इसे रोकना होगा। सपनों को नये सिरे से सँवारना होगा। कैफ़ी साहब ने भविष्य में आने वाले ख़्ातरे को भाँप लिया था। वह लिखते हैं कि,
प्यार का जश्न नयी तरह से मनाना होगा
ग़म किसी दिल में सही, ग़म को मिटाना होगा
काँपते होंठों पे पैमाने–वफ़ा1, क्या कहना
तुझको लायी है कहाँ लग्ज़िशे–पा2 क्या कहना
मेरे घर में तेरे मुखड़े की ज़िया3, क्या कहना
आज हर घर का दिया मुझको जलाना होगा
(1– वफ़ा का वादा 2– पैरों की लड़खड़ाहट 3– ज्योति, चमक)
जीवन को बचाने और रचनात्मक बनाने के लिए प्यार बहुत ज़रूरी है। प्यार का दिया हर घर में जलाने की ज़रूरत है। दुनिया भर की पूँजीपरस्त और दक्षिणपंथी सरकारें प्रेम की ज्योति को बुझा रही हैं। नफ़रत की आग को हवा दे रही हैं। देश के जरूरी मुद्दों से जनता का ध्यान हटाने के लिए तरह–तरह के ड्रामेबाज़ी कर रही हैं। जनता रोज़गार चाहती है, अपने परिवार का भविष्य उज्ज्वल बनाना चाहती है और सरकारें पूँजीवादी ताक़तों से साँठ–गाँठ कर जनता को गुमराह कर रही हैं। धर्म के नाम पर हिन्दू–मुस्लिम कार्ड खेल रही हैं। दंगे करा रही हैं। इन लोगों का हश्र बहुत बुरा होगा। फ़िल्म ‘अनोखी रात’ में कैफ़ी साहब ने एक गीत लिखा जिसका अन्तिम बन्द है कि,
वो जिनका प्यार है चाँदी से, इश्क़ सोने से
वही कहेंगे कभी हमने ख़्ाुदकुशी कर ली
बेहिसाब दौलत ईमानदारी को धता बताते हुए बेईमानी के रास्ते आती है। अल्पसंख्यक चन्द अमीरों के आराम–आराइश के लिए हाड़तोड़ मेहनत करते बहुसंख्यक ग़रीबों का हाल बद से बदतर होता जाता है। मेहनतकशों की जेब ख़ाली होती जाती है और सौदागरों की तिजोरी भरती चली जाती है। जात–पात और अमीरी–ग़रीबी में बँटी असमान दुनिया को बदलना ही चाहिए। कैफ़ी साहब का रंज और यथास्थिति को बदलने की चाहत इन दो शे’रों में व्यक्त हुई है,
लबालब है कहीं सागर, कहीं ख़्ााली पियाले हैं
ये कैसा दौर है साक़ी, ये क्या तक़सीम1 है साक़ी
नहीं पहचानता तेवर अभी तू तिश्नाकामों2 के
तेरा दस्तूरे–बख़्ाशीश लायक़े–तरमीम3 है साक़ी
(1– बटवारा 2– प्यासों 3– बदलने योग्य)
कैफ़ी साहब देशवासियों को बराबर सतर्क करते हैं। देश की बिगड़ती हुई स्थिति पर वह अपनी नज़्म में लिखते हैं कि,
हर तरफ़ अदबार1 के तूफ़ान हैं सैलाब हैं
भूक है, बीमारियाँ हैं, मौत के गर्दाब2 हैं
जाँ ब लब3 इन्साँ वूफ़ूर–ए–कर्ब4 से बेताब हैं
कितने दिल मजरूह5 कितनी अँखड़ियाँ पुर आब हैं
आँसूओं की इस झड़ी में मुस्करा सकता नहीं
मुहतरम! बारे विरासत मैं उठा सकता नहीं
(1– पतन 2– भंवर 3– होठों पर जान यानी मरणासन्न 4– भयानक दर्द 5– घायल)
कैफी के बारे में हिन्दी–उर्दू के प्रसिद्ध आलोचक शकील सिद्दीक़ी लिखते हैं कि, “वह वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कवि थे, कारणवश विपरीत परिस्थितियों में भी वे विपरीत दिशा में नहीं गये। 1971 में शारीरिक पक्षाघात के उपरान्त सक्रियता प्रभावित अवश्य हुई, कुछ मसलहत पसन्दी भी दिखाई पड़ी, लेकिन उनके चिन्तन की दिशा नहीं बदली। नये समाज के लक्ष्य को पाने के लिए जनता की विशाल एकता के प्रति उनके प्रयास पूर्ववत जारी रहे, संकल्प नहीं टूटा भले शरीर पहले जैसा नहीं रहा।”(6)
