इस वर्ष नये शिक्षा सत्र की शुरुआत मेडिकल कॉलेज में नामांकन के लिए होने वाली नीट परीक्षा में पेपर लीक और धाँधली के खिलाफ छात्रों–नौजवानों के जुझारू आन्दोलन से हुई। दिल्ली के जन्तर–मन्तर पर कॉकरोच जनता पार्टी के आह्वान पर हुए इस आन्दोलन का अन्त मोदी सरकार के शिक्षा मन्त्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे के साथ हुआ। इस मुकाम को हासिल करने के लिए छात्रों–नौजवानों ने 36 दिनों तक धरना–प्रदर्शन, 26 दिनों की भूख हड़ताल और 20 जुलाई के संसद मार्च के दौरान बर्बर पुलिस दमन का धैर्य और साहस के साथ सामना किया।
इस आन्दोलन के घटनाक्रम को समग्रता में देखें, तो यह छात्रों–नौजवानों के पूर्ववर्ती आन्दोलनों से बिलकुल ही अलग और अनोखा था। इसमें शामिल अधिकांश नौजवान शिक्षा और रोजगार के प्रति सरकारों की आपराधिक उपेक्षा और लापरवाही तथा उससे पैदा होने वाली बदहाली के भुक्तभोगी थे। इस आन्दोलन के जरिये वे वर्षों से जमा अपने असन्तोष, अपमान और आक्रोश की अभिव्यक्ति के लिए एक स्वत:स्फूर्त जनउभार का हिस्सा बने थे। इनमें से ज्यादातर नौजवान किसी संगठन के कार्यकर्ता या समर्थक नहीं थे, वे पहली बार किसी आन्दोलन में शामिल हुए थे, लेकिन इस स्वत:स्फूर्त जन समूह में अद्भुत आत्मानुशासन और सामूहिकता की भावना देखने को मिली। जन्तर–मन्तर के धरना–प्रदर्शन में महीने भर से अधिक समय तक मौजूद युवकों ने उत्सव, उमंग, उन्मुक्तता, आत्मसंयम, आपसी भाईचारा, संवेदना और सृजनशीलता का अनुपम परिदृश्य रचा। पंजाबी के जानेमाने कवि सुरजीत पातर ने दिल्ली के बॉडरों पर किसान आन्दोलन का चित्र खींचते हुए जो कविता लिखी थी–– ‘ये मेला है’ उसकी सहज ही याद आ जाती है। हालाँकि इसकी ‘किसान आन्दोलन’ से हूबहू तुलना नहीं हो सकती, दोनों की अपनी विशेषताएँ रही हैं, लेकिन कई मायने में यह काफी हद तक उससे मिलता–जुलता रहा है। दोनों ही आन्दोलनों की यह खूबी थी कि सरकार की दमनात्मक कार्रवाइयों तथा उसके समर्थकों द्वारा बताये गये देशद्रोही, आतंकवादी, पाकिस्तानी जैसे कुत्सित आरोपों की परवाह किये बिना, अपने संघर्ष पथ पर डटे रहे और सरकार को झुका कर अपनी माँग मनवाकर ही वापस लौटे।
इस आन्दोलन में शामिल लड़के–लड़कियाँ अपनी शर्तों पर, अपने खास लहजे में जाने–अनजाने, चाहे–अनचाहे राजनीति के गलियारे में दाखिल हुए। फिर भी उनके हाथों में अनगढ़ भाषा और लिखावट में जो तख्तियाँ थीं, मीडियाकर्मियों के साथ बातचीत में उनकी जो राय सामने आयी थी, उससे साफ जाहिर होता था कि अपने देश–समाज और आम जनता के साथ उनका गहरा लगाव था और मौजूदा दौर की तमाम समास्याओं के प्रति वे बेहद जागरूक थे। पिछले डेढ़ दशक से जिस प्रतिगामी राजनीतिक संस्कृति और संकीर्ण हिन्दुत्ववादी विचारधारा का दिनरात धुआँधार प्रचार किया गया था जिसमें जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, धार्मिक कट्टरता और अल्पसंख्यकों के प्रति नफरत का बोलबाला था उसके वे मुखर विरोधी हैं और इनके खिलाफ अपने विचारों का खुलकर इजहार किया। यही नहीं, उस विभाजनकारी मुहीम के पीछे की असली मंशा को भी वे अच्छी तरह समझते हैं।
