भँवर में भारत की विदेश नीति
जब घरेलू मोर्चे पर मोदी की नीतियाँ पिट गयीं और उसके समर्थकों के लिए लोगों का सामना करना मुश्किल हो गया तो विदेशों में भारत का डंका बजने का जुमला चलाया गया। आजकल भारत के शासक अति चतुराई के रोग से पीड़ित लोमड़ियों की तरह पूरी दुनिया में भागदौड़ कर रहे हैं। मीडिया में मोदी की बहुपक्षीय सम्बन्धों की महान रणनीति का शोर मचा हुआ है। लेकिन असल में वह बहुपक्षीय वैश्विक निर्भरताओं के जाल में फँसे हुए हैं। और एक ऐसी वैश्विक परिस्थिति में, जिसमें भारत की विदेश नीति बहार का मजा ले सकती थी, उसके पत्ते झड़ रहे हैं।
किसी देश की विदेश नीति उसकी घरेलू नीति का ही विस्तार होती है। दुनिया में कोई देश पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। अपनी जरूरतें या हित पूरा करने के लिए, कम या ज्यादा सभी को दूसरों की जरूरत पड़ती है। जिस दुनिया में पूँजी सर्वाेपरि है, विनिमय मूल्य हर मूल्य पर भारी है, वहाँ सभी दूसरे को कम देकर ज्यादा पाना चाहते हैं। इससे पैदा हुए टकरवों का सही लेखा–जोखा लेकर ही कोई देश अपनी आम विदेश नीति बनाता है।
किसी भी देश के लिए सबसे जरूरी है कि किसी भी देश के साथ रिश्ते में वह मजबूर न हो। रणनीतिक मामलों में उसकी आजादी बरकरार रहे।
आज दुनिया एक पिरामिड की शक्ल में है और प्रमुख रूप से तीन तरह के देशों के समूह में बँटी हुई हैं। शीर्ष पर अमरीका, पश्चिमी यूरोप के देश, जापान जैसे साम्राज्यवादी देश हैं। दुनिया के अलग–अलग देशों को गुलाम बनाकर उनकी सम्पदा लूटने का इन सबका इतिहास रहा है। आज ये अमरीका के नेतृत्व में एकताबद्ध हैं और इनके बीच लगभग बराबरी का रिश्ता है। दुनिया की ज्यादातर पूँजी, तकनीक और संसाधनों पर इन्हीं का कब्जा है। जिसके दम पर ये बाकी देशों को अपनी आर्थिक नीतियों के चंगुल में फँसाकर और वहाँ के शासक पूँजीपति वर्ग के साथ साँठगाँठ करके लूटते हैं।
इनके नीचे पूर्वी यूरोप, रूस, चीन, तुर्की जैसे देश हैं। इनके पास भी अच्छी खासी मात्रा में पूँजी, तकनीक और संसाधन हैं। इनका अपना प्रभावक्षेत्र भी है। रूस और चीन को छोड़कर इनके बीच कोई मजबूत गठजोड़ नहीं है। ये भी शीर्ष पर जाकर दुनिया के नियन्ता बनना चाहते हैं और लूट के माल में हैसियत मुताबिक हिस्सेदारी चाहते हैं। लेकिन वहाँ इनके लिए जगह नहीं है। आज ये शीर्ष देशों के वर्चस्व को चुनौती देकर दुनिया में दूसरे ध्रुव के निर्माण की कोशिश कर रहे हैं।
दुनिया के पिरामिड में सबसे नीचे एशिया, अफ्रीका, लातिन अमरीका के गरीब देश हैं। जिन्हे अक्सर तीसरी दुनिया के देश कहा जाता है। ये सभी किसी न किसी दौर में साम्राज्यवादी देशों के उपनिवेश या नवउपनिवेश रहे हैं। इनसे ऊपर के सभी देश मुख्यत: अपनी पूँजी और तकनीक के दम पर और उदारीकरण की नीतियों के जरिये इन्हे असमान समझौतों में बाँधकर इनके संसाधनों को लूटते हैं। भारत इन्ही में से एक है।
