ब्रिक्स सम्मेलन : हाथी आइल, हाथी आइल, हाथी पदलस भों
13 सितम्बर की शाम को दिल्ली में आयोजित ब्रिक्स देशों का अट्ठारवाँ सम्मेलन समाप्त हो गया। भारत सरकार ने जबरदस्त ग्रांड–गाला इंतजाम किया था। मेहमानों की शानदार खातिरदारी की गयी। अरबों रुपए पानी की तरह बहा दिये गये। नेताओं ने एक से एक शानदार पॉज में फ़ोटो खिंचवाये। और सब खुशी–खुशी अपने देश लौट गये। अगले कई दिनों तक अखबार, टीवी चैनल सम्मेलन की सफलता पर भाँड़ विशेषज्ञों की टिप्पणीयों से लबरेज रहे। मोदी जी का डंका बज गया। आदि आदि–––
दोस्तों ने सम्मेलन के बारे में मेरी राय पूछी तो मुझे विख्यात इतिहासकार स्वर्गीय लाल बहादुर वर्मा की एक मजेदार और गम्भीर टिप्पणी याद आ गयी–– “हाथी आइल, हाथी आइल, हाथी पादिल भों।” ब्रिक्स सम्मेलन के लिए यह टिप्पणी बिल्कुल सटीक है। दुनिया के बड़े–बड़े राष्ट्राध्यक्ष आये, खूब खाया, तफरीह की और जबानी जमाखर्च करके चले गये।
सम्मेलन का विषय था “लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण।” इस विषय पर 140 बिंदुओं का विराट साझा–घोषणापत्र जारी किया गया। जितना खोखला विषय था उससे कहीं ज्यादा खोखले साझा–घोषणापत्र के बिन्दु थे। यहाँ तक की सम्मेलन फिलिस्तीन में इसराइल द्वारा किये गये नरसंहार, ईरान पर अमरीका और इसराइल के एकतरफा हमले, उसके राजनीतिक नेतृत्व की हत्या और दुनिया को तेल के गम्भीर संकट में फंसा देने के लिए अमरीका और इसराइल की भर्त्सना भी नहीं कर पाया। यह समझ से परे है कि इस सम्मेलन के लिए इतना बड़ा तामझाम क्यों किया गया। वह भी उस देश द्वारा जिसकी सरकार पैसा न होने का बहाना बनाकर बच्चों के स्कूलों पर ताला लगा देती है, औरतों और बच्चों को दस पैसे की आयरन की गोली भी मुहैया नहीं करवाती जिससे वे ताउम्र के लिए गम्भीर रोगों का शिकार हो जाते हैं, जहाँ 80 करोड़ लोग सरकारी राशन के सहारे किसी तरह जिंदा हैं, ऐसे देश की सरकारों को इस तरह के तमाशों पर अरबों रूपये खर्च करना वास्तव में देशद्रोह है।
इसराइल द्वारा फिलिस्टीन में नरसंहार : ब्रिक्स किसके साथ खड़ा है?