यह बात भी ध्यान देने लायक है कि ‘जेन जी’ कहकर इस पूरी नयी पीढ़ी को महिमामण्डित करना उचित नहीं है। कारण यह कि जन्तर–मन्तर आन्दोलन में शामिल युवाओं और आन्दोलन के ठीक बाद हरिद्वार के कावड़िये युवकों के चरित्र में तथा उन दोनों के प्रति सत्ता के रवैये में अन्तर स्पष्ट है। एक तरफ संसद मार्च के दौरान पुलिस का बर्बर दमन तथा दूसरी ओर कावड़ियों पर पुलिस का फूल बरसाना, पैर दबाना और उनके हुड़दंग का मूक दर्शक बने रहना। दो तरह के ‘जेन जी’ का अन्तर स्पष्ट कर देता है–– एक जागरूक जेन जी दूसरा कूप मण्डूक जेन जी।
एक जेन जी वे हैं जिनको प्रधानमन्त्री लाल किले की प्राचीर से स्वाधीनता दिवस पर ‘दिमागी नक्सल’ घोषित करते हैं और दूसरे वे हैं जिनके साथ वे कीर्तन मण्डली में झाल बजाते नजर आते हैं।
इस आन्दोलन में शामिल युवाओं ने एक और शानदार कारनामा किया। जनता के टैक्स और पूँजीपतियों के चन्दे से प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की जो देवतुल्य और अपराजेय छवि बनायी गयी थी उसे इन छात्रों–नौजवानों ने ध्वस्त कर दिया और मर्त्य मानव की तरह जमीन पर ला दिया। बाल हनुमान और बाल कृष्ण की तर्ज पर बाल नरेन्द्र का जो रूप जनमानस में बिठाने के लिए वर्षों तक अथक प्रयास किया गया था उसे हास्य–व्यंग्य का विषय बना दिया। यही नहीं, ‘नाले की गैस से चाय बनाने’, गणेश जी की मिथकीय कहानी में उनके सिर पर ‘हाथी का सिर जोड़ने को प्राचीन भारत में प्लास्टिक सर्जरी का प्रमाण बताने’ या ‘ए प्लस बी का होल स्क्वायर इज इक्वल टू के फॉर्मूले में एक्सट्रा टू एबी ढूँढने’ जैसी बातों को उन्होंने विद्वता की जगह मूर्खता की निसानी मानकर उनका मजा भी लिया। अपने बेढब और भौंडे, लेकिन यथार्थपरक और अर्थपूर्ण नारों, जुमलों, व्यंग्य, केरिक्रेचर, कार्टून, गानों और पैरोडी के जरिये रचनात्मक तरीके से इस काम को अंजाम दिया। कुछ गालियाँ भी थीं जिनको लेकर काफी बवाल मचाया गया, लेकिन प्रतिरोध की अभिव्यक्ति के तमाम सृजनात्मक विधाओं के आगे उन्हें नगण्य ही कहा जायेगा। इस बारे में विस्तार में जाने के बजाय यहाँ इतना कहना काफी है कि गाली की संस्कृति को समाज में और राजनीति में स्थापित और प्रचलित करने का काम इस युवा पीढ़ी ने नहीं किया, बल्कि वह उसके प्रकोप से संक्रमित और प्रभावित हुई है। प्रधानमन्त्री द्वारा वीडियो बनाकर खुद को गाली दिये जाने को ‘कल्चरल शॉक’ बताना और बिना माँगंे युवाओं को माफी देना तथा उनके अपने ही समर्थकों द्वारा आन्दोलन में शामिल लड़कियों का फोटो और घर के पते सोशल मीडिया पर डालना और उनके खिलाफ गाली–धमकी देने की मुहीम चलाना, यही नहीं, एक नाबालिग लड़की से गाली देने के लिए माफी माँगते हुए वीडियो जारी करवाना और उस पर गैर कानूनी ढंग से एफआईआर करवाना तथा उसके पिता पर जानलेवा हमला करना, यह सब उसी राजनीतिक संस्कृति की निरन्तरता है, जिनके खिलाफ युवाओं ने अपने आक्रोश का इजहार किया।