दुनिया लगातार बदलती रहती है। भारत की आजादी के बाद से सन 1990 तक दुनिया में दो ताकतवर खेमे–– सोवियत रूस और अमरीका के खेमे मौजूद थे। दुनिया दो ध्रुवीय थी। बहुत सारे कमजोर देश अपनी स्वायत्ता को अधिकतम बनाये रखने के लिए गुट निरपेक्ष आन्दोलन में संगठित थे और स्पष्ट रूप से किसी भी ताकतवर खेमे के साथ नहीं जुड़े थे। भारत इसके अगुआ देशों में था। इसके साथ कमजोर ही सही लेकिन बहुत से देशों की ताकत मौजूद थी जिसका वैश्विक सौदेबाजी में भारत को लाभ मिलता था। अनाज जैसी मूलभूत जरूरत के मामले में परनिर्भरता और बहुत कमजोर आर्थिक हैसियत होते हुए भी भारत ने विदेश नीति में अपनी स्वायत्तता कायम रखी।
यह स्वायत्तता उसे मूलरूप से अपनी आत्मनिर्भरता की घरेलू नीति से हासिल हुई थी। अपने घरेलू उत्पादकों को बढ़ावा देने के लिए नियंत्रित अर्थव्यवस्था की नीति लागू की गयी थी। विदेशी मुद्रा की बचत के लिए जरूरत की अधिक से अधिक वस्तुओं का उत्पादन देश में ही करने पर जोर दिया गया। गैरजरूरी वस्तुओं और कृषि उत्पादों के आयात को हतोत्साहित किया गया। कई देशों के साथ माल के बादले माल देने के समझौते किये गये। सट्टेबाजी और सेवाक्षेत्र को नियंत्रित करके अर्थव्यवस्था को वास्तविक उत्पादन पर केन्द्रित किया गया। साम्राज्यवादी देशों से कड़ी शर्तों पर बड़े–बड़े कर्ज लेने के बजाय अपने ही जैसे कमजोर देशों से छोटे और आसान कर्ज लेकर काम चलाया जाता था। कुलमिलाकर साम्राज्यवादी देशों पर न्यूनतम निर्भरता की नीति अपनायी गयी। गुट निरपेक्षता की विदेश नीति इस घरेलू नीति के अनुकूल थी। इसके मुताबिक भारत कमजोर देशों के साथ एकताबद्ध रहने, पड़ोसियों के साथ बेहतर रिश्ते रखने, साम्राज्यवादी देशों द्वारा कमजोर देशों की बाँह मरोड़ने की कारगुजारियों का डटकर विरोध करने का खुला पक्षधर था। वह किसी ताकतवर के आगे नाक रगड़ने को मजबूर नहीं था।
1989 में सोवियत खेमा बिखर गया और अमरीका के नेतृत्व में एक–ध्रुवीय विश्व बना। यह दुनिया में दूसरे विश्व युद्ध के बाद का सबसे बड़ा और उसी जितना महत्वपूर्ण बदलाव था। भारत के शासकों ने संघर्ष के बजाय उन्ही साम्राज्यवादियों के आगे समर्पण कर दिया जिन्होंने भारत को 200 साल तक गुलाम बनाकर रखा था। इनकी डब्ल्यूटीओ, आयीएमएफ जैसी संस्थाओं के निर्देशों के मुताबिक अपनी आत्मनिर्भरता पर आधारित अर्थव्यवस्था का ढाँचा तोड़कर परनिर्भर, सट्टेबाजी और सेवा क्षेत्र पर केन्द्रित, बेलगाम बाजार की हिमायती अर्थव्यवस्था गढ़ी गयी। निश्चय ही अर्थव्यवस्था में यह बुनियादी बदलाव भारत के पूँजीपति वर्ग के हित में और मेहनतकश जनता के खिलाफ था।
अर्थव्यवस्था ही घरेलू नीति का आधार है और विदेश नीति घरेलू नीति का विस्तार। जब अर्थव्यवस्था साम्राज्यवादी संस्थाओं के निर्देशों से संचालित होने लगी तो पूरी घरेलू नीति और इसके साथ ही विदेश नीति की दिशा भी इसी के मुताबिक बदल गयी। भारत, जो पहले गुट निरपेक्ष आन्दोलन के जरिये साम्राज्यवादी गुंडागर्दी के खिलाफ कमजोर देशों के पक्ष में मजबूती से खड़ा होता था, अब मिमयाने लगा। बहुत से महत्वपूर्ण मुद्दों पर तो साम्राज्यवादियों के चाकर जैसा नजर आया, खासतौर पर इराक, अफगानिस्तान और लीबिया पर अमरीकी हमले के मामलों में। अमरीका के दबाव में ईरान जैसे मजबूत सहयोगियों से किनारा कर लिया। एसे दर्जनों उदाहरण दिये जा सकते हैं।
