एआई तकनीकी का गाजा नरसंहार में खतरनाक इस्तेमाल
दुनिया भर में बुद्धिजीवियों के बीच की खूबियाँ बताने की होड़ सी चल रही है, लेकिन उसके इस्तेमाल के विनाशकारी परिणाम भी सामने आ रहे हैं। इजराइली सेना द्वारा एआई का इस्तेमाल इस बात का पक्का सबूत है।
2024 में माइक्रोसॉफ्ट ने होस्सम नज्र और अब्दो मोहम्मद को ‘नो अज्युर फॉर अपर्थेड’ की मुहीम चलाने के चलते कम्पनी से निकाल दिया था। इस मुहिम का उद्देश्य एआई से संचालित ‘अज्युर तकनीकी’ का युद्ध में इस्तेमाल को रोकना था। इस तकनीकी की भयावहता का अन्दाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ एक महीने (अक्टूबर 2023) में 1340 परिवारों के 6120 लोग इस तकनीक का इस्तेमाल करके मारे गये थे। इसमें करीब पाँच हजार महिलायें और बच्चे शामिल हैं, 40 फीसदी बच्चों की उम्र अट्ठारह साल से कम है। यह घटना हमें द्वितीय विश्वयुद्ध में आईबीएम कम्पनी की मदद से हिटलर की सेना द्वारा लाखों यहूदियों के मौत की दर्दनाक और खौफनाक याद दिलाती है।
शुरू में माइक्रोसॉफ्ट ने इजरायली सेना के साथ अपने सम्बन्ध होने की बात स्वीकार नहीं की थी लेकिन बाद में स्वतन्त्र खोजी संस्थाओं, कर्मचारियों के दबाव और नौकरी छोड़ने की खबर बाहर आने के बाद इजरायली सेना की कुछ सेवाओं को बन्द करने के सम्बन्ध में एक सूचना जारी की थी। यह उन संस्थाओं, माइक्रोसॉफ्ट कर्मचारियों, की आंशिक सफलता थी जिन्होंने जोखिम उठाकर सच्चाई को उजागर किया था।
माइक्रोसॉफ्ट ने इजरायली सेना के हित में अज्युर तकनीकी में चुनिन्दा बदलाव किये थे। इस तकनीकी का इस्तेमाल सभी फिलिस्तीनी जनता की ऑनलाइन बातचीत को सुनने, उसे लिखित शब्दों में बदलने और उसके आधार पर उनकी जासूसी के लिए किया गया। फोन पर हो रही बातचीत को और उनके फोन के नेटवर्क को जोड़कर उनकी भौगोलिक स्थिति (लोकेशन) का पता लगाया। सेना ने लोकेशन की पुष्टि करके हमला किया और लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, मेटा, अमेजन, आदि कम्पनियाँ युवाओं की ‘ड्रीम कम्पनी’ कही जाती हैं। इन्हें ‘बिग टेक’ कम्पनियाँ भी कहा जाता है। नौजवान रोजगार के लिए ‘बिग टेक’ कम्पनियों की शरण में आता है। मुनाफे उनकी प्रतिभा का इस्तेमाल करके ये कम्पनियाँ युद्ध के लिए सॉफ्टवेयर बनाती हैं। दूसरी ओर यही ‘बिग टेक’ कम्पनियाँ, मीडिया की मदद से अपने ‘कॉर्पाेरेट कल्चर’ को प्रचारित–प्रसारित करती हैं। यह झूठ फैलाया जाता है कि यहाँ रचनाशीलता का बहुत सम्मान है, लेकिन जैसे ही कोई कर्मचारी कम्पनी की गलत नीतियों का विरोध करती है, उसे निकाल दिया जाता है। आगे कोई कर्मचारी ऐसा न कर सके इसके लिए कानून बनाकर रोक लगायी जाती है। जैसा कि गूगल की एक महिला कर्मचारी एमा हसीम के साथ किया गया। एमा ने ‘सोवेरियन क्लाउड’ के युद्ध में हो रहे दुरुपयोग के बारे में कम्पनी से सवाल–जवाब किया था। कम्पनी ने एमा को जवाब देने से इनकार कर दिया। यहाँ तक कि गूगल की मालिक कम्पनी अल्फाबेट ने इस मामले में मीडिया के किसी भी सवाल का अब तक कोई जवाब नहीं दिया। माइक्रोसॉफ्ट और गूगल से एक कदम आगे बढ़ते हुए अमेजन ने अपने कर्मचारियों के ई–मेल, फोन की बातचीत, उनके सामूहिक घूमने जाने, साथ में बैठ कर खाने, सामूहिक रूप से मिलने जैसे व्यवहार की निगरानी के लिए एक सॉफ्टवेयर बनाया। इस सॉफ्टवेयर से मिली जानकारी के आधार पर उन्हें बार–बार चेतावनी देने, नौकरी से निकालने और पुलिसिया कार्रवाई की धमकी देने जैसे काम किये गये। उन्हें संगठित होने के मूलभूत अधिकार से दूर किया गया। उनकी निजता का हनन किया गया। तथाकथित टेक्नोक्रैट्स को साइबर गुलाम बनाया गया। ये है दुनिया की जन्नत कही जाने वाली कम्पनियों के ‘कॉर्पाेरेट कल्चर’ का एक बेहद घिनौना रूप।