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि गोदी मीडिया और हिन्दुत्ववादी अन्धभक्त गिरोह की नजर में आन्दोलनकारी ‘कॉकरोच’ देशद्रोही थे जिसका इजहार उनके न्यूज चैनलों और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ही नहीं बल्कि आन्दोलन स्थल पर उनके व्यवहार में भी प्रकट हुआ। जन्तर–मन्तर से कुछ ही दूरी पर वहाँ से वापस लौट रहे आन्दोलनकारियों के साथ गाली–गलौज और मारपीट के वीडियो पोस्ट करने जैसी घटनाएँ भी सामने आयीं। बीजेपी के अध्यक्ष नितिन नवीन, गिरीराज सिंह और दूसरे मन्त्रियों ने उन छात्रों–नौजवानों पर देशद्रोही, पाकिस्तानी और नक्सली का ठप्पा लगाया तो सांसद कंगना रणावत ने नौजवान पीढ़ी को गटर जेनरेशन कहा और आन्दोलन में शामिल लड़कियों के चरित्र पर कीचड़ उछाला। इसके अलावा भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने वीडियो जारी करके कहा कि इन कॉकरोचों में से दो–चार को लटका दो तो सबके दिमाग ठिकाने आ जायेंगे। केरल निवासी आरएसएस के एक प्रचारक टीजी मोहनदास ने कहा कि “मैं जिम्मेदारी में होता तो जन्तर–मन्तर के चार किलोमीटर के इलाके में कर्फ्यू लगा देता। मैं लोगों से तीन बार हटने को कहता। इसके बाद गोली चलवा देता। लोग भाग जाते, कुछ मर जाते, कुछ बच जाते और कुछ के हाथ–पैर चले जाते। चार घण्टे के भीतर स्थिति पूरी तरह शान्त हो जाती।”
आन्दोलन में शामिल उन नये नौजवानों को भी ऐसे फासिस्टों के बारे में कोई मुगालता नहीं था, बल्कि वे उनके जनविरोधी चरित्र को लेकर सजग थे। इसकी झलक ऐसी बयानबाजियों के जवाब में उनकी टिप्पणियों, प्लेकार्ड्स, मिम्स, इण्टरव्यू में मिल रही थी। ऐसे लोगों के प्रति उन्होंने संयम से काम लिया और आन्दोलन में घुसपैठ करके अशान्ति फैलाने का प्रयास कर रहे कुछ उपद्रवियों को पुलिस के हवाले भी किया। इस तरह सरकार समर्थकों के हर चाल–कुचाल को नाकाम करते हुए आन्दोलन अनुशासित रूप से आगे बढ़ता रहा।
आन्दोलन की शुरुआत भी बिल्कुल ही अनोखी और विचित्र ढंग से हुई। एक याचिका की सुनवायी के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त ने बेरोजगार नौजवानों पर तिरस्कारपूर्ण और अपमानजनक टिप्पणी करते हुए उन्हें कॉकरोच और परजीवी कहा। सरकारी उपेक्षा और विकास के नाम पर धोखाधड़ी की शिकार इस युवा पीढ़ी की दुर्दशा का आलम यह है कि नीति आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक 15 से 29 साल के 8 करोड़ 70 लाख नौजवान न पढ़ाई कर रहे हैं, न नौकरी और न ही कोई प्रशिक्षण ले रहे हैं। ऐसी स्थिति में देश के रहनुमाओं पर सवाल उठाने के बजाय मुख्य न्यायधीश का उपेक्षित और वंचित नौजवानों पर कटाक्ष करना उनके घावों पर नमक रगड़ने जैसा था। बात आयी–गयी हो जाती, लेकिन बोस्टन में पढ़ाई कर रहे अभिजीत दीपके ने मुख्य न्यायाधीश की उक्त टिप्पणी की प्रतिक्रिया में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) के नाम से एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बनाया जिसे छात्रों–नौजवानों ने अपना क्षोभ जाहिर करने का माध्यम बना लिया। देखते ही देखते इसके 2 करोड़ 40 लाख फॉलोवर हो गये। इससे उत्साहित होकर सीजेपी ने अपनी पार्टी का ऑनलाइन घोषणापत्र भी जारी कर दिया।