साल 2023 के अन्त से अमरीकी साम्राज्यवाद का लठैत, इसराइल फिलिस्तीन में इस सदी के सबसे जघन्य नरसंहार को अंजाम दे रहा है। हजारों बच्चों, औरतों समेत वह लगभग एक लाख फिलिस्तीनियों का कत्ल कर चुका है। कई लोगों और संस्थाओं ने जान पर खेलकर फिलिस्तीनियों की मदद करने की कोशिश भी की है। साम्राज्यवादियों की जेबी संस्था संयुक्तराष्ट्र और उसका अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय भी नेतेन्याहू के खिलाफ युद्ध–अपराध और नरसंहार का मुकदमा चला रहा है। ब्रिटेन की अगुआई में यूरोप के साम्राज्यवादी देश नाममात्र के ही सही, इसराइल पर प्रतिबंध लगाने की बात कर रहे हैं, लेकिन अफसोस! ब्रिक्स इसराइल की कड़ी भर्त्सना भी नहीं कर पाया।
कोई संगठन अपने सदस्यों में जिंदा होता है। ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स के 6 संस्थापक सदस्य देश हैं, इनके साथ ही मिस्र, ईरान, इथोपिया, इंडोनेशिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात भी पूर्ण सदस्य देश हैं। इसके अलावा 10 सहयोगी देश भी ब्रिक्स में शामिल हैं।
भारत ब्रिक्स का इस साल का अध्यक्ष है। इसके मौजूदा शासक खुलेआम और गर्व से ‘इसराइल’ को अपनी पितृभूमि कहते हैं तथा उसे अपना आदर्श मानते हैं। भारत और इसराइल के बीच मजबूत सैन्य, रणनीतिक और व्यापारिक गठबन्धन है और आपसी निवेश की संधि भी हो चुकी है। 2023 से ही भारत इसराइल को हथियार, उनके पुर्जे, गोला–बारूद के साथ ही मारकाट के लिए भारतीय नौजवानों की भी आपूर्ति कर रहा है। इनके बारे में तभी पता चलता है जब इनकी लाश भारत आती है।
दक्षिण अफ्रीका भी ब्रिक्स का संस्थापक सदस्य है। इसके राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा का बहनोई पैट्रिस मोत्सेपे है। यह देश का सबसे अमीर अश्वेत है और अगला सम्भावित राष्ट्रपति है। दक्षिण अफ्रीका की कई प्रमुख कोयला खदानों पर इसका मालिकाना है। 2023 में फिलिस्तीनियों का नरसंहार शुरू होने के बाद से यह इसराइल को भारी मात्रा में कोयले की आपूर्ति करके भरपूर मुनाफा कमा रहा है। इसराइल अपनी 15 फीसदी बिजली इसी कोयले से बनाता है। दक्षिण अफ्रीका की मजदूर यूनियनों ने कोयले की आपूर्ति का जबरदस्त विरोध किया था लेकिन सरकार इसराइल को कोयले की आपूर्ति के अपने फैसले पर अडिग रही।
ब्राजील का राष्ट्रपति लूला अपनी प्रगतिशीलता का पखण्ड दिखाने का कोई मौका नहीं चूकता। यहाँ की अर्ध–सरकारी तेल कम्पनी पेटरोब्रास साल 2024 से इतालवी दलालों के जरिये इसराइल की तेल जरूरतों के 9 फीसदी की आपूर्ति कर रही है।
रूस जिसे ब्रिक्स का जन्मदाता माना जाता है, इसराइल के सबसे बड़े सहयोगियों में से एक है। खुद पुतिन के मुताबिक इसराइल में लगभग 15 लाख रूसी भाषी लोग मौजूद हैं, जिनको दोहरी नागरिकता मिली है। फिलिस्तीनियों के नरसंहार के चरम दौर में इनमें से 30 हजार इसराइल की सेना में शामिल थे। रूस इनसे नरसंहार में शामिल न होने की अपील कर सकता था, नागरिकता रद्द करने की धमकी दे सकता था, वापस रूस बुला सकता था लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। इसके बजाय रूस ने अनाज, धातुओं, कोयला और सबसे बढ़कर तेल की आपूर्ति के जरिये इसराइल की मदद की। काला सागर में अपने नोवोरोसियस्क बंदरगाह के जरिये कजाकिस्तान (जो खुद ब्रिक्स का सहयोगी सदस्य है) से भारी मात्रा में तेल निकालकर इसराइल भेजा। इस रास्ते से नरसंहार के दो साल के दौर में रूस ने इसराइल के कच्चे तेल के कुल आयात के 30 फीसदी और साफ तेल के 45 फीसदी की आपूर्ति की।
