फरवरी 2026 से देश के औद्योगिक क्षेत्रों में मजदूर आन्दोलन की एक नयी लहर का आगाज हुआ । बरौनी, पानीपत, सूरत, गुरुग्राम, मानेसर, नोएडा, भिवाड़ी, भटिण्डा, हरिद्वार, पन्तनगर, देहरादून और दर्जनों अन्य औद्योगिक इलाकों में हजारों मजदूरों ने जबरदस्त स्वत:स्फूर्त प्रदर्शन किया जो आज भी जारी हैं । उनकी बेहद बुनियादी माँगें हैं–– वेतन वृद्धि, 8 घंटे का कार्यदिवस, डबल ओवरटाइम, सुरक्षित कार्यस्थल और सम्मानजनक व्यवहार । आज की सभ्य दुनिया में इन बुनियादी शर्तों के बिना जिन्दगी की कल्पना भी नहीं की जा सकती, लेकिन मजदूरों की इन न्यूनतम जरूरी माँगों के जवाब में प्रशासन ने बर्बर दमन और अन्धाधुन्ध गिरफ्तारी का रास्ता अपनाया ।
पानीपत, गुरुग्राम, मानेसर, नोएडा, हरिद्वार, देहरादून–– हर जगह आन्दोलन कर रहे मजदूरों पर बेरहमी से लाठियाँ बरसाई जा रही हैं तथा मजदूरों और उनके नेताओं को बड़ी संख्या में जेलों में ठूँसा जा रहा है । खास तौर से नोएडा में मजदूर आन्दोलन का बेहद बर्बरता से दमन किया गया । 13 अप्रैल की रात नोएडा को अचानक छावनी में बदल दिया गया । लापता मजदूरों के परिवार, थानों के बाहर इन्तजार करती पत्नियाँ और अपने बच्चों की तलाश में भटकते माता–पिता इस संघर्ष का वास्तविक चेहरा हंै । यही हालत हर औद्योगिक क्षेत्र की कर दी गयी है । इससे मजदूर आन्दोलन के प्रति सरकार का दुश्मनाना रवैया खुलकर सामने आ गया है । गुरुग्राम सेशन कोर्ट की जज को कहना पड़ा, “अभी तो ली अँगड़ाई है, आगे और लड़ाई है और इन्कलाब जिन्दाबाद कहना अगर अपराध या भड़काऊ भाषण है, तो हमारे सिस्टम पर शर्म है ।”
देश के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों, निर्माण स्थलों, परिवहन इकाइयों, खदानों, कारखानों, गोदामों और सेवा क्षेत्रों में जिस प्रकार मजदूर असंतोष उभर रहा है, वह कोई अचानक होने वाली घटना नहीं बल्कि लम्बे समय से आर्थिक, सामाजिक और श्रम–सम्बन्धी नीतियों से उपजे असंतोष और गुस्से का नतीजा है । महँगाई आसमान छू रही है, मजदूरी ऊँट के मुँह में जीरे के समान रह गयी है, ठेका प्रथा ने श्रम को असुरक्षा के दलदल में धकेल दिया है, मजदूर हितैषी श्रम कानूनों को एक–एक कर खत्म किया जा रहा है और दूसरी ओर कॉरपोरेट मुनाफे के पहाड़ खड़े किये जा रहे हैं । ऐसी हालत में मजदूर वर्ग के भीतर जो गुस्सा पनप रहा है, वह अब अन्दर–अन्दर सुलगने वाला असंतोष नहीं, बल्कि खुली आँखों से दिखाई देने वाला जनाक्रोश बन चुका है । क्या यह सब शासन–प्रशासन की निगाहों से ओझल है ?