पहले एआई तकनीकी का युद्ध में इस्तेमाल पर रोक थी। साल 2000 में इराक, यमन और सीरिया में युद्ध के लिए मानवविहीन हथियारों का इस्तेमाल किया गया था। इसके खिलाफ विरोध–प्रदर्शन और सेमिनार–गोष्ठियाँ आयोजित की गयी थीं। एआई तकनीकी का इस्तेमाल युद्ध में न करने को लेकर विवाद और बहस जारी है। इसी बीच जनवरी 2024 में गूगल सहित अन्य टेक कम्पनियों ने एआई तकनीकी को युद्ध में इस्तेमाल करने की छूट दे दी।
इजरायली सेना, अमरीकी सरकार और बिग टेक कम्पनियाँ
साल 2021 में अमरीकी सुरक्षा एजेंसियों, टेक कम्पनियों और इसरायल सरकार की ‘यूनिट 8200’ के बीच प्रोजेक्ट निम्बस’ के रूप में एक सैन्य–तकनीकी करार हुआ। इसका मुख्य उद्देश्य ‘इन–हाउस–बोम्बिंग’ है जिसका मतलब है किसी व्यक्ति या संस्था के बारे में जानकारी इकट्ठा करना, जानकारी के आधार पर उसके घर पर हमला करके मार डालना। हमलों को स्वचलित और मानवरहित करने के लिए यह करार किया गया है। इसके लिए गूगल और अमेजन ने अपना क्लाउड स्टोरेज उपलब्ध कराया। माइक्रोसॉफ्ट, डेल, आईबीएम और ओरेकल ने डेटा सेन्टर उपलब्ध कराया। सिस्को कम्पनी ने नेटवर्क सम्बन्धी उपकरण और संरचनाएँ उपलब्ध कराये। सूचनाओं के इस अम्बार से मनचाही जानकारी खोजने और निष्कर्ष निकालने के लिए ओपन एआई कम्पनी चैट जीपीटी सुविधा उपलब्ध करायी। इस करार की कीमत 106 अरब रुपये बतायी गयी है। ‘कॉस्ट ऑफ वॉर’ नामक संस्था ने बताया कि यह तो समुद्र की सतह पर तैरते हिमखण्ड की चोटी जैसा है।
अमरीकी सरकार ने इजरायल को अक्टूबर 2023 से अक्टूबर 2025 तक युद्ध मदद के लिए लगभग 1918 अरब रुपये दिये हैं। वहीं दूसरी तरफ अमरीकी सरकार ने टेक कम्पनियों को रक्षा से सम्बन्धित तकनीकी और उपकरण बनाने के लिए लगभग 8833 अरब रुपये दिये। यह राशि पिछले सात साल (2023 से पहले) के कुल अनुदान का चालीस प्रतिशत है। यह अनुदान उन्हें अलग–अलग प्रोजेक्ट के नाम पर दिया गया। कई सरकारी प्रोजेक्ट भी इन कम्पनियों को दिये जिनकी अवधि दो साल से लेकर पन्द्रह साल तक है।
माइक्रोसॉफ्ट ने अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के समारोह में लगभग 89 करोड़ रुपये दिये। गूगल के मुख्य अधिकारी को राष्ट्रपति की बगल में बैठ कर नीति बनाने में शामिल किया गया। ओपन एआई के सैम आल्टमैन ने एआई की युद्ध तकनीकी को विकसित करने के लिए 45,000 अरब रुपये के निवेश की बात की। अमरीकी सेना की खास सलाहकार संस्था पलान्तिर कम्पनी के अधिकारी ने कहा कि अब तकनीकी को युद्ध क्षेत्र में उतरना ही नहीं उसे अपने कब्जे में लेना होगा। साफ है कि ये मुनाफे का संकट अब युद्ध से ही टालने की फिराक में हैं। ये सेमिनार, लॉब्बिंग, राजनेताओं की खरीद–फरोख्त, आदि के जरिये युद्ध को स्थापित कर रही हैं। अब युद्ध ही सभी संकट का हल