चीन, जिसे ब्रिक्स की रीढ़ माना जाता है, इसकी ड्रोन बनाने वाली कम्पनी डीजेआई ने हजारों बेहद उन्नत किस्म के ड्रोन इसराइल को बेचे। इनका इस्तेमाल गाजा और वेस्टबैंक में फिलिस्तीनियों पर ग्रेनेड बम गिराने के लिए किया गया और किया जा रहा है। तमाम मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और गैर सरकारी संगठनों की अपील के बावजूद चीन ने इसराइल को ड्रोन की आपूर्ति बंद नहीं की। चीन ने इसराइल के नये हाइफा बेपोर्ट और अत्याधुनिक अशदोद पोर्ट का निर्माण भी किया। साल 2021, जब से नेतेन्याहू ने फिलिस्तीन के खिलाफ अपनी सबसे क्रूर नीतियों को लागू करना शुरू किया है तब से इसराइल के साथ चीन के व्यापार में 5 फीसदी सालाना की तेज वृद्धि हो रही है।
ब्रिक्स के संस्थापक सदस्यों का अमरीकी साम्राज्यवाद के लठैत के साथ गजब का दोस्ताना रिश्ता है। ईरान को छोड़कर ब्रिक्स के बाकी सभी पूर्ण सदस्य देशों मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, इथोपिया, इंडोनेशिया सभी ने फिलिस्तीनियों के नरसंहार में इसराइल की भरपूर मदद की है, इन सब के हाथ फिलिस्तीनियों के खून से रंगे हैं। अगर ब्रिक्स के देश, खासतौर पर रूस और चीन राजनीतिक लाभ को किनारे रखकर थोड़े से तात्कालिक लाभ के लिए तेल से समृद्ध अरब जगत के बीच बैठे इसराइल को मजबूत करते हैं तो ब्रिक्स कभी अमरीकी साम्राज्यवाद के लिए चुनौती नहीं बन सकता।
वेनेजुएला में सत्तापलट और ब्रिक्स
इस साल के शुरू में अमरीका ने एक गोपनीय सैन्य–हमले की साजिश रचकर वेनेजुएला के निर्वाचित राष्ट्रपति, मदुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर लिया। वह आज भी पत्नी के साथ अमरीका की जेल में हैं। पूरे लातीन अमरीका में मदुरो अमरीकी साम्राज्यवाद के सबसे जुझारू और मुखर विरोधी तथा रूस और चीन के सबसे मजबूत सहयोगी थे। ब्रिक्स का एक अगुआ, चीन वेनेजुएला का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार था और बहुत सस्ते दामों पर उसका 85 फीसदी तेल खरीदता था और वाहन तथा दूसरे विनिर्मात उत्पाद उसे बेचता था। और दूसरा आगुआ, रूस वेनेजुएला का सबसे बड़ा रणनीतिक और सैन्य साझेदार था। हयुगो शावेज के जमाने से ही पुतिन के साथ वेनेजुएला सम्बन्ध मजबूत होते जा रहे थे। वेनेजुएला रूस के सैन्य साजो–समान का बड़ा ग्राहक था। पिछले साल ही रूस ने वेनेजुएला के साथ रक्षा सहयोग की संधि पर हस्ताक्षर किये थे। रूस के आग्रह पर ही वेनेजुएला ब्रिक्स में भी शामिल हुआ था।
रूस–चीन और उनके ब्रिक्स के सबसे विश्वस्त सहयोगियों में से एक, एक संप्रभु राष्ट्र के राष्ट्रपति का अमरीका ने अपहरण कर लिया और उसके समर्थन में रूस–चीन खोखली बयानबाजी से आगे नहीं बढ़े। बल्कि पिछले दरवाजे से अमरीका के साथ बात करके वेनेजुएला में अपने निवेश की सुरक्षा की गारंटी कर ली। अपनी विदेश नीति के लिए पुतिन कहता है कि वह अपने सहयोगियों का साथ काभी नहीं छोड़ता लेकिन अमरीका ने पहले लीबिया के राष्ट्रपति गद्दाफी का कत्ल किया, फिर सीरिया में बशर अल असद को सत्ता तथा देश दोनों छोड़ने पर मजबूर किया और अब मदुरो का अपहरण करके उन पर अमरीका में मुकदमा चलाने की तैयारी कर रहा है। ये तीनों ही दुनिया में रूस के सबसे पक्के सहयोगी थे और तीनों ही मामलों में रूस और चीन दोनों हाथ बाँधे खड़े रहे।
क्या ब्रिक्स अपने सदस्य देश ईरान पर साम्राज्यवादी हमले के खिलाफ खड़ा हुआ?