आज हालात यह हैं कि मजदूर आन्दोलन का यह उफान अगर नियंत्रण से बाहर चला गया तो वह अपने रास्ते में आने वाले हर अवरोध को तिनके की तरह बहा ले जाने की क्षमता रखता है । शासन–प्रशासन को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि मौजूदा मजदूर संगठन और ट्रेड यूनियनें केवल माँगपत्र सौंपने वाली संस्थाएँ नहीं हैं, बल्कि वे मजदूर, कम्पनी और प्रशासन के बीच उचित सम्बन्ध कायम रखने वाली जिम्मेदार सामाजिक शक्तियाँ भी हैं । ये संगठन उस बाँध की तरह काम करते हैं जो उफनती नदी को दिशा देता है, वरना पानी जब सिर से ऊपर निकल जाता है तो फिर किसी के काबू में नहीं रहता । हालत यह है कि पानी मजदूरों के सिर से ऊपर निकल चुका है, अब वे और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं ।
विडम्बना यह है कि जिन संगठनों ने हमेशा मजदूरों को अनुशासन, संयम और शान्तिपूर्ण संघर्ष का रास्ता दिखाया, उन्हीं पर आज लाठी बरसायी जा रही है, उनके नेताओं को झूठे मुकदमों में फँसाया जा रहा है, उन्हें “गुण्डा”, “उपद्रवी”, “पाकिस्तानी”, “अर्बन नक्सल”, “बाहरी तत्व” और “राष्ट्रविरोधी” कहकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही है । शासन–प्रशासन शायद यह भूल रहा है कि आग से खेलना और बारूद के ढेर पर चिंगारी फेंकना कभी समझदारी नहीं कहलाता । इतिहास गवाह है कि जब जनआक्रोश को संवाद से नहीं बल्कि दमन से कुचलने की कोशिश की जाती है, तब परिस्थितियाँ हाथ से निकल जाती हैं और फिर कोई तरकीब काम नहीं आती ।
सच बात यह है कि आज के ज्यादातर मजदूर नेता यह जानते हैं कि शान्तिपूर्ण आन्दोलन से ही मजदूरों को हक दिलाया जा सकता है और हिंसक आन्दोलन हमेशा प्रशासन और फैक्ट्री मालिकों को फायदा पहुँचाता है क्योंकि उसका बहाना बनाकर सरकार आन्दोलन को कुचल देती है । वे मजदूरों को हर हाल में अनुशासन बनाये रखने, सार्वजनिक सम्पत्ति की रक्षा करने और शान्तिपूर्ण आन्दोलन चलाने के लिए प्रेरित करते हैं । वे जानते हैं कि जनसंघर्ष की शक्ति उसकी नैतिक ऊँचाई और जनसमर्थन में निहित होती है । इसलिए वे हर उकसावे के बावजूद मजदूरों को कानून हाथ में लेने से रोकते हैं । अगर ये संगठन और उनके नेतृत्वकारी साथी मैदान में न हों, तो मजदूरों का स्वत:स्फूर्त आक्रोश किस दिशा में जाएगा, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है । तब शासन–प्रशासन के लिए स्थिति सम्भालना काफी कठिन हो सकता है । देश में चल रहे मजदूर आन्दोलनों ने इसका संकेत भी दे दिया है–– चाहे वह पानीपत हो, मानेसर हो या नोएडा ।
