ईरान–इजराइल टकराव तथा मध्य–पूर्व में अमरीकी विदेश नीति की दिशा
(ईरानी परमाणु स्थलों पर अमरीका के हालिया हमलों को लेकर अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के विद्वान स्टीफन जूनेस, मध्य पूर्व इतिहासकार लॉरेंस डेविडसन तथा विधि विशेषज्ञ और संयुक्त राष्ट्र के पूर्व विशेष रिपोर्टर रिचर्ड फॉक के बीच विस्तृत बातचीत हुई जो ‘काउंटरपंच’ में छपी थी। यह आलेख उसी पर आधारित है।)
ईरान और मध्य–पूर्व के लिए अमरीकी नीति
ट्रम्प और अमरीका मध्य–पूर्व तथा ईरान के लिए अपनी विदेश नीति में उपनिवेशवादी राह पर चल रहा है। ट्रम्प समर्थकों का मानना है कि अमरीका को दुनिया के बाज़ारों और संसाधनों पर नियंत्रण बनाये रखना चाहिए। इसलिए, उसके सत्ता में आने से विदेशी हस्तक्षेपों में कमी आने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। अमरीका में इन प्राथमिकताओं का निर्धारण ट्रम्प नहीं, शासक वर्ग के लॉबिंग समूह करते हैं।
वास्तव में, ट्रम्प का मुसोलिनी और हिटलर की नकल करते हुए पनामा नहर, ग्रीनलैंड और यहाँ तक कि कनाडा पर एकतरफा दावा करना, अमरीकी नव उपनिवेशवाद का एक आधुनिक रूप है–– यह बेशक शर्मनाक है। ट्रम्प की एक अनूठी हमलावर शैली है। वह नियंत्रण कायम करने के लिए शोर–शराबे का सहारा लेता है। हाल ही में ईरान और इजराइल को लेकर उसके भाषण इसका अच्छा नमूना हैं। ट्रम्प की समस्या यह है कि वह निरन्तरता कायम नहीं रख सकता। वह लगातार किसी न किसी लॉबी के दबाव में आ जाता है।
ईरान पर बमबारी 2002 की ‘अमरीकी राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति’ का तार्किक विस्तार है, जिसमें मूल विचार यह था कि अमरीका उन क्षेत्रीय ताकतों को बर्दाश्त नहीं करेगा जो उसकी वर्चस्ववादी स्थिति को चुनौती दें और तेल–समृद्ध मध्य–पूर्व जैसे क्षेत्रों में तो बिल्कुल भी नहीं। इराक और सीरिया के बाद, अब केवल ईरान ऐसा राष्ट्र बचा है जो पूरे क्षेत्र में अमरीका के खिलाफ खड़ा है। आश्चर्य की बात नहीं कि यह शक्तिशाली और संसाधनों से भरपूर देश अमरीका के लिए एक केन्द्रीय चिन्ता बन गया है।
ट्रम्प कभी युद्ध–विरोधी नहीं हो सकताय उसका युद्ध–विरोधी होने का दावा उतना ही खोखला है जितना कि वॉल स्ट्रीट के खिलाफ खड़े होने का–– असल में यह गोरे श्रमिक वर्ग का वोट हासिल करने की रणनीति थी, जिनके बच्चे हिलेरी क्लिंटन और जो बाइडेन जैसे डेमोक्रेटिक युद्ध–समर्थकों की नीतियों के कारण मध्य–पूर्व में मारे गये थे। इजराइल और दूसरे समर्थक इस नीति को लागू करने में उसके उपयोगी सहयोगी हैं। इराक युद्ध के अनुभव के बाद, अमरीका ने इजराइल को एक प्रतिनिधि के रूप में इस्तेमाल किया है–– अमरीकी हितों को बढ़ावा देने के लिए, अमरीकी सैनिकों की जान जोखिम में डाले बिना। अमरीका को केवल असाधारण परिस्थितियों में ही सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा–– जैसे अभी ईरान में।