इसका भी जवाब है ‘नहीं’। ब्रिक्स के एक संस्थापक सदस्य भारत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात ने तो अमरीकी साम्राज्यवाद के सामने सीना तानकर खड़े ईरान की पीठ में छुरा घोंपा ही है, बाकी सदस्य भी ईरान के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नहीं हुए हैं। चीन और रूस ईरान के भी सबसे बड़े व्यापारिक और रणनीतिक साझेदार हैं। चीन ने बेहद सस्ते दामों पर ईरान का तेल खरीदकर और तकनीक बेचकर भरपूर मुनाफा कमाया है और कमा रहा है। यही हाल रूस का है। दोनों किसी तरह पिछले दरवाजे से मदद कर रहे हैं जबकि वैश्विक परिस्थिति अनुकूल थी और दोनों ईरान के सक्रिय सहयोग के लिए खड़े हो सकते थे। अब, जब दिल्ली में ब्रिक्स का सम्मेलन हो रहा है, वैश्विक परिस्थिति ईरान के और ज्यादा पक्ष में है तब भी सम्मेलन में अमरीका के खिलाफ कोई ठोस कदम न उठाना ब्रिक्स की भयानक राजनीतिक कमजोरी को दिखाता है।
ब्रिक्स के बारे में माना जा रहा था कि यह आर्थिक नव उपनिवेशवाद के विरोध में अमरीकी साम्राज्यवाद और डॉलर के वर्चस्व के खिलाफ खड़ा होगा। इससे कहीं ज्यादा बेहतर हालत में तो गुट–निरपेक्ष आन्दोलन था जो कम से कम साम्राज्यवादियों की आँख में आँख डालकर बात करता था। चीन के आर्थिक विस्तार, वित्तीय क्षमता और समृद्धि के आधार पर कुछ लोग मानने लगे हैं कि चीन साम्राज्यवादी हो गया है और अमरीका के साम्राज्यवादी प्रभुत्व को चुनौती दे रहा है। मौजूद विश्व–व्यवस्था, जिसके शीर्ष पर अमरीका जी–7 के देशों के साथ विराजमान है, चीन इसे तोड़ देगा। लेकिन वे भूल जाते हैं कि अर्थशास्त्र अपने आप में जोड़–घटाव से ज्यादा कुछ नहीं है। मूल विषय राजनीतिक अर्थशास्त्र है जिसकी मूल संचालक शक्ति राजनीति है। साम्राज्यवाद भी एक राजनीतिक अर्थशास्त्रीय परिघटना है। आर्थिक ताकत भले ही बढ़ रही हो लेकिन वैश्विक राजनीतिक क्षेत्र में चीन, रूस या ब्रिक्स अमरीकी साम्राज्यवाद के सामने कहीं खड़े होते नजर नहीं आते। बल्कि ट्रम्प, जिसने कहा था कि वह ब्रिक्स को घुटनों पर ला देगा, ज्यादा सही साबित हो रहा है। ब्रिक्स की दावतों में अरबों रूपये फूँकने से बेहतर था कि वह रकम यमन के अंसारअल्ला या इराक के बागियों को दे दी जाती, जो वास्तव में अमरीकी साम्राज्यवाद से लड़ रहे हैं। दिल्ली के ब्रिक्स सम्मेलन जैसा साझा घोषणापत्र तो दो–चार कलर्क मिलकर आराम से लिख सकते थे।
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