यह भी समझना होगा कि मौजूदा आन्दोलन केवल मजदूरी के सवाल पर नहीं है । यह सम्मान, सुरक्षा, स्थायित्व और जीवन के अधिकार का सवाल बन गया है । सालों से नवउदारवादी नीतियों के तहत निजीकरण, श्रम अधिकारों पर हमला, छँटनी और ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया गया । मजदूरों से दिन–रात काम लिया गया, लेकिन बदले में उन्हें अस्थायी रोजगार, बहुत ही कम वेतन और असुरक्षित भविष्य दिया गया । “एक तो करेला, ऊपर से नीम चढ़ा” वाली स्थिति तब पैदा हुई जब बेलगाम बढ़ती महँगाई, खास कर छोटे रसोई गैस सिलिण्डर की बढ़ती कीमत और किल्लत ने मजदूर परिवारों की कमर ही तोड़ दी । ऐसी हालत खतरनाक होती है । रसोई गैस के अभाव में एक तरफ तो कई शहरों से प्रवासी मजदूर अपना काम छोड़कर वापस गाँव जाने पर मजबूर हुए । दूसरी ओर उनके संचित आक्रोश ने स्वत:स्फूर्त हड़ताल और आन्दोलन का रूप ले लिया ।
शासन–प्रशासन अगर अब भी हठधर्मिता पर अड़ा रहता है, मजदूर संगठनों को कुचलने की नीति अपनाना जारी रखता है, संवाद के रास्ते बन्द रखता है और लोकतांत्रिक तरीकों से किये गये न्याय संगत विरोध को अपराध की तरह देखता है, तो यह दूरदर्शिता नहीं बल्कि अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा कदम होगा । लोकतांत्रिक समाज में जनसंगठनों को कमजोर करना आखिर में सामाजिक सन्तुलन को कमजोर करना होता है और भारत जैसे सीमित–कमजोर लोकतन्त्र में तो यह और भी खतरनाक है । यह समझना जरूरी है कि मजदूर संगठन आन्दोलन करके शासन से दुश्मनी नहीं निकाल रहे हैं, बल्कि सामाजिक स्थिरता, न्याय और इनसानी गरिमा बनाये रखने की कोशिश कर रहे हैं । वे असंतोष को संगठित, अनुशासित और रचनात्मक दिशा दे रहे हैं जिनके अभाव में समाज का तानाबाना बिखर जाएगा । फिर कोई लाठी, गोली और जेल काम नहीं आएगी ।
अगर मजदूर संगठनों के नेताओं को लगातार जेलों में डाला जाएगा, उन्हें अपमानित किया जाएगा और उनके अस्तित्व को ही मिटाने की कोशिश की जाएगी, तो इसका नतीजा व्यापक अराजकता के रूप में सामने आ सकता है । तब इसकी जिम्मेदारी उन मजदूरों पर नहीं डाली जा सकेगी जिन्हें व्यवस्था ने वर्षों तक निचोड़कर रखा, बल्कि उस शासन और प्रशासन पर आएगी जिसने समय रहते चेतावनियों को अनसुना किया, संवाद की मेज पलट दी और दमन को ही शासन का पर्याय बना दिया । जनता का आक्रोश अहंकारी और निरंकुश सत्ताओं को धूल में मिला देता है, इतिहास का यह सबक भूलना नहीं चाहिए ।
अगर आज शासन–प्रशासन अपनी सोच और व्यवहार को नहीं बदलता और यह नहीं समझता कि समय बदल चुका है । अब नवउदारवादी नीतियों के दिन लद गये हैं, गाड़ी को उलटी दिशा में नहीं हाँका जा सकता । मजदूर अब केवल पेट भरने की लड़ाई नहीं लड़ रहा, बल्कि सम्मान और अधिकार की लड़ाई लड़ रहा है । इसलिए दमन की लाठी छोड़कर संवाद का रास्ता अपनाना ही विवेकपूर्ण कदम होगा । अगर वे फैक्ट्री मालिकों, ठेकेदारों, विदेशी निवेशकों और धन्नासेठों के दबाव में मजदूरों पर डण्डे बरसाते रहेंगे, उनके साथ रोमन गुलामों की तरह व्यवहार करते रहेंगे तो जिस जनसैलाब को आज जिम्मेदार मजदूर संगठन अनुशासन में बाँधने की कोशिश कर रहे हैं, वही कल नियंत्रण से बाहर होकर ऐसी परिस्थिति पैदा कर सकता है जिसे सम्भालना किसी के बूते की बात नहीं रहेगी ।
मौजूदा संघर्ष की जड़ें कहाँ हैं ?