पिछले दशक से दुनिया फिर महत्वपूर्ण बदलावों से गुजर रही है। अमरीकी वर्चस्व वाली एक–ध्रुवीय दुनिया में बड़ी दरारें पड़ती नजर आ रही हैं। इसे रूस–चीन के गठजोड़ से तगड़ी चुनौती मिल रही है। 2008 में अमरीका में फूटे सबप्राइम संकट के बाद से सारे साम्राज्यवादी खेमे की अर्थव्यवस्थाएँ डाँवाडोल हैं। सस्ते विनिर्माण और कृषि उत्पादन में दूसरे और तीसरे पायदान के देशों पर उनकी निर्भरता काफी बढ़ गयी है।
यह स्थिति भारत के शासकों के अनुकूल है, लेकिन अपनी नपुंसकता, परनिर्भरता और मूर्खता के चलते वे इसका लाभ उठाने की स्थिति में नहीं हैं। इन्होंने विदेश नीति के मामले में भारत को बेपेंदी का लोटा बना दिया है। लफ्फाजी की हद यह है कि प्रधानमंत्री मोदी इसे बहु–पक्षीय विदेशनीति कहते हैं। वे यह कहते नहीं थकते कि भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्ययवस्थाओं में शामिल हो गया है, महाशक्ति बन गया है। शासक वर्ग के दृष्टिकोण से यह सच भी है। आज अपने विशाल बाजार, उत्पादन और भौगोलिक स्थिति के कारण अमरीका, चीन, रूस, तीनों के लिए भारत बहुत महत्वपूर्ण है। होना तो यह चाहिए कि तीनों के साथ रिश्ते में लाभ का पलड़ा भारत की ओर झुका हो, लेकिन इसके ठीक उलट हो रहा है। असल में, भारत की विदेश नीति अमरीका, रूस, चीन के त्रिभुज में कैद हो गयी है। भारत के शासक तीनों को खुश रखने के लिए मजबूर हैं।
भारत की विदेश नीति एतिहासिक दुर्दशा की शिकार है। सबसे करीबी पड़ोस की ही बात करें तो पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते इतिहास के सबसे बुरे दौर में हैं। मालदीव, नेपाल तक में इसकी स्थिति बेहद कमजोर हो चुकी है। पिछले सालों में म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, तीन जगह सत्ता पलट हुई, इन तीनों में ही चीन और अमरीका का टकराव तो साफ नजर आया, लेकिन भारत कहीं भी हालात को प्रभावित करता नहीं दिखा। अफगानिस्तान में भी इसकी भूमिका एक पिटे हुए मोहरे की है जिसे साइड में फेंक दिया गया है।
अपनी स्वतंत्र रणनीति के अभाव में भारत के शासक त्रिभुज के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ते रहते हैं। हाल ही की घटनाओं की बात करें तो सितम्बर में भारत और खाड़ी देशों की सहयोग समिति की पहली बैठक में विदेश मंत्री जयशंकर ने गाजा में निर्दाेष नागरिकों की मौत पर गहरा दुख जताया था। उन्होंने इजराइल–फिलिस्तीन के मामले में दो राष्ट्रों के सिद्धान्त और तुरन्त युद्ध विराम के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जाहिर की, लेकिन उसी समय भारत इजराइल को हथियार बेच रहा था जिनसे फिलिस्तीन के निर्दाेष नागरिकों की हत्या की जा रही थी। संयुक्त राष्ट्र में जब इजराइल से फिलिस्तीन की जमीन खाली करने और हथियार बेचने पर रोक के लिए प्रस्ताव लाया गया तो भारत वोटिंग से बाहर हो गया।
