संपादकीय: दिसंबर 2025

उन्मादी–फासीवादी ट्रम्प का टैरिफ युद्ध और भारत सरकार का आत्मसमर्पण

उमा रमण ( संपादक ) 1

अमरीका के ट्रम्प प्रशासन द्वारा उठाये गये एकतरफा और प्रतिशोधात्मक कदम आज के वैश्विक सत्ता–सम्बन्धों में साम्राज्यवादी वर्चस्व की एक खुली मिसाल हैं। टैरिफ युद्ध को भले ही व्यापारिक असन्तुलन को सुधारने के रूप में पेश किया गया हो, लेकिन इसके भीतर छिपी असली मंशा आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक वर्चस्व को बनाये रखना है। टैरिफ केवल सीमा शुल्क नहीं हैंय वे ऐसे हथियार बन चुके हैं, जिनसे अमरीका अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बिना युद्ध लड़े चोट पहुँचाता है और अपनी शर्तें मनवाने की कोशिश करता है। उन्मादी–फासीवादी ट्रम्प के मौजूदा टैरिफ युद्ध का यही वास्तविक निहितार्थ है।

ट्रम्प की “अमरीका फर्स्ट” नीति और “मेक अमरीका ग्रेट अगेन” (मागा) की आक्रामक राष्ट्रवादी भाषा भी इसी ओर इशारा करती है। यह उस साम्राज्य की बेचैनी है, जिसकी औद्योगिक बढ़त कमजोर पड़ चुकी है, जिसकी उत्पादन क्षमता एशिया की ओर खिसक गयी है और जिसकी मुद्रा ‘डॉलर’ पर काली छाया मँडरा रही है। जब वास्तविक अर्थव्यवस्था कमजोर होती है, तब साम्राज्यवादी शक्तियाँ टैरिफ, प्रतिबन्ध और दण्डात्मक नीतियों का सहारा लेती हैं। ट्रम्प का टैरिफ युद्ध इसी ऐतिहासिक पैटर्न का ताजा उदाहरण है।

इस टैरिफ युद्ध का सबसे बड़ा निशाना वे देश हैं जो या तो अमरीकी आपूर्ति श्रृंखला के दबाव से स्वतंत्र होना चाहते हैं या उसके भू–राजनीतिक महात्वाकांक्षाओं को चुनौती दे रहे हैं। चीन इसका केन्द्रीय लक्ष्य है, लेकिन भारत, रूस, ईरान और ब्रिक्स से जुड़े अन्य देश भी इसके निशाने पर हैं। टैरिफ के जरिये अमरीका यह संदेश दे रहा है कि वैश्विक बाजार में प्रवेश की पूर्वशर्त प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि उसके राजनीतिक वर्चस्व को स्वीकार करना है। जो देश उसकी अधीनता को स्वीकार नहीं करेगा, उसे आर्थिक दण्ड दिया जाएगा।

टैरिफ युद्ध का एक अहम पहलू यह भी है कि यह “नव–उदारवाद” की उस अवधारणा को चोट पहुँचाता है, जिसे अमरीका 1990 के बाद से बाकी दुनिया पर थोपता रहा है। जब अमरीकी कम्पनियाँ लाभ में थीं, तब नव–उदारवाद एक पवित्र सिद्धान्त था। लेकिन जैसे ही प्रतिस्पर्धा तेज हुई और अमरीकी पूँजी पिछड़ने लगी, वही नव–उदारवाद और बाजारवाद अचानक “अनुचित” और “असन्तुलित” घोषित कर दिया गया। यह दोहरा मानदण्ड साम्राज्यवादी नीति की बुनियादी पहचान है।

इस युद्ध का असर केवल सरकारों या कॉरपोरेट तक सीमित नहीं। टैरिफ का बोझ अन्तत: मजदूरों, उपभोक्ताओं और छोटे उत्पादकों पर पड़ता है। कीमतें बढ़ती हैं, रोजगार अस्थिर होता है और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ टूट जाती हैं। लेकिन ट्रम्प प्रशासन के लिए यह कीमत फायदेमन्द है, क्योंकि उसकी राजनीति आर्थिक न्याय से तय नहीं होती, बल्कि घरेलू जनमत को राष्ट्रवादी उन्माद में बाँधे रखने पर टिकी है जो अन्तत: एकाधिकारी वित्तीय पूँजी की सेवा करता है। बाहरी दुश्मन गढ़ना, व्यापार युद्ध छेड़ना और आक्रामक भाषा बोलना–– यह सब आन्तरिक संकटों से ध्यान हटाने की रणनीति है जो अमरीका के लिए जानलेवा बन गये हैं।