इन सबके बावजूद सीजेपी को एक तात्कालिक प्रतिक्रिया के तौर पर ही देखा गया, क्योंकि एक ऑनलाइन पार्टी जिसका न तो कोई राजनीतिक अनुभव हो, न सांगठनिक ढाँचा और न ही कोई जनाधार उसके भरोसे छात्रों–नौजवानों के वर्तमान और भविष्य से जुड़े गम्भीर और बुनियादी समस्याओं का निदान सम्भव नहीं। फिर भी, जब सीजेपी ने नीट पेपर लीक के चलते आत्महत्या करने वाले छात्रों को मुआवजा और केन्द्रीय शिक्षा मन्त्री के इस्तीफे की माँग को लेकर दिल्ली के जन्तर–मन्तर पर आन्दोलन की शुरुआत की तो चैतरफा समस्याओं से ग्रस्त छात्रों–नौजवानों के लिए वह वर्षों से दबे असन्तोष और आक्रोश की अभिव्यक्ति का साझा मंच बन गया।
आन्दोलन में वांगचुक का प्रवेश और बहिर्गमन भी दिलचस्प था। वे अकस्मात सीजेपी के समर्थन में जन्तर–मन्तर पहुँचे और आनन–फानन में उन्होंने आमरण अनशन की घोषणा कर दी। कुछ ही समय बाद उनके खराब स्वास्थ्य का हवाला देकर उनसे अनशन तोड़ने की अपील होने लगी, पुलिस उन्हें सफदरजंग अस्पताल उठा ले गयी और वहीं उन्होंने भाजपा के दो मन्त्रियों के हाथों जूस पीकर अनशन तोड़ लिया। धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की माँग से पीछे हटकर वे सरकार से संसद में परीक्षा प्रणाली की गड़बड़ी पर चर्चा कराने और कानून बनाने का आश्वासन पाकर ही सन्तुष्ट हो गये। इस तरह संसद मार्च से पहले ही उनकी घर वापसी हो गयी।
20 जुलाई को संसद मार्च के दिन सीजेपी के प्रवक्ता उस मार्च का नेतृत्व करने की जगह भाजपा के दो मन्त्रियों जीतेन्द्र सिंह और जेपी नड्डा के साथ बैठक कर रहे थे, जन्तर–मन्तर से संसद की ओर बढ़ रहे निहत्थे और निर्दोष लड़के–लड़कियों पर दिल्ली पुलिस ने कील लगी लाठियों, एक्सपायर्ड आँसू गैस और पैलेट गन से हमला करते हुए बर्बरता की सारी हदें पार कर दीं। सीजेपी ने सरकार के साथ वार्ता में नीट पेपर लीक के बाद आत्माहत्या करने वाले छात्रों को मुआवजा, धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा और प्रदर्शन में शामिल लोगों पर लादे गये सभी मुकदमें वापस लेने की माँगें पेश की जिन्हें सरकार ने ठुकरा दी।
पुलिस के बर्बर दमन का सामना करने के बावजूद आन्दोलनकारी नौजवानों का हौसला कायम रहा। लड़के–लड़कियों का काफिला जोश और उत्साह के साथ जन्तर–मन्तर पर आकर वापस डँट गया और अगले दिन वहाँ भारी तादात में लोगों का आना जारी रहा। छात्रों–नौजवानों का आन्दोलन सीजेपी और वांगचुक के नेतृत्व को नकारते हुए आगे बढ़ता गया, एक स्वत:स्फूर्त जनउभार जिसने चेतना और अनुशासन की अद्भुत मिसाल कायम की। यही नहीं, 20 जुलाई के बाद आन्दोलन जन्तर–मन्तर की सीमा से बाहर देश के कई इलाकों में फैल गया, लखनऊ, पटना, नागपुर, मुम्बई और बेंगलुरू सहित तमाम शहरों और छोटे–बड़े शहरों–कस्बों में आन्दोलन के समर्थन और पुलिस दमन के खिलाफ आक्रोश रैलियाँ निकाली गयीं। उन तमाम शहरों में भी पुलिस दमन और गिरफ्तारियों का वही सिलसिला जारी रहा, लेकिन आन्दोलन दबने की जगह और ज्यादा फैलता गया। छात्रों नौजवानों की देशव्यापी एकजुटता और आक्रोश के आगे मगरूर मोदी सरकार को झुकना पड़ा और 25 जुलाई को शिक्षा मन्त्री को इस्तीफा देना पड़ा।