जर्मन चांसलर फ्रीडरिख मर्ज ने कहा था, “इजराइल हम सब के लिए गन्दा काम कर रहा है”–– यह बयान यूरोपीय इतिहास के उस दौर की याद दिलाता है, जब शासक वर्ग कुछ यहूदियों को “गन्दा काम” (जैसे साहूकारी, कर संग्रह, लठैती) करने के लिए इस्तेमाल करते थे ताकि बाद में उन्हें बलि का बकरा बनाकर असली गुनहगार ताकतवर लोगों से जनता का ध्यान हटाया जा सके। मध्य पूर्व में पश्चिम के दुश्मनों पर हमला करने के लिए इजराइल का उपयोग इसी परिपाटी का हिस्सा है।
वॉशिंगटन लम्बे समय से इजराइल की इस भूमिका को आगे बढ़ा रहा है। राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था, “अगर इजराइल न होता, तो हमें उसे गढ़ना पड़ता।” पूर्व विदेश मंत्री अलेक्जेंडर हेग ने इजराइल को हमारा “अविनाशी विमानवाहक पोत” कहा था।
अगर लक्ष्य केवल ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना होता, जैसा कि ओबामा प्रशासन का था, तो ट्रम्प ‘ज्वाइण्ट कम्प्रीहेसिंव प्लान ऑफ एक्शन’ (ईरान परमाणु समझौता) को रद्द नहीं करता। इससे बाहर निकलकर और प्रतिबंधों को दोबारा थोपकर ट्रम्प ने ईरान को यूरेनियम संवर्धन के लिए उकसाया ताकि युद्ध के लिए एक बहाना मिल सके। इसलिए वास्तविक लक्ष्य ईरान को यथासम्भव कमजोर करना था, जिसके लिए पहले से इजराइल को लगाया गया है।
‘ईरान परमाणु समझौता’ तैयार करने में एक दशक की राजनीतिक रणनीति और दो वर्षों की गहन बातचीत लगी, जिस पर सात सरकारों ने हस्ताक्षर किये और संयुक्त राष्ट्र ने अनुमोदित किया। ईरानी प्रतिनिधियों ने पूर्व अमरीकी विदेश मंत्री जॉन केरी से इस समझौते के मसौदे की एक–एक पंक्ति तैयार करने के लिए कम से कम 50 बार मुलाकात की थी। वास्तव में, परमाणु वार्ता फिर से शुरू हो चुकी थी और तब तक जारी थी जब इजराइल ने ईरान पर हमला शुरू किया। वास्तव में, अब अमरीका और इजराइल दोनों ही इन वार्ताओं की सफलता नहीं चाहते थे।
इसलिए ईरान पर अमरीकी बमबारी का सम्बन्ध परमाणु नीति या इजराइल से नहीं था–– यह वर्चस्व के लिए था। राहत की बात यह है कि ईरान ने केवल सीमित प्रतिक्रिया दी। जबकि ईरान के पास अमरीकी सम्पत्तियों को नुकसान पहुँचाने के लिए पर्याप्त हथियार थे। ईरान से कुछ सौ मील की दूरी पर 40,000 अमरीकी सैनिक हैं, जो न केवल ईरानी मिसाइलों, बल्कि ड्रोन और अन्य हथियारों की जद में आते हैं। अमरीकी नौसेना ईरानी तट के पास है, जिसे निशाना बनाया जा सकता था और ईरानियों द्वारा होमरुज जलडमरू–मध्य को बन्द करने का प्रयास भी किया जा सकता था, जिससे विश्व तेल आपूर्ति को गहरा झटका लगता और वैश्विक अर्थव्यवस्था संकट में पड़ जाती। इस बीच, ट्रम्प ने स्पष्ट रूप से धमकी दी कि “अगर ईरान ने जवाबी हमला किया, तो वह त्रासदी झेलेगा–––।” अमरीका द्वारा दी गयी त्रासदी तो वह पिछले दो दशक से झेल रहा है, लेकिन हर किसी की सहने की एक सीमा होती है।