टैरिफ युद्ध के जरिये अमरीका दरअसल उस बदलती दुनिया की गति को अवरुद्ध करना चाहता है, जो बहुध्रुवीय होती जा रही है। डॉलर के वर्चस्व को चुनौती, स्थानीय मुद्रा में व्यापार, ब्रिक्स जैसे मंचों का उभार–– ये सभी इस बात का संकेत हैं कि अमरीकी प्रभुत्व अब पहले जैसा निर्विवाद नहीं रहा। टैरिफ इस पराभव को थामने की एक असफल कोशिश है।

इस पूरे परिदृश्य में टैरिफ युद्ध किसी समाधान की ओर नहीं, बल्कि अस्थिरता की ओर ले जाता है। यह देशों के बीच अविश्वास बढ़ाता है, वैश्विक मन्दी के खतरे को गहराता है और साम्राज्यवादी टकराव को बढ़ा देता है। साम्राज्यवादी दबाव की यह रणनीति अन्तत: उसी व्यवस्था को नुकसान पहुँचाती है, जिसे बचाने का दावा अमरीका करता आया है। यह उसके मरणासन्न होने का संकेत भी है।

एच–1बी वीजा मामला

प्रत्येक एच–1बी वीजा धारक पर 88 लाख रुपये का असंगत और अमानवीय शुल्क लगाने की घोषणा न केवल आर्थिक तर्कों से परे है, बल्कि यह साफ तौर पर भारत जैसे देशों को झुकाने की एक रणनीति है। 21 सितम्बर 2025 से लागू होने वाला यह फैसला उस अमरीका की वास्तविकता को उजागर करता है जो “मुक्त व्यापार” और “वैश्विक सहयोग” की लफ्फाजी करता है, लेकिन व्यवहार में अपने संकीर्ण हितों के लिए दण्डात्मक नीतियाँ अपनाता है।

यह निर्णय किसी शून्य में नहीं लिया गया है। ईरान के चाबहार बन्दरगाह पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाने और प्रतिबन्धों को फिर से लागू करने के ठीक बाद यह घोषणा सामने आयी है। चाबहार बन्दरगाह भारत द्वारा संचालित एक महत्वपूर्ण परियोजना है, जो न केवल भारत–ईरान सहयोग का प्रतीक है बल्कि दक्षिण एशिया और मध्य एशिया में भारत की रणनीतिक उपस्थिति का भी आधार है। इन दोनों कदमों का समय और क्रम यह स्पष्ट करता है कि अमरीका द्विपक्षीय व्यापार वार्ताओं के दुबारा शुरू होने से पहले भारत पर दबाव बनाना चाहता है, ताकि उसे अपनी अनुचित और असन्तुलित टैरिफ माँगों के आगे झुकने को मजबूर किया जा सके। यह कूटनीति नहीं, बल्कि खुलेआम धमकाने की नीति है।

इस पूरी परिस्थिति में सबसे चिन्ताजनक पहलू भारत सरकार की प्रतिक्रिया है। इन अमरीकी दबाव का ठोस और स्पष्ट विरोध के बजाय प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर “आत्मनिर्भरता” का राग अलापा और खुद को अस्पष्ट उपदेशों तक सीमित रखा है। आत्मनिर्भरता कोई जादुई मंत्र नहीं है जिसका हर अन्तरराष्ट्रीय अपमान और आर्थिक हमले के बाद जाप किया जाये। यह न तो तत्काल समाधान है और न ही यह विदेश नीति की विफलताओं पर पर्दा डालने का औजार हो सकता है। राष्ट्राध्यक्ष का यह पलायनवादी रवैया और विदेश मंत्रालय की कमजोर, औपचारिक और प्रभावहीन प्रतिक्रिया देश की सम्प्रभुता और आत्मसम्मान दोनों को कमजोर करती है।