जनता की ख़्ाुशहाली के लिए वह आजीवन साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ते रहे। नफ़रत के ख़्िालाफ़ मोहब्बत का परचम लहराते रहे। शरीर टूटा लेकिन उनके मन का लोहा दु:खों और यातना की आग में जलकर फौलाद बनता गया। इस फौलाद को कोई टस से मस नहीं कर सका। “उनके व्यक्तित्व की सहजता, जीवटता भी लोगों को प्रभावित करती थी। विशेष रूप से सीढ़ियों पर चढ़ते समय (पक्षाघात के बाद) जब कोई उन्हें सहारा देने के लिए आगे बढ़ता तो वह सख़्ती से मना कर देते, डाँट भी देते। बहरहाल वह अपने इस संकल्प के साथ हमें बराबर याद आते रहेंगे––
ख़्ाून मेरा पिओगे पिला दूँगा मैं
तेग़ उठाओगे तो सर झुका दूँगा मैं
जान देना तो आसान है
यह है मुश्किल कि कलम का सौदा करूँ।(7)
कैफ़ी आज़मी ने कलम का सौदा कभी नहीं किया। वह झुके नहीं, बिके नहीं। आज लाभ–लोभ और अपनी गर्दन बचाने के लिए लोग सत्ताधीशों के सामने न सिर्फ़ घुटने टेक रहे हैं बल्कि अपनी कलम भी गिरवी रख दे रहे हैं। 6 दिसम्बर 1992 को विश्व हिन्दू परिषद् और उससे सम्बंधित अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं की उन्मादी भीड़ ने 16 वीं सदी में बनी ‘बाबरी मस्जिद’ को तोड़–फोड़ डाला था। यह मस्जिद मुगल कमांडर मीर बाक़ी ने अयोध्या में बनवाया था। इसके विध्वंस के बाद हिन्दू और मुसलमानों के बीच महीनों तक मार–काट होती रही। दस्तावेज़ बताते हैं कि इन साम्प्रदायिक दंगांे में 2000 से अधिक लोग मारे गये थे। मृतकों में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे। जवाबी हिंसा भी हुई। पाकिस्तान और बांग्ला देश में बहुत सारे हिन्दू मारे गये। सत्ता में बने रहने के लिए दुनिया भर में धर्मनिरपेक्षता विरोधी राजनीतिक पार्टियाँ साम्प्रदायिक दंगों का सहारा लेती रही हैं। उनकी सत्ता का महल निर्दोष जनता के ख़्ाून और हड्डियों पर खड़ी होती है।
मर्मज्ञ आलोचक डॉ– शुकदेव सिंह कैफ़ी आज़मी के बारे में लिखते हैं कि, “कैफ़ी बेलौस आदमी थे। उन्हें भारतीय होने का गर्व था। वे मानकर चलते थे कि देश का ज़र्रा–ज़र्रा हिन्दू और मुसलमानों का है। वे उन गाँव के लोगों की तरह थे जो, पूजा और प्रणाम, नमन और नमाज़ में कोई फ़र्क़ नहीं करते थे। जो गंगा–जमुना–सरस्वती का अन्तर किये बिना पूरे प्रयाग के जल को ‘संगम’ का जल समझते हैं और हर उठे हुए टीले–– चाहे बार का हो, बरम का हो, चाहे पीर का हो, महिषासुर का या शिव का हो अपना सिर झुकाते हुए संगम स्नान कर लेते हैं। कैफ़ी ने बड़ी मुहब्बत के साथ ‘सोमनाथ’ और ‘बाबरी मस्जिद’ पर कविताएँ लिखीं। साथ ही ‘ताजमहल’ पर भी लिखी ‘इब्नेमरियम’, सरोजनी नायडू, जवाहरलाल, जाफ़री सब पर कविताएँ लिखीं। ‘सोमनाथ’ पर लिखते हुए उनका कहना है––
दिल पर ये सोच कर पथराव करो दीवानो!