1956 में आइजनहावर प्रशासन के दौरान इजराइल, ब्रिटेन और फ्रांस द्वारा किया गया ‘स्वेज ऑपरेशन’ वह एकमात्र अवसर था जिसमें अमरीका ने संयुक्त राष्ट्र चार्टर के प्रति अपनी कानूनी प्रतिबद्धता को प्राथमिकता दी थी। अमरीका को संयुक्त राष्ट्र चार्टर केवल तब ही याद आता है जब उसके विरोधी इसका उल्लंघन करते हैं। पश्चिम के विरोधियों पर हमला जायज बन जाता है, लेकिन रूस का यूक्रेन पर हमला नाजायज। हालाँकि इन दोनों में ही बल प्रयोग की प्रेरणा पश्चिम, विशेषकर अमरीका ने दी–– जिसे प्रभावशाली अन्तरराष्ट्रीय मीडिया ने ढँकने का काम किया।
उपनिवेशवादी रणनीतियों की विरासत यह रही कि 1945 बाद के मध्य पूर्व को लगातार युद्ध, तनाव और अमरीका–आश्रित इजराइल के निरंकुश शासन का सामना करना पड़ा। यहूदीवादी (जियनवादी) वर्चस्व के चलते इजरायली राज्य प्रणाली में व्यवस्थित मानवाधिकार उल्लंघन, जातीय सफाया, रंगभेद और नरसंहार जैसी प्रवृत्तियाँ विकसित हुर्इं–– और फलस्तीनियों को उनके अपने ही देश में अजनबी बना दिया गया। पश्चिम के लिए इजराइल अब कोई “रणनीतिक बोझ” नहीं है, बल्कि एक बहुमूल्य साझेदार बन गया–– जो अरब दुनिया में पश्चिमी नियंत्रण को बनाये रखने में मदद करता था। तब से लेकर आज तक, अमरीका ने कभी क्षेत्र में इजराइल की सैन्य कार्रवाइयों को चुनौती नहीं दी–– चाहे वह पूर्वी येरुशलम, वेस्ट बैंक या गजा में जिनेवा संधियों का खुला उल्लंघन और नरसंहार ही क्यों न कर रहा हो।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 242 के जरिये इजराइल–फिलिस्तीन विवाद को सुलझाने की एक भोली कोशिश की गयी थी, जिसके मुताबिक इजराइल को इन क्षेत्रों से जल्दी ही हट जाना था–– लेकिन पिछले 50 वर्षों में जियनवादी नेतृत्व ने इस बारे में कभी सोचा भी नहीं। अमरीकी नीति का परिणाम यह हुआ कि उपरोक्त यथार्थ को धीरे–धीरे सामान्य मान लिया गया। ब्रिटेन और फ्रांस की जगह लेकर अमरीका मध्य पूर्व में पश्चिम के उपनिवेशवादी हितों का प्रबंधक बन गया–– यहाँ अन्तरराष्ट्रीय कानून, संयुक्त राष्ट्र की भावना और आत्मनिर्णय के वैश्विक मूल्य कोई मायने नहीं रखते।
नागरिक समाज तथा एक और युद्ध
आने वाले दिनों में ईरान के सन्दर्भ में नागरिक समाज और अन्तरसरकारी संगठनों की क्या भूमिका होगी? जाहिर है, कुछ विरोध प्रदर्शन होंगे और काफी विश्लेषण भी। लेकिन ऐसा लगता है कि अब नतीजा तय हो चुका है। जहाँ तक ईरान का सवाल है, इसका इजराइल के साथ ‘थकाने वाला युद्ध’ जारी रहेगा। अमरीकी मीडिया की तोड़–मरोड़ के बावजूद, असली संकट सबसे पहले इजराइल को झेलना पड़ेगा। इससे अमरीका को ईरानी हमले रोकने के लिए युद्ध में दोबारा घसीटा जा सकता है। अमरीका में जियनवादी लॉबी इसकी जोरदार माँग करेगी। लेकिन वे इससे कोई स्पष्ट सबक नहीं लेंगे कि इजराइल को भी वही सजा मिली जो वह गजा पर थोपता रहा है। शायद इजराइली नागरिकों ने सही निष्कर्ष निकाला भी होगा। लेकिन नेतन्याहू और उनका गुट इस सबसे बेखबर ही रहेगा।
