अक्टूबर 2026, अंक 51 में प्रकाशित

अमरीका ईरान समझौता –– अजहर

अमरीका और ईरान के बीच जारी अन्तरिम समझौते की मियाद अगस्त में पूरी हो जाने के बाद अमरीका ने सितम्बर की शुरुआत में ईरान पर फिर से हमला शुरू कर दिया। दोनों देशों के बीच जून 2026 में एक अन्तरिम समझौता हुआ था जिसका मकसद सैन्य संघर्ष को रोकना, ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बहाल करना, ईरान पर लगे प्रतिबन्धों को हटाना, उसके परमाणु कार्यक्रमों को नियंत्रित करना और ईरान को आर्थिक सहायता पहुँचाना था। जून में हुआ अन्तरिम समझौता कोई अन्तिम समझौता नहीं, बल्कि अगले 60 दिनों में अन्तिम समझौते के लिए बातचीत शुरू करने की पूर्व पीठिका था, लेकिन 60 दिन बीत जाने के बावजूद कोई नया समझौता नहीं हो पाया और अमरीका ने ईरान पर फिर से हमले शुरू कर दिये। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने 1 सितम्बर को कहा कि अगर अमरीका अन्तरिम समझौते के प्रतिबद्धताओं को मानता है तो ईरान भी समझौते की शर्तों का पालन करने को तैयार है।

अमरीका और ईरान के बीच का तनाव 1979 की इस्लामी क्रान्ति से ही चला आ रहा है। इस क्रान्ति ने अमरीका समर्थित ईरान के शाह की सत्ता को खत्म कर दिया था। इस क्रान्ति के बाद से ईरान ने स्वतंत्रता और बाहरी हस्तक्षेप के विरोध को अपनी वैचारिक पहचान का केन्द्रीय हिस्सा बना लिया। इस्लामी क्रान्ति के बाद ईरान ने एक ऐसी विदेश नीति अपनायी जिसका मकसद देश को अमरीका के अधीन न करना और किसी ताकतवर देश का पिछलग्गू न बनना था। इसी वजह से ईरान मध्य पूर्व में अमरीकी सैन्य उपस्थिति का विरोध करता आया है और कठोर अमरीकी प्रतिबन्धों के बावजूद अपनी स्वतन्त्र आर्थिक व्यवस्था विकसित करने की कोशिश करता रहा है। इसी कोशिश में उसने रूस और चीन से सम्बन्ध बढ़ाये और मध्य–पूर्व में अपने राजनीतिक और सैन्य प्रभाव का विस्तार किया। अमरीका ईरान की इन सभी योजनाओं को मध्य–पूर्व में अपने खिलाफ एक चुनौती के तौर पर देखता है। इस्लामी क्रान्ति के बाद से अमरीका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को भी सुरक्षा के लिए खतरा मानता है जबकि 1950–60 के दशकों में अमरीका ने खुद ईरान के परमाणु कार्यक्रम का समर्थन किया था। ईरान परमाणु तकनीकी क्षमता को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और प्रतिरोधक क्षमता मानता है। परमाणु कार्यक्रम भी अमरीका ईरान संघर्ष का एक संवेदनशील मुद्दा है।

2002 में ईरान के गुप्त परमाणु कार्यक्रम की जानकारी सामने आने के बाद अमरीका ने इसे अन्तरराष्ट्रीय संकट के रूप में देखा और और इस बात को लेकर विवाद बढ़ा। पश्चिमी मीडिया और अमरीका ने ईरान को एक परमाणु खतरे के रूप में प्रस्तुत करना शुरू कर दिया। ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नियंत्रित करने के लिए ओबामा के कार्यकाल में 2013 में हसन रूहानी के ईरानी राष्ट्रपति बनने के बाद अमरीका और ईरान के बीच सीधे सम्पर्क बढ़े और बातचीत शुरू हुई। इस दौरान दोनों पक्षों के बीच कुछ सहमति बनी, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अस्थाई रोक लगाना और ईरान पर लगे कुछ आर्थिक प्रतिबन्धों में राहत देना शामिल था।