इनकी जड़ें 1990 में लागू आर्थिक सुधारों में हैं । उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों के जरिये मजदूरों पर चैतरफा हमले किये गये । इसका मकसद था–– संकटग्रस्त साम्राज्यवादी पूँजी के लिए भारत के दरवाजे को खोलना, देशी–विदेशी पूँजी का गठजोड़ कायम करना, उनकी लूट का रास्ता साफ करना और संकट का सारा बोझ मेहनतकश वर्ग के कन्धों पर डाल देना । इसके लिए मजदूरों–किसानों के अधिकारों में कटौती की गयी । 1000 से कम मजदूरों वाले उद्योगों को छँटनी और इकाइयाँ बन्द करने की खुली छूट दी गयी । ठेका प्रथा को बढ़ावा दिया गया और स्थायी को अस्थायी श्रम में बदला गया ।
पहले ठेका मजदूरों को केवल सीमित और अस्थायी कामों के लिए रखा जा सकता था, लेकिन बाद में पूरे साल ठेका मजदूर रखने की अनुमति दे दी गयी । इसका नतीजा यह हुआ कि करोड़ों मजदूर प्रोविडेंट फण्ड, ग्रेच्युटी, स्वास्थ्य सुरक्षा और अन्य बुनियादी सुविधाओं से वंचित कर दिये गये । संगठित क्षेत्र लगातार सिकुड़ता गया और उसकी जगह असंगठित श्रम बाजार ने ले ली, जहाँ न निश्चित वेतन है, न सेवा सुरक्षा और न ही कानूनी संरक्षण ।
सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण ने इस संकट की आग में घी डालने का काम किया । फायदे में चल रहे तमाम सार्वजनिक उपक्रमों के निजीकरण के साथ शुरू हुई स्थायी नौकरी और मजदूर अधिकारों पर हमले की प्रक्रिया ने साहिबाबाद, फरीदाबाद, नोएडा, गुरुग्राम, सोनीपत और पानीपत जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में स्थायी रोजगार की जमीन को खोखला कर दिया । पक्की नौकरी धीरे–धीरे मजदूर वर्ग के लिए एक सपना बना दी गयी ।
इसके साथ ही, मोदी सरकार ने चार श्रम संहिताओं के जरिये पीढ़ियों की लड़ाई से हासिल मजदूर अधिकारों को लगभग खत्म कर दिया । यूनियन बनाने, हड़ताल करने और सामूहिक प्रतिरोध जैसे अधिकारों पर नये प्रतिबन्ध लगाये गये । न्यूनतम मजदूरी की गारण्टी की धज्जियाँ उड़ा दी गयीं । मनरेगा खत्म करके वीबी–जीराम–जी योजना और श्रम शक्ति नीति–2025 इसी दमनात्मक फैसलों की अगली कड़ी हैं । रही–सही कसर बढ़ती महँगाई ने पूरी कर दी । जीएसटी और दूसरे टैक्सों ने घरेलू उपभोग की वस्तुओं को महँगा कर दिया । भोजन, किराया, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी बुनियादी जरूरतें मजदूरों के लिए दुर्लभ बना दी गयीं । इसमें चिंगारी लगाने का काम अमरीका–ईरान युद्ध के बाद छोटे रसोई गैस सिलिण्डर के आसमान छूते दामों ने किया । नतीजा, औद्योगिक क्षेत्रों में चैतरफा उबाल आ गया ।
आन्दोलन कैसे आगे बढ़ा ?
फरवरी 2026 में पानीपत की आईओसीएल रिफाइनरी में 20 हजार से अधिक मजदूरों की हड़ताल हुई । मजदूर 12 घंटे की शिफ्ट, असुरक्षित कार्यस्थल, खराब आवास, साफ पानी और शौचालय का अभाव जैसी बुनियादी सुविधाओं की समस्या के खिलाफ आन्दोलन कर रहे थे । मजदूरों का कहना था कि छोटे कमरों में उन्हें ठूँसकर रखना अमानवीय है । हड़ताल के बाद प्रबन्धन बातचीत के लिए मजबूर हुआ, लेकिन मजदूरों का आरोप था कि समझौतों को लागू नहीं किया गया । आईओसीएल में लगभग 23 हजार