7 अगस्त, 2026 (ब्लॉग पोस्ट)

असली परजीवी कौन हैं?

एक ऐसे पेशे के शीर्ष पर विराजमान होकर— जिसने कभी चावल का एक दाना, एक मीटर कपड़ा या रहने के लिए एक ईंट भी नहीं बनायी— भारत के बेरोजगार युवाओं को परजीवी और कॉकरोच कहना, एक खास तरह की ढिठाई— या शायद हकीकत से पूरी तरह कटे होने की निशानी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ठीक यही कारनामा किया है।

दूसरों की मेहनत से बनी, रखरखाव की गयी और तमाम कर्मचारियों के बल पर चलने वाली अदालत के आरामदेह ऊँचे आसन से बोलते हुए, उन्होंने रोजगार न मिल पाने वाले भारतीय नौजवानों को "परजीवी" और "कॉकरोच" कहा। भारत के युवाओं ने जिनको ताकतवर लोग अक्सर कम आंकते हैं: उन्हें उसी लहजे में जवाब दिया-- बेपरवाही या बेकद्री के लहजे में। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का जन्म हुआ। तीन हफ़्ते बाद, इसके सैकड़ों समर्थकों ने— कॉकरोच के मास्क पहने, हाथ में किताबें और राष्ट्रीय झंडा लिए— नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर मार्च किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े की माँग की।

समाज में विभाजन की गहरी खाई को देखते हुए, शायद सीजेपी ज़्यादा समय तक न टिक पाये। लेकिन सीजेआई की टिप्पणी ने अनजाने में ही जो सवाल खड़ा किया— और जिसे गुस्से और जवाबी गुस्से के शोर ने दबा दिया है— उसका एक गंभीर जवाब मिलना चाहिए। सवाल यह नहीं है कि क्या उनकी भाषा आपत्तिजनक थी? ज़ाहिर है, वह थी। बल्कि असली सवाल यह है कि इस देश की अर्थव्यवस्था में वह सम्पदा कौन पैदा करता है जिस पर बाकी सब लोग जीवन निर्वाह करते हैं? अगर उस शब्द को इस्तेमाल करना ही हो, तो असल में परजीवी कौन हैं?

शुरुआत उन बुनियादी बातों से करते हैं जिन्हें हर स्कूली बच्चे ने कभी न कभी सीखा होगा, लेकिन हर राजनीतिक व्यवस्था ने उन्हें भुलाने की साज़िश रची है। कोई भी सम्पदा, प्रकृति के संसाधनों पर इनसान द्वारा मेहनत करने से पैदा होती है। जो किसान ज़मीन तैयार करता है, बीज बोता है और तैयार फ़सल को मंडी तक पहुँचाता है, वह असल चीज़ पैदा करता है-- भोजन। इसके बिना सीजेआई, कैबिनेट मंत्री और अख़बार के सम्पादक कुछ ही हफ़्तों में मर जाएँगे। ईंटें जोड़ने वाला निर्माण मजदूर वह आश्रय बनाता है जिसमें शासन और न्याय-व्यवस्था का पूरा तन्त्र अपना कामकाज चलाता है। बुनकर, मशीन चलाने वाला कारीगर, शहर को गन्दगी में डूबने से बचाने वाला सफ़ाई कर्मचारी, नर्स, टीचर, इंजीनियर और डॉक्टर— ये लोग उन वस्तुगत और सामाजिक परिस्थितियों का निर्माण करते हैं जिन पर बाकी सब कुछ टिका होता है।

एक जज किस चीज का उत्पादन करता है? यह कोई अनादरपूर्ण सवाल नहीं है; बल्कि यह अत्यन्त सम्मानजनक सवाल है, क्योंकि यह इस संस्था को इतनी गंभीरता से लेता है कि यह पड़ताल करना जरूरी समझता है कि वास्तव में इसका योगदान क्या है। एक जज एक सेवा देता है— विवादों का निपटारा करना, व्यवस्था बनाए रखना। लेकिन जज किसी भौतिक चीज़ का उत्पादन नहीं करता। जज पूरी तरह से उन लोगों से उगाही किये गए अतिरिक्त मूल्य पर अपना जीवन-यापन करता है जो वास्तव में उत्पादन करते हैं। यही बात हर राजनेता, हर नौकरशाह और प्रशासन, नियमन और न्याय प्रणाली के उस विशाल तन्त्र के हर सदस्य पर लागू होती है, जो आज़ाद भारत में इतना बड़ा हो गया है कि इसके औपनिवेशिक निर्माता भी इसे देखकर हैरान रह जाते।