इसी आधार पर 14 जुलाई 2015 को एक जॉइण्ट कंप्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) पर सहमति बनी, जिसमें ईरान और अमरीका के साथ ब्रिटेन, फ्रांस, रूस, चीन, जर्मनी और यूरोपीय संघ शामिल थे। इसके तहत ईरान ने अपनी यूरेनियम संवर्धन की क्षमता और मात्रा को सीमित करने, संवर्धित यूरेनियम और भारी पानी के भण्डार को कम करने के साथ अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के व्यापक निरीक्षण में सहयोग करने पर सहमति जतायी। बदले में ईरान को अन्तरराष्ट्रीय व्यापार और तेल निर्यात, वित्तीय लेन–देन, आदि आर्थिक लाभ देने की बात की गयी।

जनवरी 2016 में अन्तरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी ने पुष्टि की कि ईरान ने समझौते के तहत जरूरी कदम उठाये हैं, लेकिन अमरीका ने ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल, क्षेत्रीय प्रभाव और हिजबुल्ला के साथ सम्पर्क का बहाना बनाकर डोनाल्ड ट्रम्प के शासनकाल में मई 2018 में 2015 के समझौते से अपने आप को अलग कर लिया। इसके बाद अमरीका ने ईरान पर और अधिक प्रतिबन्ध लगाने शुरू कर दिये। अमरीका का तर्क था कि यह समझौता ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को पर्याप्त रूप से रोकने में नाकाम है। वहीं ईरान ने आरोप लगाया कि अमरीका ने समझौते के प्रति अपनी प्रतिबद्धता तोड़ी है। अमरीका के इस समझौते से अलग होने के बाद ईरान भी समझौते के शर्तों को मानने से इनकार करना शुरू कर दिया और अपने यूरेनियम संवर्धन की क्षमता को बढ़ाना शुरू कर दिया, जिसके चलते विवाद और गहराता गया। 2024–25 में यह तनाव अपने चरम पर पहुँच गया।

आखिरकार, 28 फरवरी 2026 को साम्राज्यवादी अमरीका और उसके लठैत इजराइल ने मिलकर ईरान के साथ सीधा युद्ध छेड़ दिया। अमरीका ने ईरान पर हमले के पीछे यह तर्क दिया कि ईरान परमाणु हथियार बनाने के करीब है और हमले का उद्देश्य ईरान के परमाणु क्षमता को खत्म करना है। युद्ध के पहले ही दिन ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेयी सहित कई बड़े नेताओं की हत्या कर दी गयी। अमरीका का मानना था कि सर्वोच्च नेता की हत्या करने के बाद ईरानी जनता सत्ता के खिलाफ खड़ी हो जायेगी और तख्ता पलट आसान हो जाएगा।

अमरीका चाहता था कि वेनेजुएला की तरह ईरान पर भी हमला करके आनन–फानन में उस पर कब्जा कर लिया जाये या तख्ता पलट कर दिया जाये, लेकिन यह दाँव अमरीका को बहुत भारी पड़ा है। ईरान ने तत्काल कार्रवाई करते हुए मध्य–पूर्व में अमरीकी सैन्य अड्डे और इजराइल पर मिसाइल हमले करके उन्हें गहरी चोट पहुँचायी है। इससे मध्य–पूर्व में अमरीका के साख को भी बहुत बड़ा धक्का लगा है। ईरान को दुनिया के नक्शे से मिटा देने और पाषाण युग में पहुँचा देने जैसी धमकियों के बावजूद ईरान ने घुटने टेकने से इनकार करते हुए अमरीका और इजराइल को मुँहतोड़ जवाब दिया है।

साम्राज्यवादी अमरीका ने कई स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को तबाह करके और हजारों लोगों की जान लेकर सोचा था कि वह ईरान को घुटनों पर ला देगा, लेकिन ईरान की दृढ़ता और हौसले के सामने अमरीका को मुँह की खानी पड़ी है। आयरन डोम के नीचे छिपकर इजराइल के सुरक्षित रहने का दावा ईरान की मिसाइलों ने तार–तार कर दिया जिसके चलते खुद नेतन्याहू भी बंकरों में छिपता फिरता रहा।

ट्रम्प की तमाम कोशिशों और धमकियों के बावजूद दुनिया का कोई भी देश ईरान से जंग के लिए अमरीका के साथ खड़ा नहीं हुआ। इस युद्ध के दौरान ईरान ने पूरे मध्य–पूर्व में अपना प्रभाव और बढ़ाया है और होर्मुज जलडमरूमध्य पर अपना नियंत्रण कायम कर लिया है। ईरान ने पूरी दुनिया के सामने अपनी ताकत और हिम्मत का लोहा मनवाया है और पूरी भू–राजनीति को एक नया मोड़ दे दिया है।