ठेका मजदूरों के मुकाबले स्थायी कर्मचारियों की संख्या न के बराबर है । यह अनुपात दिखाता है कि किस तरह ठेका प्रथा ने स्थायी रोजगार को निगल लिया । अन्दोलन के दबाव में हरियाणा सरकार मजदूरी बढ़ाने के लिए मजबूर हुई । इससे मजदूर अन्य जगहों पर भी आन्दोलन के लिए प्रेरित हुए । सोशल मीडिया पर मजदूरों द्वारा वीडियो और रिपोर्ट ने आन्दोलन की खबरों को देश के कोने–कोने तक पहुँचा दिया, हालाँकि सरकार और पूँजीपतियों की चाटुकार गोदी मीडिया इन बेहद जरूरी खबरों पर या तो चुप्पी साधे रही या तोड़–मरोड़ कर प्रस्तुत करती रही ।
मार्च और अप्रैल में मानेसर मजदूर संघर्ष का नया केन्द्र बना । मुंजाल शोवा, सत्यम ऑटो कम्पोनेंट्स, रिचा ग्लोबल, रूप पॉलिमर्स, मॉडलमा एक्सपोर्ट और कई अन्य कम्पनियों में हड़तालें फैल गयीं । यहाँ भी मजदूरों की प्रमुख माँगें वही थीं, इसमें महिला कर्मचारियों के खिलाफ उत्पीड़न पर रोक की माँग और जुड़ गयी थी । तुरन्त ही इन संघर्षों के खिलाफ पुलिसिया दमन तेज हो गया । लाठीचार्ज, गिरफ्तारियाँ और रात में कार्यकर्ताओं को घरों से उठाने जैसी घटनाएँ होने लगीं । लेकिन दमन आन्दोलन को रोक नहीं सका । इसके उलट, इससे मजदूरों के भीतर यह आक्रोश तीव्र हुआ और उन्हेंं लगा कि राज्य मशीनरी पूँजीपतियों के पक्ष में खड़ी है ।
अप्रैल 2026 में नोएडा के सेक्टर 57 और 63 की फैक्ट्रियों में हुए विरोध प्रदर्शनों ने दिखाया कि मजदूर आन्दोलन नये इलाकों में भी तेजी से फैल रहा है । मजदूरों ने व्हाट्सएप समूहों, सोशल मीडिया और आपसी नेटवर्क से आन्दोलन को आगे बढ़ाया । डिजिटल तकनीक ने आन्दोलन को नया विस्तार दिया । मजदूर खुद वीडियो बनाकर सूचनाएँ प्रसारित कर रहे हैं, घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहे हैं और एक–दूसरे से सीधे जुड़ रहे हैं ।
नोएडा आन्दोलन को प्रशासन और गोदी मीडिया ने नक्सलवाद और पाकिस्तानी आतंकवाद से जोड़ने की घिनौनी कोशिशें की । कई मजदूरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया । परिवारों को जानकारी तक नहीं दी गयी । यह सब शासन के मजदूर विरोधी रवैये को दिखाता है ।
राजस्थान के भिवाड़ी, उत्तराखण्ड के रुद्रपुर और पन्तनगर, झारखण्ड, बिहार और छत्तीसगढ़ के ऊर्जा क्षेत्रों में भी इसी तरह के आन्दोलन हुए । हाई–टेक गीयर्स, रिलैक्सो, वी–गार्ड, डीवीएस और अन्य कम्पनियों में मजदूर वेतन वृद्धि और बेहतर कार्य परिस्थितियों की माँग को लेकर आन्दोलन के मैदान में उतर आये हैं । सभी जगह 10–12 घण्टे काम करने के बावजूद मजदूरों को इतनी कम मजदूरी मिल रही है कि न्यूनतम जरूरतें पूरी करना भी असम्भव है ।
ऊर्जा क्षेत्र में भी मजदूरों का गुस्सा फूट पड़ा है । एनटीपीसी पतरातू, एनटीपीसी नवीनगर और रायखेड़ा स्थित अडानी पावर प्लाण्ट में मजदूरों ने अपनी बुनियादी माँगों को लेकर हड़तालें कर दी हैं । इससे साफ हो गया कि मजदूर आन्दोलन अब केवल किसी एक उद्योग तक सीमित नहीं है, बल्कि सभी उद्योगों और पेशों में फैलता हुआ देशव्यापी बन गया है ।