यह तय है कि एच–1बी वीजा धारकों के प्रवेश पर लगाये गये इस प्रतिबन्ध और भारी शुल्क का सीधा असर भारत के हजारों कुशल पेशेवरों पर पड़ेगा। उनके करियर अचानक अनिश्चितता के अँधेरे में धकेल दिये जाएँगे, उनके परिवारों की आजीविका पर संकट आएगा और वर्षों की मेहनत से खड़े किये गये सपने टूटने की कगार पर होंगे। यह केवल वीजा नीति का सवाल नहीं है, यह भारतीय श्रम, प्रतिभा और गरिमा पर सीधा प्रहार है।

ट्रम्प ने मोदी को “टैरिफ किंग” की अपमानजनक संज्ञा से सम्बोधित किया। मोदी और ट्रम्प के बीच कथित “मित्रता” और “रणनीतिक साझेदारी” के दावों की भी इस पूरे प्रकरण में पोल खुल गयी। यदि यह साझेदारी सचमुच बराबरी पर आधारित होती, तो अमरीका इस तरह के दण्डात्मक कदम उठाने से पहले सौ बार सोचता। लेकिन हकीकत यह है कि अमरीकी साम्राज्यवादी हितों के सामने “सरकार नरेन्दर बार–बार सरेण्डर” (आत्मसमर्पण) करती दिखाई दे रही है, चाहे रूस से तेल मँगाने का मामला हो या पाकिस्तान के साथ सैन्य संघर्ष–विराम। नतीजा, भारत सरकार अमरीका के आगे नतमस्तक होती है, देश के नागरिक नुकसान उठाते हैं और सत्ता प्रतिष्ठान खोखली बयानबाजी के सहारे जिम्मेदारी से बच निकलता है। अनुमान है कि भारत की खेती अमरीकी टैरिफ से बुरी तरह प्रभावित होगी, इससे कॉर्पोरेट को भरपूर फायदा और किसानों को भारी नुकसान होगा जिसके खिलाफ पंजाब के किसान और संयुक्त किसान मोर्चा आन्दोलन की राह पर हैं।

टेस्ला से असमान समझौता

कहते हैं कि किसी देश की विदेश नीति घरेलू नीति का आइना होती है। भारत के सन्दर्भ में ऐसा हुबहू दिखायी दे रहा है। मोदी के नेतृत्व में भारत को “विश्वगुरु” बनाने का दावा किया गया था, जबकि देश आज भीतर से खोखला और बाहर से पराधीन होता जा रहा है। यह तबाही किसी प्राकृतिक आपदा का परिणाम नहीं है, बल्कि सुनियोजित नीतिगत फैसलों, कॉर्पोरेट परस्त शासन और जनविरोधी राजनीति का नतीजा है। बेरोजगारी ऐतिहासिक स्तर पर है, महँगाई आम आदमी की कमर तोड़ चुकी है, सार्वजनिक स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था जर्जर है और लोकतांत्रिक संस्थाएँ इस सरकार के आगे एड़ियाँ रगड़ रही हैं। इस परिदृश्य में देश की सम्पदा, श्रम और बाजार को बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के हवाले करना ही “विकास” का पर्याय बना दिया गया है।

इसी तबाह भारत में अब एलन मस्क की टेस्ला का स्वागत हो रहा है। लेकिन यह स्वागत आत्मनिर्भर भारत की उपलब्धि नहीं, बल्कि उसकी विडम्बना है। टेस्ला कारें “मेड इन चाइना” होंगी और भारतीय बाजार में दोगुनी कीमत पर बेची जाएँगी। यानी उत्पादन चीन में, मुनाफा अमरीकी कम्पनी को और बोझ भारतीय उपभोक्ता पर। यह सौदा न तो भारतीय उद्योग को मजबूत करता है, न तकनीक हस्तान्तरण की कोई ठोस शर्त रखता है और न ही रोजगार सृजन की गारण्टी देता है। इसके उलट यह भारत को एक महँगा उपभोक्ता बाजार बनाकर छोड़ देता है, जहाँ वैश्विक पूँजी अपनी शर्तों पर आती है और अकूत कमाई करके चली जाती है।