बुश प्रशासन और उनके मीडिया सहयोगियों ने अमरीकी जनता को इराक युद्ध के समर्थन में राजी करने के लिए भारी प्रयास किया था, ट्रम्प ने अमरीका को इतना पुंसत्वहीन मान लिया है कि ईरान के खिलाफ युद्ध के समर्थन के लिए सहमति गढ़ने की भी जरूरत नहीं पड़ी। जबकि अमरीकी बमबारी से पहले किये गये जनमत सर्वेक्षणों में अधिकांश लोग अमरीका के युद्ध में प्रवेश का विरोध कर रहे थे। यहाँ तक कि कुछ इजराइल समर्थक समूह (जैसे जे स्ट्रीट, न्यू ज्यूइश नैरेटिव) भी ईरान के साथ युद्ध का विरोध कर चुके हैं।
दुर्भाग्यवश, अमरीकी नागरिक समाज खुद को एक लगातार निरंकुश होते राज्य से बचाने में ही उलझा है–– एक ऐसा राज्य जो अल्पसंख्यकों, प्रवासियों, शिक्षा, पर्यावरण और स्वयं सरकार पर कहर ढा रहा है। युद्ध का विरोध खड़ा करना खासकर तब जब अमरीकी सैनिक जमीनी तौर पर शामिल नहीं हैं–– राजनीतिक संकटों के इस माहौल में काफी चुनौतीपूर्ण होगा।
ट्रम्प की विदेश नीति की पहचान यह रही कि उसने “अनन्तकालीन युद्धों” के अमरीकी प्रयासों (जो इराक और अफगानिस्तान में बुरी तरह विफल रहे) का विरोध किया और एक नव–एकाकीवाद को बढ़ावा दिया, जिसे “अमरीका फर्स्ट” के रूप में प्रचारित किया गया। लेकिन वास्तव में यह सैन्यवाद और नव–फासीवादी विचारधारा से पोषित है, जिसमें इजराइल के हर कदम–– चाहे वह कितना भी अवैध, क्रूर या जोखिमभरा हो–– का बिना शर्त समर्थन शामिल है।
इजराइल की आक्रामकता के लिए जो सहानुभूति–जनित तर्क पश्चिमी मीडिया में दिया जा रहा है, वह ईरान द्वारा परमाणु हथियार प्राप्त करने के कथित खतरे पर आधारित है। लेकिन अगर राष्ट्रीय सुरक्षा के परमाणु पक्ष को ईमानदारी से देखा जाये, तो वास्तविक खतरा तो इजराइल की ओर से है, जिसके पास 300–400 परमाणु हथियारों का गुप्त जखीरा है जो उसे पश्चिम की गुप्त सहायता से मिला है। ईरान परमाणु अप्रसार संधि का पालन करता है। जबकि इजराइल मध्य–पूर्व को परमाणु मुक्त क्षेत्र बनाने के प्रयासों को सिरे से खारिज कर चुका है। उत्तर कोरिया और उसके परमाणु कार्यक्रम के प्रति घृणा के बावजूद, उस पर कभी हमला नहीं हुआ। इसके उलट, लीबिया, यूक्रेन और अब ईरान पर इसलिए हमला किया गया क्योंकि उनके पास जवाबी परमाणु क्षमता नहीं थी। इस स्थिति से जो सबक निकलते हैं, वे गम्भीर और खतरनाक हैं।
इस दृष्टिकोण से इजराइल पश्चिमी उपनिवेशवाद का अभिन्न अंग है–– इस्लामी प्रभाव के खिलाफ अग्रिम पंक्ति पर, पश्चिम का “गन्दा काम” करता हुआ और जब जरूरत पड़े तो अमरीका द्वारा समर्थित।
युद्ध मशीन और लॉबी
अमरीका के निर्वाचित नेता सचेत रूप से खुद से कहते हैं कि “हम उपनिवेशवादी हैं और यही हमारा मार्ग है।” यह सच है कि वे नस्लवादी हैं–– जिसे रीगन, बुश (पिता–पुत्र), बाइडन और अब ट्रम्प जैसे हाल के कई निर्वाचित नेताओं में देखा जा सकता है। आखिरकार, ये भयानक “नेता” अमरीका की एक उल्लेखनीय जनसंख्या के हिस्से द्वारा ही चुने गये थे। लेकिन एक बार चुने जाने के बाद वे सब एक ऐसी प्रणाली में समाहित हो जाते हैं जहाँ नीति का निर्माण प्रमुख ‘हित समूहों’ के दबाव में होता है। विदेश नीति के सन्दर्भ में सबसे प्रभावशाली समूह है, जियनवादी।