इससे पहले एक और मजेदार घटना हुई। जुलाई में मोदी पुतिन से मिलने रूस पहुँच गये। चारण–भाट की तरह उसका खूब गुणगान किया। उस समय वाशिंगटन में नाटो की बैठक चल रही थी जिसमें रूस को दुनिया में अलग–थलग करने पर चर्चा हो रही थी। वे रूस को खुश करने के लिए ठीक इसी मौके पर गये। इससे अमरीका की भृकुटी तन गयी। उसे शान्त करने के लिए अगले ही महीने मोदी, जयशंकर और अजित डोभाल दौड़े–दौड़े यूक्रेन गये और वही बेमतलब की बात कही कि भारत दोनों देशों के बीच शान्ति बहाल करने में अपनी भूमिका निभाने के लिए तैयार है। हालाँकि कोई भी पक्ष भारत से यह भूमिका निभाने के लिए नहीं कह रहा है। सारी दुनिया में मजाक बना। अमरीका को खुश करने के लिए फिर यही बात बेमौका, कजान में हुए ब्रिक्स के सम्मेलन में कह दी। पुतिन ने इसका कोई जवाब नहीं दिया और फिर मजाक बना। हो सकता है कि जानकार लोग तो अब भारत के विदेश नीति के दस्तावेजों को चुटकुलों की किताब के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हों।
चीन को घेरने के लिए अमरीका, आस्ट्रेलिया और जापान ने भारत को साथ लेकर ‘क्वाड’ नाम का गठबंधन बनाया है। मोदी इसको लेकर बहुत उत्साहित हैं। इसके जरिये अमरीका और उसके मित्र देशों के साथ सैन्य साझेदारी कायम करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि इससे चीन पर दबाव बना रहेगा। क्वाड के सैन्यकरण की भी तैयारी चल रही है। दूसरी तरफ जुलाई में भारत और चीन के विदेश मंत्रियों ने आपसी व्यापार को और ज्यादा बढ़ाने के लिए दो बार बातचीत की और ब्रिक्स के सम्मेलन से पहले यह सन्देश दिया कि भारत चीन–रूस गठबंधन के करीब आ गया है। रूस–चीन–भारत का एक त्रयी संगठन भी इसी समय आकार ले रहा है। इस बन्दर कूद को मोदी की महान रणनीति के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है।
दरअसल, भारत आज मुख्य रूप से वित्त और उसके आवागमन के माध्यमों के लिए अमरीका और उसके सहयोगी पश्चिमी देशों पर, सस्ते तेल और हथियारों के लिए रूस पर, सस्ते इलेक्ट्रॉनिक मालों के लिए चीन पर निर्भर है। यह निर्भरता लगातार बढ़ रही है। बहुपक्षीय सम्बन्धों में सन्तुलन की नीति के जरिये भारत के शासक रणनीतिक स्वायत्ता की रक्षा नहीं कर रहे हैं बल्कि अपनी बहुनिर्भरता में सन्तुलन कायम करने की उधेड़बुन में लगे हैं। वह किसी रणनीतिक स्वायत्ता का लाभ नहीं ले रहे हैं बल्कि अपनी परनिर्भरताओं के जाल में घिरे हैं।