इस आन्दोलन की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता इसका ‘नेतृत्वहीन’ होना है । मजदूरों ने अपना कोई प्रतिनिधि या नेता नहीं चुना । यह मजदूरों की निम्न चेतना के साथ–साथ सरकार और मालिकों द्वारा मजदूर यूनियतों को पनपने न देने की कोशिश का नतीजा है । मजदूरों ने पारम्परिक ट्रेड यूनियनों को भी नकार दिया । मजदूर संगठन भी आन्दोलन को दिशा देने में नाकमयाब रहे । दूसरी ओर, आन्दोलन को दबाने के लिए प्रशासन को नाको–चने चबाने पड़ रहे हैं क्योंकि सामूहिक मोलभाव के लिए जरूरी ट्रेड यूनियनों का इन इलाकों में कोई वजूद नहीं है ।
बढ़ता जन–समर्थन और चुनौतियाँ
मजदूरों के मौजूदा संघर्षों को व्यापक सामाजिक समर्थन भी मिला । संयुक्त किसान मोर्चा, मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा), जनवादी लेखक संघ, जन संस्कृति मंच, प्रगतिशील लेखक संघ, केन्द्रीय ट्रेड यूनियन और दूसरे संगठनों ने मजदूरों के समर्थन में कई बयान जारी किये और कई प्रेस–वार्ताएँ आयोजित कीं । दिल्ली का जन्तर–मन्तर इन आन्दोलनों का एक महत्वपूर्ण केन्द्र बनता जा रहा है । सभी संगठनों ने गिरफ्तार मजदूरों, उनके नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की रिहाई, फर्जी मुकदमों की वापसी और मजदूरों की बुनियादी माँगों को पुरजोर तरीके से उठाया । दमन के खिलाफ देशव्यापी एकजुटता की जमीन मजबूत होती दिखायी दे रही है । यह जन–समर्थन मौजूदा आन्दोलन की एक बड़ी उपलब्धि और महत्वपूर्ण विशेषता है कि अब यह आन्दोलन फैक्ट्री की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहा । यह एक बहुत बड़ा सामाजिक–राजनीतिक सवाल बन गया है ।
मौजूदा मजदूर आन्दोलन कई उतार–चढ़ाव से गुजर रहा है । एक ओर असन्तोष से पैदा हुआ जबरदस्त ज्वार है, तो दूसरी ओर आन्दोलन आज भी स्वत:स्फूर्त और बिखरा हुआ है । पारम्परिक ट्रेड यूनियनें कई बार केवल औपचारिक विरोध तक सिमटकर रह गयी हैं । आन्दोलन में सच्चे और अनुभवी नेताओं का अभाव है जो जनता से जीवन्त रूप से जुड़े हों । आज इसके सामने सबसे बड़ी चुनौती वैचारिक एकता की है । इसके लिए सबसे बुनियादी काम वैचारिक माहौल बनाने की और सच्चे नेता तैयार करने की है । संघर्ष की सही रणनीति और सुलझे हुए अनुभवी नेताओं का कोर ही अन्दोलन को सही दिशा में आगे बढ़ा सकता है । अगर मजदूर वर्ग अपने सच्चे नेता और जुझारू संगठन को खड़ा कर सका, तभी उसका आन्दोलन जीत हासिल करेगा ।
ध्यान रहे, जिन चार श्रम संहिताएँ ने मजदूरों के अधिकारों पर चैतरफा हमला किया और उन्हें गुलामों से भी बदतर स्थिति में धकेलने की साजिश रची, वह मौजूदा केन्द्र सरकार द्वारा हड़बड़ी में उठाया गया कोई कदम नहीं हैं, बल्कि पूँजीवादी–साम्राज्यवाद की समूची शक्तियों द्वारा मेहनतकश वर्ग पर किया गया सुनियोजित हमला है । लेकिन पूँजीवाद–साम्राज्यवाद की आर्थिक और नैतिक जमीन खोखली हो चुकी है । आज उसकी ताकत मजदूरों के बिखराव और विभाजनों के चलते बची है । अगर मजदूर अपने इतिहास के चमकीले पन्नों को पलटें, तो देखेंगे कि मजदूर संघर्षों ने एक से बढ़कर एक शानदार उपलब्धियाँ हासिल की हैं । इनसे सबक लेकर मजदूर अपने आन्दोलन को नयी ऊँचाई पर पहुँचा सकते हैं ।