80 वर्षों से अमरीका की मध्य–पूर्व नीति का संचालन जियनवादी लॉबी के नियंत्रण में है। इसी तरह की विशेष हित समूहों की प्रधानता क्यूबा के लिए विदेश नीति में भी दिखती है–– और घरेलू नीति में बन्दूक नियंत्रण, गर्भपात आदि मुद्दों पर भी। हर एक का अपना प्रभावशाली लॉबी नेटवर्क है। क्या आप नीति बदलना चाहते हैं? सिर्फ नेता या पार्टी बदलने से कुछ नहीं होगा।
अमरीकी खुफिया रिपोर्टों ने बार–बार कहा कि ईरान वास्तव में परमाणु हथियारों पर काम नहीं कर रहा है, लेकिन ट्रम्प ने बस कह दिया कि रिपोर्टें गलत हैं। उसने तो यह भी कहा कि इराक में हजारों अमरीकी सैनिकों की मौत का जिम्मेदार ईरान है, झूठ की कोई सीमा नहीं है। दुर्भाग्य से, कांग्रेस में डेमोक्रेटिक नेताओं में से किसी ने भी ट्रम्प प्रशासन के भ्रामक बयानों को चुनौती नहीं दी।
पिछले सप्ताह कांग्रेस को गये फोन और ईमेल जबरदस्त रूप से युद्ध–विरोधी थे, जो सार्वजनिक भावना का संकेत देते हैं, लेकिन क्या ये एक जागरूक और सक्रिय विदेश नीति वाली कांग्रेस के लिए आधार बना सकते हैं–– खासकर जब कार्यपालिका शाखा में सत्ता का केन्द्रीकरण हो चुका है।
ट्रम्प युग की अमरीकी विदेश नीति के केन्द्र में कई घातक तत्व हैं। एक ओर, ट्रम्प की दमनकारी रणनीतियाँ लोकतंत्र के पतन और अमरीकी किस्म के फासीवाद के आगमन का रास्ता खोल रही हैं। दूसरी ओर, वह एक साफ तौर पर निरंकुश नेता होते हुए भी जियनवादी दबावों के अधीन है। तीसरी ओर, अमरीका के हथियार निर्माता निजी क्षेत्र को विदेशी युद्धों और शासन–परिवर्तन अभियानों से मुनाफा मिलता है, वे इन्हें महँगे दुस्साहस नहीं, बल्कि व्यावसायिक अवसर मानते हैं। चैथी ओर, विदेश नीति सलाहकार थिंक टैंक और नीति विशेषज्ञों के बीच एक “समूह मानसिकता” है जो एक राष्ट्रवाद–केन्द्रित विदेश नीति की सलाह देते हैं।
वैश्विक मानदंडों का पतन
अधिकांश लोग अपने भौगोलिक और समयबद्ध अनुभवों में ही दुनिया को समझते हैं। इस स्थिति में, अन्तरराष्ट्रीय कानून और मानवाधिकारों की स्मृति और सम्भावना को जीवित रखना भी महत्वपूर्ण है।
पिछले राष्ट्रपतियों ने कम से कम दिखावे के लिए यह जताने की कोशिश की थी कि वे मानवाधिकार और अन्तरराष्ट्रीय कानून को महत्व देते हैं–– भले ही इसके लिए उन्हें वाक–कौशल और दोहरे मानकों का सहारा लेना पड़ता। इसके विपरीत, ट्रम्प दिखावा करना तक जरूरी नहीं समझता।