यह वही भारत है जहाँ घरेलू ऑटो उद्योग संकट में है, छोटे और मझोले उद्यम बन्द हो रहे हैं और लाखों युवा काम की तलाश में भटक रहे हैं। लेकिन सरकार को चिन्ता इस बात की नहीं कि देश में उत्पादन कैसे बढ़े, बल्कि इस बात की है कि विदेशी ब्राण्ड कैसे आयें और सत्ता की छवि चमकायें। “मेक इन इण्डिया” का नारा इस तरह “सेल इन इण्डिया” और “ट्रम्प इन इण्डिया” में बदल चुका है। विदेशी कम्पनियों को टैक्स में छूट, जमीन सस्ते में और नियमों में ढील दी जाती है, जबकि देश के अपने लघु और मध्यम उद्योग कर्ज, जीएसटी और अनिश्चित नीतियों के बोझ तले दम तोड़ रहे हैं।

टेस्ला के भारत आगमन पर देश के ऑटो उद्योग के बड़े पूँजीपतियों की राय एक समान नहीं है, लेकिन कुल मिलाकर उसमें समर्थन, आशंका और अवसरवाद–– तीनों का मिश्रण दिखाई देता है। सबसे पहले बड़े कॉरपोरेट ऑटो समूहों–– जैसे टाटा मोटर्स, महिन्द्रा, मारुति–सुज़ुकी की स्थिति देखें तो वे सार्वजनिक रूप से टेस्ला के आगमन का खुला विरोध नहीं करते। वे इसे “प्रतिस्पर्धा से नवाचार बढ़ेगा” और “भारत ईवी हब बनेगा” जैसी गोलमोल भाषा में प्रस्तुत करते हैं। असल में यह पूँजीपति वर्ग सरकार से पहले ही भारी सब्सिडी, टैक्स छूट और नीति–संरक्षण हासिल कर चुका है, इसलिए वह नहीं चाहता कि सरकार से टकराव हो। टेस्ला का स्वागत करना सरकार के साथ तालमेल बनाये रखने का एक तरीका भी है।

लेकिन परदे के पीछे इन पूँजीपतियों में गहरी चिन्ता है। उनकी मुख्य परेशानियाँ हैं–– अगर टेस्ला को आयातित (मेड इन चाइना) कारें बेचने की छूट दी जाती है, तो घरेलू कम्पनियों द्वारा भारत में किया गया भारी निवेश कमजोर पड़ जाएगा। स्थानीय निर्माण की शर्तें ढीली पड़ीं, तो भारतीय कम्पनियाँ लागत और तकनीक–– दोनों में पिछड़ सकती हैं। सरकार यदि टेस्ला को विशेष रियायतें देती है, तो यह “लेवल प्लेइंग फील्ड” को तोड़ेगा। यानी वे टेस्ला से डरते हैं, लेकिन सरकार से ज्यादा डरते हैं, क्योंकि उनकी दुम दबी हुई है, इसलिए खुलकर बोलते नहीं।

दूसरी ओर, ऑटो सेक्टर से जुड़े मध्यम और छोटे पूँजीपति जैसे–– ऑटो कम्पोनेंट निर्माता, सप्लायर, डीलर नेटवर्क आदि ज्यादा असहज हैं। उन्हें लगता है कि यदि टेस्ला भारत में असेम्बली या निर्माण के बजाय केवल आयात पर टिकी रही, तो स्थानीय सप्लाई चेन को कोई लाभ नहीं मिलेगा। उनके लिए टेस्ला “नया बाजार” नहीं, बल्कि एक बन्द गुफा है, जिसमें उनका कोई प्रवेश नहीं।

एक तीसरी प्रवृत्ति भी है–– कुछ बड़े पूँजीपति टेस्ला को खतरे से ज्यादा सौदे के रूप में देख रहे हैं। वे उम्मीद कर रहे हैं कि टेस्ला के साथ जॉइंट वेंचर, बैटरी, सॉफ्टवेयर या चार्जिंग इन्फ्रास्ट्रक्चर में साझेदारी, या सरकार से और रियायतें निकालने का दबाव बनाया जा सकेगा। इस अर्थ में टेस्ला उनके लिए एक लीवर है–– जिससे वे सरकार पर दबाव डाल सकें।

एलन मस्क का मामला इस सच को सामने लाता है कि मोदी का भारत आत्मनिर्भर नहीं, बल्कि परनिर्भर है। एक ओर सरकार चीन से आयात पर राष्ट्रवादी बयानबाजी करती है, दूसरी ओर उसी चीन में बनी वस्तुओं को महँगे दामों पर बेचने की व्यवस्था करती है, बस ब्रांड पश्चिमी हो और तस्वीरें सत्ता के प्रचार में काम आ जाएँ। यह दोहरा चरित्र बताता है कि राष्ट्रवाद देश की नीति नहीं, बल्कि बाजार साधने का राजनीतिक आवरण और जनता को गुमराह करने का वैचारिक जरिया बन गया है।