शिक्षा मन्त्री के इस्तीफे के बाद आन्दोलन तो समाप्त हो गया, लेकिन शिक्षा की दुर्दशा और परीक्षा में धाँधली का सवाल अपनी जगह कायम रहा। नये शिक्षा मन्त्री का चाल–चरित्र–चेहरा पहले वाले से कहीं अधिक विद्रूप और ज्ञान–विज्ञान विरोधी पाया गया। आन्दोलन के इस अप्रभावी परिणाम का कारण भी बिलकुल स्पष्ट है। दरअसल सरकार की नीतियों से त्रस्त छात्रों–नौजवानों के इतने बड़े जनउभार की उम्मीद और सपनों के आगे एक अदना से मन्त्री का इस्तीफा बहुत तुच्छ माँग थी। यह आन्दोलन के नेतृत्व की सीमा थी कि उसने समस्या को सतही और जनमनभावन मुद्दों तक सीमित कर दिया। सीजेपी के जन्म के पहले से ही प्रतियोगी और प्रवेश परीक्षाओं में बार–बार पेपर लीक के खिलाफ छात्रों और नौजवानों का लगातार अन्दोलन चलते रहे हैं। जन्तर–मन्तर आन्दोलन में शामिल तमाम वामपंथी और इन्कलाबी संगठन पहले से ही नीट परीक्षा पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर उतर कर पुलिस दमन का सामना करते रहे हैं।
सीजेपी ने उनके साथ मिलकर आन्दोलन की रूपरेखा तय करने और माँगपत्र तैयार करने के बजाय गैर लोकतान्त्रिक और मनमाने तरीके से आन्दोलन का संचालन किया। आन्दोलन में शामिल अन्य संगठनों ने भी इस दिशा में कोई संयुक्त प्रयास नहीं किया। फिर भी इस लगभग नेतृत्वविहीन आन्दोलन की आंशिक सफलता दरअसल जुझारू ताप–तेवर के साथ छात्रों–नौजवानों की भारी तादाद की हिस्सेदारी का नतीजा रहा है।
जिस नीट पेपर लीक के खिलाफ आन्दोलन किया गया वह इस पूरी शिक्षा व्यवस्था का एक हिस्सा है। जिस तरह शिक्षा व्यवस्था का निजीकरण और बाजारीकरण किया जा रहा है उसी तरह परीक्षा प्रणाली को भी मुनाफे का जरिया बना दिया गया है। नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (एनटीए) एक निजी कम्पनी है। इस निजी मुनाफाखोर कम्पनी को विभिन्न सरकारी परीक्षाओं और नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं में शामिल होने वाले लाखों नौजवानों के भविष्य की जिम्मेदारी सौंप दी गयी है। सेण्ट्रल यूनिवर्सिटी में एडमिशन के लिए सीयूईटी प्रवेश परीक्षा को सरकार ने अनिवार्य कर दिया जिसकी परीक्षा फीस से एनटीए ने 2022 से 2024 के बीच 2428.93 करोड़ की कमाई की। नीट और जेईई से कमाई भी हजारों करोड़ में है। इसके गठन के बाद से ही पेपर लीक अपवाद की जगह नियम बन गया है। इसका चेयरमैन प्रदीप कुमार जोशी पहले से ही कुख्यात व्यक्ति है। मध्य प्रदेश की आईबी रिपोर्ट में उसे भाजपा का खास बताया गया है। जब मुनाफे की लूट ही चालक शक्ति हो, किसी के प्रति जवाबदेही न हो और सत्ता का वरदहस्त हासिल हो तो पेपर लीक और मनमाने दामों पर पेपर बेचने से भला कौन रोक सकता है? छात्र–नौजवान संगठनों द्वारा पहले से ही एनटीए को भंग करने की माँग की जा रही थी, जिसे जन्तर–मन्तर आन्दोलन में मुद्दा नहीं बनाना एक बड़ी गलती रही है।
हर तरह की परीक्षाओं का केन्द्रीकरण एक दोषपूर्ण परीक्षा प्रणाली है। दरअसल यह सलेक्सन की नहीं बल्कि रिजेक्सन की कवायद है। भारी फीस और दूर–दराज सेण्टर की वजह से आम परिवारों के छात्रों–नौजवानों के लिए इसमें शामिल होने के बारे में सोचना भी कठिन है। पढ़ाई की महँगी फीस का बोझ उठाने से पहले ही उन्हें ऐसी बाधा दौड़ में शामिल होना पड़ता है जिसमें उनके पैरों में पत्थर बाँध दिया जाता है।