है। इस मानसिकता को बनाने के लिए तरह–तरह के शोध संस्थाएँ खोलती हैं। विश्वविद्यालयों में युद्ध को स्वाभाविक बताकर स्थापित किया जा रहा है। अमरीकी सरकार ने भी बीते 30 अक्टूबर को अपने ‘रक्षा विभाग’ को ‘युद्ध विभाग’ नाम दे दिया। यह सिर्फ नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि दुनिया में बढ़ते सैन्यवाद को दिखाता है। एक तरफ तकनीकी कम्पनियाँ युद्ध के औजार बनाने में रही–सही रुकावटों को भी खत्म कर रही हैं। दूसरी तरफ सरकारें युद्ध का ऐलान कर रही हैं।
तकनीकी क्षेत्र की लगभग सभी कम्पनियाँ निजी मालिकाने की हैं। इनका मुख्य काम मुनाफा कमाना है। ये इसे जनता की निगरानी करके, इन्टरनेट पर जानकारी को छुपा करके, उनकी जासूसी करके, उनके मनोविज्ञान को समझकर उसे बदलकर और प्रभावित करके, उनकी सच्ची आवाज को दबाकर, हत्या करने वाले कंप्यूटर गेम बनाकर, मनोरंजन के नाम पर बेहद अश्लील और फूहड़ विडियो–ऑडियो बनाकर, साम्प्रदायिकता फैलाकर, अन्धविश्वासी और अवैज्ञानिक बनाये रखकर, एक देश को दूसरे से बेहतर और दुश्मन बताकर उन्हें आपस में बाँटकर और लड़ाकर, आदि हथकण्डे अपनाकर करती हैं। उदहारण के लिए कैंब्रिज एनालिटिका कम्पनी अमरीकी चुनाव में लोगों को भ्रमित करके चुनाव को प्रभावित करती है। पेगासस से पूरे दुनिया के राजनेता, जनता के कलाकार, जनपक्षधर पत्रकारों, वैज्ञानिक चेतना से लैश बुद्धिजीविओं समेत सामाजिक–सांस्कृतिक–राजनीतिक कार्यकर्ताओं की जासूसी करता है। उसी आधार पर उनके मोबाइल, लैपटॉप में संदिग्ध जानकारी छुपाता है और उन्हें गिरफ्तार करवा कर जेल में डलवा देता है।
यहाँ यह बात गौरतलब है कि ये वही कम्पनियाँ हैं जिसको अपने–अपने देश में बुलाने के लिए दुनियाभर की सरकारें अपनी एड़ी–चोटी का जोर लगा देती हैं। बेहद अमानवीय शर्तों पर जब ‘बिग टेक’ कम्पनियाँ देश में आती हैं तो इसे ऐसे प्रचारित–प्रसारित किया जाता है जैसे शबरी को प्रभु श्रीराम मिल गये। ‘बिग टेक’ कम्पनियों के अपने यहाँ आने को विकास का पैमाना बताकर पेश करते हैं। मानो सबको नौकरी मिल जायेगी, जीडीपी आसमान को छू लेगी और पूरी दुनिया में देश का डंका बज जायेगा।
बीते सालों में एडगर स्नोडेन ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एन एस ऐ) द्वारा अमरीकी जनता और दुनिया भर के लोगों की जासूसी और निगरानी करने के बारे में बताया था। इसी सिलसिले में जूलियन असान्ज ने एक अमरीकी सैनिक के साथ मिलकर विकिलीक्स का खुलासा किया। इसमें कम्पनियों और सरकार के गठजोड़ के बारे में बताया था।
तकनीकी किसकी सेवा के लिए हो? यह सवाल हमेशा से मानवता को आशंकित और चकित करते रहा है। द्वितीय विश्वयुद्ध में एक तरफ हिटलर की सेना ने आईबीएम कम्पनी की मदद से यहूदी लोगों को नाम, उम्र, लिंग, पेशा, जगह, आदि के हिसाब से जानकारी इकट्ठी की और नरसंहार को अंजाम दिया जिसमें करीब साठ लाख यहूदी मारे गये। आज अमरीका और इजराइल उसके नक्शे कदम पर चलते हुए गाजा में फिलीस्तीनी जनता का नरसंहार कर रहे हैं और इसके लिए वे एआई जैसी बेहद उन्नत तकनीक के इस्तेमाल से भी बाज नहीं आ रहे हैं। दुनिया भर की इन्साफ पसन्द आवाम उनके खिलाफ संघर्ष की आवाज बुलन्द कर रही है।
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