इस तबाही का सबसे बड़ा खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है। महँगी टेस्ला कारें उस भारत के लिए नहीं हैं जहाँ करोड़ों लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं। वे उस छोटे, सम्पन्न तबके के लिए हैं, जिसे सरकार विकास का चेहरा बनाकर पेश करती है। इस तरह विकास एक सामाजिक परियोजना न रहकर सम्पन्न मध्यम और उच्च वर्ग का अश्लील प्रदर्शन बन गया है–– जहाँ चमकती कारें, ऊँची इमारतें और विदेशी ब्राण्ड हैं, लेकिन उनके नीचे दबी मेहनतकश जनता की कराह को सुनने वाल कोई नहीं है।

मोदी का भारत आज इसी विरोधाभास में जी रहा है। एक ओर “विकसित भारत” का शोर है, दूसरी ओर उजड़ती अर्थव्यवस्था, ठिठुरता लोकतंत्र और बिकती हुई सार्वजनिक कम्पनियाँ हैं। टेस्ला का दोगुनी कीमत पर बिकना महज कारोबारी घटना नहीं हैय यह उस राजनीतिक अर्थशास्त्र का बयान है, जिसमें देश की नीतियाँ––चार श्रम संहिताएँ, कृषि कानून आदि जनता के हित में नहीं, बल्कि विदेशी पूँजी और देशी कॉरपोरेट गठजोड़ के फायदे के लिए गढ़ी जा रही हैं। यही वजह है कि भारत आज आगे बढ़ता हुआ नहीं, बल्कि भीतर से टूटता–तबाह होता देश है।

रूस, चीन और अमरीका

अमरीका और रूस–चीन के बीच मौजूदा टकराव केवल टैरिफ युद्ध तक सीमित नहीं है। यह दरअसल उस वैश्विक व्यवस्था के दरकने का संकेत है, जिसे द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अमरीका ने डॉलर, सैन्य शक्ति और संस्थागत वर्चस्व के सहारे खड़ा किया था और 1990 के बाद नयी विश्व व्यवस्था का चैधरी बना था। ट्रम्प का टैरिफ युद्ध और मागा का शोर इसी कमजोर होती हुई व्यवस्था और अपनी चैधराहट को बचाने की एक बौखलाहट भरी कोशिश है। “अमरीका को फिर महान बनाओ” का नारा असल में इस स्वीकारोक्ति का दूसरा नाम है कि अमरीका अब पहले जैसा महान नहीं रह गया।

 

ट्रम्प द्वारा लगाये जा रहे टैरिफ अब केवल व्यापारिक हथियार नहीं रह गये हैं, बल्कि वे राजनीतिक और वैचारिक हमलों में बदल चुके हैं, जिनका मुख्य निशाना चीन है। अमरीका को डर है कि उसका डॉलर–– जो दशकों से विश्व व्यापार, तेल सौदों और वित्तीय लेन–देन की रीढ़ बना हुआ है–– अब चुनौती के घेरे में है। डॉलर का वर्चस्व केवल मुद्रा के रूप में नहीं हैय यह अमरीका की वैश्विक ताकत, प्रतिबन्ध लगाने की क्षमता और बिना युद्ध लड़े देशों को घुटनों पर लाने की उसकी शक्ति का आधार रहा है। जैसे–जैसे यह आधार खिसक रहा है, वैसे–वैसे अमरीकी प्रतिक्रिया अधिक आक्रामक और अविवेकी होती जा रही है।

लेकिन चीन अब वह देश नहीं है जो दबाव में पीछे हट जाये। उसने पिछले तीन दशकों में उत्पादन, तकनीक, आपूर्ति श्रृंखला और वैश्विक व्यापार में इतनी तरक्की कर ली है कि अब वह पीछे मुड़कर देखने की स्थिति में नहीं है। चीन यह समझ चुका है कि अगर उसे अमरीका की बराबरी करना है या उससे आगे बढ़ना है, तो केवल निर्यात बढ़ाने से काम नहीं चलेगाय डॉलर के वर्चस्व को चुनौती देना अनिवार्य है। इसी रणनीति के तहत चीन अमरीका–केन्द्रित वित्तीय व्यवस्था से बाहर निकलने के रास्ते तलाश रहा है और नये गठबन्धनों को मजबूत कर रहा है।