नीट और जेईई की परीक्षा से लेकर हर छोटी–बड़ी परीक्षा के लिए अब कोचिंग के व्यवसाय को बढ़ावा दिया जा रहा है जिसकी सालाना आमदनी हजारों करोड़ में है। पहले महानगरों तक सीमित ये कोचिंग सेण्टर अब छोटे शहरों तक पैर पसार चुके हैं। स्थापित तथ्य है कि हजारों रुपये खर्च करके कोचिंग किये बिना इन परीक्षाओं में अच्छे नम्बर आना असम्भव है। नवीं क्लास से ही स्कूल की नियमित पढ़ाई छोड़कर बच्चे कोचिंग सेण्टर में दाखिल हो जाते हैं।
नीट परीक्षा के बारे में तमिलनाडु सरकार ने 2021 में एके राजन कमेटी का गठन किया था। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि नीट परीक्षा उन छात्रों के लिए भारी नुकसानदायक है जो ग्रामीण इलाकों से आते हैं, सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, तमिल भाषा में पढ़ाई करते हैं और निम्न आय वर्ग से आते हैं। कारण यह है कि नीट परीक्षा का कोर्स स्कूली पाठ्यक्रम से अलग है और इसके चुनाव की प्रणाली ग्रामीण और वंचित वर्ग के छात्रों की बौद्धिक क्षमता को न्यायपूर्ण ढंग से जाँचने में असमर्थ है। तमिलनाडु सरकार ने नीट परीक्षा को पूरी तरह समाप्त करने की सिफारिश की थी। ये समस्याएँ देशभर के सरकारी स्कूलों और राज्य परीक्षा बोर्ड वाले स्कूलों के छात्रों की भी है जिनकी छँटनी का काम नीट परीक्षा के जरिये होता है।
उधर मोदी सरकार ने भी 2024 के पेपर लीक के बाद इसरो के पूर्वअध्यक्ष के– राधाकृष्णन की अगुआई में एक उच्च स्तरीय कमेटी बनायी थी जिन्होंने एनटीए की कार्यप्रणाली में कई खामियाँ गिनवाते हुए 101 सिफारिशें पेश की थीं। मोदी सरकार ने उन सिफारिशों को आज तक लागू नहीं किया और दो साल बाद एक और पेपर लीक हो गया। अब जन्तर–मन्तर आन्दोलन के दबाव में नन्दन निलेकानी की अगुआई में एक उच्च स्तरीय टास्क फोर्स बना दिया गया।
यहाँ असली सवाल तो नीट–जेईई और एनटीए की मूलभूत अवधारणा पर है जिसे तमिलनाडु की एके राजन कमेटी ने रेखांकित किया, लेकिन उन्हें प्रश्नों के घेरे में लाने और उसे निर्मूल करने के बजाय केवल उसकी कार्य प्रणाली में सुधार के लिए कड़े कानून और उच्च स्तरीय कमेटी का झाँसा दिया जा रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में 100 से भी ज्यादा प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं। यह गम्भीर बीमारी से ग्रसित सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली के रोग के लक्षण मात्र हैं। असली जड़ नवउदारवादी आर्थिक नीतियों के अनुरूप शिक्षा का बाजारीकरण और उसे मुनाफे का धन्धा बनाया जाना है। 1986 में राजीव गाँधी सरकार की नयी शिक्षा नीति से लेकर 2020 में मोदी सरकार की नयी शिक्षा नीति तक शिक्षा के बाजारीकरण की रफ्तार तेज होती गयी है। मोदी सरकार की शिक्षा नीति में व्यवसायीकरण के साथ–साथ शिक्षा का सम्प्रदायीकरण, अवैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा और उसी के अनुरूप पाठ्यक्रमों में फेर बदल भी कोढ़ में खाज की तरह जुड़ गया है।
निश्चय ही शिक्षा और रोजगार की समस्याएँ बहुत गम्भीर और बड़ी हैं जिनका सामना आज की युवा पीढ़ी को करना पड़ रहा है। अपनी सीमा और सामर्थ्य के साथ छात्रों–नौजवानों ने एक शानदार शुरुआत की है और भावी आन्दोलन के लिए नयी ऊर्जा का संचार किया है। उसी उत्साह, एकजुटता और सूझबूझ के साथ बदलाव की देशव्यापी लहर ही इन समस्याओं की जड़ पर प्रहार करने में कामयाब होगी।