राजनीतिक अर्थशास्त्र का सबसे पुराना सवाल

यह राजनीतिक अर्थशास्त्र के सबसे पुराने विचारों में से एक है। 18वीं सदी में फ्रांस के फिजियोक्रेट्स ने समाज को उत्पादक वर्ग और अनुत्पादक (यानी जो कुछ भी पैदा नहीं करते) वर्ग में बांटा था। एडम स्मिथ ने उत्पादक और अनुत्पादक श्रम के बीच अन्तर बताया था। मार्क्स ने इसी आधार पर अपना 'लेबर थ्योरी ऑफ़ वैल्यू', यानी श्रम-मूल्य का सिद्धांत प्रस्तुत किया: सभी मूल्य केवल श्रम से ही पैदा होते हैं; अतिरिक्त मूल्य— यानी मज़दूर की ज़रूरत से ज़्यादा पैदा किया गया मूल्य— उन लोगों द्वारा हड़प लिया जाता है जिनके पास उत्पादन के साधन होते हैं और उन लोगों के द्वारा जिनका काम दूसरों की मेहनत को हड़पने की व्यवस्था को बनाए रखना होता है: जैसे राज्य, धार्मिक संस्थाएं {चर्च} और कानूनी व्यवस्था। इस विश्लेषण के अनुसार, सीजेआई सामाजिक मूल्य पैदा करने वाले नहीं हैं। क्लासिकीय नज़रिए से देखें तो वे परजीवी वर्ग (दूसरों की कमाई पर पलने वाले वर्ग) के सदस्य हैं— और उन्हें इसके लिए बहुत अच्छी-खासी तनख्वाह भी मिलती है।

भारत के आर्थिक सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, देश को 2030 तक हर साल लगभग 78.5 लाख (7.85 मिलियन) गैर-कृषि नौकरियां पैदा करने की ज़रूरत है ताकि बढ़ती हुई श्रमशक्ति (कामकाजी आबादी) को काम मिल सके। जिन युवाओं को काम नहीं मिल पाता— जिन्हें सीजेआई ने अपनी शब्दावली में "परजीवी" (parasites) और "कॉकरोच" (cockroaches) कहा है— वे इसलिए बेरोजगार नहीं हैं कि उनमें महत्वाकांक्षा या काम करने की इच्छा की कमी है। वे इसलिए बेरोजगार हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था को जानबूझकर इस तरह से बनाया गया है कि यह लेबर-इंटेंसिव (ज़्यादा मज़दूरों की ज़रूरत वाले) प्रोडक्शन के बजाय कैपिटल-इंटेंसिव (ज़्यादा पूंजी की ज़रूरत वाले) व्यवसायों को बढ़ावा दे; छोटे पैमाने के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को खत्म कर दे जिसने कभी लाखों लोगों को रोज़गार दिया था; कृषि मज़दूरी को ऐसे स्तर पर ला दे जिससे ग्रामीण जीवन मुश्किल हो जाए, बिना इसके स्थान पर शहरी रोज़गार दिए; और विकास का फ़ायदा कुछ ही लोगों तक सीमित रहे, जबकि ज़्यादातर लोग कम होते हुए अवसरों के लिए संघर्ष करते रहें।

ये विकल्प किसने तैयार किये? राजनेता - जो कुछ भी उत्पादन नहीं करते हैं और जिनकी आजीविका पूरी तरह से उत्पादन करने वालों से वसूले गए करों से चलती है। उनका संचालन किसने किया? भारतीय प्रशासनिक सेवा - जिसे सरदार पटेल ने गणतन्त्र के "स्टील फ्रेम" के रूप में सराहा था, एक ऐसा ढांचा जो सैद्धांतिक रूप से मौजूद सेवाओं को प्रदान करने की तुलना में खुद अपने ही सदस्यों, राजनेताओं और संपत्तिवान वर्गों की रक्षा करने में अधिक प्रभावी साबित हुआ है। उन्हें किसने वैध बनाया? न्यायपालिका- जिसने श्रम अधिकारों, भूमि अधिकारों और गरीबों के अधिकारों पर अपने दशकों के फैसले में एक रिकॉर्ड संकलित किया है, जिसे सीजेआई को सख्त संवैधानिक छानबीन के तहत जाँच करने में असुविधा हो सकती है, जिसे वह बेरोजगारों पर इतनी आसानी से लागू करता है।