भारत के शासकों के लिए आज तीन रास्ते हैं। वे अमरीकी खेमे से चिपके रह सकते हैं, जो सबसे बुरा रास्ता होगा। पिछले तीन दशक का दौर जो अमरीका और उसके साम्राज्यवादी गिरोह के विजयोन्माद का और दुनिया चपटी है तथा इतिहास का अन्त जैसी भ्रामक धारणाओं का दौर रहा है, इसके अन्त की घंटी बज चुकी है। समय इससे चिपकने का नहीं, बल्कि पिण्ड छुड़ाने का है। भारत के शासक यह जानते तो हैं, लेकिन उनकी आर्थिक और राजनीतिक मजबूरीयाँ यह करने नहीं देती। दूसरा रास्ता रूस–चीन–भारत गठजोड़ कायम करके दूसरे ध्रुव को मजबूत करने का है। लेकिन भारत के शासक जब चीन की विराट उत्पादक क्षमताओं, पूँजी और इसी के अनुरूप उसकी महत्वाकांक्षा को अपनी और रूस की चीन पर लगातार बढ़ती निर्भरता तथा भारत की भू–राजनीतिक स्थिति से जोड़कर देखते हैं तो वे डर जाते हैं। अपनी कमजोरियों के चलते इनका यह डर सही भी है।
तीसरा रास्ता भी है। वैश्विक राजनीति में आज भारत महत्वपूर्ण स्थान पर है। अगर वह घरेलू मोर्चे पर अधिकतम आत्मनिर्भरता की नीतियाँ अपनाये और कमजोर देशों का सहयोगी बनकर अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाये तो वह ‘स्विंग स्टेट’ या बे–पेंदी का लोटा होने से बच सकता है। लेकिन इसके लिए परनिर्भरता की नवउदारवादी नीतियों को त्यागना पड़ेगा। तात्कालिक और क्षुद्र स्वार्थपूर्ति की सोच से ग्रस्त भारत के शासक यह कभी नहीं कर सकते। कुल मिलाकर भारत के मौजूदा शासक भारत की विदेश नीति के संकट को केवल बढ़ा सकते हैं उसे संकट से उबार नहीं सकते। इस जिम्मेदारी को भविष्य में मेहनतकश वर्गों के बीच से उभरे, जनता के साथ नाभिनालबद्ध, साहसी और आत्मविश्वासी शासक ही पूरा करेंगे।
Leave a Comment
लेखक के अन्य लेख
- राजनीति
-
- भँवर में भारत की विदेश नीति 1 Jan, 2025
- मणिपुर हिंसा : हिन्दुत्व के प्रयोग का एक और दुष्परिणाम 19 Jun, 2023
- सीबीआई विवाद : तोता से कारिन्दा बनाने की कथा 14 Mar, 2019
- हमें मासूम फिलिस्तीनियों के कत्ल का भागीदार मत बनाइये, मोदी जी 17 Nov, 2023
- समाचार-विचार
-
- बोल्सोनारो की नयी मुसीबत 10 Jun, 2020
- भूख सूचकांक में भारत अव्वल 17 Nov, 2023
- रत्नागिरी रिफाइनरी परियोजना का जोरदार विरोध 15 Aug, 2018
- “तबलीगी जमात को बलि का बकरा बनाया गया”–– बम्बई उच्च न्यायालय 23 Sep, 2020
- राजनीतिक अर्थशास्त्र
-
- डॉलर महाप्रभु का दुनिया पर वर्चस्व 17 Feb, 2023
- अन्तरराष्ट्रीय
-
- अफगानिस्तान : साम्राज्यवादी तबाही की मिसाल 16 Nov, 2021
- अमरीका–ईरान टकराव की दिशा 15 Jul, 2019
- अमरीकी धमकियों के प्रति भारत का रूख, क्या विश्व व्यवस्था में बदलाव का संकेत है? 3 Dec, 2018
- कोरोना काल में दक्षिण चीन सागर का गहराता विवाद 23 Sep, 2020
- पश्चिमी साम्राज्यवादियों ने यूक्रेन युद्ध को अपरिहार्य बना दिया 13 Apr, 2022
- पेरू का संकट : साम्राज्यवादी नव उदारवादी नीतियों का अनिवार्य परिणाम 14 Jan, 2021
- बर्मा में सत्ता संघर्ष और अन्तरराष्ट्रीय खेमेबन्दी 21 Jun, 2021
- बोलीविया में नस्लवादी तख्तापलट 8 Feb, 2020
- भारत–अमरीका 2–2 वार्ता के निहितार्थ 14 Jan, 2021
- सऊदी अरब के तेल संस्थानों पर हमला: पश्चिमी एशिया में अमरीकी साम्राज्यवाद के पतन का संकेत 15 Oct, 2019