जुलाई 2025, अंक 48 में प्रकाशित

दो सालों से हिंसा की लपटों में झुलसता मणिपुर

पिछले 3 मई को मणिपुर हिंसा को भड़के पूरे 2 साल गुजर चुके हैं। आज भी बड़ी संख्या में लोग वहाँ राहत शिविरों में अपनी जिन्दगी गुजारने को मजबूर हैं। न तो पर्याप्त चिकित्सा उपलब्ध है और न ही दो वक्त की रोटी। बीए की एक छात्रा ने मीडिया से बात करते हुए दुख और गुस्से में बताया कि अगर सरकार वास्तव में शान्ति चाहती है, तो उसे हमारे हाथों में किताबें पकड़ानी चाहिए, न कि एक–दूसरे को मारने के लिए बन्दूकें। हम बेहतर भविष्य का सपना भी नहीं देख सकते। हर दिन कुछ भयानक हो जाता है।

7 नवम्बर को जिरीबाम जिले में स्कूल टीचर की हत्या आज भी हम सबके दिलों को दहला दिया, जब 31 साल की हमार आदिवासी समुदाय की महिला की मैतेई समुदाय के लोगों ने निर्मम हत्या कर दी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह सामने आया कि महिला के शरीर में कीलें ठोंकी गयीं। वह चीखती–चिल्लाती रही, लेकिन हत्यारे उसके साथ बर्बरता करते रहे। उन्होंने बर्बरता की सारी हदें तब पार कर दीं, जब उन्होंने उस महिला को उसके पति और तीन छोटे बच्चों के साथ उसी के घर मे जिन्दा जला दिया।

इसी घटना के चार दिन बाद जिरीबाम जिले के बोरोबेकरा पुलिस स्टेशन पर कुकी समुदाय के लोगों ने हमला किया। इसके साथ ही मैतेई समुदाय के राहत शिविरों पर भी हमला किया गया। हमले की जवाबी कार्यवाई में 10 हथियारबन्द कुकी “ग्राम स्वयंसेवकों” को सीआरपीएफ के जवानों ने मार डाला। पुलिस मुठभेड़ की जाँच से पता चला कि मुठभेड़ में मरने वाले 10 लोगों में से 8 लोग एक ही गाँव, चुराचाँदपुर के रहने वाले थे।

मणिपुर सरकार ने दोनों समुदायों के बीच लगी आग को बुझाने के बजाय लम्बे समय तक आग में घी डालने का काम किया। एक ओर जहाँ मुख्यमंत्री बीरेन सिंह का बम मारने वाला ऑडियो क्लिप पूरे देश में तेजी से वायरल हुआ, वहीं दूसरी ओर उसने 19 नवम्बर को बयान दिया कि तीन महिलाओं और तीन बच्चों की हत्या ‘कुकी आतंकवादियों’ ने की है। इस बयान ने कुकी समुदाय का सरकार पर से भरोसा उठा दिया।

इन घटनाओं के बाद से दोनों ही समुदाय के लोगों में भारी असन्तोष बढ़ गया। इम्फाल में पहली बार मैतेई लोग सड़क पर उतरकर हिंसक विरोध प्रदर्शन करने लगे। सरकार की नाकामी और बद–इन्तजामी के खिलाफ मैतई लोगों का गुस्सा एक बार फिर फूटा। उन्होंने 16 नवम्बर की शाम को मुख्यमंत्री के साथ ही कई मंत्रियों और भाजपा के ज्यादातर विधायकों के घरों पर हमले किये।

आखिरकार लगातार बढ़ते राजनीतिक और सामाजिक दबाव के चलते 21 महीने से चली आ रही बीरेन सिंह की विभाजनकारी मणिपुर सरकार ने 8 फरवरी को अपने 14 विधायकों के साथ इस्तीफा सौंप दिया। 13 फरवरी को राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद भी मणिपुर में हिंसा की घटनाएँ कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। 8 मार्च को फिर से दोनों समुदायों के बीच हिंसा भड़क उठी, जिसमे कई लोग घायल हो गये और एक व्यक्ति को अपनी जान गवानी पड़ी। 19 मार्च को भी चुराचाँदपुर जिले की हिंसा में एक व्यक्ति की मौत हो गयी। 12 अप्रैल को इसी जिले में एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी गयी। इससे पहले भी मार्च की शुरुआत में 10 साल की एक लड़की और फिर राहत शिविर मे रहने वाली 19 साल की लड़की की भी बलात्कार कर हत्या कर दी गयी थी।

राष्ट्रपति शासन लगने के बाद मणिपुर के जमीनी हालात में बड़ा बदलाव यह आया है कि अब मणिपुर के स्थानीय लोग मीडिया से अपनी बातें खुलकर नहीं बता रहे हैं। वे अपनी ओर से बोलने के लिए किसी प्रतिनिधि को नियुक्त करते हैं या बात करने से ही इनकार कर देते हैं। उनका मानना है कि मीडिया से बात करने से कुछ बदलेगा नहीं और उन्हें यकीन हो चला है कि केन्द्र या राज्य सरकार को मणिपुर की कोई चिन्ता नहीं।

पिछले 24 महीनों से मणिपुर लगातार हिंसा और प्रतिहिंसा की लपटों मंे झुलस रहा है। इसमें अब तक 260 से अधिक लोग काल के गाल में समा गये हैं और 60,000 से ज्यादा लोगों को अपने खून–पसीने की कमाई से बनाया घर छोड़कर राहत शिविरों में रहने को मजबूर होना पड़ा। इतना सब होने बाद भी, पहले राज्य सरकार और अब राष्ट्रपति शासन अन्धे तमाशबीन बने बैठे हैं।

हमने देश–विदेश के अंक 43 और 44 में मणिपुर के हालात के बारे में बताया था। अब तक राज्य और केन्द्र सरकारें वहाँ पचास हजार से भी ज्यादा सैन्यबल तैनात कर चुकी हैं, लेकिन वहाँ से आती खबरों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि मणिपुर में गृहयुद्ध की स्थिति चल रही है। आज स्थिति इस कगार पर पहुँच गयी है कि प्रधानमंत्री तक मणिपुर जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। मणिपुर को आज एक ऐसे राजनीतिक समाधान की जरूरत है जिसके केन्द्र मे मानव जिन्दगी और विभिन्न समुदायों की एकता सर्वाेपरि हो।

Leave a Comment

लेखक के अन्य लेख

जीवन और कर्म
समाचार-विचार
राजनीतिक अर्थशास्त्र
अन्तरराष्ट्रीय
राजनीति