गजा में इजराइल की जनसंहार की कार्रवाइयों को पश्चिम द्वारा समर्थन देना–– इस बेकाबू, विधि–विहीन राजनीति का चरम बिन्दु है। इसके साथ–साथ ईरान के खिलाफ एक आक्रामक युद्ध छेड़ा गया। संयुक्त राष्ट्र को किनारे रखा गया और पश्चिमी शासक वर्ग ने फिलिस्तीन में इजराइल के व्यवहार को ‘नरसंहार’ कहने से परहेज किया–– इसके विपरीत, उन लोगों को चुनकर दण्डित किया जिन्होंने सत्ता के सामने सच बोलने का जोखिम उठाया। ईरान पर हमले के बाद के परिप्रेक्ष्य में, निगमीकृत मीडिया इजराइली प्रवक्ताओं और सलाहकारों को भरपूर मंच प्रदान करता है, जबकि वैश्विक विवेक की उन आवाजों को मौन कर देता है जो कानून, न्याय और मानवाधिकारों के मुद्दों को सामने लाती हैं। पश्चिमी लोकतंत्र की यह क्षीणता उसे स्वेच्छाचारिता में तब्दील करती प्रतीत होती है।
वैश्विक चुनौतियों की गहराई को देखते हुए, ये अनसुनी आवाजें एक महत्वपूर्ण सन्देश देती हैं जो प्रजातियों के कल्याण और अस्तित्व से जुड़ा हुआ है। यह वैश्विक मानकों की पुनर्स्थापना की दिशा में एक अनिवार्य प्रयास की आवश्यकता को रेखांकित करता है।
बिना समाधान के संघर्ष
ईरान किसी को धमकी नहीं दे रहा था और वह एक अकारण हमले का शिकार था। ईरान अभी तक परमाणु हथियार बनाने की क्षमता से दूर था और कूटनीतिक वार्ताएँ जारी थीं। सैन्य बल के माध्यम से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नष्ट करना कभी सम्भव नहीं है। वैज्ञानिक ज्ञान और पुनर्निर्माण के संसाधन हमेशा मौजूद रहेंगे।
ट्रम्प और उसका प्रशासन लोगों को यह समझाने की कोशिश कर रहे हैं कि लगभग 1,000 ईरानियों की हत्या, ईरान के परमाणु लक्ष्यों को हुआ नुकसान, ईरानी मिसाइलों द्वारा इजराइल को हुआ नुकसान, वैज्ञानिकों और सैन्य नेताओं की अवैध हत्याएँ और अन्तरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को और कमजोर करने वाला यह अकारण युद्ध केवल इस उद्देश्य के लिए उचित था कि ईरान का यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम इस शरद ऋतु तक के लिए टाल दिया जाये।
यह युद्ध ईरान के परमाणु कार्यक्रम के बारे में नहीं बल्कि उसे कमजोर करने के लिए था। लेकिन इस्लामी गणराज्य सम्भवत: इससे और अधिक मजबूत हो गया है क्योंकि उसने अपने राष्ट्र की रक्षा की। लोग आमतौर पर अपने देश का साथ देते हैं, विशेष रूप से जब वह विदेशी हमले का शिकार होता है। अगर ईरान में शासन परिवर्तन भी एक उद्देश्य था, तो वह भी पीछे चला गया है।
अमरीका के हमले के बारे में कुछ बातें उल्लेखनीय हैं। यह इतना सीमित था कि लक्षित स्थलों को नष्ट नहीं कर सका। क्षति सतही थी। ईरानियों ने कोई जोखिम नहीं लिया और हमले से पहले ही अधिकांश सामग्री फोर्दाे से हटा दी थी। इसका अर्थ है कि परियोजना को वास्तविक रूप से कोई नुकसान नहीं हुआ है। गौरतलब है कि अमरीका के कतर स्थित सैन्य अड्डे पर अन्तिम मिसाइल ईरान ने दागी–– भले ही दोनों देशों को इसकी जानकारी पहले ही दे दी गयी थी। लेकिन अन्तिम कार्रवाई ईरान की तरफ से हुई है।
अब ट्रम्प सभी को बताता घूम रहा है कि “युद्ध अभी खत्म नहीं हुआ।” और हम भी जानते हैं कि इजराइल एक बार फिर मिसाइल रक्षा प्रणाली को पुन: भरने के बाद फिर हमला कर सकता है।
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