कि जहाँ हमने सनम अपने छुपा रक्खे हैं,
वहीं ‘ग़ज़नी’ के ख़्ाुदा रक्खे हैं।
बुत जो टूटे तो किसी तरह बना लेगें उन्हंे,
टुकड़े–टुकड़े सही दामन में उठा लेंगे उन्हें
फिर से उजड़े हुए सपने में सजा लेंगे उन्हंे।
गर ख़्ाुदा टूटेगा, हम तो बना न पाएँगे,
उसके बिखरे हुए टुकड़े न उठा पाएँगे,
तुम उठा लो, तो उठा लो शायद,
तुम बना लो तो बना लो शायद।”(8)
हमें आपसी मेल–मिलाप और भाईचारे को क़ायम रखना चाहिए। अपनी राजनीतिक चेतना को लगातार अध्ययन, मनन और चिन्तन से प्रखर बनाते रहना चाहिए अन्यथा हम सब कुछ खो देंगे। कैफ़ी आज़मी रियासत और सियासत की चालाक जुगलबन्दी से सावधान करते हैं और माकूल जवाब देने के लिए जनता–जनार्दन को तैयार रहने को कहते हैं। उन्होंने लिखा है कि,
यह रियासत जिसका इस्तेहाल1 से चलता है काम
हाकिमाने वक़्त की ठोकर में है जिसका निज़ाम
आह जब महरूम इंसानों पे हो जीना हराम
आह जब रोटी के टुकड़े को तरसते हों अवाम
लालची हुक्काम को दावत खिला सकता नहीं
मुहतरम्!2 बारे विरासत मैं उठा सकता नहीं (1– शोषण 2– श्रीमान)
ऐसी विरासत को कन्धे पर ढोना अपना ही क़त्ल कर देने जैसा है। कैफ़ी साहब सच्चे मुक्तियोद्धा की तरह आह्वान करते हैं कि,
कभी आगे, कभी पीछे, कोई रफ़्तार है ये
हमको रफ़्तार का आहंग1 बदलना होगा
ज़ेहन2 के वास्ते साँचे तो न ढालेगी हयात
ज़ेहन को आप ही हर साँचे में ढलना होगा
(1– तरीका या ढंग 2– बुद्धि)
बुद्धि को तार्किक और न्यायसंगत बना कर हम राजनेताओं के भ्रष्ट आचरण और उनकी नीयत को जनता की अदालत में बेनक़ाब कर सकते हैं। उनके पापों की सज़ा दे सकते हैं। उनके घृणित मंसूबों को नाकाम कर सकते हैं। क़ौमी एकता के लिए कैफ़ी आज़मी आजीवन नये–नये प्रयोग करते रहे। 1970 में प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक चेतन आनन्द ने ‘हीर–रांझा’ नामक फ़िल्म बनाई जो बाबा वारिस शाह की अमर प्रेम कथा पर आधारित है। इस फ़िल्म की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके संवाद पद्य में हैं। यह आसान काम नहीं था। कैफ़ी साहब की मेहनत रंग लायी और कमाल कर गयी। फ़िल्म शुरू होती है इस नज़्म से,
दोस्तो! तुमने सुना होगा कभी जंग का नाम
एक मुद्दत से जहाँ बहता है दरियाए चनाब
वहीं बेदर्दों ने इस तरह से दो दिल तोड़े
याद में जिसकी तड़पता है अभी तक पंजाब
दर्द पंजाब के सीने से चुरा लाया हूँ
दर्द पंजाब के सीने से चुरा लाया हूँ
चन्द टुकड़े दिले वारिस के उठा लाया हूँ
दर्द को कैसे सजाया है ये जी जानता है
कैसे अफ़साना बनाया है ये जी जानता है
जश्ने ग़म कैसे मनाया है ये जी जानता है
कितना ख़्ाून अपना जलाया है ये जी जानता है
आग मेरी न सही, आग मेरी न सही
इसका धुआँ मेरा है
हीर–रांझा की कहानी है बयाँ मेरा है–––