इसी क्रम में मिस्र, रूस और चीन का स्थानीय मुद्रा में व्यापार करने का समझौता बेहद महत्वपूर्ण है। यह केवल लेन–देन का तकनीकी बदलाव नहीं है, बल्कि डॉलर के प्रभुत्व को धीरे–धीरे कमजोर करने की एक रणनीतिक परियोजना है। जब दो देशों के बीच व्यापार उनकी मुद्राओं में होता है, तो उन पर अमरीकी बैंकिंग सिस्टम, स्विफ्ट नेटवर्क और प्रतिबन्धों की मार कम हो जाती है। यही वह बिन्दु है जहाँ अमरीका सबसे अधिक असहज महसूस कर रहा है, क्योंकि उसकी शक्ति का बड़ा हिस्सा कागजी मुद्रा और वित्तीय नियंत्रण पर टिका है, न कि वास्तविक उत्पादन पर।

ब्रिक्स का आगे बढ़ना भी इसी ऐतिहासिक बदलाव का हिस्सा है। ब्रिक्स अब केवल एक आर्थिक मंच नहीं रह गया, बल्कि एक वैकल्पिक वैश्विक धुरी बनने की कोशिश कर रहा है। साझा मुद्रा की चर्चा, विकास बैंक की सक्रियता और आपसी व्यापार में डॉलर से दूरी–– ये सब संकेत हैं कि दुनिया एक ध्रुवीय व्यवस्था से बहुकेन्द्रीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। यह प्रक्रिया धीमी है, अन्तर्विरोधों से भरी हुई है, लेकिन अपरिवर्तनीय नहीं है।

अमरीका के खिलाफ रूस इस पूरे संघर्ष में सबसे खुला और आक्रामक प्रतिरोधकर्ता बनकर सामने आया है। यूक्रेन युद्ध के बाद लगाये गये पश्चिमी प्रतिबन्धों ने रूस को तोड़ने के बजाय उसे वैकल्पिक रास्तों पर चलने के लिए मजबूर किया। ऊर्जा व्यापार में स्थानीय मुद्रा, चीन और एशिया की ओर झुकाव और पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं से दूरी–– रूस आज अमरीका के खिलाफ सीना ताने खड़ा है, क्योंकि उसके पास खोने के लिए बहुत कम और हासिल करने के लिए बहुत कुछ है। साम्राज्यवादी रूस जानता है कि अमरीका के साथ समझौता नहीं, टकराव ही उसके हितों को आगे बढ़ाने वाली कारगर रणनीति है।

इन सबके बीच अमरीका की स्थिति उहापोह, तनावग्रस्त और उन्मादी प्रकृति की है। एक ओर वह मुक्त बाजार, नियम–आधारित वैश्विक व्यवस्था की बात करता है, दूसरी ओर टैरिफ, प्रतिबन्ध और धमकियों के जरिये उसी व्यवस्था को अपने हाथों से नष्ट कर रहा है। ट्रम्प की मागा राजनीति इस गिरावट को राष्ट्रवादी भ्रम में ढकने की कोशिश है, लेकिन हकीकत यह है कि दुनिया अब अमरीकी इशारों पर चलने को तैयार नहीं है। अमरीका विश्व व्यवस्था के मौजूदा सन्तुलन को अपने पक्ष बनाये रखना चाहता है, चीन धीरे–धीरे इस सन्तुलन को अपने पक्ष में मोड़ रहा है और रूस इसे बिगाड़कर अपने लिए रास्ता साफ करना चाहता है। लेकिन भारत के शासक वर्ग की हालत भीगी बिल्ली की तरह हो गयी है जो चीन से खौफ खाता है, लेकिन अमरीकी घुड़की से उसकी घिघ्घी बँध जाती है। यह शर्मनाक है।

सम्पादकीय (पुराने अंक)

2026
2025
2024
2023
2022
2021
2020
2019
2018
2017
2016
2015
2014
2013
2012
2011
2010
2009
2008
2007
2006