यह कोई चूक नहीं, बल्कि एक मनसूबा है

इस आखिरी बात पर, सच्चाई को साफ़-साफ़ बताना ज़रूरी है, क्योंकि यह मामले की जड़ से जुड़ी है। अगर आज देश की हालत इतनी दयनीय है— लोकतन्त्र को विकृत कर दिया गया है, नागरिक आज़ादी खतरे में है, संस्थाएँ खोखली हो गयी हैं और अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है— तो इसके लिए सबसे ज़्यादा ज़िम्मेदारी न्यायपालिका की है। आख़िरकार, वही तो संविधान के तहत देश की संरक्षक है। और उसकी नाकामियाँ मामूली नहीं रही हैं और न ही कभी-कभार होने वाली; वे तो एक व्यवस्थित ढाँचे का हिस्सा रही हैं।

अनुच्छेद 370 को हटाने और कश्मीर में पूरी आबादी को असंवैधानिक रूप से लॉकडाउन में रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की निष्क्रियता; इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम पर उसकी चुप्पी, जिसने राजनीतिक फंडिंग को संस्थागत रूप से अपारदर्शी बना दिया; पेगासस सर्विलांस और असहमति रखने वालों के खिलाफ यूएपीए का हथियार के तौर पर इस्तेमाल पर कोई कार्रवाई न करना; नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के भेदभावपूर्ण तर्क को खारिज करने में विफलता; बिना कानूनी प्रक्रिया के सजा की तरह इस्तेमाल की जाने वाली बुलडोजर यानी विध्वंस की राजनीति (demolition politics) के प्रति जानबूझकर बरती गयी उदासीनता; और ठीक उन मौकों पर जब संवैधानिक दखल की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब कार्यपालिका की बढ़ती ताकत के आगे झुक जाना—ये सब अलग-अलग गलतियों की सूची नहीं है। यह एक मंसूबे का हिस्सा है, एक ऐसी संस्था का मंसूबा जिसने आज़ादी के साथ अपने कर्तव्य को निभाने के बजाय सत्ता के प्रति झुकने और आरामदेह स्थिति में रहना पसन्द किया।

कानूनी पेशे की भी इसी तरह जाँच-पड़ताल होनी चाहिए। वकील कुछ भी पैदा नहीं करते। वकील की कमाई पूरी तरह से विवादों पर टिकी होती है— ऐसे विवाद जो तार्किक और विवेकशील समाज में या तो पैदा ही नहीं होते या फिर बिना किसी पेशेवर बिचौलिए के सुलझा लिए जाते। इस न्याय प्रणाली की हद से ज़्यादा जटिलता, इसकी बेहद कठिन प्रक्रिया, और सालों की खास ट्रेनिंग और काफ़ी पैसे खर्च किये बिना किसी के लिए भी इसका इस्तेमाल न कर पाना— ये सब कोई इत्तेफ़ाक नहीं है। एक नज़रिए से देखें तो यह एक बिज़नेस मॉडल है। आम लोगों के लिए न्याय जितना मुश्किल से मिलता है, उसे दिलाने वाले पेशेवर की ज़रूरत उतनी ही ज़्यादा हो जाती है। वकीलों के संगठन (बार) ने हर उस सुधार का विरोध किया है जिससे न्याय सस्ता, तेज़ और आसानी से मिल सकता था— क्योंकि जिस गड़बड़ी की वे सार्वजनिक रूप से बुराई करते हैं, उसी में उनका सीधा आर्थिक स्वार्थ छिपा होता है।

यह कानून के शासन के खिलाफ तर्क-वितर्क नहीं है। यह उन लोगों के पाखण्ड के खिलाफ तर्क है जो अपने फायदे के लिए बनाए गए सिस्टम से लाभ उठाते हैं, और जो लोग इस सिस्टम से बाहर हैं, उन्हें ऐसे नामों से बुलाते हैं जो असल में उन पर ही सटीक बैठते हैं। अगर 'परजीवी' (पैरासाइट) वह है जो सामाज में बिना कोई मूल्य योगदान किए दूसरों के खर्च पर जीता है, तो कानूनी पेशा में लगे लोग— जिसमें किसी केस की सुनवाई के दौरान एक तारीख पर इतनी फीस ली जाती है जिसे जुटाने के लिए एक किसान को महीनों काम करना पड़ता है, जबकि केस सुलझने में दशकों लग सकते हैं— वे ही उस उपाधि के सबसे पहले हकदार हैं जिसे सीजेआई ने इतनी आसानी से दूसरों को दे दिया।