ऐसी काव्यात्मक जादूगिरी कैफ़ी साहब ही कर सकते थे। चेतन आनन्द ने 1964 में ‘हक़ीक़त’ फ़िल्म बनायी जो चीनी हमले पर केन्द्रित है। आज़ादी के बाद बनायी गयी यह पहली युद्ध फ़िल्म है जो युद्ध की विभीषिकाओं को दिखाती है और इनसानियत के पक्ष में खड़ी होती है। फ़िल्म के गीतकार कैफ़ी आज़मी ने बर्फ़ के पहाड़ों में भीषण सर्दी, आँधी झेलते हुए सैनिकों के मनोभावों का कारूणिक चित्रण किया है जिसे महान संगीतकार मदन मोहन ने अपनी धुनों से अमर बना दिया है। एक दृश्य है, भारतीय सैनिक रास्ता भटक गये हैं। उन्हंे लगता है कि वो शायद अपने घर जिन्दा लौट नहीं पाएँगे। उन्हें अपने जीवन साथी की याद आती है। वो गहरे अवसाद में डूब जाते हैं। इस अवसाद को कैफ़ी साहब शब्द देते हैं और मदन मोहन संगीत। गीत के बोल हैं ‘होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा’। आप भी इस इस गीत को सुनिए और दर्द की तरंगों में महसूस कीजिए––
होके मजबूर मुझे उसने भुलाया होगा
ज़हर चुपके से दवा जान के खाया होगा––––
इस गीत को अपनी दिलकश आवाज़ से सँवारने वाले गायक हैं, मोहम्मद रफ़ी, मन्ना डे, तलत महमूद और भूपेन्द्र सिंह।
22 अप्रैल 2025 को कश्मीर के पहलगाम में दहशतगर्दों ने बेगुनाह पर्यटकों को गोली मार दी। बेगुनाहों की निर्मम हत्या सरकार की विफलता है। बात–बात में अपने राजनीतिक हितों के लिए विभिन्न धार्मिक प्रतीकों को नारे में बदल देने वालों से सावधान रहना चाहिए।
यश मालवीय अपने लेख ‘हंगामे जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बाद’ में कैफ़ी साहब के उद्बोधन का ज़िक्र करते हैं, “इस देश में कोई हिन्दू ऐसा नहीं होगा जिसके दस–पन्द्रह मुसलमान दोस्त नहीं होंगे। कोई मुसलमान ऐसा नहीं होगा जिसके पचीस–पचास हिन्दुओं से दोस्ती न हो और दोस्ती भी ऐसी वैसी नहीं, मगर यह लोग जब अलग–अलग बैठते हैं तो फिर सिर्फ़ हिन्दू या मुसलमान हो जाते हैं। आख़िर यह कहीं न कहीं हममें ही किसी न किसी खोट की तरफ़ इशारा करता है।”(9) हमें अपने भीतर के इसी खोट से लड़ना है और उसे जड़ से मिटाना है। अपनी तंगनज़री को मिटा कर ही हम भारत के लोकतंत्र को बचा सकेंगे। 10 मई 2002 को मुम्बई में लोकतत्र का सच्चा प्रहरी हमेशा–हमेशा के लिए हमसे जुदा हो गया। उनकी बेटी शबाना आज़मी ने कैफ़ी साहब की याद में ‘अब्बा’ शीर्षक लेख लिखा है। लेख का अन्तिम पैराग्राफ़ है, “कैफ़ी साहब की शायरी में आप बार–बार देखेंगे–– वो अपने दुखों की मुडेरों में घिर कर के नहीं रह जाते बल्कि अपने दुख को दुनिया के तमाम लोगों से जोड़ लेते हैं। फिर उनकी बात सिर्फ़ एक इनसान के दिल की बात नहीं, दुनिया के सारे इनसानों के दिलों की बात हो जाती है और आप महसूस करते हैं कि उनकी शायरी मंे सिर्फ़ उनका नहीं, हमारा–आपका सबका दिल धड़क रहा है।”(10) ‘औरत’ शीर्षक नज़्म में वह कहते भी हैं कि,