ईरान के ऊर्जा संयंत्रों पर अमरीकी हमले की धमकी के बाद ईरानी जनता ऊर्जा संयंत्रों के चारों ओर मानव श्रृंखला बनाकर खड़ी हो गयी और दुनिया के सामने साहस का एक नायाब मिसाल पेश किया। अमरीका की दादागिरी और उसके लठैत इजराइल के आयरन डोम रखने का दम्भ टूट गया है। इस्लामी क्रान्ति के बाद से ही अमरीका ने ईरान को धमकाने, उस पर प्रतिबन्ध लगाने और उसके नेताओं, वैज्ञानिकों और सैन्य अफसरों की हत्या और तख्ता पलट करने की कोशिशें करता रहा है। लेकिन इस युद्ध में ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण करके वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का गला दबा दिया है जिसके चलते अमरीका समेत यूरोप और एशिया के कई बड़े देश छटपटा रहे हैं और अमरीका पर जल्द से जल्द युद्ध खत्म करने और ईरान के साथ समझौता करने का दबाव बना रहे हैं।

अमरीका समेत दुनिया के तमाम देशों का मानना था कि ईरान अमरीका से पारम्परिक युद्ध में मुकाबला नहीं कर सकता, क्योंकि अमरीका के पास विशाल नौसेना, वायु सेवा और तकनीकी संसाधन हैं। ईरान को भी यह बात बखूबी पता है कि वह अमरीका को पराजित तो नहीं कर सकता, लेकिन वह अमरीका को आसानी से अपने हित साधने भी नहीं देगा। इसलिए वह अमरीका के साथ सीधी बराबरी करने के बजाय प्रतिरोधक और असममित युद्ध लड़ते हुए बढ़त बनाये हुए है। युद्ध के शुरुआती दिनों में अमरीका का भी मानना था कि वह युद्ध को चार हफ्ते के अन्दर खत्म कर देगा। डोनाल्ड ट्रम्प ने युद्ध शुरू होने के बाद से कई बार यह दावा किया कि अमरीका ने युद्ध के उद्देश्यों को पूरा कर लिया है और वे युद्ध जीत गये हैं। इन सब के बावजूद अमरीका को ईरान के साथ जून में एक अन्तरिम समझौता करना पड़ा।

सवाल यह है कि क्या एक साम्राज्यवादी देश और एक पिछड़े देश के बीच कोई समझौता सम्भव है? क्या ईरान के परमाणु कार्यक्रम के खात्मे के साथ यह युद्ध खत्म हो जाएगा? ईरान के पास विशाल तेल और गैस के भण्डार हैं। वह फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरू के पास स्थित है। वह मध्य एशिया, दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया और भूमध्य सागर के बीच एक महत्वपूर्ण भू–राजनीतिक स्थान रखता है, इसलिए ईरान पर नियंत्रण केवल परमाणु नीति का सवाल नहीं है। निश्चित रूप से परमाणु हथियारों का प्रसार गम्भीर अन्तरराष्ट्रीय समस्या और मानवता के लिए खतरा है, लेकिन जिन साम्राज्यवादी देशों के पास परमाणु हथियारों का जखीरा है और वे इनके इस्तेमाल की धमकी देने से गुरेज भी नहीं करते, वही वैश्विक शान्ति के सबसे बड़े पैरोकार बन रहे हैं। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ईरान पर हमला ट्रम्प के व्यक्तिगत सनक का नतीजा है जबकि पूरी दुनिया देख रही है कि पिछले दो–तीन दशकों में अमरीकी साम्राज्यवाद ने कैसे पूरे मध्य–पूर्व को तबाह और बर्बाद किया है। ईरान पर हमला ट्रम्प के व्यक्तिगत सनक का नतीजा नहीं, बल्कि अमरीकी साम्राज्यवाद का चरित्र है। साम्राज्यवादी देश दुनिया के संसाधनों, बाजरों और श्रम को लूटने के लिए लालायित रहते हैं और इसके लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसके लिए भले ही उन्हें कमजोर और पिछड़े देशों पर हमला करके उन्हें बर्बाद ही क्यों न कर देना हो या दूसरे साम्राज्यवादी देशों के साथ युद्ध ही क्यों न करना पड़े।

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