वंशानुगत गणतन्त्र, यानी उलटा-पलटा गणतन्त्र

और फिर आता है राजनीतिक वर्ग, जहाँ अब आक्रोश या नाराज़गी का कोई खास मतलब नहीं रह गया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय राजनीति एक वंशानुगत पेशा बन गयी है, जिसमें सत्ता का हस्तांतरण पारिवारिक गिरोहबन्दी के ज़रिए होता है— ठीक उसी सामन्ती व्यवस्था की तरह जिसे कभी खत्म करने का दावा किया गया था। यह बेईमान और आपराधिक प्रवृत्ति वाले लोगों के लिए सबसे ज़्यादा मुनाफ़े वाला पेशा भी बन गया है।

किसी भी दूसरे समूह के मुकाबले, यह एक ऐसे परजीवी (parasitic) वर्ग को दिखाता है जो सरकारी खजाने और आखिरकार उन लोगों की मेहनत पर पलता-बढ़ता है जो वे सभी सामान उगाते, बनाते, खड़ा करते और एक जगह से दूसरी जगह पहुँचाते हैं— जिन पर समाज टिका होता है। बदले में, ये लोग जनता का काम करने और ढंग से शासन चलाने के बजाय पहचान-आधारित आक्रोश, साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण, धार्मिक उन्माद और प्रोपेगैण्डा फैलाते हैं।

भारतीय दर्शन की पुरानी परम्परा में इस तरह के व्यवस्थित उलट-फेर के लिए एक शब्द है: 'विपरीत'—यानी उल्टा, सिर के बल खड़ा, वह स्थिति जिसमें असलियत और उसकी तस्वीर के बीच के रिश्ते को जान-बूझकर गड़बड़ा दिया गया हो। आज के भारत की इस 'विपरीत' अर्थव्यवस्था में, जो लोग काम करना चाहते हैं पर उन्हें नौकरी नहीं मिलती, उन्हें वे लोग परजीवी कहते हैं जो खुद कुछ पैदा नहीं करते और उनकी बेरोजगारी के लिए काफी हद तक जिम्मेदार भी होते हैं। जो लोग अनाज उगाते हैं, उनकी अहमियत अनाज का व्यापार करने वालों से कम होती है। जो लोग घर बनाते हैं, वे खुद उनमें रहने का खर्च नहीं उठा सकते। जो लोग कपड़े बनाते हैं, वे फटे-पुराने कपड़े पहनते हैं। और असली परजीवी ही वीआईपी बन जाते हैं।

सीजेआई ने अनजाने में ही एक सार्वजनिक सेवा की है। उन्होंने एक प्रश्न सामने रखा है कि इस गणतन्त्र की राजनीतिक अर्थव्यवस्था को हमें बहुत ज़ोर से सवाल पूछने से रोकने के लिए सावधानीपूर्वक संगठित किया गया है। यह नहीं कि बेरोज़गार परजीवी हैं या नहीं-- बल्कि: एक ऐसी अर्थव्यवस्था में जो अपने लोगों को रोजगार नहीं दे सकती है, एक ऐसे गणतन्त्र में जो सात दशकों से सम्मानजनक आजीविका के अपने संवैधानिक वादे को पूरा नहीं कर रहा है, एक ऐसे समाज में जहाँ शक्तिशाली लोगों के बच्चों को उतने ही भरोसे से अवसर मिलते हैं जितने कि कमजोर वर्ग के बच्चों को विरासत में वंचना मिलती है—दरअसल, कौन, किसके सहारे जी रहा है?

यह ध्यान देने वाली बात है कि कॉकरोच धरती के सबसे हठी और मज़बूत जीवों में से एक है। यह उन बुरे से बुरे हालात में भी जिन्दा रहा है जिनमें कई ज़्यादा मशहूर प्रजातियाँ खत्म हो गयी। अगर गहराई से सोचें, तो जो लोग उन खूबियों से डरते हैं जिनके लिए कॉकरोच को जाना जाता है, तो उनके द्वारा ऐसा कहा जाना कोई बुरी बात नहीं है।

(आनंद तेलतुंबडे पेट्रोनेट इंडिया लिमिटेड (PIL) के पूर्व CEO, आईआईटी खड़गपुर और गोवा इंस्टीट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट में प्रोफ़ेसर, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और 30 से ज़्यादा किताबों के लेखक हैं।)

अनुवाद – दिगम्बर

(साभार: फ्रंटलाइन, 9 जून, 2026)

 

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