क़द्र अब तक तेरी तारीख़ ने जानी ही नहीं
तुझमें शोले भी हैं बस अश्कफ़िशानी1 ही नहीं
तू हक़ीक़त भी है दिलचस्प कहानी ही नहीं
तेरी हस्ती भी है इक चीज़ जवानी ही नहीं
अपनी तारीख़्ा का उन्वान2 बदलना है तुझे
उठ मेरी जान! मेरे साथ ही चलना है तुझे
(1– आँसू बहाना 2– शीर्षक)
आत्मकथ्य का अन्तिम पैराग्राफ़ दिल झिंझोड़ कर रख देता है, “उस वक़्त एक ऐसा रोमांटिक हादसा हुआ कि लखनऊ छोड़कर कानपुर चला गया। वहाँ मज़दूर सभा के कार्यकर्ताओं का साथ हुआ। वह चोरी–चोरी मुझे कम्युनिस्ट पार्टी का लिटरेचर देने लगे। अब मुझे वह रास्ता मिल गया जिससे मैंने ज़िन्दगी का इतना लम्बा सफ़र तय किया है और फ़ालिज लग जाने के बाद अब तक इसी रास्ते पर चल रहा हूँ। एक दिन इसी रास्ते पर गिरूँगा और सफ़र ख़्ात्म हो जाएगा – मंज़िल पर या मंज़िल के क़रीब।”
कैफ़ी आज़मी का सफ़र कभी ख़त्म नहीं होगा। उस पर चलने वाले नये–नये कॉमरेड्स आते रहेंगे और नयी इबारतें लिखते रहेंगे।
सन्दर्भ
1– ‘कलम : हमारी ताक़त, हमारी मोहब्बत, हमारा हथियार, कैफ़ी आज़मी का उद्बोधन, ‘साम्य’ अंक 8, अप्रैल 1983, उर्दू से हिन्दी में लिप्यांत्रण : रफ़ीक़ ख़ान, प्रताप ठाकुर, प्रकाशक : प्रगतिशील लेखक संघ, अम्बिकापुर, सरगुजा, छत्तीसगढ़, सम्पादक : विजय गुप्त, पृष्ठ : 9।
2– उपर्युक्त पृष्ठ : 16।
3– उत्तर प्रदेश पत्रिका, जुलाई 2002, लखनऊ, (उ– प्र–) कैफ़ी आज़मी पर केन्द्रित, आलेख : कैफ़ी आज़मी का कवि–व्यक्तित्व, शमशेर बहादुर सिंह, पृष्ठ : 4।
4– उत्तर प्रदेश पत्रिका, जुलाई 2002, लखनऊ, (उ– प्र–) कैफ़ी आज़मी पर केन्द्रित, आलेख : हम न मरब मरिहैइ संसारा, रमेश चन्द्र द्विवेदी ‘शौक’, पृष्ठ : 8।
5– उत्तर प्रदेश पत्रिका, जुलाई 2002, लखनऊ, (उ– प्र–) कैफ़ी आज़मी पर केन्द्रित, आलेख : सिनेमा की भाषा में कैफ़ी की कैफ़ियत, प्रवीण शेखर, पृष्ठ : 36।
6– उत्तर प्रदेश पत्रिका, जुलाई 2002, लखनऊ, (उ– प्र–) कैफ़ी आज़मी पर केन्द्रित, आलेख : उनको वतन की ख़्ाुशहाली का इन्तज़ार था, शकील सिद्दीकी, पृष्ठ : 20।
7– उपर्युक्त, पृष्ठ : 20।
8– उत्तर प्रदेश पत्रिका, जुलाई 2002, लखनऊ, (उ– प्र–) कैफ़ी आज़मी पर केन्द्रित, आलेख : अब तो तक़दीर में ख़्ातरा भी नहीं, डॉ़ शुकदेव सिंह, पृष्ठ : 12।
9– उपर्युक्त, पृष्ठ : 31।
10– आज के प्रसिद्ध शायर कैफ़ी आज़मी, चुनी हुई शायरी, परिचय–– शबाना आज़मी, संस्करण 2012, राजपाल एण्ड सन्ज़, दिल्ली, पृष्ठ : 16।
(मेरे दो अभिन्न मित्रों ने इस लेख को पूरा करने में मदद की है, गोरखपुर के भाई एहतेशाम सिद्दीक़ी और बिलासपुर के भाई रफ़ीक ख़ान। दोनों के प्रति हार्दिक आभार।)
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